Friday, December 31, 2021

सुनहरा कल

सुनहरा कल

मास बीते,दिवस बीते,बीत रहे हैं कल।
कल के पहर-घंटे बीते,बीत रहे हर पल।
बीतते कल की हर घड़ी पहर कहता-
धीर धरो अब आने वाला है सुनहरा कल।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, December 30, 2021

चुगली

चुगली

चुगलखोर जब-तक न चुगली करे,
जब-तक उसका उदर ना भरे।
इधर से उधर वह मारा फिरे।
भटककर-अटककर किसी की सदा,
किसी-न-किसी से शिकायत करे।

जनों को जनों से लडा़ते चले,
नमक-मिर्च बातों में वह लगा।
चुगली-विधा में महारत उसे,
महाज्ञानी-शातिर वह है भला।
कानाफूसी सबसे सदा ही करे,
अपनापन का हमेशा दम है भरे।
चुगलखोर जब -तक न चुगली करें,
जब-तक उसका उधर न भरे।

दूजे के घर महाभारत मचा,
मधुर वाणियों से मन बहला।
मीठी-जहर का चूरण खिला,
लड़ाता अपनों से मतभेद करा।
भाई को भाई से लड़ाई करा।
बक-झक पति-पत्नी में करा।
चुगलखोर जब तक न चुगली करे।
जब-तक उसका उदर न भरे।

मानव का चुगली बड़ा रोग है,
जिसका कहीं भी न होता इलाज।
वैद्य-ओझा भी कुछ न करें,
चिकित्सक भी कहते है लाइलाज।
बनाते हैं रिश्ते में सदा वे दरार।
बिना फीस के हैं न पाते पगार।
चुगलखोर जब तक न चुगली करे,
तब तक उसका उदर न भरे।
               सुजाता प्रिय समृद्धि
                 स्वरचित, मौलिक

Wednesday, December 29, 2021

अंग्रेजियत



अंग्रेजियत

अंग्रेजों को भगा दिए पर,
अंग्रेजियत भगा न पाये हम।
संस्कृत,हिन्दी,मगही भूले, 
अंग्रेजी भुला न पाये हम।

नमस्कार-प्रणाम करना भूले,
करते हम हाय और हैलो।
दोस्त-सखी सब फ्रेंड बने हैं,
सहपाठी बन गये क्लासफेलो।

चार अक्षर अंग्रेजी बोलकर,
अपनी शान दिखाते हम।
मम्मी-डैडी कह मां-पिता का,
झूठा मान बढ़ाते हम।

चाचा-चाची के रिश्ते को,
तनिक निभा न पातेे हम।
अंकल-अंटी कह अंग्रेजी के,
दलदल में मुफ्त गिराते हम।

भाई को ब्रदर हम कहते,
बहना को कहते हैं सिस्टर।
श्रीमान-श्रीमती कहना छोड़,
कहने लगे मिसेज-मिस्टर।

पत्नी को गृहिणी न कहकर,
कहते हैं हम हाउस वाइफ।
रोते पति हसबैंड कहाकर,
मजबूर हुई उनकी लाइफ।

पुलाव बन गया फ्राइड राइस,
तबा रोटियां बन गयीं नान।
अपने स्वादिष्ट देशी भोजन की,
नहीं रही अब कोई पहचान।

साड़ी-चुनरी छोड़ दुशाले,
पहनते हम वन पीस नाईटी।
धोती-कुर्ते त्यागकर पहनते,
फटी जिन्स वह माइटी।

टोपी पगड़ी छोड़ चले हम,
पहनते हैं हम सिर में हैट।
यह ,वह बोलना हम भूलें,
मुंह बना कहते दिस-दैट।

बिलायती चूहे खरगोश को,
विस्तर पर चढ़ा सुलाते हैं।
आदमी के बच्चों को देख,
घृणा से मुंह बनाते हैं।

गैया मां को काऊ हैं कहते,
बछड़े काफ कहाते हैं।
कुत्ते को डागी कह प्यार से,
गोदी में ले घूमाते हैं।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
  स्वरचित, मौलिक

Monday, December 27, 2021

रक्षा का कर्तव्य

रक्षा का कर्तव्य

जब पाण्डव वनवास में थे,तो दुर्वासा ऋषि दुर्योधन के घर पधारे। दुर्योधन ने उनकी खूब आवभगत की। क्योंकि,वह जानता था कि दुर्वासा ऋषि बड़े क्रोधि स्वभाव के हैं। आतिथ्य में किसी भी प्रकार की कोई कमी होने पर तुरंत श्राप दे डालते हैं।उसके आदर -सत्कार से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उससे कोई वरदान मांगने के लिए कहा। दुर्योधन कब चूकने वाला था। उसने हाथ जोड़ते हुए उनसे कहा-आपके आशीर्वाद से मुझे किसी भी चीज की कमी नहीं। फिर भी आप चाहते हैं कि मैं आपसे कोई वर मांगू, तो बस इतना कृपा करिए की जिस प्रकार आप हमारे यहां पधारे,उसी प्रकार वन में रह रहे हमारे भाइयों के यहां भी पधारें। दुर्वासा ऋषि ने एमवस्तु कहां और वे वन में अर्जुन की कुटिया पर पधारे और अर्जुन से बोले -मेरे साथ मेरे दस हजार शिष्य हैं।हम सभी नदी में स्नान कर आते हैं,तब तक हम सभी के लिए भोजन का प्रबंध हो जाना चाहिए।यह सुन द्रौपदी बहुत परेशान हो गयी।वह सोच रही थी इतने सारे लोगों को भोजन कैसे करवा पाएगी। वनवास में उन्हें भोजन की दिक्कत हुई तब श्रीकृष्ण ने उन्हें एक अक्षय-पात्र प्रदान किया था।उस अक्षय-पात्र की यह विशेषता थी कि उसमें थोड़ा अन्न डालकर भी पकाया जाता तब भी चाहे जितने लोगों को भोजन करवाया जा सकता है। लेकिन उस पात्र को मांजने के पूर्व तक।दौपदी घर के सभी सदस्यों को भोजन कराने के पाश्चात् उस पात्र को मांज चुकी थी। अब कुछ नहीं हो सकता था। चिंतातुर द्रौपदी ने अपनी इस विषम घड़ी में करुणाकार भाई श्रीकृष्ण को स्मरण किया।बहन के स्मरण-मात्र से श्रीकृष्ण तुरंत प्रकट हुए और अंतर्यामी होते हुए भी द्रौपदी द्वारा याद करने का प्रयोजन पूछा।
दौपदी ने दुर्वासा ऋषि के आगमन से आई परेशानियों को उनके समक्ष रखते हुए कहा-मैं आपका दिया गया।अक्षय-पात्र मांजकर रख चुकी हूं।आज उससे किसी को भोजन नहीं करवाया जा सकता।
श्रीकृष्ण ने कहा-बहन मुझे एक बार वह पात्र दिखा तो। तब  द्रौपदी ने वह पात्र लाकर दिया। श्रीकृष्ण ने उस पात्र के अंदर झांककर देखा। उसके अंदर भोजन का एक कण लगा हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने भोजन के उस कण को निकालकर अपने मुंह में रखा और ऐसी डकार लगायी कि दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों के पेट से भूख की ज्वाला शांत हो गई।भोजन की अधिकता से वे नदी किनारे लेटकर सुस्ताने लगे तथा अर्जुन के घर भोजन के लिए जाने से मना कर दिया। तब दुर्वासा ऋषि ने अपने एक शिष्य द्वारा अर्जुन के घर यह खबर भिजवाई कि हम भोजन करने नहीं आ रहे ,हमें किसी अन्य शिष्य के घर जाने है। द्रौपदी ने राहत की सांस ली और श्रीकृष्ण के चरणों में शीश नवाकर बोली-हे संकटहारी, कृपालु माधव ! आज आपने हमारी लाज रखकर बहुत बड़ा उपकार किया नहीं तो क्रोधी ऋषि भूख से तिलमिला कर जाने हमें कौन-सा श्राप दे डालते।हम पहले ही अभिशापित जीवन जी रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा-हे बहन मैंने तुम पर कोई उपकार नहीं किया है। बहनों का संकट हरना,मदद और रक्षा करना प्रत्येक भाई का परम कर्तव्य है। मैंने तो सिर्फ अपने कर्तव्यों का पालन किया है।यह सिर्फ मेरा भातृत्व-भाव है। तुम्हें जब भी कोई परेशानी हो, मुझे एक बार याद जरूर करो। तुम्हारे हर कष्ट का निवारण मैं करूंगा।यह कह लें वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
उन्होंने अपना वचन हर समय निभाया।उनकी जीता-जागता उदाहरण नीचे प्रस्तुत है।
युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ में परिवार के सभी सदस्यों को उनका कार्य भार सौंपा जा रहा था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा-मैं अतिथियों के जूते उतार कर यथास्थान रखूंगा और भोज के झूठे पत्तलों को उठाकर फेंकूंगा। उन्होंने अपना कार्य हंसते-हंसते भलि-प्रकार किया।सभी लोगों की दृष्टि में उनका सम्मान पहले से ज्यादा बढ़ गया।यज्ञ के समय जब अग्र-पूजा की बात कही तो,सभी ने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए श्रीकृष्ण  को चयन किया, क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत के पालक एवं रक्षक हैं। श्रीकृष्ण का इतना आदर-सम्मान देख उनके फुफेरे भाई शिशुपाल ने ईर्ष्या वश उन्हें काफी भला-बुरा कहने लगा और भद्दी गालियां देने लगा। श्रीकृष्ण शांत मन से उसकी गालियां सुनते रहे क्योंकि उन्होंने शिशुपाल की माता को यह वचन दिया था कि शिशुपाल की सौ गलतियां माफ़ कर दूंगा। लेकिन जब शिशुपाल ने उन्हें सौ से अधिक गालियां दे डाली तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उसके सिर को उसके धड़ से अलग कर दिया। सुदर्शन चक्र की गतिशीलता से श्रीकृष्ण की उंगलियां घायल हो गयीं।उनकी घायल उंगलियों को देख द्रौपदी ने झट अपनी साड़ी के पल्लू फाड़े और श्रीकृष्ण की घायल उंगलियों में लपेटकर बांध दिए।बांधे जाने के कारण श्रीकृष्ण की घायल उंगलियों के दर्द घट गये। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी द्वारा बांधे गये साड़ी के टुकड़े को बहन द्वारा बांधा गया रक्षासूत्र मान यह संकल्प लिया कि जब भी मेरी बहन पर कोई संकट आएगा।उस संकट से उसकी रक्षा अवश्य करूंगा।
जब कौरवों ने चौपड़ के खेल में पांडवों को पराजित करते हुए उससे धन की मांग की तब अर्जुन ने कहा- अब मैं निर्धन कहां से धन दे सकता हूं।सारे धन तो जूए में आपको हार कर दे दी। दुर्योधन ने मजाक स्वरूप ललकारते हुए कहा-अभी तो आपके पास द्रौपदी भाभी जैसा धन है। उन्हें दांव पर लगा दें। फिर क्या था-जीत की ललसा में अर्जुन ने दौपदी को दांव पर लगा दिया। दुर्योधन के मामा शकुनि की दुष्चक्र से वे एक बार फिर बूरी तरह पराजित हुए। और सभा में द्रौपदी को खींच कर लाया गया। द्रौपदी को देखते ही दुर्योधन के कानों में उसके द्वारा बोले गए तीखे बोल ' अंधे का पुत्र अंधा ही न होगा।' गूंजने लगा और वह बदले की आग में जलता हुआ अपने भाई दु:शासन को भरी सभा में उसका चीर-हरण करने के लिए कहा। दौपदी ने अपनी लाज की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और भगवान श्रीकृष्ण ने वहां प्रकट होकर द्रौपदी का चीर बढ़ाने लगे। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी द्वारा बांधे गए उस साड़ी के टुकड़े को ही इतना विस्तार दिया कि दु: शासन खींचते-खीचते तक गया।सभा में साड़ी की बहुत बड़ी ढ़ेर लग गई लेकिन द्रोपदी के वदन निर्वस्त्र न हुए।इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने एक भाई के रूप में अपनी बहन की हर प्रकार की रक्षा का कर्तव्य निभाया।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Friday, December 24, 2021

तुलसी पूजन



तुलसी पूजन 

तुलसी की महिमा अपार,
चलो सखी तुलसी पूजन को।
कर लो तू सोलह श्रृंगार,
चलो सखी तुलसी पूजन को।

हर घर में माता तुलसी बिराजे।
हरी-हरी डाली,श्याम पत्र साजे।
शोभे सकल संसार,चलो सखी.....

गंगा जल से लोटक भरकर।
तुलसी-जड़ में जल अर्पण कर।
तुलसी का कर विस्तार,चलो सखी.....

सिंदूर,अक्षत,,पुष्प चढ़ाओ।
दाख-छुहारा भोग लगाओ।
कपूर से आरती उतार,चलो सखी.....

तुलसी की सेवा राम जी को भाबे।
राम जी को भाबे,कृष्ण को सुहाबे।
शालिग्राम जी लिए अवतार,चलो सखी.....

तुलसी महिमा सबको सुनाओ।
भक्ति-भाव से भजन तू गाओ।
कर लो जय-जयकार,चलो सखी.....

तुलसी मां को शीश नवाकर।
वर मांगो दोनों हाथ उठाकर। 
आशीष मिलेगा अपार,चलो सखी.....
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित,मौलिक

Wednesday, December 22, 2021

सर्वश्रेष्ठ शासक

सर्वश्रेष्ठ शासक

मगध साम्राज्य का विस्तार में सहयोग करने के हेतु चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने अधिनस्थ सम्राटों की एक सभा आयोजित की। इसमें सहयोगी सम्राटों को उनकी सहयोग की स्तर के आधार पर सम्मानित करने की भी व्यवस्था थी।इस पुनीत कार्य के लिए उन्होंने अपने राजनैतिक गुरु चाणक्य को आमंत्रित किया।
निर्धारित दिवस इस आयोजन में उपस्थित सभी सम्राट अपने -अपने क्षेत्र में अपना सहयोग प्रदान करने की बात बताई। गूरु चाणक्य के सहयोगी सभी शासकों द्वारा सहयोग की तालिका  एवं सारे विवरण अंकित कर इकट्ठा करते जाते।
प्रथम सम्राट ने अपनी विस्तृत सैन्य प्रणाली की व्याख्या करते हुए महाराजा को सैन्य  सहयोग प्रदान करने की बात बताई। 
द्वितीय शासक ने अपने खजाने की जमा अपार धन की बड़ाई करते हुए चंद्रगुप्त मौर्य को खूब आर्थिक सहयोग करने की बात कही।
तृतीय शासक ने अपने दरबार के बुद्धिमान मंत्रियों एवं सुघड़ सलाहकारों की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा हम अच्छे  मंत्री एवं कुशल दरवारियों को नियुक्त कर उसे अच्छा मानधन देते हैं इसलिए वे हमारे सहयोग हेतु हमेशा तत्पर रहते हैं। आप चाहें तो मैं उन्हें आपकी सेवा हेतु भेज दूं।
 चतुर्थ शासक ने अमूल्य हीरे-जवाहरातों का सहयोग देने का आश्वासन दिया। 
पंचम शासक ने अपनी नयीे तकनीकी से उन्नत किस्म के अन्न उपजाने की बात करते हुए अन्न-सहयोग करने के का आश्वासन दिया।
इस प्रकार सभी शासकों ने अपनी-अपनी उपलब्धियों को बताते हुए अधिकाधिक सहयोग का आश्वासन दिया । सिर्फ एक शासक ने हाथ जोड़कर विनम्र शब्दों में  कहा-महराज मैं आपको कोई भी सहयोग  दे सकने में असमर्थ हूं। क्योंकि मैंने न तो सेना का विस्तार किया ना ही राजकोष में अपार संपदा इकट्ठा किया , ना ही मेरे पास कुशल दरवारी हैं ।ना ही हीरे जवाहरात हैं ।ना ही अन्न का विस्तृत भण्डार है,इसलिए मुझे क्षमा करें।
सभी उपस्थित सम्राट सीना ऊंचा कर उस सम्राट को हेय दृष्टि से निहार रहे थे।
जब सम्मान प्रदान करने का समय आया तब सभी सम्राट स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित किये जाने का इन्तजार कर उचक-उचक कर देख रहे थे।
लेकिन गुरु चाणक्य ने सभी उम्मीदवारों की इच्छा एवं आशाओं पर पानी फेरते हुए सहयोग ना करने वाले सम्राट को सर्वश्रेष्ठ सम्राट घोषित कर सम्मानित किया।सभी दरबारियों सहित महाराज चंद्रगुप्त मौर्य भी अचंभित हो गुरु चाणक्य के निर्णय को सुनते रहे। किन्तु उनके निर्णय को खण्डित करने या प्रश्न उठाने का दुस्साहस कोई नहीं कर सके।
जब सभा समाप्त हो गई तो महाराज चंद्रगुप्त मौर्य ने गुरु चाणक्य से उस असहयोगी राजा को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर सम्मानित करने का कारण पूछा। गुरु जी ने कहा-महाराज पहले आप यहां उपस्थित प्रत्येक शासक के राज्य का भ्रमण कर आएं। फिर मैं आपके इस प्रश्न का उत्तर दे दूंगा।
गुरु देव की आज्ञा मान चंद्रगुप्त मौर्य वेश बदलकर एक-एक दिन प्रत्येक अधिनस्थ राज्यों का भ्रमण करते रहे। उन्होंने देखा वहां के शासक अपनी प्रजा से मनमाने कर वसूल करते हैं और प्रजा को सुख-सुविधाओं में भी कटौती करते हैं। वहां की प्रजा की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय है। लेकिन राजकोष में अपार धन भरा है। सेना हमेशा हमेशा लड़ने -मारने को तैयार रहती है।बहुमुल्य रत्नों के ब्यापार जोर पकड़ने हुए है।यह देख महाराज चंद्रगुप्त मौर्य ने उस शासक के राज्य में पहुंचे जिसने किसी तरह का सहयोग करने से मना किया था। उन्होंने देखा कि उनके राज्य में सभी खुशहाल थे।वहां के शासक ने प्रजा की भलाई के लिए  बाग -बगीचे बाबड़ी , प्याऊ -तालाब , क्रीड़ा-स्थल आदि का निर्माण करवाया है। शिक्षा की उत्तम व्यवस्था है और सभी लोग साक्षर और सुलझे विचारों वाले हैं। अल्प सैन्य व्यवस्था है जो बाह्य शत्रुओं से राज्य की  सुरक्षा करने के लिए हैं। आंतरिक सुरक्षा की आवश्यकता पड़ती ही नहीं।सभी लोगों में आपसी भाईचारे का भाव भरे हैं।अपराधियों को दण्ड देने के बदले सुधार-गह में रखकर सुविचार सिखाए जाते हैं। भीख मांगना अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।आशक्तों एवं अपाहिजों को भोजन-वस्त्र एवं आवास दान किए जाते हैं। पशुओं के लिए चारागाह एवं पक्षियों के लिए दाने की व्यवस्था है। अनावृष्टि के समय किसानों के कर माफ कर दिए जाते। स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाता है।गरीबों को रोजगार हेतु धन दिया जाता है और उनके निर्मित सामानों की बिक्री के लिए बाजार व्यवस्था है। सफाई की उत्तम व्यवस्था है। कलाकारों को सम्मानित किया जाता है।कूल मिलाकर राज्य के लोग खुशहाल जीवन यापन करते हैं।महाराज चंद्रगुप्त मौर्य को अब समझ में आया कि गुरु चाणक्य ने उस प्रशासक के द्वारा सहयोग नहीं करने पर भी उसे सर्वश्रेष्ठ सम्राट के रूप में क्यों सम्मानित किया।शायद वे समझ रहे थे कि एक उत्तम शासक के राजकोष में इतनी राशि नहीं हो सकती कि दूसरों को अत्यधिक सहयोग प्रदान करें।वे अपने राज्य वापस आकर गुरु चाणक्य के चरणों में शीश रख दिए।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Saturday, December 18, 2021

सांच को आंच क्या (लघुकथा )

सांच को आंच क्या

धीरु नामक एक मूर्तिकार था। पत्थरों को तराश कर अनेक प्रकार की मूर्तियां एवं खिलौने बनाता और बाजार में बेचा करता। उसकी मूर्तियां काफी खूबसूरत और आकर्षक होती थी, इसलिए उसे उन मूर्तियों के अच्छे दाम मिल जाते।रोज की इस आमदनी से वह अपने परिवार का भरण-पोषण भलि प्रकार से कर लेता था।इस प्रकार उसके दिन सुख पूर्वक बीत रहे थे।
    बीरु नामक उसका एक दोस्त था।वह मोमबत्तियों एवं लाभ के सामानों का व्यापार करता था।उसे धीरू के सुख-शांति से बड़ी ईर्ष्या होती उसने धीरू को नीचा दिखाने की योजना बनाई।उसने धीरू के मुख्य ग्राहकों में यह अफवाह फैला दी कि -धीरू द्वारा बनाई गई अधिकांश मूर्तियां लाह और मोम के बने होते हैं। किन्तु वह उन्हें कीमती पत्थरों द्वारा निर्मित बताकर मनचाही कीमतें वसूल लेता है।ऐसी बातें सुन धीरू  के सभी ग्राहक भड़क उठे।और खरीदी गई मूर्तियां वापस करने लगे।धीरू ने उन्हें बहुत समझाया कि वे उन मूर्तियों की जहां चाहे जांच करवा ले। लेकिन वे उसकी बात मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।वे धीरू से मूर्तियों के लिए दिये गये पैसे वापस मांगने लगे।अब बेचारा धीरु पैसे कहां से वापस करता।सारे पैसे तो उन्होंने परिवार की जरूरतों एवं मूर्तियां निर्माण के लिए पत्थरों की खरीद पर खर्च कर चुका था।
बढ़ते -बढ़ते बात ग्राम पंचायत तक पहुंच गई। गांव के मुखिया ने कहा- यदि धीरु द्वारा बेची गईं मूर्तियां नकली हुयी तो धीरु अपने ग्राहकों को मूर्तियों की कीमत के दोगुना पैसे वापस करने होंगे।धीरु से ईर्ष्या करने वाले लोग से झूम उठे। किन्तु धीरू ने धैर्य पूर्वक मुखिया का यह फैसला स्वीकार कर लिया।
दूसरे दिन पंचायत सभा में एक भट्ठी जलाई गई। उसमें धीरु द्वारा बेची गई मूर्तियों को तपा कर देखा गया।धीरु सच्चा था,उसकी मूर्तियां असली थीं। उन्हें भट्ठी की आग भला किस प्रकार पिघला सकती थी।सारी मूर्तियां सती- सीता की तरह अग्नि-परीक्षा देकर   निकल गई। ग्राहकों और जलने वालों के मुंह बन गये और धीरु प्रसन्न हो मुस्कुरा उठा।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  स्वरचित, मौलिक

Thursday, December 16, 2021

जाड़े की रात (लघुकथा )

जाड़े की रात

वह ठंड से कांपती ठिठुरती सड़क के किनारे बैठी थी। अपने तन पर बेतरतीबी से लिपटी हुई फटी-पुरानी मैली- सी साड़ी और ब्लाऊज़ को फैला कर तन ढकने की कोशिश कर रही थी। सिर के मैले एवं उलझे बालों को खुजलाती हुई मुंह से टपक आये लारों को हथेली से पोंछ कर हाथ घास पर रगड़ती हुई कुछ बुदबुदाती जा रही थी।पास में इकट्ठी की गई लकड़ियों एवं पतों को इस प्रकार समेटती हुई सहेज रही थी। जैसे वह उसके अंगों के जेवरात हों। प्लास्टिक में रखी सुखी रोटियों को बार-बार गोदी में रखकर छुपा रही थी। लेकिन कुत्तों के पैनी निगाहें उसी पर अटकी हुई थी।
अचानक किशोर खिलाड़ियों का झुण्ड वहां से गुजरा और उसे देखकर यूं किलक उठा जैसे कोई परम सुंदरी को देख लिया है। उसके द्वारा इकट्ठा की गई लकड़ियों को फुटबॉल की तरह पांव मारकर दूर तक बिखराते चला गया। उसे समेटने के क्रम में उसकी रोटियां गिरकर बिखर गई और कुत्ते उन रोटियों पर झपट पड़े।
वह  कुत्तों को देख संतोष करती है। परन्तु बच्चों को देख करुणा और घृणा मिश्रित भाव लिए कराह उठी और ऊपर  आसमान में निहारकर फिर कुछ बुदबुदायी।शायद कह रही थी सारी लड़कियां इधर बिखर गयी।आज किस चीज से आग जलाकर जाड़े की रात काटूंगी।
              सुजाता प्रिय 'समद्धि'

Tuesday, December 14, 2021

जाड़े की धूप ( विधाता छंद )



जाड़े की धूप (विधाता छंद)

कड़क की ठंड है लेकिन,
             गुलाबी धूप भी फैली।
आओ बैठें आंगन में,
                 चाहे गात हो मैली।
रजाई छोड़ हम आये,
            लगती धूप अब प्यारी।
किरणें फैली अम्बर में,
            कितनी लग रही न्यारी।
हमारी कपकपी को हर,
              भरती ताजगी तन में।
शरद से मिलती है राहत,
             स्फूर्ति भरती है मन में।
ठंड से हम ठिठूरते हैं,
            तो भाती धूप जाड़े की।
नहीं विकल्प हैं इसके,
              हीटर ए.सी.भाड़े की।
करें नित धूप का सेवन,
           तो तन मजबूत हो जाए।
उत्तम औषधि है यह,
           चिकित्सक भी न दे पाए।
विटामिन डी हमें देती,
              नरम यह धूप है प्यारी।
जब दिन है यहां ढलता,
               लगती और भी प्यारी।             
भगाती कांस और सर्दी,
                 व्याधि सारे हर लेती।
कर निरोग काया को,
                   निर्विकार कर देती।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Sunday, December 12, 2021

माता शबरी के जूठे बेर

माता शबरी के जूठे बेर

माता सीता की खोज में राम-लक्ष्मण पंपा सरोवर (जो उस काल में किष्किंधा के नाम से प्रसिद्ध था) की ओर बढ़े। वहां मतंग वन  में एक बूढ़ी माता अपने आंचल से मार्ग की सफाई करती मिली।
लक्ष्मण ने पुछा-माते ! तुम पथ को अपने आंचल से क्यों बुहार रही हो ?
 बृद्धा ने पीछे मुड़े बिना भक्ति-भाव से उत्तर दिया -इस पथ से भगवान राम पधारेंगे,इसलिए।और वह निकट रखी फूलों से भरी टोकरी से फूल लेकर पथ में बिछाने लगी। फूलों से सजे राहों में दिव्य चरणों को बढ़ते देख नजरें उठाकर राम-लक्ष्मण  दोनों भाई के दर्शन पा भाव विह्वल हो दोनों के चरण-स्पर्श करती हुई प्रेम अश्रुपूरित नयनों से निहारती हुई बोली-प्रभु !आप यहां आएंगे, यह मुझे मेरे गुरुदेव महर्षि मतंग मुनि ने बचपन में ही बताया था।तब से मैं मन में विश्वास लेकर प्रतिक्षा कर रही हूं।हे अंतर्यामी भगवन ! आपने मेरे हृदय के विश्वास को सत्य कर दिखाया।आपके दर्शन पाकर आज मेरा जीवन धन्य हो गया।
वह राम -लक्ष्मण को अागे मार्ग में ले जाते हुए बताया कि मेरा नाम शबरी है और मैं शुद्र जाति की भीलनी हूं।बचपन से ही आपकी अनन्य भक्त हूं। वह बेर केे वृक्षों के बीच स्थित अपनी छोटी-सी कुटिया में कुश के आसन पर राम-लक्ष्मण दोनों भाई को आदर पूर्वक बैठाकर सत्कार करती हुई उनके चरण पखारे।फिर वृक्ष से तोड़कर बेर एकत्र किए ।फिर, उन्हें चख-चख कर खट्टे बेरों को फेंक दिया और मीठे बेरों को थाली में सजाया और प्रेम पूर्वक दोनों भाइयों के आगे परोस दिया।उसके निश्छल प्रेम से अभिभूत हो भगवन राम ने मुग्ध हो उन्हें निहारा और बड़े प्रेम से उन जूठे बेरों का भोजन किया। उनके अनुज लक्ष्मण जी भी उनका अनुकरण करते हुए बेर उठाते और मुंह में डालने के बजाए अपने मस्तक के ऊपर से पीछे फेंक देते। उनकी यह क्रिया बूढ़ी शबरी की नजरों से छिपी न रहीं।तब उसे यह अहसास हुआ कि चखने के क्रम में मैंने सारे बेर जूठे कर दिये इसलिए लक्ष्मण ने बेर ग्रहण नहीं किया।
उसके मन की बात को अन्तर्यामी भगवन ने ताड़ लिया और शबरी को ज्ञात कराते हुए बताया कि भाई लक्ष्मण ने प्रण किया है कि "जब तक अपनी भाभी को ढूंढ कर नहीं लाऊंगा तब तक भोजन का एक कण तक मुंह में नहीं लूंगा।" राम भक्तिन मातु शबरी ने लक्ष्मण द्वारा फेंके गए बेरों को अमृत होने का वरदान दिया और राम को ऋष्यमूक पर्वत स्थित किष्किंधा के राजा सुग्रीव के बारे में बताते हुए उनसे मदद लेने के लिए कहा।
कहा 
जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए शबरी के वे जूठे बेर ही जाकर द्रोण पर्वत पर गिरकर संजीवनी बूटी के रूप में जन्म लिया और लब मेघनाद के अत्यंत तेजोमय बाण के प्रहार से लक्ष्मण जी मुर्छित हुए तो सुषेण वैद्य द्वारा बताई गई उसी संजीवनी बूटी से लक्ष्मण की चिर मुर्छा भंग हुई थी। इसलिए कहते हैं कि श्रद्धा से भगवान की भक्ति करने से भगवान की कृपा शक्ति भी भक्तों 
में आ जाती हैं।उसी भक्ति के प्रभाव से माता शबरी के झूठे बेर भी अमृत बन गये।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Thursday, December 9, 2021

लव-कुश प्रसंग



दोहा-भारत भूमि की धरती पर,जन्म लिए श्री राम।
मर्यादा पुरुषोत्तम को, है बारम्बार प्रणाम।
चौपाई-राज्य विस्तार की घड़ी जब आयी। अश्वमेध यज्ञ किये रघुराई।
कर सुसज्जित यज्ञ के घौड़े। सैनिकों की देखरेख में छोड़े।
स्वतंत्र घूमता उनका घोड़ा।उसपर कोई नजर नहीं छोड़ा।
प्रत्येक राज्य की सीमा लांघा।पर न लेता कौई भी पंगा।
देख राम की असीमित शक्ति।हृदय में प्रेम और लेकर भक्ति।
पकड़ ना पाए कोई भी राजा।किए अधीनता स्वीकार समाजा।
दोहा-एक दिन चलते-चलते यह,यज्ञ का घोड़ा खास।
पहुंच गया संयोग से, बाल्मीकि के आश्रम पास।
देख सुसज्जित यज्ञ का घोड़ा।बाल वृंद का सैनिक दौड़ा।।
दौड़े लव-कुश दोनों भाई। वीरता का प्रमाण दिखाई।।
पकड़ घोड़े आनन-फानन में।बांध दिए लाकर आंगन में।।
राम की सेना लड़ने आयी। लव-कुश की वीरता से घबरायी।।
भरत शत्रुघ्न को लव-कुश ने ललकारा।लक्ष्मण से किया युद्ध करारा।।
हनुमान वीर लव-कुश से हारे। बाल वीरों के बंदीगृह पधारे।।
दोहा-देख सीता पुत्रों की वीरता अपरम्पार।
राजाराम की सेना से करते भीषण रार।।
चोपाई-विचलि होकर सीता माई।बहु विधि पुत्रों को समझाई।।
पुत्र मेरा यह कहना मानो।राजा राम से वैर न ठानों।।
श्री राम हैं पिता तुम्हारे। जिनके गुण तुममें हैं सारे।।
पिता तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम।उनके जैसे चित्त रखो उत्तम।।
बोले लव-कुश हठ ना छोड़ेंगे। धर्म-युद्ध से मुख ना मौडेंगे।।
श्रीराम को आना ही होगा। राजधर्म निभाना ही होगा।।
दोहा
बोल माता कैसे बने, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम।
अपनी प्रसुता भार्या को छोड़ दिए वन धाम।।
    सिया वर राम चन्द्र की जय।
   लव-कुश बाल-वीर की जय।।
    सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित मौलिक

स्वरचित , मौलिक

Wednesday, December 8, 2021

राम सीता बारात विदाई प्रसंग



राम-सीता बारात विदाई प्रसंग

घनाक्षरी-(भये प्रगट कृपाला दीन दयाला)

बारात विदाई,की घड़ी आई, सर्वत्र उदासी छाई।
लक्ष्मण-रघुराई,चारों भाई, करवाने आये विदाई।
मातु सुनयना,जल भर नयना, रामचंद्र से बोली।
मेरी चारों कन्या, हैअनन्या,मन की है अति भोली।
हे सुरनायक,जन-सुखदायक,जग के आप विधाता।
धन्य भाग्य हमारे, हैं अति प्यारे,बने आप जमाता।
मेरी बिटियां रानी,अति स्यानी,गुण-सम्पन्न अभिमानी।
हैं बड़भागी,मन-अनुरागी,बनी रघुकुल की बहुरानी।
बेटियों को खोइछा,बहु-विधि शिक्षा,दे बार -बार समझाई।
तुम चारों बहना, रघुकुल की गहना,ससुर पिता,सासु हैं माई।
बहनों संग सीता,परम पुनीता,बिलख-बिलख कर रोई।
हम सबको माई, क्यों जन्माई, पाल-पोस क्यों खोई ?
रख दिल पर पत्थर,कुशध्वज रोकर,बेटियों को समझाए।
यही जंग की रीति, इसी में है प्रीति, ससुर घर तुझको भाए।

दो.-एही विधि सबसे विदाई लेकर,वापस हुई बारात।
चार बहुओं की डोली ले,चले सब दशरथ के साथ।

सियापति रामचंद्र की जय🙏🙏
💐💐💐💐💐💐💐💐💐

Monday, December 6, 2021

सीता -राम विवाह प्रसंग



राम-सीता विवाह प्रसंग

दोहा-चौपाई


छंद-जनवासे से नाचते गाते जब बारात पहुंची जनक के द्वार।
सुनयना संग जनकपति के मन में भरी खुशियां अपार।
देख राम के अंग सुकोमल परिजन सभी पुलकित भये।
गायी सुमंगल-गान सखियां,देवगण हर्षित हुए।

चौ.-सखियां मिलकर सिया को लाई।सिया-राम की जयमाल कराई।
कंचन थाल कपूर की बाती।अक्षत चंदन रख वेल की पाती।
सात सुहागिन मिल आरती उतारी। रामचन्द्र की ले बलिहारी।।
पान पत्र से गाल सेक कर।मातु सुनयना उन्हें परछकर।।
वर-वधू को मंडप में लाई।चंदन पिढ़िया पर बैठाई।।
अग्नि-कुण्ड को साक्षी रखकर। सियाराम को दिलवाए भांवर।।
सात फेरों संग वचन दिलाए। दाम्पत्य जीवन की पाठ पढ़ाए।।
हाथ सिंदूर-कीया पकड़ाए। सीताजी की मांग भराए।

दो.-इसी विधि सीता की बहनों के विवाह हो गये साथ।
भरत-माण्डवी,लक्ष्मण-उर्मिला, शत्रुघ्न- श्रुतिकृति के पकड़े हाथ।
चार जोड़ियों से मण्डप की शोभा बढ़ी अपार।
ऋषि-मुनि-गुरू आशीष दे, करने लगे जयकार।

सियापति रामचंद्र की जय🙏🙏
💐💐💐💐💐💐💐💐💐
              स्वरचित मौलिक
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              १८/०७/२०२१

Sunday, December 5, 2021

राम बारात स्वागत


१८/०७/२१
जन रामायण

राम बारात स्वागत
हरिगितिका छंद(श्रीराम चन्द्र कृपालु भजमन)

बारात देख, मिथिला नरेश, मर्यादा अपना छोड़कर।
हो भाव विह्वल जा मिले वे कोश भर से दौड़ कर।
बढ़कर सभी बारातियों की, आगवानी वे करने लगे।
मन में हुलस रोमांचित हो सबके गले मिलने लगे।
पुष्प-माला पहना गले,मस्तक लगा कुमकुम तिलक।
करबद्ध प्रणाम कर संग लाए,मन- मुदित होकर पुलक।
बैठाए जनमासे में लाकर,सबको उचित स्थान दे।
स्वादिष्ट सुगंधित मन -मोहित मंगल सगुण मिष्ठान दे।
सुदर-सुहावन वस्त्र और गहने विविध प्रकार दे।
बहुमुल्य मणियां, जवाहरात-हीरे को मधुर उपहार दे।
पुष्प वर्षा कर सुंदरियां,स्वागत- गीत गाने लगी।
हंसी-ठिठोली कर बारातियों को, उपालम्भ सुनाने लगी।
नाचते बन नार, किन्नर,ठुमक-ठुमक मन मोहते।
बारातियों की दुल्हनें बन संग बैठकर शोभते।
छंद -इस विधि बहुत आनंद से,जनवास में वे सुख से रहे।
शुभ-विवाह की घड़ी वे,विवाह-स्थल  सज-धज चले।

सियावर रामचन्द्र की जय
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Thursday, December 2, 2021

राम बारात आगमन


बारात आगमन। बोल (नमामीश मीशान निर्वाण  रूपम)

जनकपुरी में बारात आई। देवगणों ने दुंदुभी बजाई।।
पुत्र-विवाह की लेकर मनोरथ।आये अयोध्या के राजा दशरथ।।
तीन अनुज संग आये रघुराई।दो सांवरे और दो गोरे भाई।।
देवों के देव गणेश पधारे। ब्रह्मा-विष्णु महेश पधारे ‌।।
गुरु विश्वामित्र,वशिष्ठ जी आये। ऋषि-मुनि संत विशिष्ट भी आये।।
अनेक महीपति सुरपति आये। पुरोहित, मित्र, अधिपति आये।।
आए सभासद,नगरपुरवासी। सहस्त्र सेवक दास और दासी।।
मोती-माणिक्य से सजे गज प्यारे।सात घोड़ों से सजे रथ सारे।।
रंग-बिरंगी बाती जली है।चौमुख दीपों की पाती सजी है।।
हंस-मयूर की नाच मनोहर।झूम रहे नागरी खुश हो कर।।
आतिशबाजियां और आसमान तारे।फूटे पटाखे सुंदर नजारे।।
बाजत पन्नव, झांझर प्यारे।शंख,निशान और ढोल-नगाड़े़।।
दसो दिशा में ध्वज लहराए।भगवा पताके गगन फहराए।।
सभी हैं प्रफुल्लित, सुहानी है बेला। जनकपुर सजा है लगी जैसे मेला।।
राम बारात दल-बल सहित शोभा अपरम्पार,
 मानुष पशु-पक्षी गण जीव सभी आनंद भए।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Wednesday, December 1, 2021

जवानी गलतियों का नाम है (गज़ल )_

हो गयी कुछ भूल,जवानी गलतियों का नाम है।
दिवानी होती है जवानी, इसलिए बदनाम है।

दिल लगा बैठे सनम से,यह मेरी एक भूल है,
इतनी गलती के लिए हम,हो गये बदनाम हैं।

समझ न पाये प्रेम को वे,दे न पाये अहमियत,
उनकी नज़रों में मुहब्बत,आशिकी का जाम है।

अजी जीगर के दर्द को अब,कौन समझेगा यहां,
जवानी में जिस किसी ने,पीया नहीं यह जाम है।

शिकवा-गिला अब जिंदगी में, करना नहीं मंजूर है,
जवानी की देखो यहां पर,आ रही अब शाम है।

मत फफोले को कुरेदो, जख्म हरे हो जाएंगे,
भूल को अब भी सुधारों, बुजुर्गों का पैगाम है।

दुखती रग को मत टटोलो,नब्ज़ अपने देख लो,
तुमने भी खाये थे ठोकर, होता यही अंजाम है।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मां को चिट्ठी

पुजनियां मां
       सादर चरणस्पर्श
            
           मां ! आशीर्वाद एवं शिक्षाओं से भरी तुम्हारी चिट्ठी मिली। तुम्हारी और पापा की तबियत अच्छी है यह जानकर काफी खुशी हुई।सभी भतीजे-भतीजियां अच्छे से पढ़ाई कर रहे हैं। यह तो और भी अच्छी बात है। मां तुमने लिखा है कि तुम्हारी एक  भाभी मायका गयी और एक की तबीयत खराब है इसलिए सेवा-सुश्रुषा में कमी आ गयी। यइस बात से यही पता चलता है कि उनके रहने और स्वस्थ्य रहने पर तुम्हारी खूब सेवा होती है।यह तो कितनी अच्छी बात है मां! लेकिन मां !मैं देखती हूं तुम्हें नास्ते- खाना देने में उनलोग से पल भर भी देर होती है तो तुम नाराज़ हो जाती हो। मां मैं यही कहूंगी कि उनलोग का भी जीवन है ,मन है । कभी- कभी देर सवेर होती ही है।तन -मन है । कभी- कभी आलस्य भी होता है।इसके लिए नाराज नहीं हुआ करो मां।जिस प्रकार हम बेटियों की गलतियां नजर अंदाज करती हो उसी तरह उन्हें भी माफ किया करो। मां जब मैं तुम्हें अपनी सासु मां के बारे में कुछ बोलती हूं तो तुम समझाती हो कि वह भी मेरी तरह तुम्हारी मां हैं।उनकी बातों का बुरा नहीं मानो और उनका ख्याल रखो।सदा सुखी रहोगी।
उसी प्रकार मैं भी कहती हूं मां!कि तुम्हारी बहुऐं भी हमारी तरह तुम्हारी बेटियां हैं। उनसे नाराजगी छोड़कर उन्हें माफ किया करो मां ! मन को सुख एवं संतुष्टि मिलेगी।
       पापा को प्रणाम एवं भाइयों भाभियों तथा भतीजे-भतीजियों को ढेर सारा आशीर्वाद।
              तुम्हारी बेटी, सुजाता

Tuesday, November 30, 2021

पिता (हाईकू )



पिता

पिता हमारे
जनक हैं हमको
उनसे प्यार।

परिश्रम से
वे हमें पालते हैं
देते दुलार।

पिता से होता
सुखी हमारा यह
है परिवार।

पिताजी होते
हम बच्चों के सदा
ही हैं आधार।

हर संकट
मेरे दूर भगाते
हैं ललकार।

बरगद की
घनी छांव बनते
हाथ पसार।

अबोध बच्चे
को ठोक-पीटकर
देते आकार।

सुख देने को
हरदम रहते
हैं वे तैयार।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, November 26, 2021

झूमर ( मगही भाषा )

झूमर ( मगही भाषा )

पिया हमरा के ले गेल बजरिया जी।
                         बजरिया जी।
मांग टीका गढ़ैलकै हजरिया जी।

टीकबा पहीन हमें गेलियै बजरिया।
सब छोरन के अटके नजरिया जी। नज़रिया जी।
उनका देखके मारबै लतड़िया जी।

टीकबा पहीन हमें गेलियै अंगनमा।
मोर देवर जी मारे नजरिया जी।
                        नजरिया जी।
उनका ठेलके भेजबै अटरिया जी।

टीकबा पहीन हमें गेलियै दुअरिया।
ननदोई जी मारे नजरिया जी।
                      नजरिया जी।
उनका ननदी संग चढैबै पहड़िया जी।

टीका पहीन हमें गेलियै सेजरिया।
मोर सैंया के अटके नजरिया जी।
                          नजरिया जी।
उनका संग लगाएव यारिया जी।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Monday, November 15, 2021

आप ही को वोट देंगे ,वार्तालाप ( व्यंग्य)

आप ही को वोट देंगे 
वार्तालाप ( व्यंग्य )

अरे,अरे राजमहल चाचा ! प्रणाम जी प्रणाम ! आइए बैठिए।चाय, काफी,ठंढई के साथ कौन-कौन मिठाई मंगवाए ? साथे में हांट- डांग, एग रोल और मुर्ग मुसल्लम तो खैबै करिएगा। गांव के रोड जैसन टुटल पुड़िया तो खाय में कोय हरजा नै है।थोड़े-थोड़े देर में लाके देले जाएंगे।
अरे हां रे बब्बनमा ! उ तो हमें एने  से जा रहे थे।सोचे जरा भतीजा से मिलले जायं।
अरे हां चाचा ! उ हम भुलाइए गये कि चुनाव चल रहा।आपका तो पहिये छाप न है काका ?
आउर का तुम तो जानबे करता है सारा विकास तो पहिये में है।
हां चाचा पांच साल के विकास देख कर हमलोग जितना अघाएं हैं कि दुसर छाप के बटन के दबाबे ले अंगुली पहुंचिए नै सकता है। सारा कस्बा के लोग आप ही को वोट देगा। कारण कि चुनाव जीतने से पहले से भी ज्यादा आप चुनाव जीतने पर रोज विकास के आश्वासन देते हैं। सड़क पुलिया के निर्माण करने के लिए कहे थे।सो आज तक कह रहे। स्वास्थ्य केंद्र खोलने कहे थे, आज तक कह रहे हैं। आंगनबाड़ी और विद्यालय भवन निर्माण करवाने बोले थे, आज तक कह रहे हैं। तालाब-पोखर की सफाई का काम हर साल कहते हैं।सबको बिजली-पानी की व्यवस्था  दिलाने की बात आज तक करते हैं। पंचायत भवन निर्माण कार्य का शुभारंभ करने के लिए हर पंचायत में करते हैं।कोय काम नै छुटा हुआ जिसको करवाने से आप मुंह मोड़ते हैं।तब कहिए आपको छोड़कर वोट आखिर किसके झोली में जाएगा ?
हां बेटा ! ई काम हम कभी नै करते हैं।दूसर पंचायत में सड़क  बनबाया लोग ,पांच साल लगते-लगते सब टूट गया। पंचायत और विद्यालय भवन खड़ा हो गया लेकिन छत आज तक नहीं बना। साफ-सफाई के काम कहियो होता है कहियो नै होता है।एको काम कहो तो कि शुरुआत करके पूरा भी किया।
ओह चाचा ! उ बात तो हम खुदे कह रहे हैं कि उससे अच्छा तो आप हैं कि सबको बहला-फुसलाकर रखें हैं।झुठ-मूठ के दिखावा तो नहीं किए ‌ कहीं बेकार के पैसा तो नहीं बहाए। इसलिए तो आप वोट के पूरा अधिकारी हैं।आपके अतिरिक्त एक भी वोट किसी को पड़ना नहीं चाहिए।हम खुद भी आपको वोट देंगे और आपके कार्यों को याद दिलाकर सबको उत्साहित भी करेंगे।इस बार उहो आश्वासन के जरुरत नहीं है । हम सब अपने मन से आपको वोट देंगे।बाकी तनी पनियों पीके जाते तो अच्छा लगता।वोटबा तो आपको देबे करेंगें।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मां शारदे

मां शारदे ! मां शारदे!
अज्ञानता से उबार दे।
मां शारदे................
तेरे शरण में हम हैं आयें,
लेकर बहुत विश्वास मां।
तेरे चरण में सिर नवायें,
रखकर हृदय में इस मां।
मेरी मूढ़ता को दूर कर दे,
मन-ज्ञान को तू निखार दे।
मां शारदे!...................
दिल में विराजे तू सदा,
 मन में बसा तेरा रूप है।
हर भाव में,हर बात में,
हर वाणी तेरा स्वरूप है।
मन-वचन को स्वच्छ रखूं,
सुंदर सदा तू विचार दे।
मां शारदे!...................
तेरे धवल वसन-स्वरूप-सा,
अंत:करण मेरा रहे।
हर जीव के खातिर हृदय में,
इंसाफ का डेरा रहे।
हर पुण्य कर्मों को करें हम,
तुम इसे विस्तार दे।
मां शारदे!....................
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, November 14, 2021

सेवा का संकल्प (लघुकथा)



बिस्तर पर पड़े दादा जी का मल-मूत्र साफ कर रहे पिताजी को देख राजीव और संजीव का मन व्यथित हो गया। आखिर राजीव ने बोला ही दिया-क्या पिताजी आप अपने से यह सब करते हैं।एक केयर-टेकर रख लेते।
और क्या-अभी दो महीने पहले ही जब हम इन्हें लाने पटना गये थे तो देखा था चाचाजी इन लोगों के लिए केयर टेकर रख दिया था।जब दादा-दादी को कोई जरुरत होती कौंल कर देते और उनलोग आकर सब साफ़ सफाई कर देते।कुछ पैसे की ही तो बात है। संजीव ने उसकी बात खत्म होते ही कहा।
बात पैसे की नहीं बेटा! स्नेह-प्रेम और कर्त्तव्य की है। तुम्हारे चाचा बिजनेसमैन हैं।उनके पास समय का अभाव था। ‌तुम्हारी चाची भी अक्सर बीमार रहती हैं। ऊपर से घर के सारे काम नौकरों से करवाना। सो उन्होंने केयर-टेकर रख लिया ‌।
पैसे की कमी हमारे पास भी नहीं ।हम भी आदमी रख सकते हैं, इनकी देखभाल के लिए। लेकिन जब इन्हें जरुरत होगी तब तो नहीं आएगा।और जब-तक नहीं आएगा तब-तक इन्हें मल-मूत्र पर ही पड़े रहना होगा। इसलिए मैं आफिस जाने से पूर्व इनकी साफ- सफाई कर लेता हूं तो आत्मसंतुष्टि मिलती है। तुमलोग को पाल-पोस कर हमने देखा लिया कि बच्चों को पालन-पोषण और पढ़ाने-लिखाने में मां-बाप को क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ते हैं। किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। फिर वही बच्चे अपने शारीरिक रूप से लाचार मां-बाप की सेवा करने से कतराते हैं।अगर तुम्हारी चाची बीमार नहीं पड़ती तो तुम्हारे चाचू इन्हें कभी आने नहीं देते।अब हमें मौका मिला है तो हमें सहृदय इनकी सेवा करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए दलिया बनाकर लाती हुई मां ने कहा-हां आप ठीक कहते हैं इस पुण्य कार्य में मैं हमेशा आपके साथ हूं।हमें इनकी सेवा अवश्य करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए गर्म पानी लेकर आती दीदी ने कहा और हम भी।
और हम भी उनकी बातें सुनकर अनायास दोनों भाइयों के मुंह से निकल गया।
मां-पिताजी संतुष्ट-भाव से बच्चों को निहार रहे थे ।और तीनों भाई- बहन मन -ही- मन यह संकल्प लें रहे थे कि हम भी अपने मां-पिताजी की सेवा स्वयं करेंगे।पैसे की अधिकता से पंगु नहीं होंगे।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Friday, November 5, 2021

बहन के हाथों का भोजन (लघुकथा)

बहन के हाथ का बना भोजन (लघुकथा)

भैरव का मन बहुत उदास था। लम्बे अंतराल से चल रहे मुकदमे में उसकी हार निश्चित थी।अब तक पानी की तरह पैसे बहाया। कितने वकीलों ने जीत का आश्वासन दिया। लेकिन, उनकी हर दलील निरस्त हो जा रही थी।विपक्ष की ओर से पुख्ते गवाह उपस्थित होते और झूठे आरोप को भी वे इस प्रकार सच साबित कर दिखाते जिसे काट पाना पक्ष को अत्यंत दुष्कर कार्य हो जाता।कल अंतिम तारीख को सजा और जुर्माना लगाया जाना है। कहां से वह जुर्माने की राशि का भुगतान कर पाएगा।सजा मुकर्रर हो गया तो घर परिवार को भोजन-पोषण भी मुश्किल हो जाएगा। इन्हीं उधेड-़बुन में लगा था कि अचानक फोन की घंटी बज उठी।न चाहते हुए भी उसका हाथ फोन उठाने को बढ़ गया।बहन की आवाज सुन आशंकित मन थोड़ा शांत हुआ।बहन ने भाई-दूज के शुभ-अवसर पर अपने हाथ का बना भोजन करने के लिए बुलाया। उसने सोचा-चलो कुछ देर तो सुकून से बीता लूं। फिर तो जो होना है उसे कौन रोक सकता।
        बहन ने भोजन कराते हुए भरोसा दिलाया चिंता नहीं करो भाई!सब ठीक हो जाएगा। भगवान तुम्हें इस झूठे आरोप से अवश्य बरी कराएंगे।बहन की बात सुन वह भोजन कर उठा ही था कि उसके विपक्ष का गवाह वहां पहुंचा और उसे देखकर अचंभित हो उसकी बहन से उसका परिचय पूछा ।जब बहन ने बताया कि वह उसका भाई है तो वह अफसोस जताते हुए कहा-भाभी !आपने अपना अमूल्य खून देकर मेरे भाई की जान बचाई और मैं चंद पैसे की लालच में आपके भाई को सजा दिलाने में लगा हूं।अब जो हो मैं सच्चाई का साथ देकर आपके भाई को बचा लूंगा।
    उसके बयान के आधार पर भैरव पर लगे सारे आरोप हट गये और वह मुकदमा जीत गया तब उसे विश्वास हो गया कि भाई -दूज के दिन बहन के हाथ का भोजन करने से कितना लाभ है। भगवान बहनों के दिल से निकले आशीर्वाद द्वारा भाईयों के हर कष्ट का निवारण इसी प्रकार करते हैं।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित, मौलिक

Thursday, November 4, 2021

मुहब्बत के दीये



मुहब्बत के दीये, मन में जलाओ।
सभी के लिए मन में मुहब्बत लाओ।

दीप जलाकर खुशियां मनाओ।
नफ़रत के अंधेरे मन से भगाओ।

गिले-शिकवे को अब दूर हटाओ।
सभी को अपने गले से लगाओ।

सभी से रहे अब मुहब्बत का नाता।
मोहब्बत सभी के मन को भाता।

आओ मनाए मुहब्बत की दिवाली।
मन का न कोना रहे आज खाली।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Wednesday, November 3, 2021

दीप से दीप जलाकर देखो

दीप से दीप जलाकर देखो

मन से अंधेरे भगाकर देखो।
दीप से दीप जलाकर देखो।

आओ मनाएं हम आज दिवाली।
कभी नहीं आए रात कोई काली।
मन में सपने सजाए कर देखो।
दीप से दीप जलाकर देखो।

मन में हमारा जब होगा उजाला।
जग से दूर होगा अंधेरा यह काला।
मन में उजाला बसाकर देखो।
दीप से दीप जलाकर देखो।

उर का संतोष ही लक्ष्मी का रूप है।
इसे पाने वाला ही दूनिया का भूप है।
संतोष उर में लाकर देखो।
दीप से दीप जलाकर देखो।

मन से मिटा दो अब अपनी बुराई।
जीवन तुम्हारा हो जाएगा सुखदाई।
मन से बुराई मिटाकर देखो।
दीप से दीप जलाकर देखो।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

आयी दिवाली


जगमग-जगमग आयी दिवाली।
बड़ी अनोखी औ बड़ी निराली।
जग से अंधेरे को दूर भगा कर-
हर जगह को रोशन करने वाली।

आओ हम मिल कर दीप जलाएं।
पंक्तियां बनाकर हम इन्हें सजाएं।
प्रेम का दीपक औ प्रीत की बाती-
प्यार का तेल दे इसको सुलगाएं।

अंधकार को हम अब दूर भगाएं।
 घर- घर में बस प्रकाश फैलाएं।
 नव उजास को भरकर जीवन में-
 सबके मन का तम को हर जाएं।

लगता दिशा -दिशा अब बढ़िया।
लरज रही हैं दीपों की लड़ियां।
आ मित्रों संग हम नाचते-गाएं-
फोड़ें पटाखें और फुलझडियां।

आओ अब खूब मिठाई खायें।
नाचें-गाएं हम औ खुशी मनायें।
वैर द्वेष को मन से विसरा कर -
सखियो -मित्रों को गले लगायें।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, November 2, 2021

जल के हैं रूप अनेक



देव-शीश पर चढ़कर अभिषेक कहाए।
देव-चरण पखार चरणामृत बन जाए।

फूलों पर गिरे अगर तो है ओस कहाए।
फूलों से निकल कर है ,इत्र बन जाए।

आसमान की ओर चढ़े तो भाप कहाए।
आसमान से गिरे तो है वर्षा बन जाए।

पर्वत से झरकर गिरे तो झरना कहलाए ।
धरा के अंदर रहे तो यह कुआं बन जाए।

गिर कर जम जाए तो यह बर्फ़ कहाए।
जम कर गिरने पर वह ओले बन जाए।

स्थिर होकर रहे  तो यह झील कहाए।
और बह जाए तो है नदिया बन जाए।

शरीर के अंदर जाए तो है पेय कहाए।
शरीर से निकले तो यह स्वेद बन जाए।

आंखों में जाए अगर तो है अर्क कहाए।
आंखों से निकल कर है आंसू बन जाए।

सीमा में अगर रहे तो है जीवन कहाए।
सीमा तोड़ दे अगर,तो प्रलय बन जाए।

गंदगी धोकर बहे तो नाली बन जाए।
गंदगी से छन, पूर्ण पवित्र बन जाए।

लघु रूप धारण करे तो है बूंद कहाए।
वृहत रूप धर कर है सागर बन जाए।
            सुजाता प्रिय'समृद्धि'
              स्वरचित मौलिक

Monday, November 1, 2021

संतोष सबसे बड़ा धन (लघुकथा )



सभी घरों के काम निपटा कर कजरी करुआ के साथ बाजार पहुंची। लोगों के हाथों में सोने-चांदी के जेवरों वाले डब्बे देख मन मारती हुई बुदबुदाती है-सुना है धनतेरस में पीतल के बर्तन खरीदना ज्यादा शुभ होता है। लेकिन पीतल के बर्तनों के दाम सुन सोची यह लेना उसके वस में नहीं। स्टील का बर्तन ही देखती हूं। लेकिन स्टील के छोटे-से-छोटे बर्तन के दाम दोगुने हैं।यह बर्तन खरीद लेगी तो करुआ के बापू की दवाईयां.....।पगार के आधे पैसे तो कर्ज उतारने में ही चले गए।जितने बचे उनसे महीने भर के भोजन-पानी। सारे पर्व-त्योहार भी निपटाने हैं। ‌बर्तनों के दाम पूछती वह आगे बढ़ गयी।
आ मां! सबसे अच्छा बर्तन इ है।करुआ मां की मन: स्थिति को बदलने के लिए मिट्टी का गुल्लक दिखाते हुए बोला। कजरी  उल्लसित हो बोल उठी-हां यह बर्तन हमारे घर नहीं । इसमें हम बचत के कुछ पैसे रखेंगे। थोड़े धन जमा होंगे।जरा सुंदर रंग वाला लेना।
करुआ सादा गुल्लक उठाते हुए बोला उसका दाम दस रुपए है।यह पांच रुपए वाला ले चलते हैं, घर में रंग लेंगे ना।
घर आकर करुआ ने गुल्लक को पीले रंग से रंग कर तख्ती पर रखते हुए कहा-देख माय।यह पीतल जैसा लग रहा है न।
   बिल्कुल बेटा ! कजरी ने आंखों में छलक आए आंसुओं को पीकर मुस्कुराते हुए कहा-संतोष ही सबसे बड़ा धन है।
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  स्वरचित, मौलिक

Sunday, October 31, 2021

दीप (हाइकु )



दिवाली आयी
दीपों की देखो यह
बाराती लायी।

दीप जले हैं
घर आंगन तक
उजियारा है।

पंक्तियां बद्ध
जगमग करते
तम हरते।

माटी का दीया
कुछ लोगों को देता
रोजी औ रोटी।

बाती जलती
प्रकाशित करती
घर का कोना।

तेल में भींगी
बाती के जलने से
स्वच्छता आती।

अंधेरा भागा
दीपों को देखकर
घबराया-सा।

आओ मिलकर
संकल्प करें हम
तम भगाएं।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
   स्वरचित, मौलिक

Friday, October 29, 2021

तुलसी पूजन गीत (मगही लोकगीत )

तुलसी पूजन गीत (मगही लोकगीत)

हमर अंगना में शोभे,श्याम तुलसी।
श्याम तुलसी,हां जी राम तुलसी।
हमर अंगना में.................
सोने के झारी में गंगाजल भर के,
नित उठ के पटैबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में..............
सोना के डलिया में बेली-चमेली,
नित तोड़ के चढ़ैबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में.............
सोना के थारी में दाख-छोहाड़ा,
नित भोग लगैबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में...................
सोना के दियरा में रूई के बाती,
घीया देके जलैबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में..................
सोने के थरिया में कपूर के बाती,
नित आरती उतारबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में...............
दुनु हाथ जोड़के,सिर नवाके,
नित आशीष मांगबै हम श्याम तुलसी।
हमर अंगना में.............
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, October 27, 2021

माटी का दीया (लघुकथा)


माटी की गुथाई करते समय फिसलकर गिर जाने के कारण पिताजी के हाथ में चोट लग गयी और पिताजी चाक चलाने में असमर्थ हो गये।नेहा ने अपने भाई बहनों को अपनी एक योजना बताई। नक्काशी दार सांचों में तो दीये बनाये जा सकते हैं।सभी भाई-बहनों ने मिलकर ढेर सारे दीये, खिलौने और मूर्तियां बनाये। उन्हें पकाकर रंग-रोगन कर सजाया और बाजार में बेचने बैठे।खिलौने और मूर्तियां तो जल्द ही बिक गये, लेकिन दीये........।जब बाजार में चीन-निर्मित बिजली से जलने वाले सुंदर दीपों की लड़ियां उपलब्ध है तो भला इन माटी के दीयों को कौन पूछता है ? तेल-बाती डालकर जलाओ और जरा-सी हवा तेज चली कि बुझ गया।इन झंझटों में कौन पड़े।
     संध्या अपने परम यौवन प्राप्त कर चुकी थी। अंधकार ने अपना साम्राज्य स्थापित करना प्रारंभ कर दिया। फूल-रंगोलियों से सभी लोग अपने घर सजाकर  दीये जलाने और पूजन की तैयारी में लग गये। नेहा भाई बहनों को बाजार की दुकान में छोड़कर घर आ गयी। क्योंकि मां बीमार और पिता लाचार थे।घर में भी पूजन करना और दीये जलाने हैं।अचानक बिजली आई और जोरदार धमाके के साथ गुल हो गई।पूरा मुहल्ला अंधकार के आगोश में समा गया।यह विद्युत-ट्रासफर्मर जलने की आवाज थी। सभी जानते थे कि इस इलाके में नये ट्रांसफर लगने में पंद्रह-बीस दिनों से कम नहीं लगते। पास-पड़ोस के लोग नेहा के घर दीये लेने दौड़ पड़े कहीं सारे दीये बिक ना जायें। विद्युत के बिना तो चीन के दीये नहीं जगमगाएंगे। नेहा के घर और बाजार के सारे दीए बिक चुके थे।अपने माता-पिता और भाई बहनों के साथ अपने घर में लक्ष्मी जी की पूजा कर माटी के दीये जलाने और खुशियां मनाने में लगी थी।यह उन्हीं की कृपा थी कि उसके बनाए सारे खिलौने और दीये बिक गए।वह जोर से बोल उठी लक्ष्मी माता की जय।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Tuesday, October 26, 2021

वह काली रात (संस्मरण)



वह काली रात (संस्मरण)

एक बार दुर्गा-पूजा के अवसर पर हम भाई -बहन अपनी पसंद के कपड़े खरीदने की जिद कर बैठे । बाजार हमारे घर से कुछ दूर थी । पिताजी को कहीं जाने के लिए रात्रि की बस पक़ड़नी थी।तय हुआ कि हमारे पसंद के कपड़े खरीद कर पिताजी हमें दे देंगे और घर तरफ आने वाली भाड़े की गाड़ी में बैठा देंगे। नियम समय पर पिताजी ने हमें गाड़ी पर बैठा दिया।हम तीनों भाई बहन हाथ में लिए नमकीन खाते चले आ रहे थे।कि अचानक गाड़ी खराब हो गयी।हम बहुत देर किसी दूसरी गाड़ी के इंतजार में खड़े रहे। तभी उस गाड़ी से उतरते यात्रियों ने कहा-अब यहां रुकना सही नहीं।रात हो जाएगी तो गाड़ी भी नहीं मिलेगी । इससे अच्छा हम पैदल चल चलें। देखते-देखते सभी लोग बढ़ चले।अब वहां हम तीन भाई-बहन रह गये। हमने कहा -यहां अकेले खड़े रहने से अच्छा है हम भी इनके साथ चल चलें।कुछ दूर चलने के बाद बीच-बीच में सभी लोग अपने-अपने घरों की ओर मुड़ते चले। अब रास्ते में हम तीन भाई-बहन ही चल रहे थे। अंधेरा घिर आया था।काली-रात के अंधेरे में और सुनसान रास्ते की नीरवता मन में यूं ही भय उत्पन्न कर रहा था। लेकिन हम हिम्मत कर बढ़े जा रहे थे।कि अचानक चेहरे पर कपड़े लपेटे तीन लोग हमारे सामने प्रकट हुए और कड़कती आवाज में बोले- जल्दी से सारे सामान हमारे हवाले करो नहीं तो बहुत मारेंगे। हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।डर के मारे सारे सामान के थैले उनके हवाले कर दिए।सामान लेकर उन्होंने पास खड़ी साइकिल में टांग लिए फिर बोले-जल्दी से हमारी साइकिल में बैठ जाओ।इस बार बोलने का लहजा और भी तीखा था।डर और घबराहट से हम कांपने लगे।अब हमें लग रहा था कि ना हम सिर्फ लूटे गए बल्कि अगवा भी कर लिए गए। मां पिताजी ठीक समझाते थे कि बच्चों को कहीं अकेले नहीं जाना चाहिए। लड़खड़ाते कदमों से हम उनकी साईकिल की ओर बढ़ चले तभी एक जानी-पहचानी सी हंसी गूंज पड़ी। मैंने हंसने वाले की ओर देखा। सभी लोगों ने अपने चेहरे के रूमाल हटा लिए। उन्हें देखकर हमारी जान-में- जान आ गयी। क्योंकि वे हमारे चाचा और उनके मित्र थे। उन्होंने कहा-हमें लग रहा था कि तुम लोग को आने में देर होगी। इसलिए तुम्हें लेने चला आया। फिर सोचा थोड़ी शरारत भी हो जाए। तुमलोग के भय दूर करने के लिए हमें अपने चेहरे पर से नकाब हटाने पड़े।
   हम सभी का भय चाचा और उनके साथियों को देख दूर अवश्य हो गया था।पर उस भयावह परिस्थिति की कल्पना कर मन सिहर उठा।ऐसी घटनाएं सच में भी घट सकती है। हमारी जिद्द से मजबूर हो पिताजी हमें बाजार अवश्य लें गये।पर उन्हें क्या पता था गाड़ी बीच में ही खराब हो जाएगी।हम मन -ही-संकल्प कर रहे थे कि अब कभी भी इस तरह की ज़िद नहीं करेंगे।आज भी वह काली रात याद आती है तो मन कांप उठता है।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Sunday, October 24, 2021

चलनी की आड़ से (करवा चौथ )



चलनी की आड़ से साजन का,
दीदार प्यारा लगता है।
जब-जब भी पड़े साजन पर नजर,
संसार प्यारा लगता है।
जब-जब भी पड़े साजन.......
माथे पर सजा सिंदूर-बिदिया रहे।
हाथों में खनकाती ये चुड़ियां रहे।
हाथों में मेहंदी की ये लरियां रहे।
पांवों में झनकती ये बिछिया रहे।
लाल चुनरी अंग शोभे,हो-हो-हो
गले में यह लाल मोतियों का,
हार प्यारा लगता है।
जब-जब भी पड़े साजन ......
जब तलक आसमां में ये चांद रहे,
तब तलक मेरा-तेरा ये साथ रहे।
संग- संग गुजरता दिन -रात रहे।
सदा ही अचल मेरा अहिवात रहे।
बढ़ते रहें हम -तुम संग सनम,हो-हो-हो
तुम मेरे संग रहो तो मेरा,
घर-बार प्यारा लगता है।
जब-जब भी पड़े साजन.........
हर जनम में रहे हम साथ सनम।
आ मिलकर खा लें आज कसम।
आज दिल का मिटा ले सारे भरम।
एक-दूजे से कभी ना बिछड़ेगे हम। 
दिल ये कहे आज सनम,हो-हो-हो,
आज शुभ दिन में साजन का,
प्यार प्यारा लगता है।
जब-जब भी पड़े साजन............
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Friday, October 22, 2021

वक्त को साथी बनाना सीख लो (गज़ल )



वक्त को साथी बनाना सीख लो।
साथ उसका तू निभाना सीख लो।
वक्त के संग चलना तुम्हें है सदा-
कदम उससे तू मिलाना सीख लो।

राह अपना तुम बनाना सीख लो।
पग उसपर तुम बढ़ाना सीख लो।
अगर राहों के कंटक पग में गड़े-
पुष्प उसपर तू बिछाना सीख लो।

वक्त को तू आजमाना सीख लो।
भरोसा मन को दिलाना सीख लो।
वक्त ने जो दिए हैं ये जख्म तुझे-
उसमें मरहम तू लगाना सीख लो।

मन को तुम समझाना सीखो लो।
सबके दिल में समाना सीख लो।
कोई तुमको न देखे फिकर ना करो-
खुद को खुद पर रिझाना सीख लो।

तुम भी करना बहाना सीख लो।
रूठों को तुम मनाना सीख लो।
कोई जलता है अगर तुझे देखकर-
दिल उसका जलाना सीखो लो।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Wednesday, October 20, 2021

परीक्षा



एक गुरुकुल में यह परम्परा थी कि नित्य कक्षा में आगमन और प्रस्थान करते समय शिष्य गण गुरुजी के चरण-स्पर्श करते थे।एक दिन गुरुजी ने शिष्यों से कहा-कल तुम सबकी परीक्षा है। दूसरे दिन नियत समय पर गुरुजी एक ऊंची तख्ती पर बैठ गये। उन्होंने अपना बायां पांव जमीन पर रखे और दाएं पांव को मोड़कर बांए पांव के घुटने पर चढ़ा लिया।सभी शिष्य परीक्षा देने उपस्थित हुए ।वे कतार बांध कर आ रहे थे और बारी-बारी से  गुरुजी के चरण-स्पर्श करते। गुरु जी के बैठने के अंदाज से सभी शिष्यों को चरण -स्पर्श  करने में कठिनाई हो रही थी। कोई शिष्य सिर्फ उनके नीचे रखे चरण को स्पर्श करता, कोई ऊपर वाले को , कोई बारी-बारी से दोनों को,तो कोई तिरछे हाथों से एक साथ दोनों चरणों को, कोई दोनों हाथों को दाएं बाएं घुमाते हुए दोनों चरणों को। गुरुजी प्रसन्न चित्त से सभी को आशीष देते।
अंतिम शिष्य जिसका नाम विशाल था आया। उसने असमंजस से  गुरुजी के चरणों को देखा, और क्षमा-याचना के भाव से अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। गुरुजी शिष्य को गौर से देखकर सोचने लगे, क्या यह चरण -स्पर्श नहीं करेगा ?
   लेकिन उसनेे ध्यान से गुरुजी के चरणों को देखा फिर आदर- पूर्वक दोनों हाथों से गुरुजी के ऊपर वाले पांव पकड़ कर नीचे वाले पांव के बराबर रखा। उसके बाद दोनों हाथों से दोनों चरणों को स्पर्श किया। गुरु जी ने उसे भी आशीष दिया।
 फिर उठकर परीक्षा कक्ष में प्रवेश किए और होंठों पर मधुर मुस्कान लिए हुए कहा आज की परीक्षा में विशाल उत्तीर्ण हुआ।
सभी शिष्य गुरु जी को अचंभित हो देखने लगे।वे मन-ही-मन सोच रहे थे अभी तो हमारी परीक्षा ली ही नहीं गयी फिर परीक्षा फल कैसे घोषित कर दिया गया ?
     गुरु जी उनके नेत्रों की भाषा से उसके मन के भाव समझ रहे थे। उन्होंने कहा-आज तुम्हारे द्वारा मेरे चरणों का स्पर्श ही तुम सबकी परीक्षा थी। मैंने अपने चरणों को प्रतिकूल रखा।तुम सभी उस प्रतिकूलता को ही अपनाते रहे। परीक्षा अर्थात चरण-स्पर्श गलत तरीके से करते रहे। लेकिन विशाल ने मेरे चरणों को सही तरीके से रखा अर्थात पहले परिस्थिति को अनुकूल बनाया फिर चरण-स्पर्श किया। इसलिए प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने वाला ही जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकता है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक

पत्र पेटी (लघुकथा )

हाथ में दो दर्जन पोस्ट-कार्ड लिए करुणा बड़ी तेजी से डाक घर की ओर बढ़ी जा रही थी। बाजार आते वक्त मां जी ने उन्हें उसके हाथों में थमाते हुए कहा-डाक घर जाकर इन पत्रों को पत्र पेटी में डाल देना।अब बस दस दिन ही शेष हैं।पत्र मिलने में देर होगी तो सभी लोग शिकायत करेंगे। उसने उन चिट्ठियों पर सरसरी नजरें डाली। सभी चिट्ठियों में अशीष, प्रणाम और हाल समाचार के बाद लिखा था-दस दिनों बाद मेरी दूसरी आंख का आपरेशन होने वाला है। जल्द-से-जल्द आने की कोशिश करो।
पते पर नजरें दौड़ाई। सभी चिट्ठियों पर मां जी के भाई- बहन, भतीजे-भतीजियों, बेटियों आदि के पते लिखें थे।वह सोचने लगी ,उनके रहने एवं खाने-पीने की व्यवस्था भी तो करनी है।उसे याद है मां जी की पहली आंख का आपरेशन के समय मां जी के मायके के लोग आए थे तो अलग से रसोइया रखना पड़ा था।ऊपर से वह स्वयं सभी लोगों की सेवा- सुश्रुषा एवं आवभगत में लगी रहती थी। फिर भी सभी लोग उसकी निंदा करते रहते,ताने देते रहते।अलसी,निकम्मी,अलहेली, बेवकूफ,मुंह जोर आदि कितनी उपाधियां उसे प्रदान किया गया था।उन पुरानी बातों को याद कर उसके तन-मन में आग लग गयी।रोगी से ज्यादा देख-रेख और सेवा तो रोगी को देखने आने वालों की करनी पड़ती है। कोई सेवा या मदद के लिए थोड़े ना आते हैं।मेहमानी भी होती है और काना-फूसी भी करते हैं। इलाज और आपरेशन से ज्यादा पैसा तो रिस्तेदारों ंंके आवभगत में खर्च हुए थे।
  इन विचारों में डूबी वह डाक घर के पास पहुंच गयी।उसी समय कचरे ले जाने वाली गाड़ी पत्र पेटी के पास आकर रुकी।वह उस गाड़ी के हटने का इंतजार करने लगी। अचानक उसकी नज़र कचरे वाली गाड़ी के डब्बों पर पड़ी ।वह हरे डब्बों में सारी चिट्ठियों को डालने लगी। कचरे ले जाने वाले ने उसे नासमझ समझते हुए कहा- उधर है पत्र-पेटी।इन चिट्ठियों को उसमें डालिए। लेकिन करुणा ने तेजी से उन चिट्ठियों को कचरे के डिब्बे में डालते हुए कहा- इन चिट्ठियों की पेटी यही है। चिट्ठियां ना मिलने की शिकायत अवश्य रहेंगी। किन्तु हमारे और उन सभी लोगों के पैसे और समय की बचत होंगी।साथ में परेशानियों से भी मुक्ति मिलेगी।
बेचारा कचरे वाला आवाक उसका मुंह देखता रह गया।गीले कचरे में भींग सारी चिट्ठियां गीली हो गईं थी, और करुणा राहत की सांस लेते हुऐ बाजार की ओर बढ़ गयी।
                                    सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                                       स्वरचित, मौलिक

Tuesday, October 19, 2021

कहां खोया ये बचपन


,कहाँ खोया रे बचपन ?

हाय कहाँ खोया रे बचपन,
खेल-खिलौने सब छोड़कर।
तुतली  बोली  से रूठकर,
भोलापन से मुख मोड़कर।

कहाँ  गए वे लट्टू - घिरनी,
और कहाँ वे गिल्ली - डंडे।
साँप-सीढ़ी,लूडो - शतरंज,
और  वे ब्यापारी  के फंडे।

इक्खट - दुक्खट  का मजा,
वह कित-कित-कित करना।
रूमाल - चोर, ओ सम्पाजी,
वो आँख-मिचौनी का छुपना।

कहाँ गया वह गेंद और पिट्टो,
कूदना और फांदना  रस्सी से।
रेल बनाकर बम्बई को घुमना,
और झूला झूलना  मस्ती  से।

लउवा - लाठी, चंदन - काठी,
आईस-पाईस, चोर - सिपाही।
अटकन-मटकन दही-चटाकन,
और वो दोस्तों  की  गलबाहीं।

आहा,क्या थे दिन बचपन के,
मन में  कोई  क्लेश  नहीं था।
ना किसी से शिकायत शिकवा,
किसी से भी वैर- द्वेष नहीं था।

बड़े  हुए  तो खेलने  पड़ते हैं,
जिम्मेदारियों के बड़े-बड़े खेल।
छूट  गए  सब   संगी - साथी,
नहीं किसी से हो पाता है मेल।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

राम (दोहा )


दशरथ जी के लालना,राम बड़े थे वीर।
अरिदल की सेना संग, लड़ने में रणधीर।

मंझली मां के कोप से, मिला उन्हें वनवास।
पिता की आज्ञा पा चले,मन में ले हुलास।

मातु-पिता और गुरु के,चरणों में नवाकर शीश।
सभी जन को प्रणाम कर,चले पाकर आशीष।

लघु-भ्राता लक्ष्मण बोले,जोड़ कर दोनों हाथ।
भैया अकेले  ना जाइए, मैं भी चलूंगा साथ।

त्याग राजसी वस्त्र को,पहन वलकल अंग।
भार्या सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।

वन वन भटके साथ वे, खाते मूल और कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते लिए आनन्द।
                 सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Monday, October 18, 2021

कलश यात्रा

जय मां शारदे
 कलश यात्रा
शारदा की खुशी का ठिकाना नहीं ।बेटा दुल्हा बनेगा।घर में बहू आएगी।उसके पायल की रुनझुन से घर का माहौल संगीतमय हो जाएगा।उसकी शृंगार की सुगंध से पूरा घर सुवासित हो जाएगा।उसकी सुंदरता से पूरा महल सुशोभित हो जाएगा।आज उसके बेटे को तिलकोत्सव है।शुभ-घड़ी पर उपस्थित टोले-मुहल्ले के सभी लोगो तिलक-भोज से निपटकर चले गये। सम्बंधी-कुटुमब के लोग तिलक में आए सामानों को देखने लगे। किन्हीं सामानों की बड़ाई और किसी की बुराई का शिलशिला चलने लगा। लेकिन शारदा को सामानों की परवाह नहीं बहू तो सुंदर और संस्कारी मिली। किसी ने मुंह बनाते हुए कहा-इतने बर्तनो में आपकी दोनों बेटियों की शादी कैसे हो जायेगी।किसी ने कहा-होने वाले समधी की सात बेटियां हैं और यह आखिरी बेटी है कहां से दे पाते अधिक सामान। लेकिन शारदा मन-ही-मन प्रतिज्ञा कर रही थी कि बहू के मायके से आये एक भी सामान वह बेटियों को नहीं देगी।सारे सामानों को देखते-देखते अचानक उसकी नज़र तिलक में आयी कलशी पर पड़ी।उसे देख उसकी आंखों में अजीब सी चमक उत्पन्न हुई।जैसे वह अपनी कोई खोयी हुई वस्तु पा गयी।वह झट से उठी और कलशी को उठाकर देखी ।फिर उसमें की गयी कशीदाकारी में जैसे कुछ ढूंढने लगी। कशीदाकारी के बेल-बूटे पर उसकी नजरें थम-सी गयी।बूटे के बीच में उभरे अपनी दादी के दादा-दादी के नाम देख उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।वह अपने बेटे को देखते हुए बड़ी प्यार से बोली-मेरा बेटा मेरी प्यारी कलशी को बहुरा कर ला दिया।
      मतलब ? लोगों ने अचंभित हो पूछा।
शारदा ने कहा-आज से पच्चीस साल पहले यह कलशी मेरे मायके से आया था। इसमें मेरी दादी के दादा -दादी का नाम लिखा हुआ है।फिर कितनी जगह यात्रा करते हुए यह वापस मेरी बहु के मायके से आया।वह मेरे बेटे के कारण ही न। मतलब इसे मेरा बेटा वापस लाया।
*************************
शारदा अठारह वर्ष की होने वाली है। ठीक अठारह वर्ष पूरे होने पर उसका विवाह होने वाला है। तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं।दुल्हे का जोड़ा ,सिकड़ी-अंगूठी घड़ी-मोटरसाइकल और दहेज में मांगे जाने वाले सारे सामानों की खरीदारी के साथ शारदा के लहंगे-गहने संदूक-पिटारी टेबुल पलंग और जाने क्या-क्या सामान कुछ जरूरत के कुछ दिखाबे के खरीदकर लाया गया। किन्तु,
 शारदा को उन सामानों से कोई खुशी नाराजी नहीं।वह तो खुश है, बस इस बात से कि दादी ने अपनी दादी का दिया हुआ कलश उसे दे दी। उसे याद है बचपन में उस कलशी में वह तरह-तरह के सुंदर फूलों को सजाकर रखती थी।उसे वह कलशी बहुत अच्छी लगती थी।जिसका कारण था उसमें की गयी नक्काशी। कलशी के गर्दन में इतने सुन्दर  बेल ! ऐसा प्रतीत होता था कि कोई दुल्हन अपने गले में सुंदर हार पहनी हो।बीच के चौड़े भाग की नक्काशी के क्या कहने।जो देखता दंग रह जाता। सचमुच इतने सुंदर बेल बूटे कहीं किसी गगरी में नहीं दिखे।ना किसी दुकान में ना हीं किसी के घर में। दादी कहती थी कि उसकी दादी ने ठठेरे को कहकर उसे विशेष रूप से बनवाया था। नक्काशी के बड़े-बड़े बूटों में दादी के दादा-दादी का नाम इतनी बारिकी से खुदा हुआ था कि बिना बताए किसी को नजर नहीं आता था।
जब से दादी ने घोषणा की थी कि वह  कलशी अपनी पोती शारदा को दे देगी,शारदा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। तरह-तरह के सपने देखने शुरू किए।गगरी को फूलदान बनाएगी, उसमें रोज सुंदर और ताजे फूलों के गुच्छे को सजाएगी। कभी सोचती इसमें पीने का पानी रखेगी, कभी सोचती इसमें बचत के पैसे रखेगी। कभी सोचती इसे संभालकर रखूंगी और मैं भी अपनी पोती को शादी में उपहार दे डालूंगी। धत् तेरे की s s ! उसने शर्माते हुए तकिए में मुंह छिपा लिया।यह क्या सोच रही है। अभी शादी भी नहीं हुई और पोती...... कितनी कल्पनाएं कर डाली उस कलशी को लेकर।
            खैर ! उसकी शादी बड़े धूम-धाम से हो गई। ससुराल में अपनी कलशी को देख मन इस प्रकार प्रफुल्लित हो उठा -जैसे उसकी कोई अंतरंग सहेली से मिलाप हुआ हो।टोले-मुहल्ले तथा घर-परिवार के लोग मुंह दिखाई के लिए आते तो उसकी छवि के साथ-साथ उसकी प्यारी कलशी की भी प्रशंसा दिल खोलकर करते जिसे सुनकर उसके हृदय में आनन्द के जो हिलोरें उठती उसका वर्णन कर पाना अत्यंत कठिन कार्य है।
       लेकिन उसकी शादी के ठीक आठवें दिन उसकी एकलौती ननद की शादी थी।खुशी से उसका मन-मयूर थिरक उठा ।अपनी कितनी साड़ियां, कितने लहंगे, कितने गहने खुश मन से उसने ननद को पसंद करबा कर दे दिए। एक बार भी नहीं सोचा वह उसका किसी का दिया हुआ उपहार है,उसका सुहाग-शृंगार है। लेकिन उन मनोदशाओं पर काबू पाना कितना कठिन हो गया जब उसकी आंखों के सामने से उसकी प्यारी गगरी को यह कहते हुए उठाकर ले जाया गया कि उसकी ननद को यह गगरी बहुत पसंद है, इसलिए उसे उसके तिलक में  दे देते हैं। ऐसा लगा उसके सीने से किसी ने उसका कलेजा काढ़ लिया हो। परन्तु स्वाभाविक संकोच से मना नहीं कर पायी। मायके वालों की शिक्षा कानों में अलग डंके बजा रही थी-यहां से भेजे समानों को कोई रखते हों, उपयोग में लाते हों, किसी को देते हों,तुम कुछ मत बोलना।
पति ने आकर नजरों की भाषा में कुछ नहीं बोलने की चेतावनी दी।
 उसके पास अपने कलेजे पर पत्थर रख लेने के अलावा कोई चारा नहीं था।मन को तसल्ली दी कभी ननद के घर जाउंगी तो देखूंगी। लेकिन,ननद ने ससुराल से आते ही कहा आपकी कलशी की वहां बहुत तारीफ हुई। सुनकर मन गदगद हो गया। लेकिन ....
लेकिन ? सशंकित हो वह घबराकर कर पूछ बैठी।
उसे मेरी ननद ने नेग में ले लिया।ननद ने रुआंसे स्वर में कहा।
जब वह शादी के बाद पहली बार मायका गई तो लोगों ने पूछा कलशी कहां सजायी ?
 बेचारी ! जवाब में होंठों पर स्निग्ध मुस्कान बिखेरने के सिवा कुछ नहीं कर सकती थी। कुछ वर्षों बाद उसकी ननद ने यह समाचार सुनाया कि आपकी वह कलशी , जो मेरी ननद को नेग में दिया गया था वह उसकी ननद को दहेज में दे दिया गया। ठीक हुआ जैसे को तैसा। उसने कभी सोचा नहीं कि वह मुझे मिला था। मुझे कितना पसंद था। आखिर उसका भी नहीं रहा।
 शारदा सोच रही थी जैसे को तैसे का सिद्धांत तो सबके साथ लागू होता है। उसने भी तो नहीं सोचा यह सब कि मुझे वह कलशी कितनी पसंद थी। मुझे भी तो वह कलशी दादी ने उपहार में दिया था ।वह निराश मन से सोच रही थी कि अब अपनी प्यारी कलशी को कभी नहीं देख पाऊंगी।भला ननद की ननद की ननद के घर वह क्यों जाएगी ?
मायके में बार-बार पूछे जाने पर कलशी का यात्रा-वृत्तांत जाने कैसे फिसलकर उसके मुख से बाहर आ गया । फिर क्या था ।काना-फुसी होते-होते दादी के कान तक पहुंच गयी। उसके बाद के माहौल का माहौल उसके लिए भी भारी पड़ा ।तरह-तरह के ताने-बाने सुनने को मिला। कलशी की बात उठते ही उसकी मां और दादी ने उसकी ननद को लालची,सास को नासमझ और पूरे परिवार को जाने किन-किन अलंकरणों से विभूषित करती।उनके लिए बोली गयी जली-कटी  सुन उसे बहुत बुरा भी लगता। लेकिन वह करती भी क्या ?उसे वापस मांग तो नहीं सकती थी।
दिन बीतते गए।वह कलशी को मिलने-खोने और दूर होने की बात को दु:स्वप्न समझकर भूलने की कोशिश करती। कभी भी कलशी की याद आती तो अपने मन में यह निश्चय जरूर करती कि बहू के मायके से आने वाले सामानों को कभी ना उपयोग में लाएगी,ना बेटियों को देगी। किसी के दहेज अथवा उपहार में मिले सामानों को बिना उससे पूछे लेना या किसी को देना एक ग़लत प्रथा है।इस प्रथा के रोक-थाम करने पर दूसरों पर तो वश नहीं है पर स्वयं पर नियंत्रण किया जा सकता है।यह तो महज एक संयोग है कि जहां उसकी कलशी गयी थी उसी घर में उसके बेटे की शादी हुयी, और यह तो पूर्ण रुपेण  महासंयोग है कि मेरी बहू को दिए जाने के लिए अब तक यह कलशी वहां सुरक्षित रही । नहीं तो उसकी भी ननद अथवा सात बेटियों में किसी और को दे दिया जाता। शारदा प्रसन्न मन से उस कलशी को देखती हुयी उसे उठाकर अपने सीने से लगा ली। तभी कहीं लाउडस्पीकर में फिल्मी गाना गूंज उठा।कल के बिछड़े हुए हम आज कहां आ के मिले.........
और शारदा की आंखें बिछड़ने के बाद मिलन के हर्षा-तिरेक में छलछला आईं।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Sunday, October 17, 2021

ठगी का शिकार

खेल रहे ठग खेल ठगी का,हम सब हुए शिकार।
कदम- कदम पर ठग हैं देखो, ठगने को तैयार।
तरह- तरह के रोज बहाने, वे लेकर आते हैं पास।
फटे-चिथड़े परिधान पहनकर, चेहरा लिए उदास।
कोई कहते मां मरी है, कोई कहते हैं बाप बीमार।
कोई मदद में दस-बीस मांगते, मांगता कोई हजार।
कोई-अंधा-कोढ़ी बन आता, कोई बन गूंगा-बहरा।
कोई कमर झुकाकर आता, कोई बन लूला-लंगड़ा।
कोई मंदिर के नाम पर ठगता, कोई कहता है पूजा।
ठगता है लंगर-भण्डारे कह, हथकंडे और भी दूजा।
खेल रहे हैं बहुरूपिए भी, ठगी का खेल निराला।
बचकर रहना इनसे ऐ लोगों,पड़े जो इनसे पाला।
घोड़े को रंग काले रंग से,पहनाकर लोहे की नाल।
दस कदम चला दस हजार में बेचते तुरंत निकाल।
रिक्शे, टैक्सी को सजाकर, प्रतिमा उसमें रख देते।
धूप-दीप- के नाम पर भी लोगों से पैसे हैं ठग लेते।
मिलावट कर मिर्च-मसाले में, साहुकार हमें ठगते।
महंगाई का रोना रोकर, हितैषी वे हमारे हैं बनते।
ठगने के ये खेल निराले,मेहनत करने से हैं अच्छे ।
इस खेल को खेल रहे हैं, मिल युवा बूढ़े औ बच्चे।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक



Friday, October 15, 2021

रावण मरता क्यों नहीं



रावण मरता क्यों नहीं

हर साल विजयदशमी की अवसर पर बुराई के प्रतीक स्वरूप रावण को हम तीर चलाकर मारते हैं। अग्नि प्रज्वलित कर उसे धूं-धूं कर जलते हुए देखते हैं और मन में संतुष्ट होते हैं कि रावण का दहन हो गया।रावण मर गया। किन्तु आगामी साल के विजयदशमी को पुनः रावण को मारना पड़ता है।फिर हम सोचते हैं कि प्रत्येक वर्ष मारे जाने पर भी रावण मरता क्यों नहीं ? 
आखिर क्यों ? हर बार रावण को मारना पड़ता है। इस ज्वलंत प्रश्न पर हम कभी विचार नहीं करते। हम कभी यह नहीं सोचते कि कपड़े अथवा कागज के बने रावण को तो हम अग्नि में फुकते हैं किन्तु मन में पल रहे बुराई रुपी रावण को  तो हम कभी फूंक नहीं पाते।मन में उठे दुर्विचारों को, दुर्व्यवहारों को, दुराचारों को हम कभी मार नहीं पाते।तो भला हर साल मारने पर भी रावण क्यों मरेगा ? 
जिस प्रकार रावण मांस-मदिरा का सेवन करता था।उस प्रकार हम भी कर रहे हैं। जिस प्रकार रावण साधु-संतों को सताता था उस प्रकार भले लोगों के साथ हम भी दुर्व्यवहार करते हैं। जिस प्रकार रावण पराई स्त्रियों का हरण करता था उस प्रकार हमारे समाज में भी नारियों का अपहरण किया जाता है।जिस प्रकार रावण दूसरों के धन नष्ट करता था ,उस प्रकार हम भी दूसरों के धन लूट रहे हैं।इस प्रकार रावण तो हमारे मन के कण-कण में विद्यमान है। इसलिए रावण के मारने की हमारी लाख कोशिशों के बावजूद  रावण नहीं मरता है। अगर हम सचमुच रावण को मारना चाहते हैं तो इस नकली रावण को मारने का ढोंग करने वाले अभिनय  करने से अच्छा मन में उत्पन्न बुराई रुपी असली रावण को मारने का प्रयत्न करें।रावण ज़रूर मर जाएगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, October 14, 2021

ऐ पथिक बढ़ते चलो (गीतिका छंद )

हे पथिक चलते चलो तुम, जिंदगी के रास्ते।
मन कभी विचलित न करना, छोड़ने के वास्ते।

माना पथ मुश्किल बहुत है,पर इसे मत छोड़ना।
मुश्किलों के मुकाबले को,मुख कभी मत मोड़ना।

राह में कण्टक अगर है,रौंद कर बढ़ते चलो।
हौसला रखकर हृदय में, पहाड़ पर चढ़ते चलो।

आहत होकर ठोकरों से,हिम्मत कभी मत हारना।
हर हाल में बढ़ना तुम्हें है,मन में रख लो धारना।

मन के सारे हार होती, मन के हारे ही जीत है।
हिम्मत तुम्हारा संगी-साथी,हिम्मत ही तेरा मीत है।

तुम अगर बढ़ते चले तो,राह स्वयं मिल जाएगी।
हर मुसीबत हौसलों से, राह से टल जाएगी।

                              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, October 12, 2021

जय मां कालरात्रि



जय मां कालरात्रि

सप्तम रूप शोभिता,शुभ भाव धारिणी।
जयंती जयप्रदा तथा मां कालरूपिनी।।

कालिके,काली कालरात्रि,काल कपालिनी ।
कालिका कपालिनी रकतपुष्प मालिनी।।

दुष्ट दलनकारिनी सदा ही सिंहवाहिनी।
भयं रूप भयंकरी भूतादि भयहारिणी।।

महा स्वरुप महाप्रदा गृहे-गृहे निवासिनी।
ददाति दानरूपिनी दारिद्र- दुखहारिनी।।

तंत्र-मंत्र से समस्त प्राणियों को तारिनी।
महारुपेण महाज्वला नमामि विंध्यवासिनी।।

विनय विवेक ले सदा हो कपालधारिनी।
भूत-प्रेत मिले कभी लगे उसे डरावनी।।

खड़ाखड़ाती खड्ग ले खड़ी खप्पर धारिनी।
तंत्र- मंत्र धारिनी, सर्वत्र सिद्धि कारिणी।।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, October 8, 2021

सुन ले विनती आज (मां अम्बे गीत )

जय मां अम्बे, जय जगदम्बे,
सुन ले विनती आज शरण में आई हूं।
तेरी यह दासी, बहुत उदासी,
दर्शन प्यासी आज शरण में आई हूं।
कष्ट हरो मां भक्त जनों के,
जीवन आज सुधारो।
कष्ट भुजा मां दुःख-सागर से,
नैया पार उतारो।
सुनो मां नैया पार उतारो।
सब दुःख हरनी,सब सुख हरनी,
उबारो तरनी आज, शरण में आई हूं।
जय मां अम्बे.......................
संकट हरनी नाम तुम्हारा,
सबके संकट हरती।
महिमा तेरी बड़ी निराली,
सबको समृद्ध करती।
हां हां मां सबको समृद्ध करती
बिगड़ी बनाओ,पाप मिटाओ,
कर दो कृपा आज, शरण में आई हूं।
जय मां अम्बे...................
तेरे सिवा नहीं कोई मेरा,
 किसके द्वार मैं जाऊं।
हे जगतारिणी तू बतला दे,
किसको सुनाऊं।
कहो मां किसको व्यथा सुनाऊं।
तू मन हरनी,दिल खुश करनी,
बिगड़ी बना दो आज,शरण में आई हूं।
जय मां अम्बे.....................
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'


Tuesday, October 5, 2021

मां दुर्गा की भोग आराधना गीत


मां दुर्गा की भोग आराधना गीत
              (लावणी छंद)

नवरात्रि में नवदुर्गा माता को मनभावन भोग लगाइए।
मां के चरणों में शीश नवाकर,मनचाहा वर को पाइए।

प्रथम दिवस शैलपुत्री मां के चरणों में गौ का घी चढ़ाइए,
अपनी प्यारी काया को, सुंदर-स्वच्छ, निरोग बनाइए।

द्वितीय दिवस ब्रह्मचारिणी मां को,शक्कर भोग लगाइए,
माता से आशीष पाकर,अपनी आयु को दीर्घ बनाइए।

तृतीय दिवस चन्द्र घंटा मां को खीर-मिठाई खिलाइए,
सदा सुखी का वरदान लिजिए, दुःख से मुक्ति पाइए।

चतुर्थ दिवस कुष्मांडा मां को, मालपुआ खिलाइए,
बुद्धि विकसित कर देंगी मां, निर्णय शक्ति बढ़ाइए।

पंचम दिवस स्कंदमाता को,कदली का भोग लगाइए,
काया कंचन सदा रहेगी, शरीर को स्वस्थ्य  बनाइए।

षष्ठम दिवस कात्यायनी मां को, मीठा शहद खिलाइए,
सुंदर,धौम्य सुकुमार शरीर, व्यक्तित्व आकर्षक पाइए।

सप्तम दिवस कालरात्रि मां को, गुड़ का भोग लगाइए,
अकास्मिक आने वाले, सारे संकट से छुटकारा पाइए।

अष्टम दिवस महागौरी मां को, नारियल भोग लगाइए,
बंध्यापन को दूर करें,और संतति के सुख को पाइए।

नवम दिवस सिद्धिदात्री मां को,तिल का भोग लगाइए,
अकास्मिक मृत्यु के भय से,सदा के लिए राहत पाइए।

दसम दिवस माता रानी के,चरणों में शीश नवाइए।
शुभाशीष, शुभकामनाएं पाकर, यात्रा शुभ बनाइए।

प्रेम से बोलो जय माता की 🙏🙏
                              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, October 4, 2021

कल हाथ पकड़ना मेरा



कल हाथ पकड़ना मेरा (लघुकथा)

सब्जियों की थैली ले कांपते कदमों से शम्भु प्रसाद जी बार-बार सड़क पार करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन तेज रफ्तार से आती गाड़ियों को देख उनकी हिम्मत जवाब दे जाती।ना चाहते हुए उनकी नजरें मनीष को ढूंढ रही थी।वे उसका एहसान नहीं लेना चाहते थे।इतने में मनीष लपकता हुआ उनके निकट आया और उनका हाथ पकड़ कर सड़क पार कराने लगा। सड़क पार कर दोनों साथ-साथ चलने लगे। शम्भु प्रसाद ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा- बेटा तुम्हारे आफिस से आने और मेरे सब्जियां लाने का समय एक ही है। अक्सर हमारी-तम्हारी भेंट हो जाती है।तुम स्वयं थके-हारे आते हो फिर मुझे...........
शम्भु प्रसाद की बातें काटते हुए मनीष ने कहा आप भी तो आफिस से थके आते थे चाचा जी ! जब हम छोटे थे। विद्यालय से आते समय आप मेरे सभी साथियों को हाथ पकड़ कर सड़क पार कराते थे। मां ने कहा था किसी के साथ नहीं जाना।पता नहीं कैसे लोग हों क्या मकसद हो उनका। इसलिए हम आपके साथ नहीं जाना चाहते थे। आखिर मैंने आपसे एक दिन पूछ ही लिया कि क्यों आप हमें सड़क पार कराते हैं? आपने कहा था-बच्चे नासमझ और बूढ़े कमजोर होते हैं । इसलिए उन्हें सड़क पार करने में मदद करनी चाहिए।जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा तब तुम भी मेरा हाथ पकड़ कर सड़क पार करना। आपकी यह शिक्षा मुझे बहुत अच्छी लगी।सचमुच आज वही स्थिति हो गयी। मेरे कार्यालय से आने का और आपके सब्जी लाने का समय एक ही है।जब मैं आपको सड़क पार करने में असमर्थ पाता हूं आपको सड़क पार करा देता हूं। इतना ही नहीं कहीं भी मैं किसी बच्चे और बुजुर्ग को सड़क पार करने में असमर्थ पाता हूं उन्हें जरूर मदद करता हूं।
शम्भु चाचा ने सोचा -हमारे कार्यों एवं संदेश से किसी को तो सीख मिली। हो सकता है अन्य बच्चे भी यह कार्य करते होंगे। मनीष संयोग से यहीं है इसलिए मुझे मदद करता है।उनका मन प्रसन्नता से भर गया।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, October 1, 2021

और कहानी छप गयी

किसी नगर में एक निर्धन और विद्वान ब्राह्मण रहते थे।उनके द्वार पर उनके शिष्यों भीड़ लगी रहती।सभी को वे उत्तम शिक्षा देते थे।गुरु दक्षिणा के रूप में वे स्वेच्छा से जो कुछ दे देते उसे संतुष्ट भाव से स्वीकार करते। उन्हें कहानियां लिखने का बड़ा शौक था।जब भी समय मिलता अच्छी और शिक्षाप्रद कहानियां लिखकर लोगों को सुनाते।सभी लोग उनकी कहानियों की खूब प्रशंसा करते। उन्हें लगता काश उनकी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में छपती। लेकिन, निर्धनता के कारण वे अपनी कहानियों को छपबा नहीं पाते।
उनकी पत्नी मुर्ख और झगड़ालू स्वभाव की थी।आये दिन वह उनसे झगड़े करती।उनके द्वारा कहानी लिखें जाने को मुर्खतापूर्ण व्यवहार तथा कागज रोशनाई और समय की बर्वादी कहती।अवसर पाते ही उनके शिष्यों को डांट-फटकार कर भगा देती। उन्हें बस टोले-पड़ोसियों की निंदा सुनने एवं चुगली करने में ही मज़ा आता। पंडित जी उन्हें समझाते की निंदा एवं चुगली करना बुरी बात है। संसार में भांति-भांति के लोग हैं। दुर्गुणों और दुराचारियों की ओर ध्यान न देकर भले मानस और गुणवानों की कद्र तथा संगति करनी चाहिए। परंतु पंडिताइन पर उनके उपदेशों का कोई असर नहीं होता।
पंडित जी ने एक पुस्तक में पढ़ी थी कि महापुरुषों की सफलता में किसी-न-किसी नारी का साथ रहा है। वे सोचते मां-बहन तो है नहीं। पत्नी ऐसी मुर्ख है जिसकी दृष्टि में शिक्षा से बुरा कोई कार्य हो ही नहीं सकता। वे सोचते काश वे मुर्ख होते और उनकी पत्नी पत्नी कालिदास और तुलसीदास की पत्नी जैसी।
एक दिन पंडित जी किसी काम से बाहर आते हुए थे। पंडित जी की पत्नी झाड़ू लगा रही थी। अचानक उनकी दृष्टि पंडित जी के बिछावन पर पड़ी, जहां पंडित जी द्वारा लिखी गई एक नयी कहानी रखी थी। उसने सोचा? क्यों ना इसे बाहर फेंक दूं। यदि मैं उनके लिखे पन्ने को फेंकती जाऊं तो पंडित जी ऊब कर लिखना ही छोड़ दें।ऐसा सोचकर वह कहानी के पन्नों को उठाकर कूड़े के ढेर पर फेंक आयी।
संयोग से उस समय वहां से जा रहे एक पत्रकार की नजर उस पन्ने पर पड़ी। उन्होंने उसे कुछ जरूरी कागजात समझकर उठाया और कहानी पढ़ी। उन्हें वह कहानी बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद लगी। अंत में पंडित जी का नाम पता लिखा था। पत्रकार ने उस कहानी को उनके नाम-पते के साथ छपबा दिया।
 जब पंडित जी घर लौटकर आते तो अपने द्वार पर भीड़ देखकर अचंभित हो गये।उनके एक विद्यार्थी ने उन्हें अखबार दिखाते हुए कहा- अखबार में आपकी बहुत अच्छी कहानी छपी है। पंडित जी किंकर्तव्यविमूढ़ सा उन्हें देखते हुए सोच रहे थे-मुझे तो छपबाने सामर्थ ही नहीं फिर मेरे कहानी कैसे छप गयी ? अखबार लेकर पढ़ी। सचमुच यह तो उनके द्वारा लिखी गरी कहानी है। कहानीकार के स्थान पर उनका ही नाम है।साथ में उन्हें इस कहानी लिखने के लिए पुरस्कृत करने के लिए आमंत्रित किया गया है। आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे?
वे घर आकर अपनी लिखी हुई कहानी ढूंढने लगे।
पत्नी ने उन्हें ऐसा करते देख तो पूछा क्या ढूंढ रहे हो?
उन्होंने कहा-यहां मैंने एक कहानी लिखकर रखी थी।
पत्नी ने कूढ़ते हुए कहा-उसे तो मैंने कूड़े पर फेंक दिया।
अब पंडित जी को सारी बात समझ में आ गयी।वे अपनी मुर्ख पत्नी को देखकर मुस्कुरा उठे।आज उन्हें अपनी मुर्ख पत्नी के कारण यह सफलता प्राप्त हुई थी।
                             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

सेवा का संकल्प



सेवा का संकल्प (लघुकथा)

बिस्तर पर पड़े दादा जी का मल-मूत्र साफ कर रहे पिताजी को देख राजीव और संजीव का मन व्यथित हो गया। आखिर राजीव ने बोला ही दिया-क्या पिताजी आप अपने से यह सब करते हैं।एक केयर-टेकर रख लेते।
और क्या-अभी दो महीने पहले ही जब हम इन्हें लाने पटना गये थे तो देखा था देखा था चाचाजी इन लोगों के लिए केयर टेकर रख दिया था।जब दादा-दादी को कोई जरुरत होती कौंल कर देते और उधलोग आकर सब साफ़ सफाई कर देते।कुछ पैसे की ही तो बात है। संजीव ने उसकी बात खत्म होते ही कहा।
बात पैसे की नहीं बेटा! स्नेह-प्रेम और कर्त्तव्य की है। तुम्हारे चाचा बिजनेसमैन हैं।उनके पास समय का अभाव था। ‌तुम्हारी चाची भी अक्सर बीमार रहती हैं। ऊपर से घर के सारे काम नौकरों से करवाना। सो उन्होंने केयर-टेकर रख लिया ‌।
पैसे की कमी हमारे पास भी नहीं ।हम भी आदमी रख सकते हैं, इनकी देखभाल के लिए। लेकिन जब इन्हें जरुरत होगी तब तो नहीं आएगा।और जब-तक नहीं आएगा तब-तक इन्हें मल-मूत्र पर ही पड़े रहना होगा। इसलिए मैं आफिस जाने से पूर्व इनकी साफ- सफाई कर लेता हूं तो आत्मसंतुष्टि मिलती है। तुमलोग को पाल-पोस कर हमने देखा लिया कि मां बाप को बच्चों को पालन-पोषण और पढ़ाने-लिखाने में मां-बाप को क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ते हैं। किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। फिर वही बच्चे अपने शारीरिक रूप से लाचार मां-बाप की सेवा करने से कतराते हैं।अगर तुम्हारी चाची बीमार नहीं पड़ती तो तुम्हारे चाचू इन्हें कभी आने नहीं देते।अब हमें मौका मिला है तो हमें सहृदय इनकी सेवा करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए दलिया बनाकर लाती हुई मां ने कहा-हां आप ठीक कहते हैं इस पुण्य कार्य में मैं हमेशा आपके साथ हूं।हमें इनकी सेवा अवश्य करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए गर्म पानी लेकर आती दीदी ने कहा और हम भी।
और हम भी उनकी बातें सुनकर अनायास दोनों भाइयों के मुंह से निकल गया।
मां-पिताजी संतुष्ट-भाव से बच्चों को निहार रहे थे ।और तीनों भाई- बहन मन -ही- मन यह संकल्प लें रहे थे कि हम भी अपने मां-पिताजी की सेवा स्वयं करेंगे।पैसे की अधिकता से पंगु नहीं होंगे।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Thursday, September 30, 2021

नदिया की धार



कल-कल करती बहती जाती,नदिया की धार रे।
संगीत सुनाती ऐसी जैसे,भौरे करें गूंजार रे।

तेज चाल से बढ़ती जाती,मन में लेकर शान।
चलना ही है काम इसका, इस पर इसे गुमान।
जरा न रुकती,जरा न थकती,चलती मन को मार रे।
संगीत सुनाती.....................
दोनों कूल में देख उठी है कैसी आज उफान।
ऐसा लगता आज है आया सागर में तूफान।
आज है जैसे बनकर आई यह धरती की हार रे।
संगीत सुनाती...................
कभी थिरकती,कभी मचलती,मन में ले गुमान।
झूमती-गाती इठलाती-सी चल रही सीना तान।
कभी भंवर बन नाच दिखाती,सौ-सौ ठूमके मार रे।
संगीत सुनाती...................
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 29, 2021

घर का जोगी



घर का जोगी

होली का त्योहार निकट है। सभी घरों में जोर-शोर से तैयारियां चल रही है। कपड़ों एवं रंग-गुलाल के साथ-साथ पकवानों एवं लजीज व्यंजनों की भी सूची बन रही है।
रंजना ने अपनी सहेलियों से मालपुआ की बात छेड़ी।
रजनी ने कहा-पुआ तो हम सभी घरों में खाते हैं।पर, समृद्धि भाभी जैसा लजीज और खास्ता पुआ किसी का नहीं होता।
रंजना की भाभी ने कहा-अपना-अपना हूनर है, वरना मेवे मलाई तो सभी डालते हैं। किन्तु क्या चीज कितनी मात्रा में डालना है यह सभी को अंदाज नहीं होता।
रंजना ने कहा-चलो हमलोग समृद्धि भाभी से ही पूछ लें।
फिर क्या था, सभी चल पड़ी समृद्धि भाभी के घर।संयोग से समृद्धि भाभी घर में अकेली थी। उन्होंने सबका बड़े प्यार से स्वागत किया।
उनकी व्यवहार कुशलता की तारीफ सभी ने किया। फिर मिलने आने का मकसद भी बता दिया।
समृद्धि भाभी ने माल पुए को खास्ता करने के गुर्र सभी को दिल खोलकर बताया।
होली के दिन सभी संध्या को रंग-गुलाल ले एक-दूसरे के घर चल पड़े। बहुत ही सुंदर संयोग था जब समृद्धि भाभी रंजना के घर पहुंची तो उसकी सहेलियां भी वहां मौजूद थीं। सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया।
रंजना की भाभी ने गरम-गरम माल पुआ लाकर सभी को परोसा।
समृद्धि भाभी की सासु मां ने उन्हें फटकारते हुए कहा-लो खाओ पुआ।देखो कितना बढ़िया बना है।यह तो बढ़िया पुआ बना ही नहीं पाती है।
समृद्धि भाभी की ननद ने छुटते ही कहा-मैं तो पहले ही बोली थी कि रंजना या उसकी भाभी से पुछकर बनाइएगा। लेकिन इन्हें पूछने में अपमान लगता है।अरे! सीखने में कैसा संकोच ?
दूसरी ननद ने हां -में-हां मिलाते हुए कहा-ऐसे लोग कभी सीख नहीं पाते।
सासु मां ने हाथ नचाते हुए कहा-क्या करोगी ?सबके किस्मत अच्छे नहीं होते। मैं तो तरस कर ही रह गयी कि मेरे घर कोई अच्छा व्यंजन बने।
रश्मि कहना चाहती कि हमलोग ने तो इन्हीं से सीखा पुआ बनाना। लेकिन रंजना ने उसे चुप रहने का इशारा किया।वह नहीं चाहती थी कि समृद्धि भाभी को और भी खरी-खोटी सुनाना पड़े।
रंजना की सभी सहेलियां समृद्धि भाभी का उदास और रुआंसा चेहरा देख सोंच रही थी-
सारे मुहल्ले में समृद्धि भाभी सर्व गुण संपन्न और निपुण हैं। लेकिन घर के लोग उसे फुहड़ और बेबकूफ समझते हैं।इसे ही कहते हैं -घर का जोगी जोगड़ा आन गांव के सिद्ध।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, September 25, 2021

जागो-जागो ऐ इंसान

जागो-जागो ऐ इंसान

मत कर मानव झूठी शान,धरा रह जाएगा गुमान।
जरा तू मेरी भी तो मान,जागो-जागो ऐ इंसान।
छल-छद्दम से दो पैसे जब, हाथ कभी पा जाते हो।
तुझ-सा बड़ा न कोई प्राणी,ऐसी अकड़ दिखाते हो।
तू है बहुत बड़ा नादान,जागो-.......
धन-दौलत का गर्व क्यों करते,इसका कोई मोल नहीं।
साथ न तेरे जाएगा यह,जाएगा तू छोड़ यहीं।
गर्व क्यूं करता है इंसान,जागोे.......
लाख जतन से महल बनाया,सब सुविधाओं से भरपूर।
खोल न पाते मन की खिड़की,खुली हवा से रहते दूर।
डाला ख़तरे में क्यों जान,जागो......
क्यों इठलाता रे मन-मुरख इस माटी की मूरत पर।
अस्थि-मज्जा से बने वदन पर, सुंदर गोरे सूरत पर।
यह तो ईश्वर का वरदान जागो.......
रूप का मत अभिमान करो, यह तो कल ढल जाना है।
ईश्वर की रचना सब सूरत,अपना न ताना-बाना है।
मत कर इस पर तू अभिमान, जागो..........
बोली एक अमोल रतन है,इसे समझ ना पाते हो।
तीखी बोली बोल जहां में, कड़वाहट भर जाते हो।
क्यों है इससे तू अंजान,जागो........
                                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 24, 2021

दादी मां की शिक्षा

दादी मां ने हमें सिखाया, प्यार सभी से करना।
मिल-जुलकर सभी से रहना,आपस में न लड़ना।

नये-नये पकवान बनाकर दादी हमें खिलाती।
दूध,छाछ अमझोरा,सत्तु, लस्सी हमें पिलाती।
कहती कोल्ड्रिंक्स न पीना घड़े का पानी पीना।
मिल-जुल-कर ...............
दादी मां अपने विस्तार पर, साथ हमें सुलाती।
दादा जी संग घूमने जाती, साथ हमें ले जाती।
ट्रैफिक का नियम बताती,कहती बायें चलना।
मिल-जुलकर ............
दादी मां हमको रोज सुनाती, प्यार भरी कहानी।
फिर अंत में शिक्षा दे कहती,करना ना मनमानी।
सदा बड़ों का कहना मानो, खूब पढ़ाई करना।
मिल-जुलकर .............
मां-पिताजी के गुस्से से, दादी मां है हमें बचाती।
फिर प्यार से गोद बिठाकर,हमको है समझाती।
अच्छे बच्चे ज़िद न करते, शैतानी न तुम करना।
मिल-जुलकर .................
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, September 23, 2021

सरस्वती वंदना

मां शारदे ! मां शारदे!
अज्ञानता से उबार दे।
मां शारदे................
तेरे शरण में हम हैं आयें,
लेकर बहुत विश्वास मां।
तेरे चरण में सिर नवायें,
रखकर हृदय में आस मां।
मेरी मूढ़ता को दूर कर दे,
मन-ज्ञान को तू निखार दे।
मां शारदे!...................
दिल में विराजे तू सदा,
 मन में बसा तेरा रूप है।
हर भाव में,हर बात में,
हर वाणी तेरा स्वरूप है।
मन-वचन को स्वच्छ रखूं,
सुंदर सदा तू विचार दे।
मां शारदे!...................
तेरे धवल वसन-स्वरूप-सा,
अंत:करण मेरा रहे।
हर जीव के खातिर हृदय में,
इंसाफ का डेरा रहे।
हर पुण्य कर्मों को करें हम,
तुम इसे विस्तार दे।
मां शारदे!....................
स्वरचित, मौलिक
सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, September 22, 2021

मुफ्त में सब्जी



मुफ्त में सब्जी

पत्नी बोली सुनो पिया जी!तुमको अकल नहीं है।
मोल-भाव कर सब्जी लेने का,कोई नकल नहीं है।
बिक्रेता जितना दाम बताता है,उतने में तू लेते हो।
अपनी कमाई का मोटा हिस्सा बेकार गवां देते हो।
बड़े ही तुम हो सीधे- सादे ,और बड़े हो तुम भोले।
दो रुपए तुम दाम घटाओ,जितना भी विक्रेता बोले।
चले पिया जी सब्जी लाने, पाकर पत्नी से शिक्षा।
प्रिया ने जितना पाठ पढ़ाया था,देने उसकी परीक्षा।
पत्नी जी की पसन्द की, वे सभी सब्जियां लाने।
हर सब्जी के दामों में,वे लगे दो-दो रुपए घटवाने।
एक बूढ़ी सब्जी वाली, जो दिखती चेहरे की भोली।
मुट्ठी भर धनिया-पत्ती का वह, दाम दो रुपए बोली।
पति महोदय हंसकर बोले,मुफ्त में दो धनिया पत्ती।
बूढ़ी सब्जी वाली के चेहरे पर,साफ दिखी आपत्ति।
अपनी आंख नचाकर पूछी,क्या तेरे मुंह हैं चिकने?
सब्जियां दान करने ना रखी, रखी हूं यहां मैं बिकने।
पति महोदय हंसकर बोले, क्यों गुस्सा करती माई।
दो रुपए दाम घटाने को,प्यारी पत्नी है मुझे सिखाई।
दो रुपए की धनिया पत्ती का, दाम बता क्या होगा?
दो रुपए कम करने पर, यह मुफ्त में ही तो होगा।
सब्जी वाली हंस कर बोली- सुन मेरा बेटा ! भोला।
उस दिन तुम आकर,यहां पर मुफ्त में भरना झोला।
जिस दिन सब्जी बेचने बैठेगी,यहां तुम्हारी घरवाली।
सब्जियों से भरकर ले जाना, घर अपना झोला खाली।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, September 19, 2021

मुहब्बत की बरसात हो (ग़ज़ल)

जिंदगी में मुहब्बत की बरसात हो।
मुहब्बत ही हमारा बस सौगात हो।

मुहब्बत का बादल , छाये गगन में,
गरज के साथ मुहब्बत का प्रपात हो।

मुहब्बत की धरा पर,गिरे बूंद बनकर,
दिन में शुरू हो गिरना तो फिर रात हो।

मुहब्बत के जल से , भरे ताल पोखर,
झर-झर झरनों से यूं झंझावात हो।

मुहब्बत की नदी में,बहे धार बनकर,
दूर -सुदूर तक यही जलजात हो।

मुहब्बत की धारा,बहे अब निरंतर,
समंदर से उसकी ,तब मुलाकात हो।

समंदर से मुहब्बत उड़े भाप बनकर,
मेघों का रूप ले , फिर बरसात हो।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Saturday, September 18, 2021

मासूम सवाल

मासूम सवाल

अम्मा चंदा क्या होता?अम्मा सूरज क्या होता?
अम्मा नदिया क्या होती?अम्मा पर्वत क्या होता?

अम्मा दीदी क्या होती?अम्मा भैया क्या होता?
अम्मा अम्मा क्या होती,अम्मा बाबा क्या होता?

नन्ही-सी बिटिया का प्यारा मासूम सवाल।
क्या कहूं कितना मेरे मन को कर गयी निहाल।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मां का रूप

मां का रूप

मां का है रूप अनूप,जाने रंक धनी और भूप।
मां सुखदाता का रूप जाने........
मां महागौरी,मां महाकाली,मां ही ज्योतावाली।
मां ही शारदा,मां ही लक्ष्मी,बल-बुद्धि देने वाली।
मां अद्भुत-अपूर्व अनूप जाने........
मां बच्चे को जन्म है देती,पालन पोषण करती।
दूध पिलाकर भूख मिटाती,सारे दुखड़े हरती।
मां समस्त सिद्धि-स्वरूप जाने.................
मां की महिमा बड़ी निराली, जिसका कोई छोर नहीं।
मां की ममता लूट सके जो,ऐसा डाकू चोर नहीं।
बदल सके ना मां का रूप जाने......
मां सुख करनी, संकट हरनी,मां ही सुख की छाया।
मां ममता की सुंदर मूरत,जिसमें है बसती माया।
मां सुबह की कोमल धूप,जाने........
मां गर्मी में शीतल छाया,जाड़े में है अंगीठी।
वर्षा में छतरी बन जाती,जिसकी छाया मीठी।
मां हर ऋतु के अनुरूप जाने.......
मां ठंडा जल भी हमें पिलाती, लगता अमृत जैसा।
शर्बत-छाछ जो घोल पिलाती, कहीं न मिलता वैसा।
मां मीठे जल का कूप, जाने .......
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 15, 2021

मामी जी का 'और बताओ' (हास्य-व्यंग्य)



कालेज से आते प्यास से व्याकुल,पहुंची मामी पास।
बोली- मामीजी ! पानी दीजिए,लगी है जोर से प्यास।

मामी ने पूछा और बताओ,अब क्या है हाल तुम्हारा?
सब ठीक-ठाक कहकर उनसे पानी मांगी मैं दोबारा।

उठते मामी पूछी- और बताओ,मां-पिताजी हैं कैसे ?
तिलमिला कर मैं बोली-सब ठीक ही हैं पहले जैसे।

मामी ने पूछा-और बताओ,पढ़ाई कैसी चल रही है?
मैंने कहा- खूब अच्छे से, धीरे- धीरे निकल रही है।

मामी कदम बढ़ाते पूछा-और बताओ,दीदी कहां है?
मैं बोली-कहीं मुम्बई के आगे, मेरे जीजाजी जहां हैं।

मामी बोली-और बताओ,बहन को नहीं तुम मानती।
और बताओ,बहन कहां रहती है इतना नहीं जानती।

फिर वह पूछी कि और बताओ,भाई क्या कर रहा है?
मैंने कहा-ग्रेजुएशन कर,नौकरी का फार्म भर रहा है।

मामी पूछी और बताओ,फार्म भरता या पढ़ता भी है?
और बताओ,भावी जीवन की राह कोई गढ़ता भी है?

और बताओ,तुम अपने दादा और दादी का समाचार।
बोली मैं दादाजी तो ठीक हैं,पर दादी है थोड़ी लाचार।

पुनः मामी ने पूछा-और बताओ,पास-पड़ोस का हाल।
मामी की तकिया कलाम प्रश्नों से हुआ हाल मेरा बेहाल।

मैं बोली कि सब सानंद है,अब मैं तो घर को चलती हूं।
मामी ने कहा-और बताओ,रुक जाओ पकौड़े तलती हूं।

मैं बोली-बस मांगी थी पानी,नहीं पकौड़े की मुझको चाह।
मामी ने कहा-और बताओ,बिना खाए-पीए पकड़ ली राह।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 14, 2021

बदमाश बहू। ( लघुकथा )


तुम्हें परिवार के लोगों के साथ इतना बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए रिदीमा ! एकांत देखकर रेशमी ने अपनी नवेली देवरानी को समझाते हुए कहा।

लेकिन उनलोग हमारे साथ कितना अच्छा व्यवहार करते हैं?रिदीमा ने जेठानी से प्रश्न किया।

लेकिन हम बहू हैं। हमें ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्हें भी बुरा लगेगा और दूसरे लोग भी हमारी शिकायत करेंगे।
मुझे दूसरों की परवाह नहीं।उनका तो काम है बातें बढ़ाना।रही बात घर बालों की तो उन्हें एक बदमाश बहू की आवश्यकता है। अच्छे व्यवहार करने वाले को ये बहुत प्रताड़ित करते हैं।रिदीमा ने दृढ़ता से कहा।आप तो सभी से अच्छा व्यवहार करतीं हैं, सबसे मीठा बोलती हैं,सबका ख्याल रखती हैं।बदले में आपको क्या मिलता है। सिर्फ दुत्कार, फटकार, तिरस्कार । कोई भी आपसे अच्छा से नहीं बोलता।हर वक्त सभी आपको प्रताड़ित और अपमानित करते हैं।हर जगह आपकी शिकायत होती है।यह क्या है ? अच्छी बहू होने का पुरस्कार ?
अपने लिए किसी के मन में प्यार और सहानुभूति पाकर रेशमी का मन भर आया। छलछलाती आंखों से रिदीमा को निहारते हुए कहा-यदि तुम मेरे साथ किए गए दुर्व्यवहारों को दूर करना चाहती हो बस इतना करो कि उनके साथ दुर्व्यवहार करना छोड़ दो।मेरे साथ उनके द्वारा किए गए सारे दुर्व्यवहार और प्रताड़ना तुम्हारी सहिष्णुता और प्यार से धुमिल हो जाएगा।
हां बहू ! उन पर नजरें रख रही और छुपकर उनकी बात सुन रही सासु-मां ने प्रकट होते हुए कहा।
अब ना हम तुम लोग के साथ दुर्व्यवहार करेंगे।ना तुम हमारे साथ। तुम्हारे दुर्व्यवहारों से चार महीने में हमारी हालत खराब हो गई तो चार साल से हमारे दुर्व्यवहार झेल रही बड़ी बहू का दिल कितना बेचैन होता होगा ?
तुम मेरी बदमाश बहू नहीं हो,बल्कि अच्छी बहू हो जो हमारी आंखें खोल दी।
 रश्मि ने देखा दरवाजे के पास उसके साथ दुर्व्यवहार करने वाले देवर -ननद भी अपनी आंखों में पश्चाताप के आंसू लिए खड़े थे।
ससुरजी ने बढ़ते हुए कहा-हां बहू तुमने ठीक कहा। आज समाज को तुम्हारे जैसी बदमाश बहू की नितांत आवश्यकता है। तुमने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर और उसका प्रतिकार कर एक सशक्त बहू का फर्ज निभाया है।
तुम्हारे मन में यह हौसला तो है कि ईंट का जवाब पत्थर से देकर दुर्व्यवहार करने वाले को समझाया। वरना बड़ी बहू तो सद्व्यवहार करते-करते थक गई।किसी को इसकी अच्छाइयां समझ नहीं आई।
रेशमी पहली बार अपने ऊपर ससुराल वालों द्वारा किए अन्याय के लिए ग्लानि देख रुआंसी हो उठी। उसने कृतज्ञता भरी दृष्टि से देखते हुए बढ़ कर रिदीमा को गले लगाते हुए कहा-अब तुम भी सबके साथ अच्छा व्यवहार करना रिदीमा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, September 13, 2021

हिन्द की शान है हिन्दी

हिंदी की शान है हिन्दी

हिन्द की जान है हिंदी,और पहचान है हिन्दी।
लगता देवों के मन से,मिला वरदान है हिन्दी।

भारत मां के माथे की,चमकती-सी है यह बिंदी,
इसकी आन है हिन्दी,इसका प्राण है हिन्दी।

लिपि देवनागरी इसकी,सहजता से समझ आती,
पुरातन भाषा संस्कृत की,सुनो संतान है हिन्दी।

बड़ी ही है सरल भाषा,बड़ा आसान उच्चारण,
खुले मन से इसे बोले,तो लगती शान है हिन्दी।

जब हम बोलते हिंदी,मधुर झंकार करती है,
हमारी गीतों की लगती,सुर-लय-तान है हिन्दी।

करें हिन्दी में हम लेखन,करें हिन्दी में हम गायन,
हम हिन्दी को अपनाएं,यही अभियान है हिन्दी।

कहे कितना बारम्बार,किसी को क्या सुनाएं हम,
हमारे देश का जग में,किया उत्थान है हिन्दी।

हिन्द के कोने-कोने में,बोली जाती यह भाषा,
हमारे देश का गौरव,हमारा मान है हिन्दी।

हमारी है ये जनभाषा,सभी जन शान से बोलें,
हमारी राष्ट्रीय भाषा,अलग पहचान है हिन्दी।

हमारी कामना इतनी,बने यह विश्व की भाषा,
हमारी आन है हिन्दी, और अभिमान है हिन्दी।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 10, 2021

गणपति वंदन



गणपति तुम्हारे मंदिर में हम,भजन सुनाने आए हैं।
श्रद्धा की छोटी फुलवारी का,पुष्प चढ़ाने आए हैं।

मस्तक तेरे मुकुट विराजे,सिंदूर शोभे भाल में,
कानों में है कुण्डल तेरे, हार पहनाने आए हैं।

कांधे में है जनेऊ-माला,पीताम्बर है अंग में,
उसके ऊपर रेशम का हम,वस्त्र ओढ़ाने आए हैं।

एक दन्त गजवदन तुम्हारा,लम्बोदर पर सूढ़ है।
लड्डू-मोदक तुमको भाता,भोग लगाने आए हैं।

धूप-दीप,कर्पूर जलाकर,आरती तेरी गाएं हम,
भक्ति-भाव को मन में रख,शक्ति पाने आए हैं।

पार्वती ने तुझे बनाया , शंकर मार- जिलाया है,
तेरी उत्पत्ति- की कथा,दुनिया को सुनाने आए हैं।

तीन लोक कह मात-पिता की परिक्रमा तूने कर डाली।
प्रथम पुज्य तू देव तेरा हम,पूजन करने आए हैं।

बच्चों को बल-बुद्धि देते,भक्तजनों को यश-वरदान,
मन में ऐसी आशा लेकर,हम तुझे मनाने आए हैं।

निर्विघ्न हर काम हो मेरा,विघ्न विनाशक हे भगवान,
दे दो यह वरदान हमें ,यह विनती करने आए हैं।

महाकाय स्वरूप तुम्हारा, दुर्गुण दूर भगाते हो,
तेरे इस स्वरूप को भगवन,ध्यान लगाने आए हैं।

हाथों में कुल्हाड़ी लेकर,भव-बंधन को काट रहे।
हाथ उठा आशीष हो देते,उसको पाने आए हैं।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 8, 2021

हरितालिका तीज (गीत)

हरितालिका तीज

लोटा में गंगा जल भर कर
पूजा की थाली हाथ में।
करें सखी शिव-शंकर पूजा,
गौरी मां के साथ में।

बालू की तीन मूर्ती बनाकर,
गंगा जल स्नान करो।
गौरी को ओढ़ाओ लाल चुनरिया, 
भोला के पीताम्बर जी।

गौरी के माँग में सिंदूर लगाकर,
भोला के सिर में चंदन जी।
गौरी के सिर पर टीका बिंदी,
भोला के वेलपत्र जी।

गौरी कोे चमेली फूल चढाओ,
भोला को धतुरा -आँक जीे।
गौरी के खिलाओं पूड़ी गुझिया,
भोला को भाबे भांग जी।

वंदन-कीर्तन आरती गाओ,
बजा-बजा के ताल जी।
दोनो के चरण में शीश नवाकर,
मांगो सभी वरदान जी।

       सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

हम मां का कहना माने तो.........

हम मां का कहना माने तो

हम मां का कहना मानें तो,हर बात हमारी बन जाए।
हर खुशी मिलेगी जीवन की,मन- प्रसून सब खिल जाए।

मां के दिल में होती माया, है उसने गढ़ी हमारी काया।
उसकी आंचल की छाया,हर बच्चे को है मन भाया।
मां की आंचल की छांव तले,दिल को सुकून कुछ मिल जाए।
हम मां का...................
मां के मन में केवल ममता,है कहीं नहीं इसकी समता।
प्यार नहीं मन में कमता,वात्सल्य कभी नहीं थमता।
मां के हृदय की करुणा को,कोई पार नहीं पाने पाए।
हम मां का कहना.................
मां होती है नाराज नहीं,तीखी उसकी आवाज नहीं।
मातृत्व का कोई ताज नहीं, मां की लोरी में साज नहीं।
मां के चरणों की धूली से,मस्तक का चंदन बन जाए।
हम मां का कहना...................
मां से न कोई भूल होती,बात न उसकी फिजूल होती।
मां की कुछ उसूल होती,हर दुआ उसकी कुबूल होती।
मां सिखाया जो पाठ हमें, लक्ष्य हमें अब मिल जाए।
हम मां का कहना...................
मां देती है हमको शिक्षा,दे गुरु - जनों जैसी दीक्षा।
लेकर हमारी वह परीक्षा,करती है सदा ही समीक्षा।
इसमें अगर उत्तीर्ण हुए,जीवन में सफलता मिल जाए।
हम मां का कहना...................
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'