Wednesday, April 26, 2023

सरस्वती वंदना (विधाता छंद )

सरस्वती वंदना (विधाता छंद )
शुभ घड़ी आज है माता,करें हम ध्यान औ पूजन।
करूँ विनती हृदय से माँ,सुनो संगीत में गुंजन।

पधारो हंस पर चढ़ कर,तुझे हम सब बुलाते हैं।
लगा कर भाल में टीका, स्फटिक माला चढ़ाते हैं।

बजा दो प्यार की वीणा,यहाँ झंकार तुम कर दो।
सुनो हे स्वेत वसना माँ, हमें तू ज्ञान से भर दो।।

सभी को प्यार तुम से है,शरण तेरे सभी जाते।
चरण तेरे पकड़ कर माँ,सभी जन ज्ञान हैं पाते।

करो सबको सुघड़ माता,रहे ज्ञानी सभी जग में।
रहे कोई अज्ञानी तो,नवाता सिर यहाँ पग में।।

बड़ी ही प्यार से माता, लुटाती भक्त पर ममता।
नहीं करती किसी से छल,सदा मन में भरी समता।

लगाती हो गले सबको,सभी को गोद बैठाती।
सभी अंधेर हर लेती, सुघड़ सबको बना जाती।

विनय तुझसे करूँ अम्बे,सुनो हे शारदे माता।
मिटा दो मूढ़ता जग से,जगत में ज्ञान की दाता।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, April 25, 2023

सुख दुख

सुख दुःख 
यह जीवन सुख-दु:ख का संगम,
                      भाई मत घबराओ। 
दुःख आए तो हँंसकर झेलो,
                  सुख में मत इतराओ।

सुख की चाह तुझे अगर है,
                  सुख सबको देता जा।
इसके बदले में लोगों से,
                 आशीष सदा लेता जा।

सुख और दुःख तो है भाई,
                    पहलू दो जीवन के ।
पीछा करता करवटें बदल,
                  जग के प्राणी जन के।

दिन का उजाला सुख देता,
                   फिर आता है अंधेरा।
काली रात जब कट जाती,
                    आता है नया सवेरा।

वैसे छट जाती दुःख की बदली,                          
                      और सुख आता है।
सुख की चमकीली किरण से,
                  जीवन चमक जाता है।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, April 22, 2023

आधुनिक भारत की शादियांँ

आधुनिक भारत की शादियांँ

शादी एक ऐसा पवित्र और अटूट बंधन है,जो दो लोगों को जोड़ता है,दो परिवारों को मिलाता है,शादी के बाद दो अनजाने लोग साथ- साथ एक अटूट बंधन में बंध कर रहते हैं, साथ-साथ जीते हैं, साथ-साथ खाते-पीते हैं,घर बसाते हैं,परिवार बढ़ाते हैं,रिश्ते निभाते हैं ।ना सिर्फ जीने-मरने की कसमें खाते हैं बल्कि एक- दूसरे की तथा उनके रिश्तेदारों- परिवारों की मान मर्यादा का ख्याल रखते हैं,एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हैं ।आदि काल से ही शादी में कन्यादान के समय कन्या पक्ष के लोग स्वेच्छा से कुछ वस्तुएँ, द्रव्य,बर्तन ,कपड़े आभूषण ,जमीन उपयोग में आने वाले अन्य प्रसाधन इत्यादि कन्या को दान में देते थे। यथा योग्य बारातियों का स्वागत-सत्कार भोजन-आवासन,वस्त्र-आभूषण इत्यादि भेंट स्वरूप देकर विदा करते थे।कालांतर में इन सभी आवश्यक सामानों को सूचीबद्ध कर कन्या पक्ष से इनकी मांँग की जाने लगी।जिसे दान की जगह दहेज के नाम से जाना जाने लगा। फिर दहेज-मांँग की प्रथा का विस्तार सुरसा के मुँह की तरह होने लगा।लोग घर की जरूरत के सभी बेशकीमती सामानों की मांँग करने लगे । लोगों की सोच तो इतनी गिर गई कि वर पक्ष के लोग अपनी बेटियों को दहेज में देने वाले सामानों को भी बड़ी बेशर्मी से मांँग कर लेते हैं। दहेज में कुछ उन्नीस-बीस होने पर बहू को प्रताड़ित करना, अवहेलना करना,यहाँ तक कि जलाकर या किसी अन्य विधि से मार देना इत्यादि भी आज लोगों के लिए आम बात हो गई ।
आधुनिक युग में दहेज के स्वरूप में थोड़ा बदलाव आया । लड़की के माता-पिता के मन में कन्या के विवाह का विचार आते ही वैवाहिक संगठनों के एडमिन का फोन आने लगता है। आंटी आप दीदी की शादी करना चाहती हैं तो मुझे फोटो-बायोडाटा भेजिए।उसके अनुसार मैं लड़के का विवरण भेजूंगी। फिर वह कुछेक  अच्छे लड़के का फोटो दिखाकर पंजीकरण के नाम पर थोक राशि जो हजारों में होती हैं।उसे जमा करने की मांग करने लगते हैं।और पंजीयन की उक्त राशि भेजते ही फोन उठाना बंद कर देते या फिर दूसरे नम्बर और नाम से फिर फोन कर पैसे ठगने का प्रयास करते हैं।इस तरह के  अनेक वैवाहिक समुह कुकुरमुत्ते की तरह उत्पन्न हो अपना मकड़जाल  फैलाकर कन्या पक्ष को जोड़े लगवाने की गारंटी देते हुए धन ऐंठने के प्रयास करते हैं । यहाँ उबर गए और किसी तरह शादी की बात पक्की हो गई तो फिर दहेज नहीं के नाम पर अलग ड्रामा। चुकी आज लड़कियांँ भी जागरूक हो गई पढ़ लिखकर लड़कों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगी।स्वयं अर्थोपार्जन कर घर गृहस्थी चलाने में आर्थिक सहभागिता निभाने लगीं।तो लड़के वालों के विचारों में कुछ  परिवर्तन हुआ । दहेज क्या लेना ? क्यों लेना ? कामकाजी बहू को लाने के समय वह दहेज की मांग नहीं करते हैं किंतु शादी में होने वाले सारे खर्चों को एन-केन- प्रकारेण कन्या पक्ष के कंधों पर ही डाल देते हैं ।जैसे -लड़की के वस्त्र आभूषण और सिंगार सामान तथा उपयोग में लाने वाली सभी वस्तुओं को कन्या पक्ष को ही देना होता है स्वयं बारात जाने के झंझट से बचने के लिए कन्या पक्ष को ही अपने नगर में बुलाकर विवाह करने को मजबूर करना, जिसमें विवाह स्थल भी उन्हीं के द्वारा चयनित होता है ।जो कि उनके निवास के निकट होता है। विवाह स्थल की साज -सज्जा एवं महंगी भोज्य-पदार्थ जो प्लेट- सिस्टम पर आधारित होता है और जिसके कीमत हजारों में होती है। जिसमें कुछ ऐसे प्रकार के व्यंजन भी शामिल होते हैं जिसे सभी लोग नापसंद करते हैं और वह नाहक बर्बाद ही होता है लेकिन व्यंजन की गिनती पूरी करने के लिए रखे जाते हैं ।या फिर आप जितना भी कम खाएँ प्लेट उठाने के दाम लगते हैं।
वर पक्ष द्वारा चालाकी होती है वह अपने इस वैवाहिक पार्टी यानी बहू भोज ( बहू को को आने पर दिए जाने वाले भोज )को भी उनमें शामिल करते हैं क्योंकि खर्च तो कन्या पक्ष की ओर से होता है । इसलिए ऐरे-गैरों को भी उस पार्टी में आमंत्रित कर लेते हैं।बेचारा कन्या पक्ष का पिता 'मरता क्या न करता' की स्थिति में ठगी का शिकार होता है। क्योंकि बारात सैकड़ों में नहीं हजारों में आती है। कुछ राही-बटोही और अनजाने लोग भी भोजन का आनन्द लेते हैं।कौई पहचानने वाला तो होता नहीं है कि वे किस पक्ष से हैं। प्लेट सिस्टम में ज्यादा खर्च होगा यह सोच अन्य के पिता गिने-चुने लोगों को ही आमंत्रित करते हैं। किंतु.........इधर दूल्हे- दुल्हन को सजाने का काम एक ही पार्लर में होता है तथा यहाँ आने वाले लाखों रुपए भी कन्या पक्ष को देय होता है । मिला-जुलाकर आज की शादियों में आजादी से बर्बादी की जाती है।जिसका लाभ वर-कन्या तथा उसके परिवार से ज्यादा दूसरे लोग उठाते।
 आधुनिक रीति- रिवाजों के चक्कर में हम अपनी पारम्परिक रीति रिवाजों को भी भूल जाते हैं। आवश्यकता से अधिक हम दिखावे में धन लुटाते हैं ।
              सुजाता प्रिय समृद्धि
                  रांँची, झारखण्ड

Thursday, April 20, 2023

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया आयी

वैशाख माह के शुक्ल-पक्ष की अक्षय तृतीया आयी।
शुभ तिथि है आज संग में शुभ-सौभाग्य है लायी।

शुभ मुहूर्त है आज'सभी मिल पूजन कर लो।
शुभाशीष पाओ ईश्वर से, अच्छे-अच्छे वर लो।
देखो भगवन विष्णु के संग खड़ी है विष्णु माई।

बड़ी ही पावन तिथि है, पुण्य कार्य भी कर लो।
अच्छे कर्मों से अपने,जीवन का घट भर लो।
अच्छे फल देंगे ईश्वर,जीवन की है यही कमाई ।

चल हम दीन-दुखियों को दान करें कुछ। 
दुखित-पीड़ित का भी कल्याण करें कुछ।
जरूरतमंद लोगों की हम,करते चलें भलाई।

सुख-सौभाग्य का अक्षय पर्व है आया।
रोग-शोक को भी अब,यह दूर भगाया।
रिद्धि सिद्धि खुश होकर देखो सुख 'समृद्धि' लायी।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, April 19, 2023

दो बूंद इश्क (विधाता छंद )

दो बूंद इश्क 
भरी कितनी लबालब है,तुम्हारी इश्क की शीशी।
मगर देते नहीं मुझको,कभी दो बुंद परदेसी।

तुम्हारे इश्क में मैंने,जहां अपना लुटाया है।
मुझे जो प्यार करता था,उसे पल में भुलाया है।

उसी का मान रख लेना,नहीं मुझको दगा देना।
मुझे दो बूंद अभी देना,गले अपने लगा लेना।

यही दो बुंद जीवन भर,रहे साथी सदा मन में।
नहीं कोई गिला तुझसे,नहीं शिकवा किसी क्षण में।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, April 18, 2023

गणेश वंदना (विधाता छंद )

गणेश वंदना (विधाता छंद)

गजानन जी पधारो तुम,हमें बस आस तुम पर है।
अभी आजा हमारे घर, तुझ बिन न शोभता घर है।।

भला किसको बुलाऊंँ मैं,मुझे बस आस है तेरी।
जरा आकर नजर फेरो,करो ना आज तुम देरी।।

लगाकर कूश का आसन,बिठाऊँ आपको उसपर।
नहाकर साफ जल से मैं, सजाकर रेशमी चादर।।

लगाऊंँ भाल पर चंदन,चढ़ाऊँ फूल की माला।
लगाऊंँ भोग लड्डू का,पिलाऊँ दूध का प्याला।।

चरण तेरे पडूँ देवा,जरा मुझ पर दया करना।
अगर पथ में रुकावट हो,सुनो उसको अभी हरना।।

बना दो आज बिगड़ी तुम,मिटा दो क्लेश सब मन की।
पकड़ पतवार हाथों से,उबारो नाव जीवन की।

मुझे आशीष दो इतना,सभी पूरी मनोरथ हो।।
मुझे मंजिल मिले मेरी,रुके कोई नहीं पथ हो।।

 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, April 13, 2023

प्यार की फुहार में

प्यार की फुहार में 

चल रे साथी हम नहाएँ,प्यार की फुहार में।
जिसमें मन निर्मल हो जाए,उस नदी की धार में।
चल रे साथी......................
प्रेम की दरिया बड़ी है,चल लगा लें डुबकियाँ।
मन के सारे मैल धो लें,स्वच्छ मन कर लें यहाँ।
पार कर लें प्रेम दरिया,रुकें नहीं मझधार में।
चल रहे साथी......................
प्यार का गहरा समंदर,प्रीत के गोते लगा।
प्रेम-मोती बीन लें,दुष्प्रेम की सीपी हटा।
प्रीति धागे में पिरो लें,मोतियों को हार में।
चल रहे साथी......................
प्रीति पर्वत से है झरता, प्रेम का निर्झर सदा।
साथ अपने है बहाता,विद्वेष का पतझड़ सदा।
जिसमें कोई छल नहीं है,बह लें उस उद्गार में।
चल रहे साथी......................
प्रीत है एक झील गहरी,जिसके मन में धीर है।
शांत-चित से प्रेम करता,हृदय बड़ा गंभीर है।
झूठ का हलचल नहीं है,सच्चाई जिसके प्यार में।
चल रे साथी...............
                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Tuesday, April 11, 2023

हे माता पटनदेवी (कृपाण घनाक्षरी)

हे माता पटनदेवी ( कृपाण घनाक्षरी )


माता खोलो ना कपाट,
                तेरा भक्त जोहे बाट,
सारे विघ्न माँ दे काट,
                 भक्त खड़े तेरे द्वार।

खड़े भक्त हैं कतार,
                  आस लेकर हजार,
करते तेरी पुकार,
                 संकट से तू उबार।

पटना की महारानी,
                    पटनदेवी भवानी,
तेरी दुनिया दीवानी,
                लाज रख इस बार।

तेरे नाम का नगर,
                किसी को यहाँ न डर,
सब दुख लेती हर,
                  मात कर उपकार।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, April 9, 2023

घड़ा (हरिहरण घनाक्षरी)

घड़ा  (हरिहरण घनाक्षरी )

गीली- मिट्टी गूथकर,
  थोड़ा बालू मिलाकर,
     चाक  पर  रखकर,
        लकुट से घुमाकर ।

हाथ जल लगाकर,
   मिट्टी पर दबाकर,
    घड़ा आप बनाकर,
      सुतली से काटकर,

छाँव तले सुखाकर,
  लकड़ियांँ जलाकर,
    आवे पर पकाकर,
      घर उसे ले जाकर,

प्रातः पानी छानकर,
   रखें घड़े डाल कर,
    ठंडा जल को पीकर, 
        रहें आत्मतुष्ट कर।

सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, April 5, 2023

जय श्रीराम (विधाता छंद )

जय श्री राम राजा की,अयोध्या धाम की जय हो ।
राम का नाम लेने से,जगत का जीव निर्भय हो।।

पिता की आज्ञा पालन को,गए वनवास खुश मन से।
न मन में कोई दुख लाए,न हुए निराश जीवन से।।

किसी के नाम से पहले,राम का नाम तुम लेना।
घड़ी दो-चार तुम लेना,सुबह औ शाम तुम लेना।।

जी मर्यादा का जीवन,पुरुष उत्तम बने जग में।
झेलते कष्ट खुश मन से,गति भी लाते थे पग में।।

दुख जो आए जीवन में,उसे वे दूर करते हैं।
सुख को जल्दी आने को,सदा मजबूर करते हैं।।

जपो मन नाम रामा का,सीता माँ का भी भज लो।
याद कर नाम दोनों का,व दोनों का चरण रज लो।।

   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, April 2, 2023

मुफ्त में सब्जी



मुफ्त में सब्जी

पत्नी बोली सुनो पिया जी!तुमको अकल नहीं है।
मोल-भाव कर सब्जी लेने का,कोई नकल नहीं है।

बिक्रेता जितना दाम बताता है,उतने में तू लेते हो।
अपनी कमाई का मोटा हिस्सा बेकार गवाँं देते हो।

बड़े ही तुम हो सीधे- सादे ,और बड़े हो तुम भोले।
दो रुपए तुम दाम घटाओ,जितना   विक्रेता बोले।

चले पिया जी सब्जी लाने, पाकर पत्नी से शिक्षा।
प्रिया ने जो था पाठ पढ़ाया,देने उसकी परीक्षा।

पत्नी जी की पसन्द की, वे सभी सब्जियाँं लाने।
हर सब्जी के दामों में,लगे दो-दो रुपए घटवाने।

एक बूढ़ी सब्जी वाली, दिखती चेहरे की भोली।
मुट्ठी भर धनिया-पत्ती का, दाम दो रुपए बोली।

पति महोदय हंस बोले,मुफ्त में दो धनिया पत्ती।
 सब्जी वाली के चेहरे पर,साफ दिखी आपत्ति।

आंँखों को नचाकर पूछी,क्या तेरे मुंँह हैं चिकने?
सब्जियांँ दान करने ना रखी, रखी यहां मैं बिकने।

पति महोदय हंँसकर बोले, क्यों गुस्सा करती माई।
दो रुपए दाम घटाने को,प्यारी पत्नी है मुझे सिखाई।

दो रुपए की धनिया पत्ती का, दाम बता क्या होगा?
दो रुपए कम करने पर, यह मुफ्त में ही तो होगा।

सब्जी वाली हँंसकर बोली- सुन मेरा बेटा ! भोला।
उस दिन तुम आकर,यहांँ पर मुफ्त भरना झोला।

जिस दिन सब्जी बेचने बैठेगी,यहाँं तेरी घरवाली।
सब्जियों से भर ले जाना,घर अपना झोला खाली।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'