Friday, September 30, 2022

पंचम देवी स्कंदमाता



पंचम देवी स्कंदमाता

सृष्टि की रचनाकर आओ हे स्कंदमाता।
नमन बारम्बार तुम्हें कार्तिकेय की माता।

तुम ही हो माँ बल-बुद्धि- विद्या स्मृति।
तेरे ही आशीष से माता,हम पाते हैं कीर्ति।

तुमसे समस्त सृष्टि में माँ आती है गति।
तेरी कृपा से ही पाते हैं हम मूढ़ सुमति।

तुम ही श्रद्धा तुम ही हो माता परम दयालु।
अपने भक्तों पर माता रहती तुम कृपालु।

तुम ही क्षमा तुम हो क्षुधा- तृष्णा- सज्जा।
तुम ही श्रद्धा -सुधा,रखती जन की लज्जा।

तुम ही में संसार समाया ,तुम ही से है शक्ति।
तुम्हारी पूजा सब जन करते मन में रख भक्ति।

तेरे मुखड़े पर शोभित है मातृत्व की कांति। 
उद्वेलित मन में तुम लाती हो माता शांति।

संसार की रानी तुम ही,हे जय जगदंबा माता।
तेरा आलोक सभी जनों को है राह दिखाता।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
जय माँ अम्बे,जय जगदम्बे,🙏🙏

Thursday, September 29, 2022

चतुर्थ देवी कूष्माण्डा माता

कुष्मांडा माता (कविता)
अष्ट भुजाओं वाली कुष्मांडा माता!
तेरी जय हो, जय हो, जय हो। 
करती है तुम सिंह सवारी माता!
तेरी जय हो,जय हो,जय हो।

चतुर्थ रूप यह तेरा मैया सब लोगों को है भाए। 
मुख मंडल पर दिव्य आलोक सदा ही सुख पहुंचाए।
उत्साह उमंग भरने वाली माता !
तेरी जय हो,जय हो, जय हो।

हाथों मैं है धनुष,बाण और गदा, चक्र।
कमंडल, कलश,कमल-पुष्प माला प्रवर। 
सबको देती वरदान तू माता ! 
तेरी जय हो,जय हो,जय हो।

विविध प्रकार फल भोग लगाएंँ हे कुष्मांडा माता।
शुद्ध मन से करें आराधना तुम ही हो सुख दाता।
मनोवांछित फल प्रदान तू करती माता।
तेरी जय हो,जय हो,जय हो ।

भक्त जनों पर सदा ही तेरी रहती कृपा दृष्टि।
तुम ही हो माँ जगत जननी रचने वाली सृष्टि।
तुम संसार चक्र चला जग प्रकाशित करती माता।
तेरी जय हो,जय हो,जय हो।

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 27, 2022

माँ चंद्रघंटा (कृपाण घनाक्षरी)

मांँ चंद्रघंटा (कृपाण घनाक्षरी )

बात बहुत है गूढ़,
     पक्षिप्रवर गरूड़,
         पर होकर आरूढ़,
             माँ चंद्रघंटा घूमतीं।

आतीं हैं घर आँगन,
      देतीं हैं सुख-साधन,
            आपदा का निवारण,
                 दुःख सभी का सुनतीं।

करें हम आराधना,
      त्रि दिवस उपासना,
         शक्ति रूप की साधना,
               हो प्रसन्न माँ झूमती।

आद्याशक्ति दुर्गा माता,
      जग भर में विख्याता,
             शक्ति-संपत्ति दाता,
                 भक्तों को न भूलती।

               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

जय मैया चंद्रघंटा

जय मैया चंद्रघंटा

भैया चंद्रघंटा का रूप,तेरी महिमा अगम अनूप।
चाहे रंक धनी या भूप,सबको भाए तेरा रूप।
मैया चंद्रघंटा..........
पक्षिप्रवर गरूड़ पर आरूढ़ जग में विचरण करती।
उग्र कोप और रौद्र रूप में सबका चिंतन करती।
अपने भक्तों के अनुरूप,सबको भाये तेरा रूप।
मैया चंद्रघंटा.............
त्रिशूल गदा तुम हाथ में लेकर सबकी रक्षा करती।
जल में ठंडक,आग में गर्मी,तुम ही माता भरती।
विभिन्न रुप में शक्तिरूप,सबको भाये तेरा रूप।
मैया चंद्रघंटा..........
मुझ पर भी तुम दया करो मां,मैं भी तेरी बिटिया।
कभी तो मेरी सुध- बुध लेने, आओ मेरी कुटिया। 
तुम हो ममता का स्वरुप,सबको भाये तेरा रूप।
मैया चंद्रघंटा .................
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                    स्वरचित

द्वितीय माता ब्रह्मचारिणी (हाइकु)

माँ ब्रह्मचारिणी (हाइकु)

   ब्रह्मचारिणी 
माँं धारण करती 
   नथ-कुण्डल।

    कर कमलों
में अक्ष माला और
   है कमण्डल।

   वेद-पुराण 
उपनिषद  और 
 सभी ग्रंथों में।

   माँं की महिमा 
का विवरण लिखा 
   सब संतों ने।

 शक्ति-सृष्टि की 
मूल नाड़ी-चेतना 
   सर्वव्यापी है।

  दुर्गा माता की 
उपासना प्राचीन 
  व अनादि है।

   महाशक्ति मांँ
परमात्मा रूप में 
  अति सुशीला।

   विभिन्न रुप 
धर कर हैं करती 
  विविध लीला।

 मांँ आदिशक्ति 
परम  महाशक्ति 
  हैं दया शक्ति।

  ब्रह्म रूप में 
विचरण  करती 
 हैं माया शक्ति।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, September 26, 2022

मैया शैलपुत्री (मगही भाषा)

मैया शैलपुत्री (मगही भाषा)

हे शैलपुत्री मैयाजी तोहर महिमा अपरम्पार।
भक्तन के भीड़ देखा मैया,लगल है तोहर द्वार।

आधा चंदा के माथा पर तू धारण कैली मैया।
भोला बाबा ऐसन वृषभ सवारी तू कैली मैया।
शूल धारिणी मैया तोहर रूप के सभे निहार।
भक्तन के भीड़ देखा.............
अखिल व्रह्माण्ड के उत्पन्न तू ही कैली मैया।
चराचर जगत के पालन करे वाली तू ही मैया।
आदि शक्ति दुर्गा मैया, रूप में बड़ी निखार।
भक्तन के भीड़ देखा............
लक्ष्मी-सरस्वती,राधा-सीता,सब है तोहर रूप।
महामाया-माया, प्रकृति विद्या-अविद्या,आदि-अनूप।
जगदीश्वरी, महेश्वरी, परमेश्वरी नाम तिहार।
भक्तन के भीड़ देखा..........
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, September 25, 2022

बेटियांँ (दोहे)


बेटियाँ (दोहे )

बेटियों से दुर्भावना, क्यों करते हैं लोग।
जन्म लेते ही बेटियांँ,लगती कोईर्रट रोग।

बेटी रखती मान है, दोनों कुल-परिवार।
जग वालों को बेटियांँ, फिर लगती क्यूँ भार।

बेटियांँ भी होती है,मात-पिता का अंश।
फिर बेटी को देखकर, क्यों है मारे दंश।।

क्यों बेटी को देखकर, चुभता मन में शूल।
बेटी तो परिवार की, होती कोमल फ़ूल।।

बेटी लक्ष्मी -शारदा, दुर्गा की अवतार।
पढ़-लिख देखो बेटियांँ,कर रहीं रोजगार।।

बेटियाँ भी होती हैं,अपनी ही संतान।
उसको भी हमने जना, दिया  न कोई दान।।

पढ़ा लिखा काबिल बना,दो इसको सम्मान।
बिटिया हमको है दिया, ईश्वर ने वरदान ।।

बेटियों के विवाह में,लेते लोग दहेज।
बेटी पा न खुश रहते,रखते नहीं सहेज।।

बेटी को ना मानिए,कभी मही पर भार।
बेटी से घर शोभता, शोभित है संसार।।

बेटियों से होते हैं,जीवन का कल्याण।
कल की जननी है सुता,तू बात हमारी मान।।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, September 22, 2022

शांति की राह

शांति की राह

आशा का दीप जलाना है,
मानवता का पाठ पढ़ाना है।
जन को जन से मिल्लत हेतु,
शांति की राह बनाना है।

हम रहें आपस में मिल कर,
ना झगडे़ और फसाद करें।
झूठी अकड़ दिखाने को,
ना अपना धन बर्बाद करें।
जो अज्ञानी और बुजदिल हैं,
उन सबको यह समझाना है।
जन को जन से............
हम शांति से विचार करें,
हर प्राणी का अधिकार यहांँ।
हम करें नहीं अधिकार हनन,
हमें करना है उपकार यहाँ।
वे जन होते हैं महान बहुत,
जिन्होंने यह प्रण ठाना है।
जन को जन से..........
आपस के सारे झगड़े को,
हमको करना है निपटारा।
हम मिलकर ऐसा न्याय करें,
रहे ना कोई जन बेचारा।
हर मानव का सम्मान रहे,
हमें समता को अपनाना है।
जन को जन से..........

सजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 21, 2022

शिकायत



विषय -     शिकायत

किससे करूँ शिकायत,
             क्यूँ कर करूँ शिकायत।
शिकायत नहीं है करना, 
                मिलती रही हिदायत।

शिकायत तुझे है जिससे,
                वह कर्म ना करो तुम।
खुद को सुधारने का,
              यह मर्म चित धरो तुम।
शिकायत किसी की करना, 
              है आदत बुरी निहायत।
शिकायत नहीं है करना,
                मिलती रही हिदायत।

शिकायतों के कारण,
               जन ! जन से दूर होते।
अपनी बनाई गरिमा, 
              इज्ज़त भी आप खोते।
शिकायत अपनी सुन जन,
                करते  नहीं  रियायत।
शिकायत नहीं है करना, 
                मिलती रही हिदायत।

               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, September 19, 2022

इंद्रधनुष

इंद्रधनुष

इंद्रधनुष है छाया,
    मन में उमंग लाया,
       सबका मन लुभाया,
              देख रहे लोग हैं।

सात रंग हैं इसके,
    लोग दीवाने जिसके,
       थोड़ी देर में खिसके,
              ये कैसा संयोग है।

जीवन में हुलास है,
     मन में यही आस है,
          जीवन रंग पास है,
              मिटे शोक-रोग है।

जीवन में सात रंग,
     चल रहा संग-संग,
         भर जाएगा उमंग,
               सुंदर ये भोग है।

          सुजाता प्रिय समृद्धि

पितरों का आशीष

पितरों का आशीष (मनहरण घनाक्षरी )

पितृपक्ष चल रहा,
    दिन-दिन टल रहा,
       समय निकल रहा, 
          तर्पण तो कीजिए।

कीजिए आप तर्पण,
    पितरों को दे अर्पण,
       फल-फूल समर्पण,
           प्रसन्न हो कीजिए।

तृप्त हो पितृलोक,
    मिटाते हैं रोग-शोक,
       बढ़ा जीवन आलोक,
           श्रद्धा भाव दीजिए।

होकर अति प्रसन्न,
    पितर मन-ही-मन,
        देते अन्न-धन-जन,
          आशीष तो लीजिए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, September 18, 2022

हिन्दी कविता (सायली छंद )

हिन्दी कविता ( सायली छंद )

     हिन्दी              हिन्दी
की कविताएंँ       कविता में 
बहुत सरल है    मधूरता का है 
समझना भी       अद्भुत रस
   आसान              शृंगार 

     सरल              ‌     इसी 
    रूप   के             कारण से
कारण ही इसको   कविता प्रेमी हैं 
   मिलता है           करते इससे 
    सम्मान ।              प्यार।

        हर                 हिन्दी
   कविता के          की कविता
अलग-अलग हैं   सम्पूर्ण जगत में 
    सदा होते         रखती अपनी
       रूप।                 शान।

        छंदों                हिन्दी 
     में चौपाई          की कविता 
दोहे-सोरठा-रोला  साहित्य क्षेत्र में 
    इसके रूप           रखती है 
       अनूप।             पहचान।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 16, 2022

पाती ढाई आखर की

पाती ढाई आखर की

ढाई आखर की पाती लिखकर,
            भेजूँ तुझको ओ हरजाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

इस ढाई आखर में छिपे हैं,
          जाने कितने कोमल भाव।
तेरे मन में मोल न इसका,
          भूल गए तुम खाकर ताव।
व्याकुल मन ये तड़प रहा है,      
              डस रही है यह तन्हाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

बहुत पढ़ें तुम पोथी-पुस्तक,
              पढ़ें ना ढाई आखर को।
गागर का तुम मोल न जाने,
                 ढूंढ रहे हो सागर को।
निज विरह में तड़पाते हो,
          तूने यह कैसी प्रीत लगाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

ढाई आखर में समाया,
           प्रेम,प्रीत और प्यार सुनो।
ढाई आखर में समाया,
             जीवों का व्यवहार सुनो।
देख हुआ व्याकुल मन मेरा,
     चंचल चितवन ने ली अंगड़ाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आशा का दीप जलाए रखना

आशा का दीप जलाए रखना

मन में विश्वास जगाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

माना तुझे असफलता मिली है।
जो तुम चाहे वो गुल ना खिली है।
मन का प्रसून खिलाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

विफलता भी तो होती वरदान है।
सफलता की राह करती प्रदान है।
मन के कोने को सजाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

आशा  जीवन का एक अंग है।
जीवन भर आशा चलती संग है।
हृदय में यह बात बसाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

अंत समय तक आस न खोना।
शायद लिखा हो सफल होना।
अंत तक आस लगाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, September 15, 2022

शिव दोहे



शिव ( दोहे )

शिव देवों के देव हैं, चरणों में प्रणाम।
हर-हर,शिव-शिव बोल ततू,जपते जाओ नाम।।

सबका ये संकट हरे,सब के पालनहार।
जग वालों पर हैं सदा, करते वे उपकार।।

मस्तक पर है चंद्रमा,जटा गंग की धार।
बाघम्बर ओढ़े वदन,गले सर्प की हार।।

एक हाथ त्रिशूल है, कमण्डल दूजे हाथ।
नत्मस्तक होकर सदा, भक्त झुकाते माथ।।

मंदिरों में विराजते, गौरी मांँ के संग।
सारा जग हैं घूमते,चढ़ बसहा के अंग।।

खाते सदा भांग चबा, लगाते हैं विभूत।
कार्तिक और गणपति हैं, दोनों इनके पूत।।

नंदी जिनके साथ हैं, भक्ति भाव के रूप।
मिले न ऐसा भक्त कभी,अनुपम रूप -अनूप।

शिव के कर में शोभता,सोने का त्रिशूल।
शिव शंकर संहारक हैं,यह मानव की भूल।

आपकी ज्योति पुंज से,जगमग है संसार।
ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, महिमा  अपरम्पार।

इनके चरणों में सभी,सदा नवाओ माथ।
रहते अपने भक्त के,हर पल शंकर साथ।।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 14, 2022

मेरे इस नन्हें से दिल को

मेरे इस नन्हें से दिल को 

साजन तूने खूब सताया, मेरे इस नन्हें से दिल को।।
कैसा है तू समझ न पाया,मेरे इस नन्हें से दिल को।।

विरह में तेरे तड़प रहा है,होकर कितना व्याकुल।
तुझसे दूर न रह पाएगा,कहता है होकर आकुल।
ओ निर्मोही!खूब तड़पाया,मेरे इस नन्हें से दिल को।।

तड़पाना ही तुझे अगर था,फिर क्यों प्रीत लगाए ?
सोया था यह करवट लेकर,क्यों कर इसे जगाए ?
ना जाने तुम क्यों भाये थे,मेरे इस नन्हें से दिल को।।

संग ना रख पाया पल भर,तन्हा इसको छोड़ें क्यों?
प्यार में तेरे दीवाना था,टुकड़े- टुकड़े तोड़े क्यों?
इधर-उधर क्यों कर बिखराया,मेरे इस नन्हें से दिल को?

दिल मेरा इक छोटा पंछी,इत-उत थोड़ा उड़ता था।
अभी फुदकना ही सीखा था,ना कहीं वह मुड़ता था।
क्यों फांँसने को जाल बिछाया,मेरे इस नन्हें से दिल को ?

दाना डाला था इसे दिखाकर,गया बेचारा लालच में।
दो-चार दाने ही चुग पाया,फँसा जाल के आनन में।
धोखे देकर तूने फँसाया,मेरे इस नन्हें से दिल को।।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

हिन्दी (कृपाण घनाक्षरी)

हिन्दी (कृपाण घनाक्षरी )

हिन्दी हमारी शान है।
देश की पहचान है।
इसी से अभिमान है।
इसे मान बढ़ाइए।

हम हिन्दी में बोलते।
बोली में मिश्री घोलते।
हर भाषा से तोलते।
हिन्दी को अपनाइए।

सभी जनों को भाती है।
समझ जल्दी आती है।
नयी उमंग लाती है।
इसे मन बसाइए।

सब भाषा में प्यारी है।
लगती कैसी न्यारी है।
जैसे फूलों की क्यारी है।
बात तो मान जाइए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 9, 2022

गुरु (दोहे)

गुरुजी देते हैं हमें, विद्या- बुद्धि व ज्ञान।
उनसे से हम  सीखते,साहित्य,व-विज्ञान।।

लक्ष्य-प्राप्ति के लिए, बतलाते हैं राह।
बिना गुरु के जीवन में, मिलता है ना थाह।।

अनगढ़ माटी शिष्य हैं, गुरु होते कुम्हार।
गढ़ते रख कर चाक पर,देत सुगढ़ आकार।।

पाते गुरु से ज्ञान हैं,मन में उच्च विचार।
गुरु ज्ञान के सागर हैं, करें ज्ञान विस्तार।।

गुरु अपने आदर्श से,देते सबको ज्ञान।
गुरु के गुणों को अपना,बनते लोग महान।।

शिक्षा की प्रसाद को पा,बन जाते गुणवान।
शिक्षक के गुण को अपना,बनते गुण की खान।।

गुरु ज्ञान की ज्योत जला, देते हमको ज्ञान।
प्रकाश देना ज्ञान का, शिक्षक की पहचान।।

चरण कमल में सिर नवा, गुरु को करें प्रणाम।
प्रथम देव गुरु आप हैं,मुख में जपते नाम।।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 6, 2022

करमा पूजा

करमा पूजा गीत (मगही भाषा)

आज सुदिन हइ करमा वरतिया,
लाइ दा हो भैया करमा के डालिया।

कैसे हमें लइबै बहिन करमा के डालिया,
नदिया में बहिन दोनो कुल पनिया।

नदिया में नाविक खेबै नैया,
ओही पर चढ़ भैया पार उतरिहा।
लाइ दा हो भैया करमा के डालिया।

लेलन सभे भैया कान्धे कुलहड़िया,
लाइ देलन भैया करमा के डालिया।

युग-युग बढ़े भैया तोहरी उमरिया,
भौजी के भैया बढ़े अहिवतिया।

लाई दा हो भैया .........

       सुजाता प्रिय समृद्धि
          स्वरचित

Monday, September 5, 2022

जय श्रीराम (दोहे)

जय श्रीराम

दशरथ जी के लालना,राम बड़े थे वीर।
जीवों पर करते दया,लड़ने में रणधीर।

मझली मांँ ने द्वेष से, दिलवाया वनवास।
पिता आज्ञा पालन को,धर मन चले हुलास।

मातु-पिता और गुरु के,चरणों में रख शीश।
गुरु जन को प्रणाम कर, लेकर वे आशीष।

लघु-भ्राता लक्ष्मण जी,जोड़ कर दोनों हाथ।
बोले भैया आपके, मैं भी चलता साथ।

त्याग राजसी वस्त्र को, पहने वलकल अंग।
माता सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।

वन-वन भटके साथ वे, खाते मूल और कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते ले आनन्द।

कपटी रावण ले गया, सीता को हर साथ।
एक न माना वह उनकी, रोकर जोड़ी हाथ।।

विकल हो तब राम लखन,ढूंढे चारो ओर।
लेकिन सीता का वहाँ,मिला न कोई छोर।।

घायल जटायु तब मिला, बतलाया यह बात।
सीता के गहने दिखा, जोड़े दोनों हाथ।।

वानर सेना ले बढ़े, प्रभु लंका की ओर।
रावण से जाकर किया, युद्ध बड़े घनघोर।

सीता को ले पहुंचे, साथ अयोध्या धाम।
नगर वासी खुश होकर,जपे राम का नाम।।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'



                 सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Sunday, September 4, 2022

शिक्षक

                                 शिक्षक
                            ऐसे शिल्पकार
                     जो मंदिर उठाते ज्ञान के।
    शिक्षक   ऐसे   काष्ठकार जो , द्वार  बनाते   ज्ञान  के।      शिक्षक   ऐसे   मूर्तिकार जो,  मूरत बनाते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   बुनकर हैं जो, वस्त्र  बनाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   स्वर्णकार जो, गहने  गढ़ते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   माली हैं जो , फूल खिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   पंडित हैं जो , पूजन करते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   त्रृषि-मुनि हैं जो, दीक्षा देते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   दीपक हैं जो,ज्योत जलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   मार्गदर्शक जो,राह दिखाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   अनुगामी जो,लक्ष्य दिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   रक्षक हैं जो,रक्षक हैं बनते  ज्ञान  के।
                          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
                  समस्त शिक्षकों को सादर समर्पित

Saturday, September 3, 2022

एकता और अखंडता का रूप हिंदी

एकता और अखंडता का रूप हिंदी

देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा की जननी संस्कृत भाषा है।या यूँ कहें हिन्दी  संस्कृत भाषा का ही सरल रूप है।यह एक वैज्ञानिक भाषा है।इस भाषा में कोई उच्चारण दोष नहीं है।इस भाषा को लिखने में स्वरों के मेल के लिए वर्ण नहीं अपितु मात्राओं को प्रयोग में लाया जाता है।संस्कृत हर भाषा की जननी है तो हिन्दी सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है।यह सहजता से समझी और सीखी जाने वाली सरल भाषा है।इसके हर अक्षर और अक्षरों के योग से निर्मित शब्दों में जो माधुर्य है वह किसी अन्य भाषा में नहीं। सच माने तो हिन्दी हमें एकाग्रता के साथ-साथ एकरूपता और अखण्डता  का भी पाठ पढ़ाती है। हिन्दी भारत की हर क्षेत्रिय भाषी लोगों को सहजता से समझ आती है। मान्यता यह भी है कि भारत में हजारों क्षेत्रीय भाषाओं की बोली प्रचलित हैं। हर कोश की दूरी पर भिन्न -भिन्न शब्द और उनके अलग-अलग अर्थ हैं जिन्हें दूसरे क्षेत्र के लोगों को समझना कठिन था ।इसलिए सभी भाषाओं को मिश्रित कर सरल भाषा 'हिंदी' का निर्माण हुआ और उसी भाषा को राजकीय और प्रशासनिक कार्यों में प्रयोग किया जाने लगा।इस प्रकार हिंदी देश की जन- भाषा के रूप में विकसित हुई और इसी कारण से हमारी हिन्दी भाषा को हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा बनने का गौरव प्राप्त है।
भारत के हिन्दी साहित्यकार गण हिन्दी भाषा में अपनी बेजोड़ साहित्यिक सृजन कर इस भाषा को लोकप्रिय बनाते हुए 'समृद्धि' की ओर ले जाने का अथक प्रयास कर रहे हैं। इस भाषा में साहित्यारों 'द्वारा लिखे गए  लेख, निबंध, नाटक, कहानी, कविता, उपन्यास इत्यादि काफी सुंदर, सार्थक ,प्रेरक और आकर्षक होते हैं।
इस भाषा को विस्तार देने एवं समृद्ध बनाने में हमारे देश के फिल्म- जगत का योगदान भी सराहनीय है ।जो बड़े-बड़े फिल्म -उद्योग चलाकर देश-विदेश में हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहे हैं ।विदेशों में लोग भी बड़ी तन्मयता से  हिन्दी फिल्म देखते और पसंंद करते हैं।एक दिन ऐसा भी आएगा जब देश-विदेश में बोली जाने वाली हमारी हिन्दी सम्पूर्ण जगत में लोकप्रियता को प्राप्त कर अपना उच्च और श्रेष्ठतम स्थान प्राप्त करेगी। हिन्दी साहित्यकार इसे शीर्ष स्थान पर पहुंचाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं।एक दिन हमें यह सफलता प्राप्त हो कर ही रहेगी, ऐसा हम अपने मन में दृढ़ विश्वास लेकर निरंतर प्रयास कर रहे हैं। हमारी हिन्दी भाषा जल्द ही अखण्ड भारत का निर्माण कर  सम्पूर्ण जगत में अपना अलग पहचान बनाकर रहेगी।
       जय हिन्द,जय हिन्दी।
  🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
         मौलिक रचना

Friday, September 2, 2022

हिन्दी (दोहे)

हिंदी (दोहे)

सरल भाषा हिन्दी का,सदा करें सम्मान।
हिंदी में सब बोलिए, रखिए इसका मान।।

हिंदी देश की बिंदी, अद्भुत है श्रृंगार।
इस भाषा के प्यार को, जान रहा संसार।।

हिन्दी से हिन्दवासी,पाते हैं पहचान।
इस भाषा को बोलिए, मन में रखकर शान।।

इसके जैसी जगत में,नहीं है भाषा एक।
चाहे इसको परख लो,जग में नजरें फेंक।।

जो जन बोले प्रेम से,इस भाषा में बोल।
बोलने में मधुर लगे,जैसे मीठा घोल।।

हिन्दी में जो बाचते,गीता-वेद-पुराण।
उससे ना संसार में, ना है जीव महान।।

हिन्दी को बस मानिए, ईश्वर का उपहार।
इस भाषा को हर घड़ी, मिलता जाता प्यार।।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'


Thursday, September 1, 2022

हिंदी भाषा (सायली छंद)

हिंदी भाषा (सायली छंद)

  राष्ट्रीय                     बड़ी 
भाषा हिंदी             गतिशील है 
का हम सब          यह भाषा हिंदी 
मिल  मान             इसकी लिपि
  बढाएंँगे                    सुंदर

   सारी                     बहती 
भाषा छोड़             नदियों की
कर हम सब          धारा - सी  है
 हिंदी को               गति इसके
अपनाएंँगे                 अंदर

    देश                     इस
  में बोली               भाषा में 
यह जाती है         एक  रूपता है 
 जनता की            बहुत सुंदर 
   प्यारी                    भाषा

   सुत्र                    रहती
है सम्पर्क             थी अँग्रेजों
की लगती तो       को  भी  इसे
 कितनी  यह        बोलने   की
     न्यारी।            अभिलाषा 

    भाषा                 भावों 
का मूलाधार      की अभिव्यक्ति 
चक्र है  यह       सरलता से इसमें 
अक्षर इसके           हो पाती
    अच्छे                    है

   देवताओं                  इसी
   को प्यारा             कारण यह 
यह लिपि है     भाषा तो देवनागरी 
सत्य सनातन       लिपि कहलाती
   सच्चे                      है

        सुजाता प्रिय समृद्धि

कवि और कविता (मन हरण घनाक्षरी)



कवि और कविता (मनहरण घनाक्षरी)

कविता लिखते हैं कवि,
दिखती है प्यारी छवि,
चमकता जैसे रवि,
सुर-लय-छंद में।

पिरोते भावों के मोती,
दिखा साहित्य की ज्योति,
साहित्य के बीज बोती,
स्वरों के छंद में।

बनाते माला शब्दों के, 
लेखन प्यारे पदों के,
प्यारे औ न्यारे पद्यों के,
कुछ है स्वछंद में।

सजाते कागज की क्यारी,
लिखते कविता प्यारी,
सभी लेखों से न्यारी 
सरल बंध में 
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'