Wednesday, September 30, 2020

साझा चुल्हा

आओ चुल्हा  साझा कर लें।
अपना-अपना भुंजा भुंज लें।

नौ अछिया यह चुल्हा हमारा।
नौ पतिला को  चढ़ा  करारा।

लकड़ी-गोइठा सब लेकर आए।
टोकरी भर भरकर अनाज लाए।

भूनने बैठी दीदी, बुआ -चाची।
दादी गीत गा कहानियाँ बाची।

चना,जौ और वह अरहर भूनी।
गेहूँ, मकई मूँग और मटर भूनी।

कूट - पीसकर हम सत्तु बनाएँ।
मकई चने की सोंधी रोटी खाएँ।

सोंधी- दाल बनाएँ अरहर की।
दलिया मकई औ मूँग-मटर की।

हिल-मिल भूने,मिलजुल खाएँ।
एकता का  हम संदेश सुनाएँ।

     सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित ( मौलिक)

Wednesday, September 23, 2020

राष्ट्र कवि दिनकर

राष्ट्र कवि दिनकर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।
विश्व कवि दिनकर के,
जयंती पर आज वंदन मेरा।

बिहार के पूत, भारत के सपूत।
काव्य की विद्या जिनमें अकूत।
कविवर वीर रस के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।
राष्ट्र कवि दिनकर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।

मनरूप माता,रवि सिंह पिता।
सिमरिया गाँव के कृषक बेटा।
नाम किए जग भर में,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।
राष्ट्र कवि दिनकर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।

राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के नभ पर।
उदयमान हुए बनकर दिनकर।
ओजपूर्ण हुंकार भर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।
राष्ट्र कवि दिनकर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।

रश्मिरथी,कुरुक्षेत्र,उर्वशी लिखे।
संस्कृति के चार अध्याय लिखे।
धरोहर भारत के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।
राष्ट्र कवि दिनकर के,
चरणों में शत-शत नमन मेरा।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित (मौलिक)

Tuesday, September 22, 2020

साक्षर जमाई

साक्षरता का अभियान चला,
           तो लगे सभी जन पढ़ने।
सीख-सीखकर अक्षर-अक्षर,
            जोड़-जोड़ शब्द गढ़ने।

एक नेता जी ने भी अपने,
              बेटे को खूब पढ़ाया।
क्या जाने उनके सुपुत्र ने,
               उनको मुर्ख बनाया।

रोज खा-पीकर विद्यालय को,
              निकलता बस्ते लेकर।
दिनभर मित्रों के घर जाकर,
             खेलता जूआ जमकर।

सातवीं की वार्षिक परीक्षा में,
                  लाया नम्बर जीरो।
घुड़की दे पास कराये नेता जी,
                 बन गया बेटा हीरो।

फिर निरक्षर गाँव में उन्होंने,
               बेटे की ब्याह रचाई।
सास- ससूर फूले न समाए,
              पाकर साक्षर जमाई।

एक बार जमाई राजा जी,
               पहुँचे जब ससुराल।
सासु-माँ चिट्ठी पढ़ने बोली,
                हुआ हाल, बेहाल।

आधे घंटे टकटकी लगाकर,
            पढ़ते रहे खोए-खोए।
सासु-माँ को देख बेचारे,
              दहाड़ मारकर रोए।

जमाई को रोता देख बेचारी,
              सास बड़ी घबराई।
चिट्ठी में कैसी बुरी खबर है,
              बताएँ मुझे जमाई।

रोते-रोते बड़ी देर में,
      जमाई राजा ने मुँह खोला।
'क' दुबला हो गया सासु-माँ,
      बिलख-बिलख वह बोला।

जब मैं लिखता था पट्टी पर,
            'क' दिखता था मोटा।
आज देखिए इस चिट्ठी में,
              'क' है दुबला-छोटा।

सास-ससूर ने सिर पीटा,
            पाकर जमाई साक्षर।
ऐसी साक्षरता से भला है,
                रहना हमें निरक्षर।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
         स्वरचित (मौलिक)

Saturday, September 19, 2020

अकेले खड़े हो ( गज़ल )

अकेले खड़े हो मुझे तुम बुला लो।
मायुस क्यों हो ,जरा मुस्कुरा लो।

रात है काली औरअँधेरा घना है,
तम दूर होगा तू दीपक जला लो।

भरोसा न तोड़ो, मंजिल  मिलेगी,
जो मन में बुने हो सपने सजा लो।

देखो तो कितनी है रंगीन दुनियाँ,
इन रंगों को अा मन में बसा लो।

रूठा न करना कभी भी किसी से,
रूठे हुए को जरा तुम मना लो।

पराये को अपना बनाना  कला है,
अपनों को अपने दिल में बसालो।

बुराई किसी की तू, मन में लाओ,
अच्छाईयों कोभी अपना बना लो।

प्यार सिखाता जो,वह गीत गाओ,
झंकार करता ,  गजल गुनगुनाओ।
           सुजाता प्रिय
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, September 18, 2020

दर्द देकर हँसाया गया ( गज़ल )

हर जगह मुझको ही आजमाया गया।
दर्द दे - देकर है सदा ही हँसाया गया।

सोंचती रही कि है ईश्वर की यही मर्जी,
जितना सहती गई उतना सताया गया।

वश तो गैरों पर कभी भी चलता है नहीं,
सदा अपनों के द्वारा मुझे रुलाया गया।

दिखाऊँ किसे दिल पर पड़े फफोलों को,
धीमी आँच पर जिसको है जलाया गया।

अश्क आँखों से छलक जाए ना कहीं,
मीठे शब्दों से दिल को बहलाया गया।

उफ न कह दे होंठ कहीं गैरों के निकट,
मरहम मधुर वाणियों का लगाया गया।
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        मौलिक ( स्वरचित )

Thursday, September 17, 2020

आखों देखी

आदिशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का पूजन का मुहूर्त आज प्रातः१०:१९ बजे से था।पूर्व की तरह हर स्थान पर  पूजन पूरे हर्ष के साथ मनाया गया लेकिन उल्लास का सर्वत्र आभाव दिखाई दिया।अधिकांश जगहों पर बड़ी-बड़ी प्रतिमा के स्थान पर छोटी मूर्ति अथवा चित्र स्थापित कर पूरी सादगी से पूजा किया गया। एहतियात के तौर पर कम भीड़ एवं आपसी दूरी बनी रही। महाभोग वितरण नहीं होने की सूचना के साथ थोड़े- से मुंगफली इलाइची दाने के प्रसाद बाँटे गए। मेले के तौर पर कहीं-कहीं गुब्बारे खिलौने बाले सड़कों पर घूमते नजर आये।अधिकांश घरों में बच्चे सज- सँवरकर पूजा में जाने की जिद्द करते और अभिभावक अपने बच्चों को जाने से रोकते हुए पाये गए।
कोरोना के कारण पूजा का स्वरूप पूरा बदला-बदला नजर आया।कल खारखानों में भी पूजा की मात्र रस्म अदायगी की गई।वाहनों के परिचालन बंद रहनें से वाहनों की भीड़ सड़क पर ना होकर मैदानों एवं घरों के आगे ज्यादा दिखी।फल वाले  ठेले पर फलों को सजाकर मक्खियाँ मारते नजर आए।मिठाइयों की दुकानों पर पसरे सन्नाटें को मक्खियों ने अपनी भिनभिनाहट से तोड़ा।बची-खुची खबरें अगले समाचार में।
                'अभी तक 'राँची से
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 15, 2020

आजा मेरे बालमा

जीया बेकरार है,छाई बहार है,
आजा मेरे बालमा,तेरा ईतजार है।

आज है पहली तारिख बालम,
जल्दी से घर आ जाओ।
महीने भर का पगार अपनी,
हाथ मेरे तुम थमाओ ।
आज मंगलवार है,जाना बाजार है,
आजा मेरे बालमा,तेरा इंतजार है।

चल कर मेरा झुमका ले दो,
अँगूठी पायल भी ले दो।
जरी-बुटिक की सारी ले दो,
मखमल की चोली ले दो।
तुझको मुझसे प्यार है।
तो लेना मेरा हार है।
आजा मेरे बालमा..........

नमक नहीं है, तेल नहीं है,
और न आटे -  दाल है।
सब्जियों की टोकरी खाली,
मसाले का भी यही हाल है।
हम पर सारा भार है,खाने वाले चार हैं।
आजा मेरे बालमा ,तेरा इंतजार है।
       सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, September 12, 2020

अकेले आना अकेले जाना

यह दुनिया है एक विशाल भँवर।
जी रहे हैं हमसब उसमें फँसकर।

लाख भरें हैं  हमसब  में सद्गुण।
हर कला में चाहे हम  हैं निपुण।

कर दिखाते हैं बड़े-बड़े करतब।
देखते हमें अचंभित होकर सब।

खुद को दुनिया में सावित करते।
अपनी विशिष्ठता का  दम भरते।

यह भूल है हमारे अन्तर्मन  की।
संकुचित भावना है जीवन  की।

अकेले आना और अकेले जाना।
पाई भर  न साथ में है ले जाना।

मिला है  जीवन हमें अनमोल।
बनाकर रखें सबसे मेल-जोल।

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, September 10, 2020

एकरूपता और अखण्डता का रूप हिन्दी

देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा की जननी संस्कृत भाषा है।या यूँ कहें हिन्दी  संस्कृत भाषा का ही सरल रूप है।यह एक वैज्ञानिक भाषा है।इस भाषा में कोई उच्चारण दोष नहीं है।इस भाषा को लिखने में स्वरों के मेल के लिए अक्षर नहीं अपितु मात्राओं को उपयोग में लाया जाता है।संस्कृत हर भाषा की जननी है तो हिन्दी सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है।यह सहजता से समझी और सीखी जाने वाली सरल भाषा है।इसके हर अक्षर और अक्षरों के योग से निर्मित शब्दों में जो माधुर्य है वह किसी अन्य भाषा में नहीं। सच माने तो हिन्दी हमें एकाग्रता के साथ-साथ एकरूपता अखण्डता  का भी पाठ पढ़ाती है। हिन्दी भारत की हर क्षेत्रिय भाषी लोगों को सहजता से समझ आती है।
यही कारण है कि हिन्दी भाषा को हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा का गौरव प्राप्त है।
भारत के हिन्दी साहित्यकारगण हिन्दी भाषा को लोकप्रिय बनाते हुए 'समृद्धि' की ओर ले जाने का अथक प्रयास कर रहे हैं। इस भाषा में साहित्यारों 'द्वारा लिखे गए  लेख, निबंध, नाटक, कहानी, कविता, उपन्यास इत्यादि काफी सुंदर, सार्थक और आकर्षक होते हैं।
इस भाषा को विस्तार देने एवं समृद्ध बनाने में हमारे देश के फिल्म- जगत का योगदान भी सराहनीय है ।जो बड़े-बड़े फिल्म -उद्योग चलाकर देश-विदेश में हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहे हैं ।विदेशों में लोग भी बड़ी तन्मयता से  हिन्दी फिल्म देखते और पसंंद करते हैं।एक दिन ऐसा भी आएगा जब देश-विदेश में बोली जाने वाली हमारी हिन्दी।इस प्रकार हिन्दी भाषा जल्द ही अखण्ड भारत का निर्माण कर  सम्पूर्ण जगत में अपना अलग पहचान बनाकर रहेगी।
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
         मौलिक रचना

Wednesday, September 9, 2020

मानवता का पाठ

नेता जी का नौकर चन्दूं,
चला घुमाने टॉमी को।
एक हाथ से पकड़ रखा था,
उजली बिल्ली रौमी को।

सड़क किनारे जाते देखा,
कृशकाय एक बालक को।
शायद राह भटक गया था,
ढूंढ रहा था पालक को।

थी दुर्बल उसकी जर्जर काया,
हड्डी-पंजर सब दिखता था।
कुपोषण की शिकार बेचारा,
चिड़-चिड़ करता चीखता था।

मन में अपने सोंचा चन्दू,
मानवता का अब मोल नहीं
कुपोषित काया की खातिर,
किसी के मुख में बोल नहीं।

कुत्ते-बिल्ली सभी पालते,
प्यार लुटाते उसपर अपना।
दूध-मांस हैं उनको देते,
सुखी रोटी गरीब का सपना।

कुत्ते को स्वेटर हैं पहनाते,
बिल्ली को दुशाले का साया।
मानव का पूत नंगा घूमता,
इस पर न किसी को माया।

कुत्ते-बिल्ली को गोद बैठाकर,
गाड़ियों में घुमाते हैं।
गरीब के इस बच्चे को देख,
घृणा से मुँह बनाते हैं।

पशुओं को छोड़ कर चन्दू ने,
झट बच्चे को उठा लिया।
मानवों को मानवों के संग,
मानवता का पाठ पढ़ा दिया।

     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, September 6, 2020

माँ

मन- मंदिर में तेरी  मूरत।
वात्सल्य की  है तू  सूरत।
तेरे चरणों  में  सब तीरथ।
चमके तेरी कितनी सीरत।

गोद बैठाया  हृदय  लगाया।
अपना दूध है हमें  पिलाया।
जाग - जाग तू हमें  सुलाया।
पढ़ना-लिखना हमेंसिखाया।

सत-पथ पर चलना बताया।
भला-बुरा का ज्ञान दिलाया।
कामयाब,कबिल हमें बनाया।
आत्म-निर्भर तू हमें बनाया।

गुड्डा-गुड़िया बना सलोना।
तूने मुझको दिया खिलौना।
जीवन का हर कोना-कोना।
तेरे कारण बन गया सलोना।

सिखाई सिलाई और कटाई।
बेल -बूटे की सुंदर कढ़ाई।
कहाँ-तक तेरी करूँ बड़ाई।
तू ही सब कुछ हमें सिखाई।

शिष्टाचार का ज्ञान दिया है।
तूने  मुझको  मान दिया है।
जग में कुछ पहचान दिया है।
शिक्षा का  वरदान दिया है।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, September 4, 2020

शिक्षक की परिभाषा

                                    शिक्षक
                               ऐसे शिल्पकार
                         जो मंदिर उठाते ज्ञान के।
    शिक्षक   ऐसे   काष्ठकार जो , द्वार  बनाते   ज्ञान  के।    शिक्षक   ऐसे   मूर्तिकार जो,  मूरत बनाते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   बुनकर हैं जो, वस्त्र  बनाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   स्वर्णकार जो, गहने  गढ़ते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   माली हैं जो , फूल खिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   पंडित हैं जो , पूजन करते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   त्रृषि-मुनि हैं जो, दीक्षा देते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   दीपक हैं जो,ज्योत जलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   मार्गदर्शक जो,राह दिखाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   अनुगामी जो,लक्ष्य दिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   रक्षक हैं जो,रक्षक हैं बनते  ज्ञान  के।
                          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
                  समस्त शिक्षकों को सादर समर्पित

Thursday, September 3, 2020

आत्महत्या सुलझन नहीं उलझन।


आज कल आत्महत्या का प्रचलन बढ़ता जा रही है आए दिन समाचार पत्रों में आत्महत्या की खबरे छपी दिखती है।साथ ने यह भी लिखा रहता है कि मानसिक तनाव , जिम्मेदारियों के बोझ अथवा आर्थिक तंगी से घबरा कर आत्महत्या कर ली। विद्यार्थी गण असफलता के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। स्त्रियाँ कलह और मानसिक अवसादों का शिकार हो आत्महत्या कर रही हैं।लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोंचा कि आत्महत्या कर लेने से उनकी यह समस्या सुलझ जाएगी ? नहीं न।
किसी भी परिस्थिति में की गई आत्महत्या सुलझन नहीं हो सकती ,वल्कि यह हर बातों में उलझन ही उत्पन्न करती है।जिस समस्या का समाधान या निदान व्यक्ति जीते जी नहीं कर सकता, उसे मरने के पश्चात कैसे कर सकता है।मरकर तो कितनी ही अनसुलझी गुत्थियों को उलझाकर और अपने आप में समेटकर ही चले जाते हैं।स्वयं भी किव्दंतियों एवं बदनामियों के शिकार होते हैं , और दोस्त- साथियों  और परिजनोंं को भी उलझन में डाल देते हैं।स्वयं अवसाद एवं मानसिक तनाव से निजात पा लेते हैं किंतु दूसरों को उलझाकर चले जाते हैं।
जिंदा रहकर सारे रहस्यों का पर्दाफास किया जा सकता है, मन की सारी उलझनों को सुलझाया जा सकता है न कि आत्महत्या कर सारी रहस्यों को दफन कर।
इस प्रकार आत्महत्या सिर्फ और सिर्फ उलझन है सुलझन नहीं।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

तर्पण का महत्व ( लघु कथा )

सोनू आज बहुत उदास है।दादाजी और दादी माँ गाँव चले गए हैं।अब तक दादा-दादी के साथ घूमने- फिरने , पढ़ने-लिखने, नित नई एवं प्रेरक कहानियाँ एवं भजन - गीत इत्यादि सुनने में उसे जो मजा आता था।वह उनके जाने के बाद कहाँ आएगा।उसने दादाजी को रूकने के लिए बहुत मनाया ।पर वे बोले- दो दिन बाद पितृपक्ष प्रारम्भ होने वाला है।वे गाँव जाकर पितरों को तर्पण करना चाहते हैं।
सोनु ने पूछा यह तर्पण क्या होता है और क्यों किया जाता है?
दादाजी ने समझाते हुए कहा-इन दिनों हम अपने पूर्वजों के नाम जल फूल प्रसाद इत्यादि अर्पित कर उन्हें याद कर प्रणाम करते हैं।
क्या आपको अपने पूर्वजों के नाम याद है? सोनु ने पूछा।
हाँ मुझे अपने दादा-परदादा के अलावा इक्किस पुस्त तक अपने पूर्वजों के नाम याद हैं।
सोनु ने पूछा- आप उनके नाम कैसे जनते हैं और कैसे याद रखते हैं।उतने नामों को याद रखना तो बड़ा ही कठिन कार्य है।
मुझे उनके नाम मेरे पिताजी ने बताया था।मैं अपनी डायरी में उनके नाम लिखा हूँ।नाम याद रखना कोई कठिन कार्य नहीं। इतिहास में तो जाने कितने लोगों के  वंशजों के नाम याद रखना पड़ता है।दादाजी ने सरलता से उत्तर दिया।
सोनु ने कहा-आप  यहीं रहकर अपने पूर्वजों का तर्पण करें।
नहीं हम अपने पैतृक घर जाकर  समस्त परिवारो के साथ मिलकर ही यह पुण्य कार्य संपन्न करते हैं। इस तरह गोत्र-परिवार से हमारी भेंट भी हो जाती है।कुछ दिन उनके साथ भी रहना अच्छा लगता है।जब हम नौकरी करते थे तब भी गाँव जाकर ही यह कार्य करते थे।
पितरों को तर्पण करने से क्या लाभ है।सोनु ने उत्सुकताबस पूछा।
तुम मुझे चाय ,पानी ,नाश्ता लाकर क्यों देते हो ?उसकी बातों के उत्तर में दादाजी ने एक प्रश्न कर दिया।
   क्योंकि आप खुश होकर वाह-वाह बोलते हैं।
ठीक उसी प्रकार हमारे पूर्वज तर्पण करने से प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते है।यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।हम अपने पूर्वजों एवं बड़ों को जैसा आदर सम्मान करते हैं ,हमारी अगली पीढ़ी के मन में भी हमारे प्रति वैसे ही भाव उत्पन्न होते हैं।
इसलिए हमें पितरों को तर्पण - नमन अवश्य करने चाहिए।उन्होंने हमें इस जगत में उत्पन्न कर पाला-पोसा और लायक बनाया।इसलिए वे हमारे देवता है।
सोनु तथा उसके माँ-पिताजी का मन इन बातों को सुनकर बहुत खुश हुआ।उन्होंने दुर्गा पूजा के अवसर पर गाँव आने का वादा किया ताकि सभी परिवारों से उनकी भेंट-मुलाकात हो सके।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, September 2, 2020

नारी के हैं रूप अनेक

मत कहो कि है अबला नारी।
सदा- ही रही है सबला नारी।।

पाई है  वह  बस, दो- ही हाथ।
कितने कामों को करती साथ।।

सबके लिए है भोजन पकाती।
दूर तालाब से  है पानी  लाती।।

नौ महीने तक पेट में रखकर।
बच्चे जन्म देती दुःख सहकर।।

एक बच्चा को पीठ पर बाँध ।
और दूजे को कराती है स्नान।।

समय पर है विद्यालय पहुँचाती।
और घर आने पर स्वयं पढ़ाती।।

घर के सारे बर्तन- कपड़े धोती।
तड़के जगती है व देर से सोती।।

सिलाई- बुनाई और करे कढ़ाई।
कूड़े- कचरे की  भी करे सफाई।।

कुदाल  चला वह खेती करती।
पाल - पोष सबका दुख हरती।।

बीमारों की  देखभाल करती।
बड़े-बूढों की सेवा भी करती।।

बाजार का काम भी है  करती।
कभी नहीं मुख से उफ कहती।।

पैसे कमाने भी बाहर है जाती।
डाक-दफ्तर को भी निपटाती।।

जलावन की लकड़ियाँ बिनती।
किन-किन कामों की है गिनती।।

दुर्गा काली की लेकर अवतार।
देश-रक्षा करती उठा हथियार।।

महामाया-मोहा-नारायणी नारी।
शक्तिशालिनी- कात्यायनी नारी।।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित