Tuesday, August 11, 2026

हरी-हरी चूड़ियाँ

हरी-हरी चूड़ियाँ 

हाथों में शोभ रही हरी-हरी चूड़ियाँ। 
गोरी कलाई पर भरी-भरी चूड़ियाँ।
लगती है सावन की हरियाली-सी।


जब-जब चूड़ियाँ खन-खन खनकती।
गोरी की पायलिया झन-झन झनकती।
सुर लग रही है बड़ी मतवाली-सी।


माँग में सिन्दूर और होठों पर लाली।
माथे पर बिन्दी ओर कानों में बाली।
कमर लचकाती फूल की डाली-सी।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, August 10, 2026

नटखट मोहन-श्याम

नटखट मोहन-श्याम 

बड़ा नटखट मोहन-श्याम सखी
बड़ा नटखट......
तंग करता आठो याम सखी।
बड़ा नटखट.......
जब पनघट पर मैं जाती हूँ,
मेरे पीछे-पीछे आता है।
झकझोर मेरी मटकी को,
सारे जल को गिराता है।
मटकी लेता थाम सखी
तंग करता........
जब  जाती हूँ मैं फुलवारी,
मेरे पीछे-पीछे आता है।
बेली-चमेली की कलियाँ,
तोङ मुझ पर गिराता है।
हर दिन उसका काम सखी,
तंग करता.................
बैठ कदम की डाली पर,
वह वंशी मधुर बजाता है।
बंशी की धुन में राधे-राधे,
कहकर वह मुझे बुलाता है।
करता है मुझे बदनाम सखी
तंग करता....................

सावन महीना (कजरी)

सावन महीना (कजरी)

हरि बोलो ! सावन महीना पावन, मनमा हरसे हरि बोलो।
हरि बोलो ! रिमझिम रिमझिम, मेघा बरसे हरि बोलो।

गड़-गड़, गड़ -गड़ बोले बदरिया।
चम-चम,चम-चम चमके बिजुरिया।हो रामा,
हरि बोलो !अजब आवाज आबे, अम्बर से हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना...........

वर्षा की देखो है बुंदे ये न्यारी।
लगती है यह हर जन को प्यारी।हो रामा,
हरि बोलो ! कड़क -कड़क कर,बदरा गरजे हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना .........

धरती पर छायी है हरियाली।
हरी- भरी है पेड़ों की डाली।हो रामा।
हरि बोलो ! खेतों की क्यारी में, पौधे लरजे हरि बोलो।
हरि बोलो !सावन महीना...........

       सुजाता प्रिय समृद्धि

Sunday, August 9, 2026

ज्ञानामृत बरसाओ

अप्रत्यक्षित ज्ञान उजागर कर दो।
समस्त ज्ञान का गागर भर दो।
जग में ज्ञानामृत बरसाओ। 
अच्छा क्या होता बुरा क्या होता।
मूढ जगत में कैसे है रोता।
आगे बढ़कर सबको दरसाओ।

कैसे ज्ञानी जग में उठते।
अज्ञानी के दम कैसे हैं घुटते।

सबको बोलो सबको समझाओ।

Wednesday, August 5, 2026

दिल एक मंदिर (लघुकथा)

दिल एक मंदिर ( लघुकथा)

मंगलवार का दिन....
साँझ को दुर्गा माता और हनुमानजी  के मंदिर में दीया भी जलाना है और प्रसाद भी.......
 दमयन्ती अपनी बेटी सुकन्या  के साथ मंदिर के पास वाले दुकान से नारियल- चुनरी, बतासे- लड्डू ,माला इत्यादि लेने बढ़ी तभी- "ले लो माई जी ! घर में काम आने वाले सामान, कम कीमत लगा दूँगी..।"
दोनों अनसुनी करती ......।
"कुछ तो ले लो माँ जी!" उसके साथ बैठी छोटी बच्ची ने दीन भाव से .....l
माँ ने दया भाव  से पूछा-"क्या-क्या रखी है आंय  ...?"
प्लेट,कटोरी,चम्मच एहि सब.......
"प्लेट दिखा तो कैसा है ?"
 वह टोकरी से सामान निकाल........
उसकी गोदी से बच्चे के रोने.........
वह उसे पुचकार कर चुप कराती हुई आँचल से.......।
"कितने दिन का है.?"
 चार दिन बाद महीना लगेगा माँ जी.."
 "इसका बाप ....?"
"दिहाड़ी मजदूर है माँ जी!....पेड़ काटते वक्त गिर पड़ा सो हाथ टूट गया.."
"बर्तन बेचकर कितना कमा......"
"बर्तन पर दो रुपया बचता है. पचास भी बिक जाए तो......"
दमयन्ती ने प्रसाद के पैसे उसकी ओर बढ़ा दिए-"जा कुछ लेकर तुम और बेटी खा ले और बचे हुए पैसे से बच्चे के  लिये दूध.....l"
फिर प्रसाद के सारे पैसे भी ........
"जा इसके बाप का इलाज.....
उसने मंदिर में प्रवेश कर दुर्गा माता और हनुमानजी को प्रणाम किया और घर की ओर........
उसे उस बच्ची के चेहरे में दुर्गा माता, और बच्चे के चेहरे में हनुमानजी की छवि दिख रही थी। और अपना दिल............।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, August 3, 2026

जब जिद ठान ली (संस्मरण)

जब ज़िद ठान ली 

मेरे मायके के गाँव में,दादाजी के जमाने में बहुत अच्छी खेती होती थीं। खेती के सारे साधन मौजूद थे। एक बार हमलोग वहांँ थे।मजदूरनियों के मुख से खेत में होने वाले कामों के बारे में सुनकर मन में उत्सुकता जागी कि खेती कैसे होती है देखना चाहिए। लेकिन दादा -दादी की शख्त हिदायत मिली कि लड़कियों को खेत की ओर नहीं जाना है। क्यों नहीं जाना है यह पूछने पर उन्होंने डराते हुए कहा -वहाँ बहुत सारे साँप-बिच्छू और भूत-प्रेत रहते हैं।बाल बिखराती  किच्चिनिया बैठी होती हैं जो बच्चों को पकड़कर झोली में बैठाकर ले जाती हैं। साँप -बिच्छू तथा भूत-प्रेत का नाम सुन मन में एक अलग जिज्ञासा जागृत हुई कि साँप-बेच्छू,भूत-प्रेत कैसे होते हैं।सभी लोग उनके बारे में कह कर डराते हैं।जरा एक बार देखूँ तो सही-"वे कैसे दिखते हैं।" बस हमने यह जिद्द ठान ली कि खेत देखने जरूर जाउँगी।
अन्य खेतों के अलावा हमारा एक जगह बाईस बिघे का एक प्लॉट था जहांँ उस समय खेती का काम चल रहा था।वह खेत घर से अधिक दूर था इसलिए हम दोनों बहनों ने आपस में तय किया कि जब दादाजी खेत की ओर जाएंँगे,हम उनके पीछे चल देंगे।जब दादाजी जाने लगे तो थोड़ी दूरी बनाकर हम भी छिपते-छिपाते खेत तक पहुंँच गयीं।वहाँ हमारे एक चाचा मोटर पंप को ठीक करवाने में लगे थे। उन्होंने हमें देखते ही पूछा तुम लोग क्यों आईं।उनकी बातें सुन दादाजी ने हमें प्यार से देखा तो तनिक गुस्सा कर हमें वहीं बैठाया और कहा -घर अकेली मत जाना जब हमलोग चलेंगे तब चलना।
   खेतों में ट्रैक्टर चलते देख हमने उसपर चढ़ाने की जिद की।चाचा ने कहा जाओ अंदर टेबल पर स्वीच बोर्ड है उसका हरा बटन दबा दो तब ट्रैक्टर पर चढ़ाएंगे।जब हमने हरा बटन दबाया तो मोटर चलने की बड़ी तेज आवाज हुई। घबराकर दोनों बहनें जोर से चीखती हुई एक-दूसरे से लिपट गई।दादाजी ने सोचा हमें करेंट लग गया। चाचा से गुस्से से कहा-मार दिया न दोनों को? चाचा ने जाकर जब हमें सही -सलामत देखा तो मन बहलाने के लिए  खेतों की ओर ले चले।एक खेत में घूसते ही हमें भूतों के दर्शन होने लगे। बिना सिर बारे भूत, खेतों में बोझ ढोते सिर्फ दो पैरों वाले भूत,खेतों में कीचड़ से नहाये, पौधे उखाड़ते भूत। पेड़ों पर झूलते और उछल-उछल कर चढते-उतरते हुए भूत।एक बूढ़ी खेत की क्यारी पर बैठी दो बच्चों को अपने पास पकड़कर बैठाई थी,उनके बाहर निकले बड़े-बड़े दातों को देख हमने उन्हें किचिन मान लिया।अब हमारी नजरें चारों ओर साँप-बिच्छू भी ढूंढ रही थीं।डर के मारे हम रोने लगीं। चाचा ने डाटते हुए कहा-और जिद्द ठानों खेत घूमने की।अभी तो सिर्फ भूत  देखी हो ।अब कभी आओगी तो पकड़कर ले भी जाएंगे अपने साथ। फिर उन्होंने हमें घर पहुंचा दिया।घर में हमारी खोज हो रही थी। पिताजी ने चाचा से हमारे खेत पहुँचने की सारी बात जानी। हमने डरते हुए उन भूतों के बारे में पिताजी को बताया। हमें इस प्रकार डरी-सहमी देखकर पिताजी दूसरे दिन हमें लेकर फिर खेत पहुंँचे। उन्होंने हमें मोटर का स्वीच ऑन- ऑफ करना सिखाया, फिर मकई के खेतों में खड़े पूतलों के बारे में बताया,कि यह मकई खाने आने वाली चिड़ियों को डराने के लिए लगाया जाता है।ताड़ -खजूर पर चढ़कर ताड़ी उतारने के बारे में बताया कि -कैसे वह आदमी हाथों को पेड़ के ऊपर बाधकर पैरों को ऊपर खीचते हुए चढता है और पेड से ताड़ी का लवनी उतार लाता है।बोझ उठाकर चलते मजदूरों को दिखाते हुए कहा ये जो फसलों के बोझे लेकर चल रहे इसलिए इनका आधा शरीर फंसलो के बोझ से ढका हुआ है ,ये सिर्फ दो पैर वाले भूत नहीं। इस प्रकार जब हमने ज़िद ठानी तो झूठे भूतों के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां जानी।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, August 2, 2026

शिव शंकर का दरवार

शिव शंकर का दरवार 

सावन का महीना,शिव-शंकर का दरवार। 
जो भी आते उनका,हो जाता बेडा पार।
सावन का.......
बाबा का देखो रूप निराला।
तन पर ओढे हैं मृग छाला।
भोले के जटे से बहे जलधार। 
गले में देखो लटका है साँप का हार। 
सावन का.......
डम-डम डम-डम डमरू बजाते।
बम-बम बम-बम कह गीत गाते।
नाचते तो करे,त्रिशूल टंकार। 
गौरी माँ पायल करे झंकार। 
सावन का..........
भोला के चरणों में,ध्यान लगाओ। 
इच्छित फल बाबा भोला से पाओ।
महल-अटारी,रुपया हजार। 
सब-कुछ देंगे भोला,जाओ उनका  द्वार। 
सावन का..........
शिव शंकर हैं ,औढर दानी।
भक्तों को देते हैं वर मनमानी।
बड़े-छोटे का न करते विचार। 
सभी भक्तों को बाबा,देते अपना प्यार। 
सावन का........
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'