Friday, August 27, 2021

हे सखिया ( मगही भाषा )




हे सखिया

अब बीतल सावन हे सखिया।
आइलै भादो पावन हे सखिया।

जल्दी से केसिया चोटी बना ला।
मथबा में सेनुर-टिकुली लगा ला।
करूँ मेंहदी लगावन हे सखिया।
अब बीतल सावन, हे सखिया।

अब खेतबा में भर गेलै पानी हे।
 केयरिया  के रंग होलै धानी हे।
होलै धान रोपावन हे सखिया।
अब बीतल सावन हे सखिया।

बचल-खुचल मोरिया रोपु से सखी।
संग मिलके गीतिया गइवै हे सखी।
करूं झूला झूलावन हे सखिया।
अब बीतल सावन हे सखिया।

भादों महीना में भैया जी अइलन।
खोमचा में भर के पेड़ा भी लइलन।
दिन लगे हुस्न से सखियां।
अब बीतल सावन से सखिया।
अइलै भदवा पावन से सखिया।
         सुजाता प्रिय'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 22, 2021

ग़ज़ल

लाकडाउन का अफसोस क्यों जताते हो।
यूं भी वर्षों से मेरे पास कहां तुम आते हो।

पता है हर महीने तुम आते हो शहर में मेरे,
और मुझसे बिना मिले ही तो चले जाते हो।

पल भर मिलने का, कभी फुर्सत नहीं तुझको,
जीवन भर साथ निभाने की कसम खाते हो।

एक एक खत लिखकर, हाल ना पूछते मेरा,
दुरियों का ह‌मको अहसास क्यों दिलाते हो।

लाकडाउन में फोन करने की मनाही तो नहीं,
ना कभी फोन करते हो,ना ही  फोन उठाते हो।

आज अपने नैनो में तुम छलकाकर ये आंसू,
वक्त बूरा है बहुत,अब ये बात क्यों बताते हो।

याद दिला कर तुम बीते हुए प्यार के लम्हे,
दिल में उठने वाले मेरे  दर्द को बढ़ाते हो।
                   सुजाता प्रिय समृद्धि
,

Friday, August 20, 2021

रक्षा बंधन गीत ( मगही भाषा )



राखियां बंधा ला भैया सावन पूर्णिमा,
जीया तू लाख बरीस जी।
तोहरा के लागे भैया हमरी उमरिया,
बहनी के इहे अशीष जी।

जुग-जुग बढ़े भैया तोहरी उमरिया,
भौजी के बढ़े अहिबात जी।
दिन दुगुना बढ़े,पहर तिगुना,
चारी गुणा बढ़े तोहर रात जी।
बारह महीना के साल सबके है,
तोहर महीना होबे तीस जी।
राखिया बंधा ला भैया..........
दिन-दिन बढ़े भैया तोहरी दौलतिया,
देखि कर मन हुलसाय जी।
बडढ़े तोर घरबा में कोठा-अटरिया,
देखी कर हृदा जुड़ाय जी।
परसन मन रहे सदा तोर भैया,
दिखै तोर दतिया बत्तीस जी।
राखिया बंधा ला भैया...........
सदा खुश रहें मोर भतिजा- भतिजिया,
तिल-तिल बढ़े तोर कूल जी।
दूर-सुदूर तोर नाम बजे अउर,
बगिया में खिले सुख फूल जी।
दुअरा पर शोभे कार-मोटरबा,
सुंदर गाड़िया पच्चीस जी।
रखिया बंधा ला भैया.............
तोहरा के लागे भैया..............
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, August 19, 2021

मेरी हंसी



जब -जब मेरे होंठों पर,
देती दिखाई मेरी हंसी।
जब-जब मेरी मुखड़े पर,
है छाई मेरी हंसी।

कितने लोगों ने होश को खोए, कितने हो गये घायल।
कितने के दिल में तीर समान,
समाई मेरी हंसी।

कुछ लोग भी हैं ऐसे, 
जिन्हें हंसना नहीं गवारा।
उन लोगों के मन में भी,
 कुछ-न-कुछ भाई मेरी हंसी।

जब महफ़िल में छाई थी, 
तमाम उदासियां,
तो खुशी का जलवा बन, 
लहरायी मेरी हंसी।

भरी सभा में आलम था,
मायुसियों की क्या जाने।
तब बादल की झोकेे -सी ,
लहराई मेरी हंसी।

सोई थी रात तिमिर का,
चादर फैलाकर ओढ़।
प्रभात किरण बनकर नभ में 
तब छाई मेरी हंसी।

मेरी हंसी का जलवा क्या, 
देखें  कभी हैं आप,
हंसने वालों को भी है
मिर्ची लगाई मेरी हंसी।

मार ठहाके मेरी हंसी पर,
हंसते जाते हैं आप।
चलो खुशी की बात है,
 कुछ तो रंग लाई मेरी हंसी।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, August 17, 2021

रूप बदलते चंदामामा



रूप बदलते चन्दा मामा

             आंगन में 
        एक खाट पड़ी थी।
उसके ऊपर इक टाट पड़ी थी।
               रात को 
      उसपर मैं सो रही थी।
मीठे -स्वप्नों में मैं खो रही थी।
            चंदामामा 
      आये हैं आंगन मेरे।
मेरी ओर अपना मुखड़ा फेरे।
            कर रहे 
    हैं हंस वे मुझसे बातें।
शिकायत मेरी क्यों ना आते।
          उसी समय
       टूट गई मेरी नींद।
सुस्वप्न टूट जाने की मानिंद।
             ढूंढ़ी चंदा
        को मैंआंखें खोल।
इत-उत हथेलियों से  टटोल।
             अनायास
        ऊपर उठीं निगाहें।
रुक गई  मेरी टटोलती बाहें।
           आसमां में 
        तारे विचर रहे थे।
चम-चम करते निखर रहे थे।

चंदामामा 
        ्भी्थे्भी््भी्थे्के्््भ
हंस-हंस मुझसे कर रहे बा
      थे लुक छिप खेल।
इक- दूजे से वेे रखकर मेल।
             चंदामामा
        का देख आकार।
मेरे  मन में यह उठा विचार।
          कहां छुपाये
        हैं वे आधा अंग। 
किसी के प्रहार से हुए हैं भंग।
             एक रात 
      देखी मैं हंसियाकार।
   एक रात दिखते थे जैसे तार।
               एक रात 
       रूप था गोल-मटोल।
आज मैं इनकी खोलूंगी पोल।
               मां  से 
       पूछा मैंने  इसका राज।
 चंदामामा आधा क्यों है आज।
              मां बोली
       चंदा बड़ा है नटखट।
रूप बदलता रहता है झटपट।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित, मौलिक

Sunday, August 15, 2021

बंदिशें (लघुकथा )



आज खूशबू गौरव से नजरें मिलाने से कतरा रही थी।यह पहला मौका था जब उनलोगों के द्वारा बनाए गए प्लान में वह शामिल नहीं हो पाई।न जाने कैसे उसे एक ओर खड़ी देख गौरव उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सब ठीक है न खूशबू ! तुम इतनी उदास क्यों नजर आ रही हो ? कल पिकनिक पर भी नहीं आई ? उसने लगातार प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
खुशबू ने रुआंसी आवाज में कहा-मैने मां-पिताजी को कितना समझाया कि तुम कालेज में टाप आने की ख़ुशी में सभी दोस्तों को पिकनिक पार्टी दे रहे हो। लेकिन वे नहीं माने।कहा- लड़के-लड़कियों को घर से इतनी दूर अकेले घूमना सही नहीं।
तो इसमें तुम्हें लज्जित होने की क्या बात है।गौरव ने बेवाकी से कहा। उनके विचार महान हैं।वे अपनी जगह सही हैं। लड़के-लड़कियों के मेल-जोल में थोड़ी बंदिशें होनी ही चाहिए। नहीं तो दुनियादारी से अनभिज्ञ किशोर मन को फिसलते देर नहीं लगता।अब देखो न सारे दोस्तों ने मुझे पार्टी के लिए उकसाया। इसलिए मैंने सारा खर्च किया। लेकिन वहां का नजारा कुछ और था।सारी लड़कियों ने अपने-अपने ब्याय फ्रेंड को बुला रखें थे। हमारी पार्टी जल्दी से खत्म कर उनके साथ सैर सपाटा करने लगीं। उनके माता-पिता सोंच रहे होंगे वे कालेज के दोस्तों के साथ हैं। लेकिन उन्हें क्या पता थोड़ी-सी छूट देते ही उनके बच्चे कहां फिसल रहे हैं।
उफ़ इतना बड़ा धोखा? खुशबू व्यग्र हो बोल उठी।
धोखे वे मां-पिताजी को नहीं दे रहे। स्वयं धोखे के दलदल में फंसे जा रहें हैं। इसलिए हमारे माता-पिता का हमारे ऊपर बंदिशें लगाना जायज है।
गौरव की बातें सुन खुशबू के मन पर पड़ा बहुत बड़ा बोझ हल्का हो गया।
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

जंगल की चिरैया (लघुकथा )



चिरैयो की गोष्ठी लगी थी।एक साथ ढेर सारी चिरैयों को बैठे देख आकाश में उड़ती चिरैया भी वहां एकत्रित होने लगी।पता चला वहां गीत प्रतियोगिता होने वाली है। प्रतियोगिता शुरू होते ही सभी चिरैया अपनी -अपनी बारी आने पर अपने प्यारे प्यारे गीत गाकर सुनाई। सर्वश्रेष्ठ गीत गाने वाली पांच चिरैयों को सम्मानित किया जाना था।एक चिरैया की मधुर आवाज़ और प्यारे गीत सुन सभी आत्मविभोर हो ग्ए।सभी ने उसकी गायकी की खूब प्रशंसा की और उसकी श्रेष्ठ गीतों के कारण उसकी खुब सराहा। फिर श्रेष्ठ गीत गाने वाली चिरैयों से उनका नाम पता पूछा जाने लगा।
उस चिरैया ने चहकते हुए कहा-मेरा नाम गीतिका है, मैं पास के जंगल के एक विशाल वृक्ष पर अपना घोंसला बनाकर रहती हूं।
उसका पता सुन प्रतियोगिता आयोजित करने वाली चिरैयों ने उसे हेय दृष्टि से देखते हुए अन्य चिरैयों से नाम पता पूछा।अन्य सुंदर गीत गाने वाली चिरैयों ने अपने घोंसले का पता छोटे-छोटे बगीचे के पेड़ पर या शहर के ऊंचे घरों के रोशनदानों में बताये। अब भला इस जंगल की चिरैया को कौन पूछे। सबसे प्यारा गाना गाती है तो गाए, सबसे मधुर आवाज है तो है।उसका निवास तो अच्छी जगह नहीं है न।भला जंगल में रहने वाली चिरैया को इतनी प्रसिद्धि क्यों ? जब बड़े-बडे़ शहरों में रहने वाली चिरैया यहां मौजूद हैं।उसे छोड़ अन्य चिरैयों को चयनित कर पुरस्कृत किया गया।बेचारी जंगल की चिरैया के सारे आस टूट गये। प्रसंशा से प्रसन्न मन उदास हो गया। उसे क्या पता था, "सम्मान गुण और कार्य-कुशलता से नहीं मिलता। उसके निवास और कुल श्रेष्ठता के कारण मिलता है।"
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित, मौलिक

वे वीर थे हिंदुस्तान के



आजादी की खातिर जिसने,
जीवन को कुर्बान की।
वे वीर थे हिन्दुूस्तान के 2

अंग्रेजों से लड़ें वे डटकर,
अपनी कसम निभाने को।2
खायी थी जिसको दृढ़ मन से,
मां को आजाद कराने को।2
हंसकर वे दुश्मन की गोली,
खाए सीना तान के।
वे वीर थे.........................
जान गंवा लाशों की ढेरी,
लगा दिए जो दुश्मन की।2
भूल कभी परवाह नहीं की,
जिसने अपने जीवन की।2
जंजीर तोड़ दी मां की जिसने,
लगाके बाजी जान की।
वे वीर थे...........................
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
हंसी-खुशी बढ़ जाते थे।2
दुश्मन के जुल्मों-सितम से,
तनिक नहीं घबराते थे।2
बांध कफ़न वे सिर पर कहते,
जय-जय हिंदुस्तान की।
वे वीर थे..........................
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

दोहे



जन-गण-मन है गा रहा, मिलकर पूरा देश।
मिलजुल कर है दे रहा,एकता का संदेश।

बेकार नहीं कभी जाएगा,वीरों का बलिदान।
देश आजाद कराने की, खातिर दे दी जान।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, August 12, 2021

गंगा मां की धारा



कल-कल छल-छल बहती जाएं,मां गंगा की धारा।
प्लावित रहता निर्मल जल से,इसका सदा किनारा।

मां गंगा के पावन जल में,जब भी स्नान करें हम।
रोग-दोष सब दूर भगाएं,जीवन कल्याण करें हम।
पवित्र हमारा तन-मन होति, मिट जाता कष्ट हमारा।
प्लावित रहता.................

इसके जल में शीश नवाएं,तब अपना पांव बढ़ाएं।
इसके चंचल बहते जल में, हम डुबकी मार नहाएं।
हाथ में जल ले अर्ध चढ़ाएं,खुश हो जाए देव हमारा।
प्लावित रहता ...................

इसके जल में जड़ी-बूटियों का सत्व मिला है होता।
तभी हर नदियों के जल से, इसका जल पावन होता।
इसके जल में कीटाणुओं का, होता है नहीं गुजरा।
प्लावित रहता.................

अमृत सम मां गंगा है,हमको अपना नीर पिलाती।
इसीलिए यह जाह्नवी हमारी, है प्यारी मां कहाती।
हर - हर गंगे बोल सदा हम, लगाते हैं इसका नारा।
प्लावित रहता...................

इसके तट पर कितने ही ,प्राचीन नगर बसे हुए हैं।
हर नगर की गौरव-गाथा, पुरातन इतिहास रचे हैं।
ऋषि-मुनियों का शरण-स्थल है गुरुओं का गुरुद्वारा।
प्लावित रहता ......................
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

स्वतंत्रता के मायने ( लघु नाटिका )


स्वतंत्रता के मायने

पात्र परिचय

रेशमी-सात वर्षीय चुलबुली लड़की
मां-रेशमी की मां


मां -बेटी! तितलियां मत पकड़ो।

रेशमी-क्यों मां ? आज स्वतंत्रता दिवस पर मैं स्वतंत्र होकर अपना काम करना चाहती हूं।

मां-लेकिन स्वतंत्र होने का मतलब यह तो नहीं कि तुम कोई भी काम करो ?

रेशमी-तितलियां पकडना कोई बुरा काम तो नहीं ?

मां-बुरा क्यों नहीं?तुम उसे पकड़ कर बंधन में रख रही हो।

रेशमी-हम स्वतंत्र देश के नागरिक  हैं। "स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है"।यह बात हमें आज झंडोतोलन के बाद विद्यालय में बताया गया है।

मां-लेकिन स्वतंत्रता का मायने यह नहीं कि सिर्फ मैं स्वतंत्र रहूं।

रेशमी-खीजकर हाथ नचाते हुए-तो फिर क्या है स्वतंत्रता के मायने ?

मां-  स्वतंत्रता के मायने हैं कि हम स्वतंत्र रहे। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ,न कि मेरा। इसलिए हमें सभी प्राणियों की स्वतंत्रता का ख्याल रखना चाहिए। हमें किसी को अकारण बंधन में जकड़कर रखने की स्वतन्त्रता नहीं । ये उड़ने वाले जीवों को उड़ने की स्वतंत्रता है। फिर हम इन्हें पकड़कर परतंत्र नहीं करना चाहिए।

रेशमी- हाथ में पकड़ी तितलियों को उड़ाती हुई। ठीक है मां अब मैं किसी जीव को इस प्रकार नहीं पकड़ूंगी।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, August 11, 2021

मेहंदी लगा दूं हाथों में



आ सखी मेंहदी लगा दूं हाथों में।
सावन का शृंगार सजा दूं हाथों में।

हरियाली तीज का सौगात हमारा।
ईश्वर रखें , सदा अहिवात हमारा।
जीवन का उपहार सजा दूं हाथों में।
सावन का शृंगार....................
देखो झम-झम बरस रहा है पानी।
पहनी लाल चुनरिया हमने चोली धानी।
मेहंदी के संग प्यार सजा दूं हाथों में।
सावन का शृंगार ......................
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, August 6, 2021

सावन की कजरी



सखी री ! सावन में अइलै बलमुआ,
जिया हरसे री सखी।
सखी री ! रिमझिम बरसे सवनमा,
जियरा हरसे थी सखी‌।

हरियर साड़ी और बिंदी ले अइलै।
कान के झुम्मक और नथुनी ले अइलै।
सखी री !हाथ के लइलै कंगनमा,
जियरा हरसे री सखी !

बगिया में पिया जी झूला लगैलै।
संग में बैठाई के खूब झुलैलै।
सखी री ! गाके फिलिम के गनमा,
जिया हरसे री सखी !

खीर-पूड़ी, हलुआ, जलेबी बनैलियै।
सासु-ससुरजी के संग में खिलैलियै।
सखी री!मीठा-मीठा सभे भोजनमा,
जिया हरसे थी सखी !
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           स्वरचित, मौलिक

धनमा रोपा हो किसनमा (मगही भाषा )


     
बाबा जी के खेतबा में,बरसे सवनमा।
खेतबा जोता हो किसनमा।
खेतबा जोतिए जोती,मेड़िया बनाबा,
चारों ओरी एक रे समनमा।

मेड़िया के ओते-ओते पनियां पटाबा,
भरी-भरी एक रे टेहुनमा।
पनिया के बीचे-बीचे,हरियर मोरिया,
धनमा रोपा हो किसनमा।

धनमा रोपाई जब सारी भुवनमा,
रही-रही हुलसे मोर मनमा।
मनमा हुलसे मोर,हिय मोर हलसे,
गूंजे मोर मन में गीत गनमा।

अबरी अगहनमा में उपजत धनमा,
शोभतै खेत -खरिहनमा।
धनमा से भरी जैइतै बाबा के अंगनमा।
साल भर होइतै भोजनमा।
साल भर होइतै भोजनमा।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित, मौलिक

Thursday, August 5, 2021

सावनी पुड़िया



रेशमा की सासु मां ने सावनी पुड़िया भेजा है।हरी साड़ी , हरी चूड़ियां सिंदूर-विंदी शृंगार-बांक्स बैगिल-केश और जाने कितने प्रकार के शृंगार -प्रसाधनो से पूरा बैग भरा पड़ा था। लेकिन इसे लेकर आने वाला वह नहीं जिसकी इंतजार वह चार महीने से कर रही थी। जिसके लिए सावनी शृंगार का महत्व था।सारे सामानो को लेकर आए देवर ने सुनाया मां ने महीने भर पहले कह रखा था भैया को आने क्योंकि यह सारे समान लेकर उन्हें आना था ,पर वे नहीं आए।वह उदास हो गई।
मां ने कहा-जा आज अंतिम सोमवारी है। ससुराल से आए कपड़े और चूड़ियां पहन लो।सारे शृंगार भी कर लो।सावन में सोलहो शृंगार करने से सौभाग्य बढ़ता है।वह जानती थी मां ने यह बात कितना दुखी मन से कहा। क्योंकि वह हमेशा मां को यह कहते सुनी थी सावनी पुड़िए का किया शृंगार यदि पति देखता है तो सौभाग्य बहुत बढ़ता है। लेकिन पति तो.....?वह अनमने ढंग से सारे शृंगार कर पूजा करने मंदिर चली गई। सभी जानकार स्त्रियों ने पूछा यह सावनी पुड़िया का शृंगार है ? उसके हां कहने पर सभी ने संदेहास्पद ढंग से देखा और फिर काना-फुसी....तभी उसके हाथ का मोबाइल स्पंदित हुआ और उसमें आए विडियो काल देख उसका मन मयूर ....काल रिसीव करते ही धीरज सम्मुख था।वह मुंह फुलाए उसे देखती रही और धीरज चकित भाव से शृंगारित उसके चेहरे को निहार रहा था। उसके आंखों में उभरे शिकायत को दूर करते हुए बोला-क्या करूं सीमा पर इमरजेंसी ड्यूटी लगी है इसलिए किसी हाल में छुट्टी नहीं ले सकता।बस मेरे द्वारा किया गया सीमा-सुरक्षा ही तुम्हारा असली शृंगार है।
रेशमा ने सहमति में पलकें झपकाई और धीरज को देख मुस्कुरा उठी।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Wednesday, August 4, 2021

खरगोश का वार्तालाप

झूठे -मक्कार! क्यूं यहां पर आए।
भोजन दिखलाकर जाल बिछाये।

देखकर मुझ भूखे को मजबूरी।
गाजर दिखलाते छुपाकर छूरी।

अरे जा रे तू लालच  देनेवाले।
तेरे जाल में हम ना आने वाले।

स्वतंत्र धरा के हम तो प्रणि हैं।
सह जाते जब तेरी मनमानी हैं।

बाछें तब तेरी तो खिल जाती है।
दौलत दुनिया की मिल जाती है।

पुचकार कर हमें  बुलाते हो तुम।
लालच देकर हमें फंसाने हो तुम।

तेरी चाल में नहीं मैं आने वाला।
तेरे धोखे में ना हूं अब आनेवाला।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Tuesday, August 3, 2021

आईना



देखकर आईने में सूरत निहारते।
बड़े ही जतन से सजाते-संबारते।

सांवली सूरत को गोरी बनाने को।
दागदार चमड़ी को कोरी बनाने को।
सौंदर्य-प्रसाधनों से उसको निखारते।
बड़े ही जतन से..............
केवोन को संवारते विभिन्न तरीके से।
गूंथते ओर बांधते बड़े सलीके से।
देखकर आईना कंघी से हो झाड़ते।
बड़े जतन से... ‌......................
पहनकर वसन बार-बार हो देखते।
आईने में हर बार हो नज़र फेंकते।
वसन को ठीक करने को हाथ मारते।
बड़े ही जतन से.................
तू काश आईने में अपने मन को देखते।
बस एक बार अंतर में नजर को फेंकते।
अपनी बुराइयों को थोड़ा सुधारते।
बड़े ही जतन से...................
           
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक

अम्मा मुझको दे दूध मलाई (बालगीत )



बड़ी जोर की भूख लगी है,
अम्मा मुझको दे दूध-मलाई।
थोड़ा शक्कर-शहद मिलाकर,
अम्मा मुझको दे दूध-मलाई।

मुझे न भाता है पिज़्ज़ा-बर्गर।
मैगी-चाउमिन दिखता गोजर।
का नहीं पाता हूं मैं ननखटाई।
अम्मा मुझको दे दूध-मलाई।

खाने गया था मैं लड्डू - पेड़े।
उसको खाने में भी हुए बखेड़े।
भैया ने छीन ली सभी मिठाई।
अम्मा तुझको दे दूध-मलाई।

कोल्ड्रिंक्स मुझको ना भाता।
आइसक्रीम से कफ हो जाता।
मित्रोंं ने मुझ संग करी लड़ाई।
अम्मा मुझको दे दूध- मलाई।

मैं तो बच्चा था भोला-भाला।
दूध तेरा पीता था हो मतवाला।
मलाई खाने भी तुम्हीं सिखाई।
अम्मा मुझको दे दूध- मलाई।
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       स्वरचित, मौलिक

Monday, August 2, 2021

टपके का डर ( लघुकथा )



बरसात की रात में एक वृद्ध दम्पत्ति कमरे में सो रहे थे।घर के अन्य लोग किसी समारोह में गये हुए थे।यह जानकार दो चोर किसी तरह उनके घर में घुस आए और इंतजार करने लगे कि जब वे दरवाजा खोलेंगे तब कमरे में घुस कर सारे किमती सामान एवं रुपए-पैसे लूट लेंगे।वे खिड़की के पास खड़े होकर उनकी बातें सुनने लगे। अचानक हल्की गड़गड़ाहट के साथ वर्षा की बूंदें टपकने लगी।
यह सुन वृद्धा ने कहा-सुनिए जी! मेरी साड़ी आंगन के टंगने पर ही रह गई। कहीं भींग न जाए। जाकर उठा लाइए।
यह सुनकर दोनों चोर एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठे।सोचे अब तो दरवाजा खुलेगा।
लेकिन,उसी समय वृद्ध ने कराहते हुए कहा-मैं तो नहीं जाता तेरी साड़ी लाने। मुझे आंगन जाने में टपके का डर लगा रहता है। इसी टपके की मार से मैं महीने भर से बीमार हूं।
      उनकी बातें सुन चोरों ने सोचा।यह टपके अवश्य ही कोई बलशाली प्राणी है। तभी तो उसकी मार से वृद्ध इतने दिनों से बीमार है। कहीं हमें भी न यह टपके देख ले और मारकर बीमार कर दे।वे डर से सिर पर पांव रख कर वहां से भाग खड़े हुए।
     इस प्रकार बरसात के टपके के डर से चोरों द्वारा उनके घर के सामान लूटे जाने से बच गए।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Sunday, August 1, 2021

गीत मल्हार



सावन महीना बड़ी पावन सखी री,
कर ले तू सोलह शृंगार।
लेकर आई है बहार सखी री,
कर ले तू सोलह शृंगार।

मांग सिंदूर और माथे में बिंदिया।
हाथ में मेहंदी, हरी-हरी चुड़ियां।
गले में मोतियों की हार सखी री,
कर ले तू सोलह श्रृंगार।

पांवों में पायल पहनकर बिछुआ।
लगाओ आलता अंगुली के पिछुआ।
सब मिल गाओ मल्हार सखी री।
कर ले तू सोलह शृंगार।

रिमझिम वर्षा में भींगे चुनरिया।
चले पुरवाई तो उड़े अचरिया ।
मन मेरा डोले बार-बार सखी री!
कर ले तू सोलह शृंगार ।

             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित, मौलिक

चरित्र-निर्माण करो (गीत)



निर्माण अगर कुछ करना है तो,
प्रथम चरित्र-निर्माण करो।
अपने उत्तम चरित्र के बल पर,
जग का कुछ कल्याण करो।
अपने उत्तम.............. ...
बड़े भाग्य से हमने प्राणि,
मानव का तन पाया है।
बल,बुद्धि,विवेक-विद्या भी,
भाग्य हमारे आया है।
वरदान विधाता ने दिया है,
उसका तुम सम्मान करो।
अपने उत्तम........... ‌....
नहीं कठिन है काम कभी भी,
करना चरित्र -निर्माण सुनो।
शिष्टाचार -सहिष्णुता-सभ्यता को,
शांत-चित से मन में गुनो।
भला-बुरा सारे कर्मों को केवल,
मन में अनुसंधान करो।
अपने उत्तम....................
सदा करो सत्संग तू भाई,
सत्पथ पर चलते जाओ।
महापुरुषों के सुविचारों औ
सद्गुणों को भी अपनाओ।
अगर तुम्हें गुण वैभव हो तो,
उसपर ना अभिमान करो।
अपने उत्तम .....................
चरित्रवान जनों को हरदम,
मिलता है जग में आदर।
सेवा-त्याग समर्पण से ही,
स्थान बनाते हैं सादर।
अपनी मेहनत और हिम्मत से,
संसार का तुम उत्थान करो।
अपने उत्तम .....................
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित, मौलिक