Friday, May 22, 2026

समझदारी

समझदारी

एक टोपी वाला टोपी लेकर। 
बेचता टोपियाँ घूम घूम कर। 
हरी लाल और पीली टोपी।
काली सफेद औ नीली टोपी।
एक दिन वह जब थक गया।
पेड के नीचे जाकर सो गया।
उस पेड़ के ऊपर डाली पर। 
बैठे हुए थे बहुत सारे बंदर।
टोपी वाले को टोपी पहने देख।
पहन ली बंदरों ने भी एक-एक।
टोपीवाला जागा तो टोपी वाली।
टोकरी बिलकुल थी खाली।
उसने जब नजर उठाई ऊपर।
टोपियाँ पहन बैठे थे बंदर।
माँगी टोपियाँ बहुत मगर।
एक न वापस की बंदर। 
तब बुद्धि से उसने काम लिया।
सिर की टोपी खोल फेक दिया।
टोपी वाले को ऐसा करते देख। 
बंदरों ने भी खोल टोपी दी फेंक। 
टोपी वाला तब खुश होकर।
चल पड़ा सभी टोपियाँ लेकर।
समझदारी से जो करते काम। 
मुश्किलें उनकी होती आसान। 
      सुजाता प्रिय समृद्घि

Thursday, May 21, 2026

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी

मीठे-मीठे गीत सुनाती, 
           नन्हीं चिडिया जब घर आती।
सुबह-सबेरे रोज आकार, 
                  मेरी मुनिया को बहलाती।
आती जब वह फुदक-फुदक,
                 मुनिया ताली खूब बजाती। 
जब  भी वह रोने लगती तब,
               गाना गाकर चुप कर जाती। 
नन्ही,प्यारी चोंच खोलकर, 
                   छोटे दाने को चुग जाती।
जब मुन्ने का मन भर जाता,
                 उड़ जाती है पंख फैलाती।
सोती सूरज के सोने पर, 
                पर उससे पहले जग जाती।
स्नेह-प्यार से चीं-चीं गाकर,
                 हर प्राणि को रोज जगाती।

                          सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

तमन्ना ( विधाता छंद)

तमन्ना

तमन्ना है यही मेरी, कि तुम अब पास आ जाओ।
बड़ी तड़पा रहे मुझको,अभी मत और तड़पाओ।।

मुझे जो  छोड़कर भागे, बताया भी नहीं मुझको।
तुझे भी रास कब आया,जताया तो नहीं मुझको।।

जिगर   बेचैन   है  मेरा, परेशानी   तुझे    घेरी।
अगर  मुझको  न तड़पाते, सुधी लेते  जरा मेरी।।

अभी इतनी गुजारिश है,चले आओ निकट मेरे।
तमन्ना आज  पूरी  हो, मिटे  संताप  सब  तेरे।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Sunday, May 17, 2026

संस्कार (लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🙏 

संस्कार (लघुकथा)

"मन बहुत घबराता है सिम्मी की......!"
 "काहे खातिर.........?"
 "तुम तो कुछ समझती ही नहीं। देखो हमारी बेटियांँ जवान हो गई। आजकल के छोरों के रंग-ढंग तो देख ही रही हो । छोकरियों को देखते ही किस कदर.........।अब इन्हें बाहर जाने से....."
    "उनकी नादानियों की सजा हम अपनी बेटियों को क्यों.........."
    "अरे ! हम उन मनचलों को रोक नहीं सकते । पर,अपनी बेटियों को तो घर में सुरक्षित.........।"
       "हांँ-हांँ बेटियाँ ही ना बलि का बकरा हो सकती.......।बेटों को तो छुट्टा साढ़.........."
 "ओह! हम यह नहीं कहते कि बेटों को.....।पर बिटिया को समझाकर घर में...........।"
 "हमें बिटिया को समझा कर घर में नहीं.........,बेटों को समझाकर बाहर भेजना है कि लड़कियों के साथ किसी भी तरह की.............. पाप है। जैसे तुम्हारी मांँ-बहन की आबरू है ।वैसे ही पराई लड़कियों और........।अपनी मांँ- बहन की तरह अन्य लड़कियों की सुरक्षा भी तुम्हारी........।तब देखना हमारी बिटिया भी सुरक्षित और बेटे भी व्यवहारिक और समझदार..........।"

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
कोयल का गली पन्खोन् बाली।
मधुवन की कोयल मतवाली।
कंहुकुहू करती डाली-बा,ई
फुदक-फौट कर 

मैं

मैं                   मैं 
                  स्त्री हूँ 
             तो क्या हुआ 
        मेरा कोई वजूद नहीं 
    मेरे मन में कोई इच्छा नहीं 
  चुप रहती हूँ ! पर गूंगी  नहीं हूँ 
    यह तो मेरा  एक तरीका है 
      माहौल शान्त रखने का 
       नहीं चाहती हूँ विषाद 
        इसीलिए उदासी पर 
    परदा डाल मुस्करा देती हूँ 
दिल के अन्दर कितनी भावनाएँ 
 हिलोरे लेती हैं तूफ़ान की तरह 
   पर उसे बेरहमी से दवाकर
        शान्त कराती देती हूँ
  
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Saturday, May 16, 2026

कैसे बीज हैं पेड उगात े?

कैसे बीज हैं पेड उगाते

सहज कौतुहल उठा था मन में। नन्हें बीज मिट्टी के कण में। 
कैसे विस्तृत पेड उगाते।कैसे प्यारे फूल खिलाते।
कैसे मीठे फल उपजाते।सबको हैं वे भाते लुभाते।
एक बीज लेकर हाथ मे।छोटी खुरपी भी थी साथ में। 
खुरच-खुरच धरती का दामन।कर डाला बीज को अर्पण।
दो-चार अन्जलि पानी डाल। चल पड़ी मैन खुरपी संहाल।
रोज उठाकर देख करती।कई दिनों का लेखा करती।
एक-दो तीन गीन -गीन।ऐसे बीत गये कितने दिन। 
बीज न उगला कोई पेड। सोची इसको देखून छेड़।
तुरन्त दौड़कर खुरपी लाई।धरती का दामन खुजलाई।
वहाँ, जहाँ बोई थी बीज। खोज रही थी पेड-सी चीज। 
बीज मिल गया थोड़ी देर में। छुपा हुआ मिट्टी के ढेर में। 
नहीं अब वह छोटा था।पहले से ज्यादा मोटा था।
हाँ  एक बात  थी अलग।पड़ उसपर नजर सहज।
उस बीज के एक ओर। निकली थी मानो कोई  डोर। 
ठीक उजले धागे-सी।पीछे या उसके आगे थी।
मैंने सोचा ये क्या हुआ। मतलब कितना नया हुआ। 
दौड़ पड़ी मैन् मान के पास।सत्य जानने की ले आस। 
मा मिल गई जल्दी खैर, पूछा क्या ये हैं बीज के पैर।।
हाथ पैर  हैं या हैं  पूँछ। या फिर दूसरा और है कुछ। ।
मान थी कामों  मेन व्यस्त। सूर्य हुआ जाता था अस्त।।
खीझकर बोली ओ लंगूर।इसका नाम है अंकुर। 
बढ़कर फेंकती पत्तियाँ  दो।उससे निकलती टहनियां दो।
फिर  पत्तों से हैं  भर जाते।और फूलों से हो तर जाते।
और फलों से हैं लद जाते।जो सबको हैं लुभाते।
ऐसे बीज हैं पेड उगाते।ऐसे ही हैं फल-फूल उपजाते।
                                  सुजाता प्रिय 'समृद्घि'