चलिए मुस्कुराते हैं (जलहरण घणाक्षरी)
सातवा ओर आठवाँ वर्ण गुरू
चलिए मुस्कुराते हैं।
गीत गुनगुनाते हैं।
सभी प्यारी सखियों को
पास हम बुलाते हैं।
हँसते औ हँसाते हैं।
सुनते औ सुनाते हैं।
रोजमर्रे की बात को,
सखियों को बताते हैं।
घूमते व घूमाते हैं।
दिल को बहलाते हैं
ठेले के निकट चल-
आ चटपटा खाते हैं ।
रूठे को भी मनाते हैं ।
दिल में भी बसाते हैं ।
आस- पास बैठकर,
प्रीत हम बढाते हैं ।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'