Sunday, April 5, 2026

गाँव की नारी

गाँव की नारी 

पुरुषों से कदम मिलाकर चलती,
                           वह गाँव नारी है।
हर पल पुरुषों का साथ निभाती,
                     वह  गाँव की नारी है।

घर का काम निपटाकर बाहर,
             पुरुषों का साथ निभाती है।
पीठ पर बच्चे को बांँध कर,
                संग खेती करने जाती है।

कुदाल चलाती,खेत कोड़ती,
              हल चलाकर खेत जोतती।
मेड़ बनाकर बीज बोती,
              एक-एक कर पौध रोपती।

भला कैसे गुजारा होगा अब, 
                     हाल बड़ा बदहाल है।
करे क्यूँ न मजबूरी में, 
             यह पापी पेट का सवाल है।

फिर भी जन हाथ उठाकर कहते        
                   शक्तिहीना यह नारी है।
है केवल ममता की मूरत, 
           कोमल अबला यह बेचारी है।
         सुजाता प्रिय समृद्धि

Saturday, April 4, 2026

एकता में बल

एकता में बल 

एक दिन एक शिकारी आया। 
जंगल में वह जाल बिछाया। 
उसके ऊपर वह दाना डाला। 
छिपकर बैठा बन रखवाला। 
कबूतरों का झुण्ड तब आया। 
दाने को देख कर ललचाया। 
कबूतरों का राजा तब बोला। 
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला। 
जंगल में अन्न कहाँ से आया। 
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे। 
लज्जा से उनके सिर झुके थे। 
कपोतराज ने फिर मुँह खोला। 
बड़े प्यार से उन सबको बोला। 
एक साथ चलो उड़ चलें हम। 
जाल को लेकर भाग चलें हम। 
मानकर कबूतर दादा की बात। 
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से। 
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।

Friday, April 3, 2026

संगठन में शक्ति

संगठन में शक्ति 
एक किसान के थे चार बेटे ।
चारो मिलकर खूब झगड़ते ।
किसान ने उनको समझाया। 
पर  बेटों को समझ न आया। 
किसान ने एक योजना बनाई। 
उनसे आठ  लड़कियाँ मंगाई।
चार को  साथ रस्सी से बंधा। 
चार को अलग - अलग रखा। 
प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया। 
बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।
पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी। 
मिलकर  पाई  थी  मजबूती। 
एक - एक लकड़ी पकड़ाया।
उनको उन चारो से तुड़वाया।
टूटी  वह  बिना  लगाए जोर। 
अकेली लकड़ी थी कमजोर। 
तब लड़कों को समझ आया। 
सब आपस में हाथ मिलाया। 
बोले अब हम सब नहीं लड़ेंगे।
हम-सब मिल- जुलकर रहेंगे। 
संगठन में शक्ति बहुत है भाई। 
है  बँधी लड़कियों -सी सच्चाई।

Wednesday, April 1, 2026

चोट (लघुकथा)

चोट (लघुकथा) 

पत्नी की तीखी बोली से संजीव का मन बड़ा आहत था। इतनी बेरूखी से सबके सामने डांँटेगी । यह तो कभी उसने सोचा.......... ।क्या हो गया उसे ?
 इतना भी नहीं सोंचा ऐसे अपमान भरे लहजे से मेरे दिल पर क्या..... ।
यदि मैं सबके सामने उसे ऐसे ही अपमानित...............? 
"करते तो हो........ !  हमेशा... .....।
हर जगह.........।हर समय ,......।
बडो़ं के सामने...... ।
छोटों के............।सहेलियों .......।
पडोसियों........।परिवारों,
सहकर्मियों,नौकरों..... ।"
उसने एक बार तुमसे........ ।
अपमान से दिल लहू-लुहान हो जाता है....... ।लेकिन वह हमेशा आसुओं के घूट पीकर  ........है।तो तुम क्यों विचलित.... ?"
तेरे जैसा उसका दिल..........? नहीं- नहीं! अपनी अंतरात्मा की फटकार सुन वह ............।
होंठों से बुदबुदाते हुए...
..मुझे भी. उसके सम्मान का...............। 

  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 31, 2026

कब तक (वर्ण पिरामिड)

5,               कब तक 
              (वर्ण-पिरामिड)

                       मैं 
                      जब 
                    राहों में 
                   चलती  हूँ।
                 मन-ही-मन 
               सोचा करती हूँ।
              कब तक मुझको 
             इन  दुर्गम  राहों  में 
           चलते चले जाना होगा? 
          और कब - तलक मुझको 
         इनकी असीमित दूरियों को 
        अपने कदमों से नापना होगा?
       कब तलक मुझको इसके सभी 
      घुमावदार मोड़ों में  मुड़ - मुड़कर 
    दिशा बदल कर, दाएं और बाएँ चल 
  कंक्रीटों से भरे उबड़ - खाबड़,टेढ़े - मेढ़े 
पथ के ठोकरों को सह करके चलना होगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आँखों-ही-आँखों में (लघुकथा)

आँखों-ही-आँखों में 

सुशांत का मन बड़ा अशांत था।आखिर कौन सा ऐसा अपराध  .......? जो सुनीता मैम ने इतनी जोर से........
वह तो कोई भी काम उनसे पूछे बिना............।
उन्होंने जिन सामानों को लाने कहा वह तो लाकर...........!
उन्हें लाने में मेरी जेब भी खाली..... ।
उपर से सबके सामने........।
अपमान का घुट पीकर कॉलेज के आयोजित कार्यक्रम में शामिल.........।लेकिन सुनीता मैडम  से नजरें चुराता.........।
कार्यक्रम की समाप्ति होते ही आयोजक छात्रों ने खर्च के पैसे का  हिसाब और बचे हुए पैसे उन्हें देने लगे ।
वह सोचने लगा-मैं दूँ भी तो क्या  ?
मेरे तो जेब के पैसे भी......
कोई बात नहीं मैं मैम को न हिसाब दूंगा न ही यह बताऊँगा कि ...........
सुशां s s त.....! अचानक मैम ने पीछे से पुकारा  ।
"लो य़ह तुम्हारे रुपये !" उसके पीछे पलटते ही मैम ने रुपये बढ़ाते हुए कहा-
"यह कौन - से रुपये मै  s s म  ?" उसकी आवाज में हकलाहट  ......
"तूने सारे सामन ..........।"  "मैंने पैसे भी......!"
"इसकी कोई जरूरत नहीं .........."
"क्यों नहीं ?" मैम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ......
वह नजरें उठाकर मैडम की ओर......।
उनके नजरों में वात्सल्य, प्रेम और ममत्व की लहरें हिलोरे ....। 
सारे गिले-शिकवे भूल वह हौले से मुस्कुरा दिया......
मैम का मन भी.....

                    सुजाता  प्रिय "समृद्धि"

Thursday, March 26, 2026

तीखे बोल-(लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽

        तीखे बोल 

अर्चना के पति विलास जी अचानक बीमार पड़े ।डॉक्टरों ने किडनी की बीमारी बताकर वेल्लोर ले जाने को कहा।वह पड़ोसन सोनाक्षी को बच्चों एवं घर की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप कर चल पड़ी।
मोह बस सोनाक्षी सारी जिम्मेदारी बखूबी........।
छह महीने इलाज के बावजूद विलास जी.............।
अंतिम संस्कार गाँव से होने के बाद दुःखी मन से जब अर्चना जी शहर वापस आई तो देखी- बच्चे सोनाक्षी अंटी के दिवाने हो गए हैं। 
हर बात पर सोनाक्षी जी की तारीफों के पुल............।
"आंटी जी ने ऐसा खाना खिलाया, वैसा लंच दिया ! ऐसे घर, कपड़े, फूलों इत्यादि............।तबियत खराब होने पर खूब..........।किसी से लड़ाई झगड़े होने पर बीच-बचाव.............।"
हाँ अब बच्चे उनके अहसान के काईल हो या ममता के वशीभूत हो अंटी के भी ,बाजार के  छोटे-मोटे काम कर देते। 
माँ के मना करने पर कहते- अंटी ने हमें पैसे और मेहनत से जितना सहयोग व सहारा दिया उस अनुपात में तो हम तो कुछ भी नहीं करते मम्मी!" 
उफ्फs s s s s s s s s s
हर समय सोनाक्षी की तारीफ.......
खीज कर वह बच्चों को डाट .....।
इस तरह भी जब बच्चे नहीं मानते तो सोनाक्षी को ही कठोर शब्दों में सुनाती -"मेरे बच्चों जैसा मुर्ख कोई हो ही नहीं सकता। कोई कुछ चिकना-चटपटा खिला देगी तो उसकी जी हजूरी में लगे रहेगें।इनके सीधेपन का फायदा चालबाज  औरतें खूब उठाती हैं। एक तो दुसरे के बच्चों से काम कराने में कोई शर्म नहीं करतीं, ऊपर से खूब वाहवाही भी लूटती हैं।"
सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'