Monday, November 21, 2022

रुपिया से बड़ा परिवार ( मगही भाषा)

रुपिया से बड़ा परिवार (मगही भाषा)

सुना भाई हो!रुपया से बड़ा परिवार।
हाँ परिवार से बड़ा नै रुपिया
हजार।
सुना भाई हो...........
जेकरा घर-परिवार बड़ा है ऊ बड़का धनवान।
जेकर परिवार में मिल्लत है ऊ बड़का गुणवान।
सुना भाई हो !परिवार के तू रखिहा सम्हार।
सुना भाई हो !......................
बड़ा-बुढ़ा से परिवार शोभे,सुना तनी भैया।
जेकर घर दादा-दादी,चाचा-चाची
बापू-मैया।
सुना भाई हो !जेकर घर हो आपस में प्यार।
सुना भाई हो !...............
भाय-बहिनिया मिलके खाय-खेले साथ।
घूमे-फिरे,पढ़े-लिखे,जाय पकड़ के हाथ।
सुना भाई हो !बाल-बुतरु करें गुलजार।
सुना भाई हो !..............
आपस में सब सुख-बाँटे,बटाबे सबके हाथ।
दूध-मिठाई,चूड़ा-भुज्जा,खाथिन सभे साथ।
सुना भाई हो ! रहे उनकर घर में बहार।
सुना भाई हो ! ...................
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, November 20, 2022

दोहे शब्द आधारित



दोहे (शब्द आधारित)

 कलम, गीत, संगीत,काव्य सृजन (दोहा)

विद्वानों के हाथ का,कलम बड़ा हथियार।
कलम चलाते वे सदा,बनते  रचनाकार।।

गीत सदा मन मोहता,गाते जाओ गीत।
सुनने में प्यारा लगे,लेता है मन जीत।।

संगीत की धुन सुन कर,मन में उठे तरंग।
सुनते सब मन मुग्ध हो,थिरक रहे सब संग।।

कवियों के काव्य सदा, मुखरित करते भाव।
भाव सदा प्यारा लगे,हो जाता संभाव।।

कवि गीत का सृजन करें,कथा- कहानी रोज।
रहता मन उमंग भरा,उनके मन में ओज।।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, November 18, 2022

मेहनत (सायली छंद)

         मेहनत (सायली छंद )
     मेहनत                  मेहनत 
    करना है              को मुकाम 
धर्म हमारा हम       बना  कर  हम 
 मेहनत करते           आगे बढ़ते 
      जाएंँ।                   जाएँ।

   मेहनत                  मेहनत 
 करना पड़े             करके हम 
कभी तो हम       निज मंजिल की
 तनिक नहीं            राहें गढ़ते
   घबराए।                जाएँ।

   मेहनत               मेहनत
 करने वाले          की पतवार 
ही जीवन में       पकड़ कर हम
  सदा पाते           पा   सकते 
   मंजिल।             किनारा।

     मेहनत                 मेहनत 
  करने वालों             की नौका
 के जीवन में          से  दूर  रहती
  नहीं आती।             दुःख की
   मुश्किल।                 धारा।

   मेहनत                  मेहनत
 करने वाले             जीवन का
जग में सदा          सच्चा साथी है 
   सुखी हैं               सदा  साथ
     होते।                  निभाता।

   मेहनत                  मेहनत
  दिन  भर               संग  तुम 
कर रात्रि में          कर लो दोस्ती 
अच्छी नींद             सदा रखो
    सोते।                   नाता।
       सुजाता प्रिय समृद्धि

Thursday, November 17, 2022

मेरी मर्जी (लघुकथा)


          मेरी मर्जी (लघुकथा)

 संदीप का मन भूख से व्याकुल हो रहा था।ऐसे में मम्मी का मुँहतोड़ जवाब सुन मन बड़ा विचलित हो जाता। अब उसमें हिम्मत नहीं थी कि फिर पूछे भोजन कब बनाओगी ? दोपहर से कई बार पूछ लिया भोजन कब बनाओगी ?भोजन में क्या-क्या बनाओगी ? इन सभी सवालों का बस एक ही जवाब होता 'मेरी- मर्जी' । सुबह के नाश्ते के बाद तो कुछ खाने नहीं मिला। ना ही कहीं डब्बे में कुछ रखा मिल रहा,ना ही फ्रीज में कुछ बचा-खुचा है। आखिर खाऊँ-तो क्या खाऊँ ? उससे पूछूंगा तो बस एक ही जवाब देगी  'मेरी मर्जी'। रोज तो ऐसा नहीं करती थी। सभी चीज समय पर बनाकर स्वयं ही पूछा करती थी खाना परोसूँ ? खाना कब खाइएगा ? नाश्ता कब करेंगे ? लेकिन,आज घर में अकेला हूंँ तो चादर तान कर सोई है।ना बनाती है,ना खिलाती है,ना पूछने आती है।
पूछने पर भी यही जवाब देती है कि 'मेरी मर्जी'।आखिर कहांँ से सीखा उसने यह 'मेरी मर्जी?
वह मन-ही-मन झूंझला उठा ।मुझसे। अनायास उसके मुँह से निकल पड़ा।मन ने तुरंत स्वीकार किया । हांँ-हांँ मुझ से ही सीखा है।यह मेरा ही तकिया कलाम है।

 शादी के इतने साल बीत गए।वह बेचारी हमेशा पूछती है कि -आप क्या खाएंँगे  ? कब खाएँंगे ? क्या पहनेंगे ?कब आएगे? कब जाएँगे बगैरा-बगैरा।और मेरा जवाब होता है- 'मेरी मर्जी' । अब उसे गुस्से के बजाय अपनी गलती का एहसास हो रहा था।
 ओह मैं इतने वर्षों से उसे 'मेरी मर्जी' का जवाब दे रहा हूंँ,तो उसे कैसा लगता होगा । अपने जवाब को सुनकर कुछ घंटों में ही जब मैं परेशान हो गया।
रोज वह मजबूर थी ।मांँ- पिताजी के लिए तथा बच्चों के लिए उसे भोजन बनाना था । लेकिन आज बच्चे भी मांँ-पिताजी के साथ गांँव चले गए । आज ना उसे बच्चों के लिए खाना बनाना है,और ना माँ- पिताजी के लिए । इसलिए उसने मेरी मर्जी को अपनी मर्जी बना ली और मुझे .................।
अब वह 'मेरी मर्जी' की अकड़ भूलकर पम्मी को हाथ पकड़ कर उठाते हुए कहा- उठ पम्मू !आज तुम अपनी मर्जी का ही कुछ बनाकर खिला दे । पेट में चूहे कूद रहे हैं यार ! अब मैं तुम्हें कभी भी 'मेरी मर्जी' कह कर नहीं सताऊंँगा।हाथ जोड़ता हूँ, कान पकड़ता हूंँ।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, November 16, 2022

बड़े चलो बढ़े चलो (देशभक्ति गीत)

बढ़े चलो बढ़े चलो

बढ़े चलो बढ़े चलो,वीर तुम बढ़े चलो।
सतत मन में धैर्य ले,धीर तुम बढ़े चलो।
बढ़े चलो बढ़े चलो...................
रक्षा की आस ले,बुला रही मांँ भारती।
त्रस्त मन की वेदना,ले तुझे गुहारती।
रख मन में चेतना गंभीर तुम बढ़े चलो।
बढ़े चलो बढ़े चलो...................
देश के लिए जीओ,देश के लिए मरो।
सामने हो काल तो,वीर तुम नहीं डरो।
रख मन में हौसले,तूफान से लड़े चलो।
बढ़े चलो बढ़े चलो...................
शत्रुओं से ले बचा,आज अपने देश को।
कृपाण से उतार दे,कपटियों के वेश को।
इंतकाम ही मुकाम है, सास्ते गढ़े चलो‌।
बढ़े चलो, बढ़े चलो....................
उपद्रवियों को रोक दे, तलवारों की नोंक से।
देश को उजाड़ने,जो आ रहे हैं झोंक से।
कदम नहीं बढ़ा सकें,काल बन अड़े चलो।
बढ़े चलो बढ़े चलो..................

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, November 15, 2022

बढ़े चलो साथियों

बढ़े चलो साथियों

बढ़े चलो साथियों ! तुम बढ़े चलो।
निज मंजिल के रास्ते को गढ़े चलो। बढ़े चलो.....

बढ़ना ही है धर्म तुम्हारा,जल्दी-जल्दी बढ़ा कदम।
सबसे आगे बढ़ सकते हो,सोच नहीं हो किसी से कम।
पर्वत भी हो राह में,उस पर चढ़े चलो।बढ़े चलो.....

मत घबरा तू बाधाओं से,सफलता का यह साधन है।
करता चल संघर्ष सदा तो,कठिन नहीं यह जीवन है।
हिम्मत कर तूफानों से भी,लड़े चलो।बढ़े चलो.....

श्रेय पथ पर बढ़ते जाओ, अनुगामी स्वयं बनकर।
लेकर साहस दृढ़ हृदय से,विश्वास की डोर पकड़ कर।
जीवन को स्वर्णिम तीलियों से,मढ़े चलो।बढ़े चलो.....

विघ्न पराजित होंगे तेरे,दृढ़ निश्चय के आगे।
नतमस्तक होगी सफलता,जब तेरा मन जागे।
सफल जीवन का मंत्र है यह,पढ़े चलो।बढ़े चलो.....
                             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, November 11, 2022

देश प्रेम (हरिगीतिका छंद)

देश प्रेम 

हमको अपने देश से कभी,प्यार ना मन में घटे।
किसी हाल में किसी बात से,प्रेम बादल ना छटे। ‌

देश हमारा,प्यारा जग में,मान भी जग  में बढ़े।
आजाद रहे आवाद रहे, उच्च-शिखर हरदम चढ़े।

धन-धान्य से परिपूर्ण हो, सुख-समृद्धि हरदम रहे।
हर हाल में खुशहाल हो,हर होंठ हँंसी हर पल रहे।

हर गाँव के, हर खेत में,उपजे फसल  प्रकार के।
हर वृक्ष के,हर डाल में,फल लगे हर आकार के।

मानवों को मानव के लिए,प्रेम का व्यवहार हो।
किसी हाल में किसी लोग पर,कभी न अत्याचार हो।

हर लोग में मिल्लत रहे, प्रेम सह समभाव हो।
जाति-वर्ण के वास्ते ना , कोई दुराभाव हो।

है कामना हर जन्म में,इस देश के बासी रहें।
इस पुण्य भूमि में जीएँ,इसी के अभिलाषी रहें।

                  सुजाता प्रिय समृद्धि

भारत का संदेश

भारत का संदेश 

भारत अपना देश,जिसका प्यारा यह संदेश,
                                 आगे बढ़ते जाओ।
 लेकर मन में विश्वास,कर सफलता की आस,
                                 रास्ता गढ़ते जाओ।

 भारत प्यारा,देश हमारा , यहाँं के हम हैं बासी।
सुख-वैभव की चाह नहीं है,रक्षा के अभिलाषी।
पहनकर सैनिक का वेश, बचा लो अपना देश,
                              दुश्मन से लड़ते जाओ।

इसकी वायु में सांँस लेकर, ही तो हम जीते हैं।
इसका खाते अन्न-फल,हम इसका पानी पीते हैं।
प्यारा यह उपहार,इससे मिलता है हयको प्यार,
                                 प्यार तो करते जाओ।

इस धरती की रक्षा करना, है धर्म हमारा भाई।
इसकी ममता के आँंचल में,हम लेते हैं अंगड़ाई।
कर लो इससे प्यार,हमारा यह सुंदर है संसार।
                                     ऊपर चढ़ते जाओ।

जीवन धन्य होगा कर,इस पर प्राण निछावर।
इसका मस्तक ऊंँचा कर दें, हिमालय के बराबर।
हम सब मिलकर साथ,नवाते जाओ अपना माथ,
                                 नमन सब करते जाओ।

 सुजाता प्रिय समृद्धि

Thursday, November 10, 2022

भारत माँ के बच्चे हम (बाल गीत)



भारत माँं के बच्चे हम
हैं नन्हे अच्छे सच्चे हम।

भारत मां के बच्चे हम।
मिलता सबका प्यार हमें।
खुशियों का उपहार हमें।
हसगुल्लों के लच्छे हम।

नहीं किसी से डरते हम।
प्यार सभी से करते हम।
सचमुच मन के अच्छेहम।
भारत माँं के बच्चे हम।

भारत मांँ की खातिर हम।
मर मिटने को आतुर हम।
नहीं  किसी से कच्चे हम।
भारत मांँ के बच्चे हम।

फूलों-सा महकते हम।
किसी से न बहकते हम।
खाते कभी न गच्चे हम।
भारत माँ के बच्चे हम।

रहते हरदम हँंसते हम।
धोखे में ना फँंसते हम।
चक्रव्यूह खुद रच्चे हम।
भारत माँ के बच्चे हम।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, November 9, 2022

सूरज (बाल गीत)


सूरज 

सुबह सवेरे आया सूरज।
थोड़ा सा अलसाया सूरज।।

हंसकर हमें हंसाया सूरज।
नई उमंगे लाया सूरज ।।

किरण फेंक मुस्काया सूरज।
संपूर्ण जगत में छाया सूरज।।

सोतों को जगाया सूरज ।
दया-प्रेम उपजा या सूरज।।

कलियों को खिलाया सूरज।
भटकों को राह दिखाया सूरज।।

हर प्राणी को भाया सूरज।
 दिन भर जगमगाया सूरज।।

 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, November 8, 2022

दहेज ना चाही (भोजपुरी भाषा)



दहेज ना चाही (भोजपुरी भाषा)

कैलन दहेज समाज में तबाही।
बेटा बियाह में दहेज ना चाही।

जब हम बेटी के बियाह कईनी।
दहेज जुटाबे में की दिन बितैनी।
लोग परिवार से कईनी उगाही।
बेटा बियाह में दहेज ना चाही।

बेटी के बाप के खून नै चूसब।
उनका से तनी धन नहीं झूसब।
बनाइब न उनका कर्जा के राही।
बेटा बियाह में दहेज ना चाही।

करब ना बियाह में कोनो दिखावा। 
अमीर बने के हम झूठा भुलावा।
देबे जो समधी तो करब मनाही।
बेटा बियाह में दहेज ना चाही।

सादगी से बेटा के बियाह रचाइब।
लक्ष्मी बहुरिया के घर में ढुकाइब।
माने में उनका ना करब कोताही।
बेटा बियाह में दहेज ना चाही।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, November 4, 2022

सरस्वती वंदना (मगही भाषा )



सरस्वती वंदना ( मगही भाषा )

वीणा बाजे रे, सरस्वती माय के द्वार में।
मनमा नाचे रे, उहे वीणा के झंकार में।

रोज मैया के ध्यान लगैबै,चरनियां में सिर नवा के।
मैया हमरा देथिन आशीष,अपने दुनु हथ उठा के।
हमर आस पुरैहा मैया,विद्या-बुद्धि वरदान दे।
जीवनमा संवरे रे, मैया के दुलार में।
वीणा बाजे ये,................

मैया रानी,तू हा वरदानी,हमरा तू वरदान दा।
हम मुरख-अज्ञानी मैया,हमरा सच्चा ज्ञान दा।
विद्या दायिनी मैया मोरी,इहे हमर अरमान है।
झूम-झूमके नाचूँ रे, मैया तोहर प्यार में
वीणा बाजे रे,.....................

सरस्वती मैया,होबा सहैया,पढ़ें लिखे के बेर में।
आखर एक समझ न आबे,गीत-कवित के ढेर में।
जड़मति हमर हर ला मैया,जग में थोड़ा मान दा,
विनती गाऊँ रे, मैया के अलार में।
वीणा बाजे रे.............
           सुजाता प्रिय समृद्धि

Thursday, November 3, 2022

गरीब का बुढ़ापा



    गरीब का बुढ़ापा

मुट्ठी भर दाने है खाना।
उसको मुझे है पकाना।
चुल्हे इसी से है जलाना।
उसके लिए ईंधन लाना।

पापी पेट का सवाल है।
अब जीना यहाँ मुहाल है।
ठंड से बुरा अब हाल है।
किसी को नहीं मलाल है।

लाठी बुढ़ापे का सहारा है।
ठंड में आग ही हमारा है।
इसके सिवा नहीं चारा है।
लाठी और आग सहारा है।

बुढ़ी हूँ किस्मत की मारी ।
लकड़ियाँ बिनना लाचारी।
हूँ बस दुःख की अधिकारी।
ढोती पीठ पर बोझा भारी।

पल सुबह का, या शाम का।
समय न मिलता विश्राम का।
नहीं लेनेकभी नाम राम का।
जपना मन में हरि-नाम का।
        सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, November 2, 2022

गणेश वंदना (विजया घनाक्षरी )



     गणेश वंदना 

गणपति गणेश जी, 
   पिताजी हैं महेश जी,
        माता जी हैं दुर्गेश्वरी,
              कर जोड़ है नमन।

भाल पर सिंदूर है,
     हाथ कमल फूल है,
           मूष पर बैठ कर, 
               करते जग गमन।

मुख में है एक दाँंत,
     और शोभे चार हाथ,
           सेवक झुकाए माथ,
               रोग को करें शमन।

बालकों को हैं तारते,
        दुख से हैं उबारते,
            बुद्धि बल निखारते,
                    सँवारते हैं चमन।
            सुजाता प्रिय समृद्धि