Sunday, October 17, 2021

ठगी का शिकार

खेल रहे ठग खेल ठगी का,हम सब हुए शिकार।
कदम- कदम पर ठग हैं देखो, ठगने को तैयार।
तरह- तरह के रोज बहाने, वे लेकर आते हैं पास।
फटे-चिथड़े परिधान पहनकर, चेहरा लिए उदास।
कोई कहते मां मरी है, कोई कहते हैं बाप बीमार।
कोई मदद में दस-बीस मांगते, मांगता कोई हजार।
कोई-अंधा-कोढ़ी बन आता, कोई बन गूंगा-बहरा।
कोई कमर झुकाकर आता, कोई बन लूला-लंगड़ा।
कोई मंदिर के नाम पर ठगता, कोई कहता है पूजा।
ठगता है लंगर-भण्डारे कह, हथकंडे और भी दूजा।
खेल रहे हैं बहुरूपिए भी, ठगी का खेल निराला।
बचकर रहना इनसे ऐ लोगों,पड़े जो इनसे पाला।
घोड़े को रंग काले रंग से,पहनाकर लोहे की नाल।
दस कदम चला दस हजार में बेचते तुरंत निकाल।
रिक्शे, टैक्सी को सजाकर, प्रतिमा उसमें रख देते।
धूप-दीप- के नाम पर भी लोगों से पैसे हैं ठग लेते।
मिलावट कर मिर्च-मसाले में, साहुकार हमें ठगते।
महंगाई का रोना रोकर, हितैषी वे हमारे हैं बनते।
ठगने के ये खेल निराले,मेहनत करने से हैं अच्छे ।
इस खेल को खेल रहे हैं, मिल युवा बूढ़े औ बच्चे।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक



8 comments:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (18 -10-2021 ) को 'श्वेत केश तजुर्बे के, काले केश उमंग' (चर्चा अंक 4221) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  2. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार भाई

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  3. यथार्थ को बयां करती हुई बहुत ही बेहतरीन रचना!
    हमारे ब्लॉग पर भी आपका हार्दिक स्वागत है🙏

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  4. बहुत सुंदर रचना।

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  5. बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार

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