गेंदरी बनाम गद्दे
होली-दशहरे में आई साड़ियाँ नई।
पुरानी साड़ियाँ जमा हो गयी कई।
कोई रंग उड़ी, कोई फटी-चिथड़ी।
कोई - थी मुड़ी, कोई थी सिकुड़ी।
उन्हें देखने को नहीं करता था दिल।
रखना भी है उन्हें उनको मुश्किल।
य़ह सभी अब तो बेकार की ढेर है।
इसे हटाने में करना क्यों यूं देर है।
अम्मा - चाची और बुआ को दादी।
बोली - मत करो तुम इनकी बर्बादी।
इनको मिला कर बना लेना गेंदरी।
मतलब बिछौना अथवा कहो दरी।
डर से अम्मा और चाची रही मौन।
बुआ ने पूछा - इसे बनाएगा कौन?
दादी बोलीं- तुम ननद-भौजाई मिल।
तह लगा-लगाकर उसको देना सिल।
बुआ के चेहरे पर उड़ पड़ी हवाइयाँ।
माँ और चाची लेने लगी जम्हाईयाँ।
बाहर बोला कोई माइक में हल्ले में।
आ गया आपके हर गली मुहल्ले में।
कपड़े से रूई बनाने वाली मशीन।
नरम-गरम तोसक बनबाईये हसीन।
सुन- बुआ,चाची व माँ बड़ी इतराई।
झट जा- रुई बनाने वाले को बुलाई।
सभी पुरानी साड़ियों के बन गए गद्दे।
छूटे कपडों से गेंदरी बनाने के मुद्दे।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'