Monday, August 31, 2020

चौपाई

हर-हर-हर भोले त्रिपुरारी।
सब संकट तुम हरो हमारी।

दया करो तुम हे  नागेश्वर।
हे शिव-शंकर, हे परमेश्वर।

आयी  जग में विपदा भारी।
त्रस्त है जिससे दुनिया सारी।

पीकर तूने विष का प्याला।
सारे जग का बने रखवाला।

आज नाथ तू हमें बचा लो।
सारे कष्ट को  दूर भगा दो।

क्षमा करो अपराध हमारा।
भूल-चूक जो भी हो सारा।

    सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, August 28, 2020

अपराध बोध ( संस्मरण )

बात उस समय की है- जब मैं पहली कक्षा में पढ़ती थी।दादाजी अपना कलमदान खोलकर कोई जरूरी कागजात ढूंढ रहे थे। उत्सुकताबस मैं उनके कलमदान से निकलने वाली प्रत्येक वस्तुओं के नाम एवं इस्तेमाल पूछती और दादाजी बताते जाते ।लेकिन कुछ देर बाद दादाजी मेरे प्रश्नों से ऊबने लगे।क्योंकि उन्हें वह कागजात मिल नहीं रहा था। कलमदान से निकालकर बीस पैसा मुझे थमाते हुए बोले जा दुकान से कुछ खरीदकर खा लो।मैं खुश होकर सामने वाली दुकान गई । दुकानदार ने पूछा क्या चाहिए? पर मेरे लिए यह निर्णय कर पाना कठिन था कि क्या लूँ।
मैं दुकान में रखी सामग्रियों को देखने लगी।अचानक मेरी नजर ढेले वाले गुड़ पर पड़ी।मैं झट उधर इशारा कर दी।दुकानदार ने मेरे हाथ से पैसे ली और दोनों हाथों में एक-एक ढेला गुड़ थमा दी।
घर आकर मैं एक ढेला-गुड़ अपनी बहन को दी और स्वयं गुड़ खाने लगी। उसी समय बगल की एक बुआ की नजर हम पर पड़ी और वह मेरी माँ को पुकारती हुई बोली-ये दोनों गुड़ खा रही हैं।
माँ ने कमरे से निकल कर गुस्से से कहा -अभी पीटती हूँ। मैं सोची माँ से बिना पूछे दुकान चली गई इसलिए माँ मुझे पीटेगी।डर से मैं भागती हुई पिताजी के पास पहुँची ।पिताजी बगीचे की सफाई करबा रहे थे। बगीचा मेरे घर से थोड़ी दूर पर था।पिताजी ने कई बार मुझे घर जाने के लिए कहा,पर मैं नहीं गई।तब उन्होंने मुझे अपने पास बैठा लिया।शाम ढल गई ।पिताजी ने कहा क्यों इतनी देर रही ।स्वेटर भी नहीं पहनी।कितनी ठंढ है।उन्होंने अपने सिर पर पहनी मंकी- कैप को मुझे पहना दिया जिससे मेरा पूरा सिर और गर्दन ढक गया।फिर अपना मोटा तौलिया ओढ़ाकर घर ले चले।रास्ते में जितने लोग मुझे देखते पुचकारकर पूछते क्या री बंदरिया? एक चाचा जी ने तो पिता जी से पूछ लिया -इस बंदरिया को कहाँ से पकड़ लाये ।पिताजी मुस्कुरा कर रह जाते और मैं अपना नया नाम सुनकर खुशी से इतराती हुई घर पहुँच गई।माँ को देख अपराधबोध से मेरी नजरें झुक गई।
पिताजी ने माँ से पूछा- इसे मारा था क्या ?यह इतनी देर मेरे पास क्यों रही?
माँ ने कहा -मारी तो नहीं, मारने जा रही थी।
पिताजी ने पूछा-क्यूँ?
माँ बोली- माधुरी बोली कि यह गुड़ लेकर खा रही है। मुझे लगा गणेश-चतुर्थी के लिए गुड़-तिल मंगाई उसे जूठा कर दी ।परन्तु पूजा घर के पास आई तो देखी पूजा घर का दरवाजा बंद है। उसकी सिटकनी इससे खुल ही नहीं सकती।लेकिन तब-तक यह भाग चुकी थी। बाबूजी ने बताया -मैने इसे पैसे दिए थे उसी से गुड़ खरीदकर खा रही होगी।
अब सारी बातें मेरी समझ में आ गईं कि ना  माँ बिना पूछे दुकान जाने के लिए नाराज थी, ना गु़ड़ खाने के लिए और ना ही बाहर जाने के लिए।बस मेरे मन में ही एक अपराध बोध का भय था।आसमान में चाँद लाल आभा के -साथ निकल आया था माँ ने चाँद देखकर गणेश-भगवान का पूजन किया।और प्रसाद बाँटा। मैं खुश होकर खाई और मन में संकल्प की कि माँ से बिना पूछे कुछ भी नहीं करूँगी।यदि मैं माँ से पूछ कर दुकान जाती तो इतनी बातें ही नहीं बढ़ती।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       स्वरचित एवं सच्ची घटना

Thursday, August 27, 2020

उन्मुक्त भाव

उन्मुक्त धरा के सहवासी हों,
                         मन में भाव जगाइए।
हम सब मिलकर इस धरती को,
                          सुंदर सहज बनाइए।
हम सब मिलकर............

हम उन्मुक्त तभी रहेंगे,
                जब भाव हमारे हों उन्मुक्त।
सभी जनों का क्लेश हरें हम,
                   भेद-भाव से होकर मुक्त।
वैर-द्वेष और कलुष रहित हो,
                         ऐसा महल सजाइए।
हम सब मिलकर.......

कभी किसी को दुःख ना दें,
                 किसी का ना अपमान करें।
उन्मुक्त भाव से सब प्राणि का,
                   सदा ही हम सम्मान करें।
प्रेम,दया सब वासी में हो,
                           ऐसा नगर बसाइए।
हम सब मिलकर...........

निर्भय हो हर बाला घूमें,
                     हर बालक निष्पापी हो।
ममता की मूरत हर नारी हो,
                     हर नर अब प्रतापी हो।
प्रेम परस्पर सब लोगों में हो ,
                           ऐसी रीत चलाइए।
हम सब मिलकर...........

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, August 26, 2020

जननी की ललकार

जननी की ललकार

जा जा रे बेटा जा रे जा तू सरहद पर।
देश  की रक्षा करना , चाहे जान जाए।
बोली माँ  कलेजे पर  पत्थर रखकर,
द्वार के भीतर आकर वह आँसू बहाए।

भारत की रक्षा है पहला कर्तव्य तेरा।
निभाकर तू ऊँचा करना मस्तक मेरा।
दूध की लाज रखना,देश को बचाकर,
थीरज धरूँगी जब तू वापस न आए।
जा जा रे बेटा जा रे.................

सीमा सुरक्षा करना तू बंदूक तानकर।
दुश्मनों को मारो,खेल अपनी जान पर।
मेरा प्यारा पूत ,तब ही तू कहलाएगा,
आतंकियों को जब तुम मार गिराये।
जा जा रे बेटा जा रे.................

भारत की धरती को अब कोई न लूटे।
वीरों के रहते माँ की किस्मत ना फूटे।
मैं जननी,जन्मभूमि का तुम रखवाले,
रक्षा की शपथ ले,तू अपनी जान गवाए।
जा जा रे बेटा जा रे...............
           सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, August 25, 2020

गज़ल

दिल में बस जाते हैं

यूँ तो लोग कितने ही,दिल में आते-जाते हैं।
पर , कोई उनमें - सेे , दिल में बस जाते हैं।

दिल एक मंदिर है, जिसमें एक मूरत है।
मन-मंदिर में रखकर,हम उसे  रिझाते हैं।

दिल एक दर्पण है, जिसमें एक सूरत है,
पास जाकर उसके,हम प्रेम-गीत गाते हैं।

दिल एक बगिया है, जिसमें फूल खिलते हैं।
उस फूल की खुशबू को, दिल में बसाते हैं।

दिल एक दरिया है, जिसमें धारें बहती हैं,
उसमें नाव को खे कर, हम पार लगाते है।

दिल एक पंछी है,जो आसमां में उड़ता है।
मन के कोमल पंखो से, नभ चूम जाते हैं।
              सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                स्वरचित मौलिक

Monday, August 24, 2020

एक नजर मुझपर डालकर देखो

मेरे लिए मन में प्यार पालकर देखो,
एक नजर मुझपर डालकर दैखो।

माना कि मैं कोई हूर की परी ना हूँ,
तुम अपने रूप को खंगालकर देखो।

किसी बहकावे में कतराओ ना मुझसे,
अपने दिल में मुझे संभालकर देखो।

मैं बुरी लगती हूँ महफिल में अगर,
दिल में मेरा अक्श डालकर देखो।

क्यूँ इतराते हो खुद पे मीत मेरे तुम,
अपने मन में थोड़ा सवाल कर देखो।

आज तुझसे मेरी यह गुजारिस है कि,
मेरे साथ खुद को भी ढालकर देखो।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
         स्वरचित मौलिक

Saturday, August 22, 2020

मुंडेर की आत्मकथा

मुंडेर की आत्मकथा

हाँ मैं छत की मुंडेर हूँ।
गिरते हुए लोगों की ढाल हूँ।
धीरज रखकर सुनिए,
मैं बताती अपनी हाल हूँ।

गिरने से बचने के लिए ,
लोगों ने है मुझे बनाया।
बचाना मेरा कर्तव्य है,
जिसे मैंने बखुबी निभाया।

लोग अलग-अलग तरीके से
करते हैं मेरा इस्तेमाल।
कपड़े सुखाते हैं सभी लोग
सदा ही मेरे ऊपर डाल।

धोती , साड़ी, चादरें गलीचे,
मुझ पर ही हैं लटकाते।
तकिए,तोसक,कंबल भी,
हैं मुझ पर रखकर सुखाते।

दीवाली की झिलमिल बत्तियाँ
मुझ पर ही हैं सजाते।
दीये और मोमबत्तियाँ भी,
मुझ पर ही रख जलाते।

कौए,गौरैया आदि पक्षि गण,
मुझ पर ही हैं बैठते।
बची-खुची रोटियाँ-चावल,
क्यूँ कि लोग मुझ पर हैं रखते।

मुझ पर ही हाथ रख लोग,
झाँक नीचे का नजारा लेते हैं।
संयोग से फिसल गीर पड़े तो,
इल्जाम मेरे सिर मढ़ते हैं।

कि मुंडेर बहुत नीची है,
इसे और ऊँची होनी चाहिए।
कोई जाने-अनजाने गिरे तो,
मुंडेर को ही बचाना चाहिए।

अब आप ही बताइए जरा,
इसमें क्या है मेरा दोष।
कितनी ऊँची मुंडेर है,
सबको खुद रखना चाहिए होश।
            सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, August 21, 2020

गणपती वंदन

गं  गणपत्यै नमो नमः।
हे गणनायक नमो नमः।

एक दंत हाथी के सूढ़।
विद्वान बने तेरे संग मूढं।
बुद्धि दायक नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः।

सूप सम बड़े-बड़े कान।
भक्त करें तेरा गुणगान।
बिघ्नविनासक नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः ।

तेरा प्यारा लड्डू भोग।
दूर करो तू सबके रोग।
दोष निवारक नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः।

लघु मूषक तेरी सबारी।
ढोता है तेरा  तन भारी।
देव गजानन नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः।

कष्ट हरो मेरा हे लम्बोदर।
कार्तिक के भ्राता सहोदर।
हे कष्ट हारक नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः।

गौरी सुत शंकर के नंदन।
देवों के देव तुझको वंदन।
हे सुख दायक नमो नमः।
गं गणपत्यै नमो नमः।

  सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, August 20, 2020

तीज की साड़ी ( लघु कथा )

हाथ में फलों की थैली लिए महेश अपने घर की ओर बढ़ता आ रहा था।साहब के बीमार बेटे को अस्पताल पहुँचाने जाना पड़ा।वे सभी खुद बहुत परेशान थे तो किस मुँह से उनसे पैसे माँगता।सोंचा था तीज की बात कह पगार पहले ले लेगा।जल्द आकर गौरी के लिए साड़ी और प्रसाद आदि का बंदोबस्त कर देगा।लेकिन आज तो और ज्यादा देर हो गई।पूजा का कोई भी सामान नहीं घर में । बेचारी कैसे करेगी पूजा? मुहल्ले की औरतें जब उसे साड़ी और गहने दिखा रही थी तो वह कितनी लालसा भरी नजरों से देख रही थी।तभी उसने उससे वायदा किया था कि तुम्हें भी तीज में सुंदर साड़ी और पायल ले दुंगा। लेकिन अब क्या समझाएगा उसे।जब से इस महल्ले में आया है थोड़ी परेशानी बढ़ गयी है।क्योंकि यहाँ के लोग पैसे वाले हैं और उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं।वह तो गौरी संतोषी स्वभाव की है , लोगों की परवाह नहीं करती है।वरना उसके दोस्त की पत्नी ने तो अच्छी साड़ी नहीं खरीदे जाने पर तालाब में कूद कर अपनी जान दे दी।कितनी औरतें तो दिखाबा के लिए कपड़े गहने नहीं लाने पर घर में कोहराम मचा देती हैं।
     मन मसोसते हुए वह घर पहुँच गया तो उसकीे इंतजार में खड़ी गौरी को सुहाग के जोड़े में सजी-सँवरी देख दंग रह गया।इस जोड़े में गौरी सात वर्ष पहले की नवेली दुल्हन लग रही थी।
वह लज्जित स्वर में बोला- क्या करूँ पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया साहब का बेटा बीमार हो गया पैसे माँगने में अच्छा नहीं लगा।
गौरी हँसती हुई बोलीे- कोई बात नहीं।तुम नाहक परेशान हो रहे हो।मैने शादी का पवित्र जोड़ा पहन लिया। यही साड़ी मेरे लिए तीज की सबसे अच्छी साड़ी है। थोड़े न पुरानी साड़ी पहनने पर भगवान मेरी पूजा नहीं स्वीकार करेंगे।तुम चिंता ना करो मेरे पास कुछ बचे हुए पैसे थे।उससे बतासे और घी धूप इत्यादि ले आई।बच्चे फूल वेलपत्र ले आये।बाजार दूर था इसलिए फल लाने नहीं गई।
लो मैं फल ले आया हूँ।महेश ने खीरे और सेब की थैली बढ़ाते हुए कहा।
गौरी ने खुश होते हुए कहा- इतनी परेशानी मैं भी तुम्हें मेरा ख्याल था।इसीलिए तो कहती हूँ। तुम्हीं मेरे शंकर हो।बच्चों को देखना मैं पूजा करने जाती हूँ।कहती हुई वह पूजा पाण्डाल की ओर बढ़ चली। साथ-साथ वह भी बाहर आया।पूजा कर रही औरतें ने जब उसे देखा तो पूछा क्यों री गौरी तीज के लिए नई साड़ी नहीं खरीदी।
नहीं मेरे यहाँ शादी की साड़ी ही तीज में पहनी जाती है।महेश समझ गया गौरी ने उसकी इज्जत रखने के लिए ऐसा कहा। पिछली तीज में तो नई साड़ी खरीदी ही थी।मन-ही मन बोला मेरी गौरी तू भी साक्षात गौरी हो।
             सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, August 19, 2020

सज-धज कर बोली दुल्हनियाँ

पहनकर बैठी लाल चुनरिया
          और लाल रंग की चोली।
पास मेरे तू आजा साजन,
               नव दुल्हनियाँ बोली।

माँग सिंदूर,माथे पर बिंदी,
              और होठों पर लाली।
कलाई की यह लाल चूड़ियाँ,
             खनक रही मतवाली।

माँग में टीका नाक में नथिया,
             और कानों में झुमके।
गले में हार हाथभरी अँगूठियाँ,
            कंगने संग मारे ठुमके।

मेंहदी हाथ की ओट बालम,
           देखना चाहूँ मैं तुझको।
झुकी-झुकी पलकें ना उठती,
        प्रिय लाज आती मुझको।

      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, August 15, 2020

काम का दबाव और आत्महत्या.( आलेख )

आधुनिक युग की आपाधापी भरे जीवन में काम का दबाव कमो-बेस सभी जनों पर रहता है।चाहे वे गृहिणियाँ हो या कार्यालय या अन्य स्थान पर कार्यरत महिला- पुरुष।चाहे कृषक हों या मजदूर । शिक्षक हों या लेखक और समीक्षक । या फिर नेता -अभिनेता।काम तो सभी को करना पड़ता है। कोई इसे साधारण क्रियाकलाप समझ व्यवहारिक रूप में अपना कर्तव्य समझकर हौसला के साथ करता है,कोई इसे बोझ और दबाव समझ नाहक मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार होता है। कर्म ही जीव की सच्ची साधना है।कर्म बिना जीवन बेकार है।जो व्यक्ति काम से जी चुराता है वह जीवन पथ पर आगे बढ़ नहीं पाता।स्वयं का और दूसरे का भी नुकसान करता है ।कर्म से मुँह मोड़कर आप कर्म से छुटकारा नहीं पा सकते ।हर जीव अपनी क्षमता और जरूरत के अनुसार कर्म करते हैं। पशु-पक्षि एवं कीट-पतंग भी बिना कर्म किए नहीं जीते।उन्हें भी अपनी आवश्यकता के लिए,अावास एवं भोजन के लिए काम करना ही पड़ता है।हाँ अस्वस्थता या किसी प्रकार की परेशानी- लाचारी के कारण काम करने में असमर्थ हैं तो माफी या अवकाश माँगकर बच सकते हैं ना कि जान गवाँकर।काम के दबाव के कारण आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देना किसी दृष्टिकोण से सही नहीं है ।आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।आत्महत्या करने वाले अपने पीछे अपने हितैषियों एवं परिजनोंं के लिए विकट परिस्थिकियाँ तथा अनेकानेक प्रश्नों को उत्पन्न कर दुःख और संकट में डाल देते हैं।यदि काम का दबाव रहने पर काम को छोड़ कर बैठ जाते तो परिवार की देखभाल तो करते।सच कहें तो हत्या पाप है तो आत्महत्या महापाप है।
          सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                 स्वरचित

Friday, August 14, 2020

हम भारत की बेटियाँ

हम भारत की बेटियाँ हैं , इसका मान  बढ़ाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम,हँसकर प्राण गवाँएगें।

कोई भारत माँ पर अपनी,बुरी नजर अब डालेगा।
इसकी धरती पर कब्जे की मन में सपने पालेगा।
हम संहार के लिए खड्ग ले रणचण्डी बन जायेंगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवांएगे।

अब किसी की गुलामी, हमको है स्वीकार नहीं।
मेरी पावन धरती पर,किसी का है अधिकार नहीं।
अपनी जौहर की ज्वाला में दुश्मन को जलाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवाँएगें।

सीमा की रक्षा की खातिर,हम प्रहरी बन जाएगें।
अपने घर के वीरों को भी,अपने साथ लगाएँगे।
हम चुड़ावत की हाड़ा बन,मुण्डमाल बन जाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवाँंएगे।
          सुजाता प्रिय'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, August 13, 2020

बादल की शोभा

घने बादल की शोभा अपार देखो।
सारे  नभ में है छाई  बहार  देखो।

धूमकेतु - से काले - काले बादल।
लगे तरुणी के आँखों का काजल।
कर लिया है  सोलह शृंगार देखो ।
सारे नभ  में है छाई  बहार देखो।

कभी  इधर -  उधर दौड़ लगाए।
हवा के झोंकों के संग उड़ जाए।
पवन रथ पर होकर सँबार देखो।
सारे नभ में है छाई  बहार देखो।

कभी गड़-गड़,गड़-गड़ गरजे।
कभी पानी की बुंदें बन बरसे।
छाई चारो दिशा में बहार देखो।
सारे नभ में है छाई बहार देखो।

कभी चंदा  की ओट ले  झाँके।
कभी झिलमिल तारों को ताके।
दिखता है सूरज के  पार देखो।
सारे नभ में है छाई बहार देखो।

       सुजाता प्रिय'समृद्धि'
  स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, August 12, 2020

माँ-बाप की हालत खस्ता

चाहे टूट जाए रीढ़ की हड्डी।
लाद चलूँ मैं नोटों की गड्डी।

मासिक फीस भी है भरना।
वार्षिक नामांकन करवाना।

दैनिक वेष है जरूरी लेना।
हाउस- ड्रेस मजबूरी लेना ।

जूते सफेद और काले लेने।
बेल्ट - टाई और मोजे लेने।

वाहन-शुल्क भी हमें देना है।
कार्यक्रम -शुल्क भी देना है।

किताबें भारी - भारी है लेनी।
कॉपियाँ बहुत सारी  है लेनी।

ड्राईंग की कॉपी भी लेनी है।
कलर पेंसिल कूची  लेनी है।

ढोना  है हमको भारी बस्ता।
माँ-बाप की है हालत खस्ता।

       सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Tuesday, August 11, 2020

श्रीकृष्ण जन्म लीला

लिए जनम मुरारी,जग हितकारी,
बिलख उठी महतारी।
जब पता चलेगा,इसे मारेगा,
कंस है अत्याचारी।

भए प्रकट कृपाला,दीन दयाला,
गूढ़ बात समझाये।
मुझको लेकर,पहुँचा दें नन्द घर,
उनकी कन्या ले आएँ।

खुल गए ताले,सो गए रखवाले,
टूट गई उनकी बेड़ी।
रात अँधियारी , हुई उजियारी,
छाई घटा घनेरी।

उन्हें सूप में लेकर, रख माथे पर,
वसुदेव चले वृंदावन।
उफनायी यमुना, छूने को चरणा,
बालकृष्ण के पग पावन।

बादल गरजे , झम-झम बरसे,
शेषनाग सिर छत्र धरे।
लक्ष्मण-रघुराई, मिले दोउ भाई,
पुलकित चित आनन्द भरे।

गोकुल के नन्द ,घर में आनन्द,
कान्हा जी हैं जनम लिए।
कन्या को लेकर , पहुँचे तत्पर,
रखवाले सब जाग गए

कंस जब जाना,जनमी कन्या,
लगा पटकने हाथ पकड़।
हाथ से छुटकर ,नभ में उड़कर,
महामाया का रूप धर।

बोली रे कंस, सुन देवकी का अंस
पहुँच गया वृंदावन में।
सुन रे दुराचारी,तुझ पर वह भारी,
सोंच जरा अपने मन में।

यह प्रभु की लीला,परम सुशीला,
जो जन आनंद से गाबे।
दुख न सताबे ,सब सुख आबे,
निश्चित ही सुफल पाबे।

        सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 9, 2020

जीया सब बिहार के लाला

बिहार धरती दिवस पर साईकिल यात्रा कर धरती पर पौधा रोपण करने वाले सभी भाईयों को समर्पित।

जीया सब बिहार के लाला

जीया सब बिहार के लाला।
जीया हो सब हजार साला।
सगरो घूम-घूम के,
सभे झूम-झूम के।
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

आज बिहार घरती दिवस है,
सबके तू बताबा।
स्वच्छ बनाबे धरती अपन,
सब मिलके समझाबा।
जने मिलै कौनो बंजर धरती
हरियाली तू फैलाबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

साईकिल यात्रा तोहर बड़ी निराली,
पेट्रोल जले ना डीजल।
ना दुर्गंध ना धूआँ उगले,
झटपट मारा पैंडल।
साईकिल यात्रा के फयदा ,
सबके बताबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

कटौना,दाबिल,गरसंडा में तू
अनगिनत पौध लगैला।
नगदेवा,लभैत,टुंबा पहाड़ पर भी,
हरियाली फैलैला।
धरती के सगरे मरुभूमि के हरियर, बनाबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

अब पेड़ लगाके पर्यावरण,
बचाबा हो भैया!

        सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, August 8, 2020

अहिंसा परमों धर्मः ( लघु कथा )

भगवान बुद्ध गृह त्याग चुके थे।संसार के प्राणियों के दुःखों का कारण व उसका निदान ढुंढते हुए एक उपवन में जा बैठे।निकट गाँव के लोगों ने उन्हें देखा तो गाँव के लोगों की खुशहाली एवं सुखी जीवन की कामना के लिए अपने द्वारा किए जा रहे सामुहिक पूजा में उन्हें आमंत्रित किया ।
भगवान बुद्ध ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया।निश्चित समय पर वे पूजा स्थल पर उपस्थित हो गए।सभी ने आकर उनका स्वागत-सत्कार किया और ऊँचे स्थान पर बैठाया।
वहाँ के लोगों के सहयोग एवं शांति पूर्ण व्यवहार से वे बड़े प्रभावित हुए।उन्होंने देखा हवन-कुण्ड के चारो ओर केले तथा अन्य बृक्षों को काटकर सुंदर और आकर्षक तोरणद्वार बनाकर मनमोहक सजावट किया गया है।एक ओर बहुत सारे लोग पंक्तिबद्ध खड़े हैं।
बुद्ध ने पूछा-क्या वे प्रसाद ग्रहण करने के लिए वहाँ खड़े हैं?
वहाँ खड़े पुजारीजी ने बताया- वे बलि दिलबाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
बुद्ध ने पूछा- ये किन की बलि देंगे।
पुजारीजी ने एक ओर लकड़ियों और रस्सियों से बने बाड़े की ओर दिखाते हुए कहा- उन जानवरों तथा पक्षियों की।
भगवान बुद्ध ने देखा,बाड़े में गाय, भैंस ,भेड़ ,बकरे,कबूत्तर इत्यादि पशु-पक्षी बँथे थे।
बुद्ध ने पूछा- इन पशु-पक्षियों की बलि देने से तुमलोग को क्या मिलेगा।
पुजारी जी ने खुश होते हुए कहा-यह हमारा धर्म है।
भगवान बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले- यही तो हम मानवों की भूल है।हम एक प्रबुद्ध और श्रेष्ठ प्राणि होकर भी अन्य जीवों के प्रति हिंसा का भाव रखते हैं।हिंसा किसी भी स्थिति में मानवों का धर्म नहीं हो सकता।आपलोगों के आत्मीय भावों को देख मैं बहुत प्रसन्न हुआ।लेकिन किसी ने यह सोंचा है कि जगह-जगह पूर्ण बृक्षों को काटकर जो सजावट की गई है इससे प्राकृतिक वनस्पत्तियों की कितनी हानि होगी ?यह कौन- सा धर्म है, कैसी पूजा है ? इस प्रकार सभी जीव-जन्तु एवं पेड़ -पौधे नष्ट हो जाएँगे। जो मानव किसी अन्य बेवस लाचार और निरीह प्राणियों के प्रति हिंसा का भाव रखते हैं, वे अन्य मानवों तथा परिवार-रिस्तेदार के प्रति भी हिंसक हो सकते हैं।इसलिए आप लोगों  जिस प्रकार मानवों के साथ मित्रवत एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखते हैं,उसी प्रकार सभी जीवों के प्रति प्रेम और दया का भाव रखें।बलि देने से आपका जीवन कभी भी सुखमय नहीं हो सकता।आपका जीवन सुखमय हो सकता है अहिंसा को अपनाने से।'अहिंसा ही हम मानवों का परम धर्म है। हिंसा नहीं।'
पुजारीजी ने उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया।
भगवान बुद्ध ने देखा- सभी लोग बाड़े में बँधे पशु-पक्षियों को बंधन- मुक्त कर रहे थे।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 2, 2020

दोस्ती का रिस्ता

हर  रिस्ते से प्यारा , है दोस्ती का रिस्ता।
सच्चा है वही साथी ,जो करता है मित्रता।

ना जन्म औ जाति हो,ना धर्म का हो बंधन।
जब दोस्त बने कोई , तो देखते केवल  मन।
वही इसको निभाता है,जो जाने इसकी महता ।
सच्चा वह...................

गिरने से पहले जो , थाम ले  हाथों को।
दुःख दर्द जो हर लेता,समझे जज्वातों को।
भटकने से पहले ही ,जो राह है दिखलाता।
सच्चा वह..........

सारे सुख - दुःख को जो , बाँट ले जीवन के।
व्याकुलता प्रसन्नता जो समझता अन्तर्मन के।
अपने सब  मित्रों का जो साथ है निभाता ।
सच्चा वह..............
         सुजाता प्रिय'समृद्धि'