दोहे (शब्द आधारित)
काक चेष्टा सभी करे,रखते मन में लोभ।
धोखा दे सब घट भरें,रखकर मन में क्षोभ।।
धर्मों का झण्डा दिखा,फैलाते हैं द्वेष।
हिन्सा,धर्म व झूठ से,देते सदा क्लेश।।
सत्ता की लालच दिखा,जुमले कसे हजार।
कपट भाव से आप वे,बना रहें सरकार ।।
छल से मन घृणा बढ़ा,करवाते हैं वैर।
रखता इसमें पाँव जो,छल की करता सैर।।
कहता बात बढा-चढ़ा,भरता मन उन्माद।
वादा जो करते यहाँ,जीत न रखते याद।।
अन्याय का छत्र बढा,दे न्याय की छाँव।
अपना काम निकाल वे,पीछे खींचे पाँव।।
सुजाता प्रिय 'समृद्घि'
राँची, झारखण्ड