Sunday, May 31, 2020

शराबी पति से विनती

पिया अब तो नशा तुम छोड़ दो,
तोरे पैयां पड़ूँ बालमा।
तोरे पैयां पड़ूँ तोरे विनती करूँ,
पिया अब तो नशा तुम छोड़ दो,
तोरे पैयां पड़ूँ बालमा।

जब पीते हो सिग्रेट-बीड़ी पिया।
धूँ- धूँ कर जलता है तेरा जिया।
पिया दिल को जलाना छोड़ दो,
तोरे पैयां पड़ूँ बालमा।

जब पीते हो तुम शराब पिया।
तेरा मन हो जाता खराब पिया।
पिया मन को बहकाना छोड़ दो,
तोरे पैयां पड़ूँ बालमा।

तंबाकू भी बड़ा है रोगों का घर।
जानकर क्यों खाते हो ये जहर।
पिया रोगों से मरना छोड़ दो,
तोरे पैयां पड़ूँ बालमा।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, May 25, 2020

रो मत पगली ( लघु कथा)

ए माई कुछ तो खाने को दे।पाँव दुख रहा है।कह बापू के ।मुनियाँ के उतार के हमरा कंधा पर चढ़ा ले।
थोड़ा आउर चल बेटा ! मंगरी बेटे को बहलाती ललकारती हुई पल्लु में बंधी मुढ़ी खाने को देती है।
बेचारा बुधवा अनसुनी किये बेटी को कंधे पर संभालता हुआ सोंच रहा है तीन -चार दिन और चलकर घर-परिवार के बीच पहुँच जाएँगे।अभी चार दिन पहले ही लॉक डाउन से रोजगार छिन जाने के कारण से भूख से व्याकुल हो पत्नी के साथ मौत को गले लगाने का फैसला किया।पर चार बच्चों का मोह ने कोरोना वायरस से सामना करने का हौसला बढ़ाया और चल पड़ा सैकड़ों किलो मीटर दूर पैदल अपने गाँव ।
गाड़ी की तलाश में आगे बढ़ता हुआ बेटा चिल्लाया- माई-बापू जल्दी आ ,एक गाड़ी लगी है।
मंगरी और बुधवा उर्जावान हो गए।दोनो बेटे- बेटी को गोद में उठाकर गाड़ी के निकट पहुँचे। मजदूरों से खचाखच भरी दुर्घटाग्रस्त ट्रक के हृदय विदारक दृश्य देख उनका कलेजा मुँह को आगे गया।
बुधवा के पाँव काँपने लगे,मंगरी दहाड़े मारकर विलाप कर उठी,चारो बच्चे सकते की हालत में दुर्घनाग्रस्त ट्रक को निहार रहे थे ।जैसे ट्रक में लदे सभी घायल और मृतक मजदूर उनके अपने परिवार जन हों।दुर्घटना स्थल के निकट न कोई आवादी थी ना ही आवागमन।यह तो छुपते-छुपाते ईधर कच्चे रास्ते से गुजर रहा था।  शायद नाले का ज्ञान नहीं था सो गाड़ी पलट गया।
अचानक भूखा प्यासा थका-हारा बुधवा में कहाँ से शक्ति का संचार हुआ कि वह अपनी फटी-मैली गमछी को कमर में बाँधकर मंगरी को ढांढस बँधाता हुआ बोला- ' रो मत पगली '।चल हम इन्हें बचाने- निकलने का काम करते हैं।
मंगरी आँसु पोछती हुई बोली।हाँ जरूर बचाएँगे हम।ये भी तो हमारे परिवार हैं।ये भी मजदूर ,हम  भी मजदूर।
बच्चे सहमत हो हाथ बँटाने लगे।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, May 23, 2020

आओ खा लें आज कसम

सागर को साक्षी मान सनम।    
   आओ खा लें आज कसम।                           
    अलग कभी  ना  होंगे हम।
        साथ रहें हम जनम-जनम।

इतने बरस हम साथ रहे।
   सुख-दुख को मिलकर सहे।
      चाहे दुनियाँ कुछ भी कहे।
        जलधारा-सा हम साथ बहे।

आँधी आए या फिर तुफान।
   कोरोना आए या अम्फान।
       खतरे में हो चाहे अब जान।
          आपदाओं से  हों परेशान।

एक-दूजे पर कर विश्वास।
    एक-दूजे से लेकर आस।
       एक-दूजे के रहकर पास।
         साथ-साथ लें अंतिम साँस।
         
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, May 22, 2020

वो मेरी राह तकता है (गजल)

अगर बाहर मैं जाती हूँ,मेरे पीछे वो आता है,
जो रुक जाते कदम मेरे,नहीं पग वह बढ़ाता है।

वो पीछा करता नजरों से,जहाँ मैं दूर जाती हूँ,
जो मैं नजरें उठाती हूँ,नजर ना वह उठाता है ।

न जाने कैसी चाहत है ,मुझसे नजर मिलाने की,
मिलाना चाहूँ जब नजरें,तो वो नजरें चुराता है।

वो मेरी राह तकता है,खड़े होकर क़े राहों मेंं।
नजर आती हूँ जब उसको,तो झट से भाग जाता है।

कभी मन उसका रखने को,मैं जब भी पास जाती हूँ,
निकट आने के बदले में ,चला वह दूर जाता है।

भला ये खेल  नजरों का,चलेगा कब तलक यूं हीं,
ना उसको मैं हरा पाती, ना वो मुझको हराता है।
       सुजाता प्रिय'समृद्धि'

पदचिह्न रेगिस्तान के

बड़े
गहरे
होते हैं
पदचिह्न,
रेगिस्तान
में उभरने वाले ।
हिम्मतवाले होते हैं
बड़े,
सुखे रेत
पर चलने वाले।
यह पदचिह्न सुबूत है
संघर्षशील लोगों का बुलंदी
पर
पहुँचने की।
रेतोंं में धसते
पावों द्वारा अदम्य
साहस ले राहें रचने की।
गहराई
तक उभरने
वाले ये पदचिह्न,
पथप्रदर्शक बन पथ
दिखाती है।और यह रेत
अपनी
छाती पर
इन सुबूतों को
दिखाता है और
चीख-चीखकर कहता है
कि
संघर्षशील
बनो, संघर्षरत रहो
और चलते चलो तब
तलक ,जब तक यह पदचिह्न,
तुम्हें लक्ष्य तक ना पहुँचाये।
                       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, May 17, 2020

गिरफ्तार सबकी जिंदगी

थम गई है अब तो रफ्तार हाय रे जिंदगी।
लॉक डाउन में है गिरफ्तार सबकी जिंदगी।

बाधित हैं सेवाएँ औ बंद अब बाजार हैं।
दरवाजे के अंदर हम रहने को लाचार हैं।
और नहीं है दूसरा हथियार हाय रे जिंदगी।
लॉक डाउन में है गिरफ्तार सबकी जिंदगी।

जाना नहीं विद्यालय, जाना नहीं है दफतर।
मिलना नहीं किसी से रहना है घर के अंदर।
ठप्प पड़े हैं सारे कारोबार हाय रे जिंदगी।
लॉक डाउन में है गिरफ्तार सबकी जिंदगी।

आता नहीं है माली, आता नहीं है मेहतर।
आता नहीं है  नाई,  आता नहीं है नौकर।
साफ करते खुद ही घर-बार हाय रे जिंदगी।
लॉक डाउन में है गिरफ्तार सबकी जिंदगी।

जो जहाँ गया था,आज तक है वहीं फँसा।
पैदल है कोई आया,मजबूर हो कोई बसा।
ढूंढने  गए थे  रोजगार  हाय  रे जिंदगी।
लॉक डाउन में है गिरफ्तार सबकी जिंदगी।
                           सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Saturday, May 16, 2020

नव किसलय से भरा धरातल

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरण फैली है,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटा है।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती का तपन मिटा है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरियाली है मन मन में छाई।
     सुजाता प्रिय

Thursday, May 14, 2020

दूर क्षितिज में

प्रथम रश्मि ले आया सूरज,
    फैलाकर किरणों के तार।
       दूर क्षितिज में फैली लाली,
            स्वर्ण-मंजूषा सा उपहार।

शाम ढली,चंदा मुस्काया,
    अब तो राज हमारा है।
        काली रात के अंधियारे में,
             हमसे ही उजियारा है।

रजनी ने ओढ़े तिमिरांचल,
     सुभग सितारें जड़े हुए।
         नन्हें-नन्हें दीप सरीखे,
             झिलमिल करते सजे हुए।

दूर कहीं है छाया बादल,
      लगता बड़ा सुहाना है।
        झूम-झूम लहराकर हँसता,
            रिमझिम जल बरसाना है।

दूर क्षितिज में उड़ते जाते,
    खग-कुल अपने पंख पसार।
        चहक-चहक कलरव करते हैं,
             पाकर क्षितिज का विस्तार।

असीम क्षितिज का है संदेशा,
    कि यहाँ कोई विराम नहीं है।
        बढ़ना है, बढ़ते जाओ तुम,
            रुकने का अब नाम नहीं है।
     .       
                     सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, May 13, 2020

हाल प्रवासी मजदूरों का

पैसे कमाने की ले आस।
मजदूर परिवार गए प्रवास।

पेट की भूख मिटाने को ।
दो पैसे भीे घर लाने को।

गाँव घर से दूर टाउन में।
फँस गए लॉक डाउन में।

लौट रहे ट्रकों मे लदकर।
बड़े दिनों पर अपने घर।

जान को जोखिम में डाल।
पहुँच रहे वे होकर बेहाल।

पत्नी देखो लटकी है ऊपर।
बच्चा गिरने वाला है भू पर।

साथ में लेकर पूरा परिवार।
बे पैसे के लौट रहे लाचार।

हा-हा कैसा ये गजब हुआ ।
देखते-देखते अजब हुआ।

कहर कोरोना का छा गया।
सबको है दुखी बना गया।
        सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, May 6, 2020

हम चलते जाएँ साथ

हाथ में लेकर हाथ।
हम चलते जाएँ साथ ।

मौसम बड़ा सुहाना है,
हमको घर भी जाना है,
चलो, चलें अब हम-तुम
दोनों करते जाएँ बात।
हम चलते जाएँ साथ।

साथ-साथ चलते जाएँ,
मुश्किल में ना घबराएँ,
हवा का रुख चाहे बदले
हम साथ रहें दिन-रात ।
हम चलते जाएँ साथ।

सदा रहे यह साथ हमारा,
सदा रहे यह जीवन प्यारा,
हँसते जाएँ हम जीवन भर
यही हो बस सौगात ।
हम चलते जाएँ साथ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, May 5, 2020

उठो वीर

उठो वीर तुम अपनी सीमा की ओर बढो़ जवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

सीमा के भीतर रावण कोई आने कभी न पाए ।
आ भी जाए तो वह बचकर,जाने कभी न पाए ।
साहस संचित कर दुश्मन को खदेड़ बढ़ो जवानों।
भारत माँ की रक्षा   करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

तुम ही राम हो,तुम ही लक्ष्मण,सीता के रखवाले।
तुम ही  हो महावीर देश के, लंका  को ढाने वाले।
अयोध्या के सुख-वैभव को तुम छोड़ बढ़ो जवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

हिम्मत मत हारो करते जाओ देश की तुम रखवाली।
विजय पाकर लौटोगे तब, मनाएँगे हम खूब दीवाली।
बम पटाखों-सा दुश्मन सेना पर फोड़ बढ़ो दीवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।
                                   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'