Tuesday, March 31, 2026

कब तक (वर्ण पिरामिड)

5,               कब तक 
              (वर्ण-पिरामिड)

                       मैं 
                      जब 
                    राहों में 
                   चलती  हूँ।
                 मन-ही-मन 
               सोचा करती हूँ।
              कब तक मुझको 
             इन  दुर्गम  राहों  में 
           चलते चले जाना होगा? 
          और कब - तलक मुझको 
         इनकी असीमित दूरियों को 
        अपने कदमों से नापना होगा?
       कब तलक मुझको इसके सभी 
      घुमावदार मोड़ों में  मुड़ - मुड़कर 
    दिशा बदल कर, दाएं और बाएँ चल 
  कंक्रीटों से भरे उबड़ - खाबड़,टेढ़े - मेढ़े 
पथ के ठोकरों को सह करके चलना होगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आँखों-ही-आँखों में (लघुकथा)

आँखों-ही-आँखों में 

सुशांत का मन बड़ा अशांत था।आखिर कौन सा ऐसा अपराध  .......? जो सुनीता मैम ने इतनी जोर से........
वह तो कोई भी काम उनसे पूछे बिना............।
उन्होंने जिन सामानों को लाने कहा वह तो लाकर...........!
उन्हें लाने में मेरी जेब भी खाली..... ।
उपर से सबके सामने........।
अपमान का घुट पीकर कॉलेज के आयोजित कार्यक्रम में शामिल.........।लेकिन सुनीता मैडम  से नजरें चुराता.........।
कार्यक्रम की समाप्ति होते ही आयोजक छात्रों ने खर्च के पैसे का  हिसाब और बचे हुए पैसे उन्हें देने लगे ।
वह सोचने लगा-मैं दूँ भी तो क्या  ?
मेरे तो जेब के पैसे भी......
कोई बात नहीं मैं मैम को न हिसाब दूंगा न ही यह बताऊँगा कि ...........
सुशां s s त.....! अचानक मैम ने पीछे से पुकारा  ।
"लो य़ह तुम्हारे रुपये !" उसके पीछे पलटते ही मैम ने रुपये बढ़ाते हुए कहा-
"यह कौन - से रुपये मै  s s म  ?" उसकी आवाज में हकलाहट  ......
"तूने सारे सामन ..........।"  "मैंने पैसे भी......!"
"इसकी कोई जरूरत नहीं .........."
"क्यों नहीं ?" मैम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ......
वह नजरें उठाकर मैडम की ओर......।
उनके नजरों में वात्सल्य, प्रेम और ममत्व की लहरें हिलोरे ....। 
सारे गिले-शिकवे भूल वह हौले से मुस्कुरा दिया......
मैम का मन भी.....

                    सुजाता  प्रिय "समृद्धि"

Thursday, March 26, 2026

तीखे बोल-(लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽

        तीखे बोल 

अर्चना के पति विलास जी अचानक बीमार पड़े ।डॉक्टरों ने किडनी की बीमारी बताकर वेल्लोर ले जाने को कहा।वह पड़ोसन सोनाक्षी को बच्चों एवं घर की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप कर चल पड़ी।
मोह बस सोनाक्षी सारी जिम्मेदारी बखूबी........।
छह महीने इलाज के बावजूद विलास जी.............।
अंतिम संस्कार गाँव से होने के बाद दुःखी मन से जब अर्चना जी शहर वापस आई तो देखी- बच्चे सोनाक्षी अंटी के दिवाने हो गए हैं। 
हर बात पर सोनाक्षी जी की तारीफों के पुल............।
"आंटी जी ने ऐसा खाना खिलाया, वैसा लंच दिया ! ऐसे घर, कपड़े, फूलों इत्यादि............।तबियत खराब होने पर खूब..........।किसी से लड़ाई झगड़े होने पर बीच-बचाव.............।"
हाँ अब बच्चे उनके अहसान के काईल हो या ममता के वशीभूत हो अंटी के भी ,बाजार के  छोटे-मोटे काम कर देते। 
माँ के मना करने पर कहते- अंटी ने हमें पैसे और मेहनत से जितना सहयोग व सहारा दिया उस अनुपात में तो हम तो कुछ भी नहीं करते मम्मी!" 
उफ्फs s s s s s s s s s
हर समय सोनाक्षी की तारीफ.......
खीज कर वह बच्चों को डाट .....।
इस तरह भी जब बच्चे नहीं मानते तो सोनाक्षी को ही कठोर शब्दों में सुनाती -"मेरे बच्चों जैसा मुर्ख कोई हो ही नहीं सकता। कोई कुछ चिकना-चटपटा खिला देगी तो उसकी जी हजूरी में लगे रहेगें।इनके सीधेपन का फायदा चालबाज  औरतें खूब उठाती हैं। एक तो दुसरे के बच्चों से काम कराने में कोई शर्म नहीं करतीं, ऊपर से खूब वाहवाही भी लूटती हैं।"
सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 24, 2026

sur

सुर छेड़o न अभी तुम सांवरिया। 
तेरी सुर सुन होती मैं  बाबरिया।।
सुर छेड़ न.........
मैं तो paniया  भरण को जाती रहीं, 
छलक-छलक छलक जाए मोरी gagriyan

Sunday, March 22, 2026

यमुना किनारे

हरी बोलो!कृष्ण जी बंसी बजावे यमुना किनारे हरि बोलो।
हरि बोलो! वंशी के धुन में सबको रिझाबे हरी बोलो।
हरी बोलो .....
यमुना किनारे कदम की गछिया,
हरि बोलो गाछ पर चढ़कर डाली नवाबे हरि बोलो ।
हरि बोलो ......
सब सखियन मिली वसन उतारे,
हरि बोलो  यमुना के जल में संग नहाबे हरि बोलो
हरि बोलो .......
देख गोपन की स्नान की रीति, 
हरि बोलो धीरे से जाकर कान्हा वसन चुराबें हरि बोलो ।
हरि बोलो ...
सब सखियां मिली अरज करत हैं,
हरि बोलो कान्हां से विनय कर वसना मांगे हरि बोलो।
हरि बोलो....
 कृष्ण जी बोले वसन मत खोलो,
हरि बोलो जल में वरुण के वास बताए हरि बोलो।
हरि बोलो......
                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, March 18, 2026

तुम से मिलकर

S               तुम से मिल कर 

                तुम  से  मिल कर
                ऐसा लगता है कि 
                कुछ  खोया हुआ 
                पा लिया है हम ने 
            उस रास्ते की याद आई 
        जहाँ कभी हम साथ चलते थे 
     गलबहियाँ डाल,पीठ पर बस्ते लिए 
  नन्हें कदमों से मंजिल की दूरियाँ नापते 
   संजीदगी -से रास्ते की धूल उड़ाते हुए 
    चलते चले  जाते थे, बढ़ते जाते थे, 
       तब  हमारे  मक़सद एक होते थे, 
        और हमारे उद्देश्य एक होते थे,
          सभी सपने भी एक होते थे,
             पर आज हमारा मिलना
              एक सपने से कम नहीं
                
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, March 8, 2026

बुद्धिमान गदहा

एक धोबी था। लोगों के कपड़े धोकर पैसे कमाता। परिवार का भरण-पोषण कर कुछ पैसे बचा भी लेता था।
एक बार उसकी पत्नी बहुत बीमार पड़ी। उसकी इलाज में जब उसके जमा किए गए सारे पैसे खत्म हो गये,तब उसने एक व्यापारी से यह कहकर कुछ पैसे उधार लिए,कि जल्द ही उसके पैसे वापस कर देगा। किन्तु समय पर वह व्यपारी को पैसे वापस नहीं कर पाया। व्यापारी उससे अपने पैसे मांगने आने लगा।इसी बीच उसकी निगाह धोबी के गदहे पर पड़ी। उसने धोबी से कहा- यदि तुम मेरे नहीं वापस कर सकते तो उसके बदले अपने गदहे को ही दे दो।
धोबी ने उससे बहुत कहा कि वह जितने कपड़े धोने के लिए ले जाता और लाता है उसे गदहा ही ढोता है। उसके जाने से कपड़ा धोना कठिन हो जाएगा। लेकिन व्यापारी ने एक नहीं मानी।हारकर धोबी ने व्यपारी  को अपना गदहा दे दिया।
गदहे को अपने मालिक की विवशता देखी नहीं जा रही थी।सोचा व्यपारी के साथ ना जाए।पर नहीं जाने से भी उसके मालिक को पर