Thursday, March 31, 2022

है प्रीत जहाँ की रीत

है प्रीत जहाँ की रीत

है प्रीत जहांँ की रीत सदा, उस राज्य की बात बताती हूँ।
भारतीय राज्य झारखंड की सब सच्ची बात सुनाती हूँ।

छोटा नागपुर पठार पर बसा हुआ, भारत का छोटा कोना है।
यहांँ खान है काले हीरे की,नदियों में बहती सोना है।
खनीज-सम्पदा से है भरा हुआ,यह आज मैं समझाती हूंँ।भारतीय .....
यहाँ का पर्व सरहुल,जावा,तुसु,कर्मा फगुआ-सोहराई।
संस्कृति जनी शिकार सेदरा, मुर्गा लड़ाई।
छऊ-मुंडारी,नचनी-जतरा है यहांँ का नृत्य बताती हूं।भारतीय .....
प्रमुख फसलें-धान मक्का,घंघरा,मड़ूआ,गेहूं है।
प्रमुख-व्यंजन-चिल्का रोटी,ढुसका,रुगड़ा मशरूम है।
सब खा-पीकर खुश रहते हैं,यह अद्भुत गीत गाती हूँ।भारतीय .....
यहांँ का राजकीय पक्षी कोयल है,और राजकीय पशु हाथी।
राजकीय फूल-पलास,फल- कटहल पेड़-साल वन में साथी।
राजकीय प्रतीक चिह्नों को, मैं सबको आज गिनाती हूँ।भारतीय ....
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           स्वरचित,मौलिक

Monday, March 21, 2022

पहली कविता

पहली कविता

जिसको मैंने रोज संवारा,
  जिसको मैंने रोज निखारा,
    जिसे रचाई मैं वर्षों तक,
      जिसे सजाई मैं अर्सों तक,
         वह मेरी पहली कविता है।

करनीय कार्य में आनेवाली,
  तुकबंदी सिखलानेवाली,
    कोशिश करना हमें सिखाया,
       कविता रचना हमें सिखाया,
         वह मेरी पहली कविता है।

जिसने बर्बाद किए कई पन्नें,
   जिसने स्याह किए कई पन्नें,
     कलम चला थक जाती थी मैं,
       क्या लिखूँ समझ न पाती थी मैं,
            वह मेरी पहली कविता है।

जिसमें वर्तनी दोष बहुत थे,
  पर्यायवाची शब्दकोष बहुत थे,
     अशुद्धियों का भंडार था उसमें,
    .    त्रुटियोंं की भरमार थी जिसमें,
          वह मेरी पहली कविता है।

             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
     स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, March 20, 2022

कहां गयी तुम ओ गौरैया

कहाँ गई तुम ओ गौरैया

एक जमाना बीता जब
मेरे कमरे के रोशनदान पर,
खर-पतवार के तिनके
दवा चोंच में लाती थी तू गौरैया।
एक-दूजे में उलझा-उलझाकर
थोड़ा उसमें फँसा-फँसाकर,
घोंसला अपना बनाती थी तू गौरैया।
रह-रहकर तुम्हारे नव-जनमें बच्चे,
मधुर कलरव जिसमें करते थे।
मेरे हृदय में मधुरस घोल
नव जीवन वे भरते थे।
चीं-चीं की कोमल संगीत,
सुनाई पड़ता था कानों में।
मन के तार झंकृत हो उठते थे,
उनके मधुर-मीठे गानों में।
उनके कोमल,लाल चोंच में,
तुम दानों के कण भरती थी।
निज शिशुओं की भूख मिटाकर,
अंतर की पीड़ा हरती थी।
चलचित्र-सा देखा करती थी,
पुलकित मन से मैं वह दृश्य।
माता की ममता की महिमा,
कैसी सुंदर उपहार सदृश्य।
आज न दिखती हो तुम गौरैया,
न श्रवण ही होता तुम सबका गाना।
रोशनदान घोंसले बिन सूना है ,
कौन छेड़ेगा वह प्रेम-तराना।
हाय कहाँ तू गई गौरैया,
बना बसेरा आसमान में।
नीले-नभ की सीमा पाने,
या पर फैलाने नील -वितान में।
                    सुजाता प्रिय

Friday, March 18, 2022

रंगों का त्योहार

रंगों का त्योहार

रंगों का त्योहार आया, 
रंगों का त्योहार।
दिखता है रंग-बिरंगा 
देखो सारा संसार।
रंगों का त्योहार आया...............

रंग लाल में मिलकर पीला, 
नारंगी रंग बनाया।
पीले में मिलकर नीला,
हरियाली है फैलाया।
हम भी आपस में मिलकर
करें प्यारा रंग तैयार।
रंगों का त्योहार आया...........

हम सब हाथों में रंग ले,
जन को रंगीन बनाएं।
सबसे अच्छा है हम सबको 
प्यार का रंग लगाएं।
सद्व्यवहारों से रंग दें,
हम सारा संसार।
रंगों का त्यौहार आया............. 
   
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 15, 2022

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ,गूंज रहा यह नारा है।
किन्तु बेटियों का पिता,बन जाता यहाँ बेचारा है।
अपनी आत्मजा को वह करता तो है दिल से प्यार।
पर ब्याह के समय बेटियाँ,बन जाती सीने पर भार।
दहेज की खातिर घर-बार बेचता,
क्योंकि बोली हारा है।
किन्तु बेटियों का पिता.......
बेटियों को भी पढ़ा-लिखाकर, काबिल वह बनाता है।
फिर भी लड़के वालों के सम्मुख,
निरा मुर्ख कहाता है।
बेटी का पिता है इसीलिए वह फिरता मारा-मारा है।
किन्तु बेटियों का पिता.......
कुछ लोग कहने को दहेज ना लेते, दुनियां में नाम कमाते हैं।
जेवर पार्टी का मोटा खर्चा, बेटी के पिता से करबाते हैं।
आज दहेज का स्वरूप है बदला,खुश जमाना सारा है।
बेटी व्याह के समय पिता दहेज देने में घबराता है।
पर पुत्र के समय दहेज माँग में सुरसा-सा मुंँह बढ़ाता है।
दहेज से कोई विमुख न होता,ना करता निपटारा है।।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

रंगीन संस्मरण



          रंगीन स्मरण

एक बार छुटपन में मैं होली में नानी घर में थी। क्योंकि मेरे मामाजी की शादी कुछ ही दिन पहले हुई। नई नवेली मामी घर में थी । इसलिए नानी ने हमलोग को होली में रोक लिया था। हम बच्चों के लिए मस्ती का दिन था। मौसेरी, ममेरी बहनों तथा नयी मामी की छोटी बहन जिन्हें मामी ने रोक लिया था।वह भी हमारी ही उम्र की थी ,के साथ जमकर खेलना और घूमना-फिरना हो रहा था। होली के दो-चार दिन पहले से हमलोग होली खेल रहे थे। होली के दिन तो खुब रंग उढ़ेली एक दूसरे पर।
सामने वाले मामा के दरवाजे पर छोटा-सा हौज था ,जिसमें थोड़ा सा पानी  था।वे मामा ने मामी की बहन से कहा इसी पानी में नहा लिजिए। लेकिन शरारत में उन्होंने चुपके से उसमें रंग डाल दिया ‌। जब वह नहायी तो पूरी रंगीन हो गई थी।उनका रंग हमें भी भाया। फिर मैं और मेरी अन्य बहनें आव देखा ,न ताव झट-झट हौज मैं कुद-कुदकर डुबकी लगा लिया।अब   हमारे फ्राक सहित हम सभी हरी-हरी दिख रही थीं।
घर से निकलते हुए मेरे मामा की नजर जब अपनी शाली पर पड़ी तो वे खूब मजे ले-लेकर हंसे। और जब हमारी मांँ-मौसी की नजरें हम सभी पर पड़ी तो क्षणिक गुस्से से ज्यादा वे सभी हंस-हंसकर लोट-पोट हो गई। फिर पूरे मुहल्ले के लिए हम हंसी के पात्र हो गये। रंग इतना चोखा था कि हमारा रंग उगरने में पूरा सप्ताह लग गया। मामा की रंगीन शाली तो पहले चली गई।  एक-दो दिन में हमारा रंग कुछ फीका पड़ा तो हम भी अपने-अपने चल दिए हमारे घर लौटने पर सभी जगह बस हमारी ही परिचर्चा होती। सभी खूब हंसते और उस रंगीन स्मरण में मैं आज भी जी भरकर हंसती हूंँ।‌❤️❤️😀😀🙏🙏

                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  सत्य एवं स्वरचित

Monday, March 14, 2022

बेटियाँ

बेटियांँ

बेटे से कदम मिला कर देखो, चल रही हैं बेटियाँं।।
कंधे-से-कंधा मिला कर देखो,चल रही हैं बेटियाँ।।
माता पिता की हैं बेटियांँ प्यारी।
जगत की रचना यह सबसे न्यारी।
जननी बन मानव का वंश बढ़ा रही हैं बेटियाँ।।
घर के कामों को भी निपटाती है।
बाहर का भी यह काम बनाती है।
घर-परिवार का चिंतन-मनन कर रही हैं बेटियाँ।।
सिलाई-बुनाई ,कढा़ई-चित्रांकन।
करती है अभिनय, नृत्य-गायन‌।
लेखनकला में भी आगे देखो, बढ़ रही हैं बेटियाँ।।
नियम-कानून का न करें उलंघन।
तोड़ रही है जगत के झूठे बंधन।
मर्यादा का पालन भी देखो,कर रही हैं बेटियाँ।।
विद्यालय महाविद्यालय में पढ़ती।
जीवन की अच्छी राह भी गढ़ती।
पैसे कमाने अच्छी नौकरी देखो, कर रही है बेटियाँ।
हर क्षेत्र में है पहचान बनाती।
खेल -कूद में भी आगे जाती।
अंबर में ऊँची उड़ान भी देखो,भर रही हैं बेटियाँ।
राजनीति में अपना पैर जमाती।
शिक्षा-स्वास्थ्य में अलख जगाती।
पुलिस-प्रशासन की बागडोर पकड़ रही हैं बेटियाँ।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

परीक्षा



एक गुरुकुल में यह परम्परा थी कि नित्य कक्षा में आगमन और प्रस्थान करते समय शिष्य- गण गुरुजी के चरण-स्पर्श करते थे।एक दिन गुरुजी ने शिष्यों से कहा-कल तुम सबकी परीक्षा है। दूसरे दिन नियत समय पर गुरुजी एक ऊंची तख्ती पर बैठ गये। उन्होंने अपना बायां पांव जमीन पर रखा और दाएं पांव मोड़कर बांए पांव के घुटने पर चढ़ा लिया था। सभी शिष्य परीक्षा देने उपस्थित हुए ।वे कतार बांध कर आ रहे थे और बारी-बारी से  गुरुजी के चरण-स्पर्श करते। गुरु जी के बैठने के अंदाज से सभी शिष्यों को चरण -स्पर्श  करने में कठिनाई हो रही थी। कोई शिष्य सिर्फ उनके नीचे रखे पैर को स्पर्श करता, कोई सिर्फ नीचे वाले को , कोई बारी-बारी से दोनों को,तो कोई तिरछे हाथों से एक साथ दोनों पांवों को, कोई दोनों हाथों को दाएं -बाएं घुमाते हुए दोनों पांवों को। गुरुजी प्रसन्न चित्त से सभी को आशीष देते।
अंतिम शिष्य जिसका नाम विशाल था आया। उसने असमंजस से  गुरुजी के चरणों को देखा,और अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। गुरुजी शिष्य को गौर से देखकर सोचने लगे, क्या यह चरण -स्पर्श नहीं करेगा ?
   लेकिन वह शिष्य ध्यान से गुरुजी के चरणों को देखा फिर अंदर पूर्वक दोनों हाथों से गुरुजी के ऊपर वाले पांव पकड़ कर नीचे वाले पांव के बराबर रखा। उसके बाद दोनों हाथों से दोनों चरणों को स्पर्श किया। गुरु जी ने उसे भी आशीष दिया।
 फिर उठकर परीक्षा कक्ष में प्रवेश किए और होंठों पर मधुर मुस्कान लिए हुए कहा आज की परीक्षा में विशाल उत्तीर्ण हुआ।
सभी शिष्य गुरु जी को अचंभित हो देखने लगे।वे मन-ही-मन सोच रहे थे अभी तो हमारी परीक्षा ली ही नहीं गयी फिर परीक्षा फल कैसे घोषित कर दिया गया ?
     गुरु जी उनके नेत्रों की भाषा से उसके मन के भाव समझ रहे थे। उन्होंने कहा-आज तुम्हारे द्वारा मेरे चरणों का स्पर्श ही तुम सबकी परीक्षा थी। मैंने अपने चरणों को प्रतिकूल रखा।तुम सभी उस प्रतिकूलता को ही अपनाते रहे। परीक्षा अर्थात चरण-स्पर्श गलत तरीके से करते रहे। लेकिन विशाल ने मेरे चरणों सही तरीके से रखा अर्थात परिस्थिति को अनुकूल बनाया फिर चरण-स्पर्श किया। इसलिए प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने वाला ही जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकता है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक

बीटिया ने जनम लिया

बिटिया ने जन्म लिया है

शुभ दिन शुभ घड़ी आयी,
घर बिटिया ने जन्म लिया है।
देखो घर-घर बजती बधाई ,
घर बिटिया ने जन्म लिया है।

सब लोगों के मन में बड़ी खुशी है।
पिताजी खुश हैं,औ माँ बिहसी है।
जैसे कोई कली है मुस्कायी, 
घर बिटिया ने जन्म लिया है।

दादा-दादी मिल कर मंगल गाते।
चाचा-बुआ अब फूले न समाते।
सब मिल ले रहे हैं बलाई,
घर बिटिया ने जनम लिया है।

सबके उर में है आनंद समाया।
राज दुलारी पर मन भर आया।
खिला रहे हैं सबको मिठाई,
घर बिटिया ने जनम लिया है।

माता पिता को प्यारी है बिटिया।
सारे जगत से न्यारी है बिटिया।
अब द्वार पर बजेगी शहनाई,
घर बिटिया ने जन्म लिया है।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, March 6, 2022

आँखें चुराना (मुहावरे पर आधारित)



आँखें चुराना

आँखें चुराकर आज तुम, मुझसे किधर चले।
हमको भी साथ ले चलो,जाने तू जिधर चले।

आँखें मिलाकर आँखों को,चुराना न चाहिए,
आंँखे चुराकर आज क्यों, करने सफर चले।

माना कि छोटी भूल से, बिछड़े थे हम कभी,
पर हम आज हैं मिलें,तो तुम उधर चले।

आँखें बिछाए बैठी थी, राहों में मैं तेरी,
अब तुम आये तो यहांँ,बदल कर डगर चले।

आँखें चुराना गैर से लगता है कभी भला,
आँखें चुरा तू मुझसे ,मुझे क्यूं गैर कर चले।

देखो पुरानी यादें अब, दिल में रही मचल,
यादों को अश्क रूप ले,आंँखों को भर चले।

आँखें चुराना छोड़कर,मुझसे नज़र मिला,
आँखों से बात करते थे,अब क्यों मुकर चले।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
  स्वरचित, मौलिक

Saturday, March 5, 2022

शिव नचारी (मगही भाषा)



शिव नचारी ,मगही भाषा

हमर शिवजी के रूप है निराला।
फिर भी हथिन इस जग रखवाला।

सब देवन के सिर में सोने मुकुटबा,
हमर शिव जी के जटा में चंदा
फिर भी हथिनी इ.................

सब देवन के गला में सोना के हरबा,
हमर शिवजी के साँप के माला।
फिर भी हथिनी इ..........

सब देवन के अंग में साल -दुशाला,
हमर शिवजी के बाघ के छाला।
फिर भी हथिन इ..............

सब देवन पियथिन दूध और सरबत,
हमर शिवजी पियथिन विष प्याला।
फिर भी हथिनी इ..........

सब देवन खाथिन फल ओ मेवा,
हमर शिवजी खाथिन भांग हाला।
फिर हथिनी इ..............

सब देवन सुनथिन मृदंग और वीणा,
हमर शिवजी हथिनी डमरू वाला।
फिर भी हथिनी इ................
       
सब देवन के हाथी-घोड़ा सवारी,
हमर शिवजी हथिनी बैल वाला
फिर भी हथिनी इ............

सब देवन के है कोठा-अटारी,
हमर शिवजी के मैड़ैया न ताला।
फिर भी हथिनी इ...........

सब देवन करथिन स्वर्ग में विचरण,
हमर शिवजी घुमथिन मतवाला।
फिर भी हथिनी इ......
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'