Monday, October 5, 2026

प्रदर्शन

     प्रदर्शन                                                  20/04/2001

एक बार एक महात्मा जी को एक अमीर व्यक्ति ने अपने घर आमंत्रित किया।नियत समय पर वे पधारे।
सेठ जी ने उन्हें गद्देदार सोफे पर बैठाया।
महात्मा जी अस्वस्थ। कास रोग से पीड़ित ।बार-बार खाश रहे थे।खासी से परेशान उन्होंने पानी की मांग की।
लेकिन सिर्फ पानी देना सेठ जी की अमीरी का अपमान था।उन्होने अपने नौकर को बुलाकर धीमें  स्वर में  कुछ आदेश दिया।
        महात्मा जी खासते रहे।
थोडी देर बाद नौकर एक चाँदी के ट्रे में बहुत सुंदर चाँदी के गिलास में बहुत सुंदर रंग का खुशबूदार शर्बत लेकर आया और महात्माजी की ओर बढाया। 
खासी से महात्माजी का कंठ सुख रहा था।उन्होने जल्दी से शर्बत का गिलास उठाया और  दो घूंट पीकर गिलास वापस ट्रे में रख दिया।
उनका यह नकारात्मक ढंग देख सेठ जी तिलमिला उठे।गुस्से में  भरकर उन्होंने कहा- महात्मन! आपने यह शर्बत क्यों छोड दिया ? यह बहुत ही महंगे स्क्वाइस से बनाया गया है।
महात्मा जी ने बड़े ही शांत और सरल शब्दों में कहा-बेशक आपने मुझे महंगे पात्र में महंगे शर्बत पेश किया।लेकिन मेरे लिए इसका कोई मोल नहीं। 
सेठ जी ने आश्चर्य मिश्रित रोष में प्रश्न किया-क्यों, आखिर क्यों महात्मन ? मैने तो आपके आदर ...
महात्मा जी उनकी बात  बीच में  ही काटते हुए बड़े ही संयत स्वर में कहा-आप देख रहे हैं, मैं कास रोग से पीड़ित हूँ। इसलिए यह शर्बत कितना भी मूल्यवान क्यों न हो,मेरे लिए कितना हानिकारक है।
इस वक्त मुझे सादे पानी की आवश्यकता थी।न कि इस महंगे शर्बत की।सेठ जी को अपनी भूल के एहसास हुआ। सचमुच धन के घने कोहरे में मदान्थ हो किसी के कष्टों और आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना ही..............
उन्होंने महात्मा जी से अपनी इस भूल के लिए हाथ जोडकर क्षमा माँगी। 
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

वक्त को साथी बनाना सीख लो

वक्त को साथी बना सीख लो

वक्त को  साथी  बनाना सीख  लो।
   साथ उसका तुम निभाना सीख लो।
      वक्त के संग  चलना तुमको  है सदा-
         कदम उससे तुम मिलाना सीख लो।

राह अपना  तुम बनाना  सीख लो।
   पैर  उसपर  तुम बढ़ाना  सीख लो।
      राहों  के  कंटक अगर  पग  में गड़े-
         पुष्प उसपर तुम बिछाना सीख लो।

वक्त  को  तुम आजमाना  सीख लो।
   भरोसे मन को भी दिलाना सीख लो।
      वक्त  ने  जो  जख्म  तुझको  हैं दिए -
         मरहम उसपर तुम लगाना सीख लो।

मन को भी तुम  समझाना सीखो लो।
   सबके  दिल  में तुम  समाना सीख लो।
      कोई तुमको देखता नही,फिकर न करो-
         खुद को खुद पर तुम रिझाना सीख लो।

तुम  भी करना  कुछ  बहाना सीख लो।
   रूठों हुए  को  तुम मनाना सीख लो।
      कोई  जलता  है  अगर  तुम्हें देखकर-
         दिल उसका भी तुम जलाना सीखो लो।
          
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, October 4, 2026

प्रदर्शन

     प्रदर्शन                                                  20/04/2001

एक बार एक महात्मा जी को एक अमीर व्यक्ति ने अपने घर आमंत्रित किया।नियत समय पर वे पधारे।
सेठ जी ने उन्हें गद्देदार सोफे पर बैठाया।
महात्मा जी अस्वस्थ। कास रोग से पीड़ित ।बार-बार खाश रहे थे।खासी से परेशान उन्होंने पानी की मांग की।
लेकिन सिर्फ पानी देना सेठ जी की अमीरी का अपमान था।उन्होने अपने नौकर को बुलाकर धीमें  स्वर में  कुछ आदेश दिया।
        महात्मा जी खासते रहे।
थोडी देर बाद नौकर एक चाँदी के ट्रे में बहुत सुंदर चाँदी के गिलास में बहुत सुंदर रंग का खुशबूदार शर्बत लेकर आया और महात्माजी की ओर बढाया। 
खासी से महात्माजी का कंठ सुख रहा था।उन्होने जल्दी से शर्बत का गिलास उठाया और  दो घूंट पीकर गिलास वापस ट्रे में रख दिया।
उनका यह नकारात्मक ढंग देख सेठ जी तिलमिला उठे।गुस्से में  भरकर उन्होंने कहा- महात्मन! आपने यह शर्बत क्यों छोड दिया ? यह बहुत ही महंगे स्क्वाइस से बनाया गया है।
महात्मा जी ने बड़े ही शांत और सरल शब्दों में कहा-बेशक आपने मुझे महंगे पात्र में महंगे शर्बत पेश किया।लेकिन मेरे लिए इसका कोई मोल नहीं। 
सेठ जी ने आश्चर्य मिश्रित रोष में प्रश्न किया-क्यों, आखिर क्यों महात्मन ? मैने तो आपके आदर ...
महात्मा जी उनकी बात  बीच में  ही काटते हुए बड़े ही संयत स्वर में कहा-आप देख रहे हैं, मैं कास रोग से पीड़ित हूँ। इसलिए यह शर्बत कितना भी मूल्यवान क्यों न हो,मेरे लिए कितना हानिकारक है।
इस वक्त मुझे सादे पानी की आवश्यकता थी।न कि इस महंगे शर्बत की।सेठ जी को अपनी भूल के एहसास हुआ। सचमुच धन के घने कोहरे में मदान्थ हो किसी के कष्टों और आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना ही..............
उन्होंने महात्मा जी से अपनी इस भूल के लिए हाथ जोडकर क्षमा माँगी। 
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Wednesday, September 30, 2026

अधूरे सपने

अधूरे सपने

                                 माना
                              कि हमारे
                            कुछेक स्वप्न
                        अधूरे रह जाते हैं 
                      हम  चाहकर भी उसे
                   कभी पूरा नहीं कर पाते हैं 
                क्योंकि बीच में  ही हमारी नींद 
            टूट जाती है और स्वप्न अधूरे रह जाते
          पुनः सोने का  उपक्रम भी करते  हैं और,
       नींद भी आ जाती है और  हम सो भी जाते हैं 
    पर स्वप्न का श्रृंखला फिर,कभी जुड़ ही नहीं पाता
  शायद ! स्वप्न-ग्रंथी टूटे स्वप्नों को जोडना नहीं जानती

Tuesday, September 29, 2026

पितरों का आशीष

पितरों का आशीष (मनहरण घनाक्षरी )

पितृपक्ष चल रहा,
    दिन-दिन टल रहा,
       समय निकल रहा, 
          तर्पण तो कीजिए।

कीजिए आप तर्पण,
    पितरों को दे अर्पण,
       फल-फूल समर्पण,
           प्रसन्न हो कीजिए।

तृप्त होते पितृलोक,
   मिटाते हैं रोग-शोक,
      बढ़ा जीवन आलोक,
          श्रद्धा भाव दीजिए।

होकर अति प्रसन्न,
    पितर मन-ही-मन,
        देते अन्न-धन-जन,
          आशीष तो लीजिए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 15, 2026

कर्म हमारे भाग्य बदलते

कर्म किए जा लगन लगाकर, करके तू  ये आस।
कर्म  हमारे  भाग्य  बदलते, मन में रख  विश्वास।

कर्म  हमारा  सच्चा साथी, हर  पल चलता  संग।
मेहनत से जो काम करें हम, लाता एक दिन रंग।
कर्म के पथ पर बढ़ते जाओ,मत कर मन उदास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते, मन  में  रख विश्वास।

कर्म करो तो इक दिन तुझे, मिलेगा इसका फल।
कर्म  करने  वाले का होता, जीवन सरल-सफल।
सफलता तेरे पग चूमेगी, भर जीवन में  उल्लास।
कर्म  हमारे  भाग्य बदलते,  मन में  रख विश्वास।

कर्म को अपने बुरा न करना,कर्म ही जीवन-सार।
जीवन जीने का, मर्म यही है, करो कर्म से  प्यार।
कर्म  हमारा जीवन धन है, कर्म  के हम  हैं  दास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते,  मन  में  रख विश्वास।
                
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, September 14, 2026

कर्म हमारे भाग्य बदलते

कर्म किए जा लगन लगाकर, करके तू  ये आस।
कर्म  हमारे  भाग्य  बदलते, मन में रख  विश्वास।

कर्म  हमारा  सच्चा साथी, हर  पल चलता  संग।
मेहनत से जो काम करें हम, लाता एक दिन रंग।
कर्म के पथ पर बढ़ते जाओ,मत कर मन उदास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते, मन  में  रख विश्वास।

कर्म करो तो इक दिन तुझे, मिलेगा इसका फल।
कर्म  करने  वाले का होता, जीवन सरल-सफल।
सफलता तेरे पग चूमेगी, भर जीवन में  उल्लास।
कर्म  हमारे  भाग्य बदलते,  मन में  रख विश्वास।

कर्म को अपने बुरा न करना,कर्म ही जीवन-सार।
जीवन जीने का, मर्म यही है, करो कर्म से  प्यार।
कर्म  हमारा जीवन धन है, कर्म  के हम  हैं  दास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते,  मन  में  रख विश्वास।
                
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'