Sunday, May 10, 2026

पिपासा (लघुकथा)

पिपासा

ईर्ष्या और तृष्णा दो बहनें थी।दोनों बहनों को किसी की अच्छाई-बड़ाई सहन नहीं होता था।किसी की प्रगति देख  वे जल-भुन जातीं। हाँ दोनों के जलने- भूनने में थोड़ा अन्तर था।जहां ईर्ष्या किसी की प्रसंशा सुन जल-भूनकर खाक हो जाती, किसी की बुराई करती, किसी के बुरा होने की कामना करती,उनका अपमान करती,वहीं तृष्णा किसी की प्रसंशा सुन प्रसंशा-पिपासित हो जाती। उसे इस बात की चिन्ता हो जाती कि उसकी प्रसन्शा क्यो हो रही है।वह उसके कारकों की तह तक पहुँचने की जी तोड़ कोशिश करती, उसके हर क्रिया-कलापों का बारीकी से अध्ययन करती और कारण जानने के बाद उसे आत्मसात करने अथबा स्वयं को उस विधा मे निपुण करने में लग जाती। इस प्रकार उन सभी की अच्छाइयों को ग्रहण कर वह स्वयं प्रसंशा प्राप्त कर लेती।इस प्रकार सफलता व सम्मान प्राप्ति के सभी मार्ग प्रशस्त करती हुई अपनी मंजिल तक पहुँच कर अपना जीवन सार्थक कर ली।
                                        सुजाता प्रिय  'समृद्धि'

सैनिक

Saturday, May 9, 2026

तेरी नजर ने मुझको चाहा

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽
गजल

तेरी नजर ने मुझको चाहा,
   इसे मुहब्बत का नाम  दे दो।
      मेरी नजर ने  तुम्हीं को देखा,
          सभी को  ऐसा पैगाम दे दो।

खड़ी मै  पथ पर तुम्हें निहारूं।
    मन- ही -मन में तुम्हें पुकारू।
       कभी मिले हम नदी किनारे,
          बस एक ऐसी तू शाम दे दो।

बसी हृदय में तुम्हारी सूरत।
   नहीं किसी की मुझे जरूरत।
        मेरे  हृदय  में सदा विराजो,
           हृदय में अपना ही नाम दे दो।

नहीं घड़ी भर है चैन मुझको।
    अगर न देखे ये नैन तुझको।
      जरा न होना नजर से ओझल,
          मुझे दरस तुम तमाम  दे दो।

तुम्हें जो लगता कि मैं हूँ पागल।
    किया है मुझको तुम्हीं ने घायल। 
        मन को कुछ  तो सुकूं मिलेगा,
          मुझे यह तू छोटा इनाम दे दो।

तू अपने मन में  जरा टटोलो।
    हृदय का अपना तू राज खोलो।
       फिजा में महकती है मेरी खुशबू ,
            सुरा का  ऐसा तू जाम  दे  दो।

  
हैं जहाँ में तेरे जो लोग प्यारे,
    सभी  ही   न्यारे  रहें  हमारे।
         मुझे तो आशीष उन्हीं से लेना,
               सभी  को  मेरा प्रणाम दे दो।

                        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, May 7, 2026

नव किसलय से भरा धरातल

नव किसलय से भरा धरातल 

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरणें फैली हैं,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटे हैं।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती की तपन मिटी है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरीतिमा है मन  में छाई।
     सुजाता प्रिय समृद्घि

Wednesday, May 6, 2026

काश मैने कह दिया होता

काश मैंने कह दिया होता

सामने कुर्सी पर दो महिलाएंँ साथ-साथ बैठी थीं। रमेश बाबू दोनों को बारी-बारी से देख रहे थे। दोनों में कितना अंतर है । एक सुंदर, शांत, समझदार, सहनशील,शालीन, मृदुभाषी ।ना कोई नाज नखरे ना कोई शान- घमंड ।दूसरी दिखने में साधारण अशांत,उदंड,बाचाल,नासमझ, नखरेबाज और घमंडी। पहली महिला उसके दोस्त की पत्नी और दूसरी उनकी स्वयं की पत्नी। वे यादों के भंँवर में गोते लगाने लगे। जब उनकी नौकरी लगी थी, पहली महिला के परिजन उनके घर उनसे विवाह का प्रस्ताव लेकर आए थे। उनके घर वालों को लड़की तो भाई लेकिन दान-दहेज ? ना -ना -ना !हम कोई फ़क़ीर घर में बेटे की शादी नहीं करेंगे ।इतने कम में हम क्यों बेटे का विवाह करें ?कोई मेरा बेटा भागा तो नहीं जा रहा ।साइत अच्छा कहें या किस्मत खराब। अगले महीने ही दूसरा परिवार आया और मुँह- मांगी दहेज देने को तैयार हो गया। अब ढेर किस बात की ? सभी ने तुरंत हामी भर् दी।खुशखबरी रमेश बाबू के कानों तक भी पहुंची। संयोग से वे दोनों लड़कियों को जानते थे ।दोनों उनके ही कॉलेज में पढ़ती थी दोनों ही अपने-अपने गुण-दोषों के कारण चर्चित थीं। वे दोनों की तुलना करने लगे ।जमीन- आसमान का अंतर । पहली दुःख-पीड़ा में भी मुस्कुराने वाली। दूसरी घमंड से बरसने-गरजने वाली ।जी में आया -अपने परिवार को कह दें कम दहेज भी लाती है तो पहली लड़की से ही हमारा विवाह करें ।लेकिन कहे तो कैसे ? कहीं इसका कुछ दूसरा अर्थ ना निकल जाए कि साथ में पढ़ती थी .................... फिर  पैसे कम देंगे तो शादी का सारा खर्च कैसे चलेगा ? लोग सरस्वती और शक्ति से ज्यादा महत्व तो लक्ष्मी को ही देते हैं । सो रमेश बाबू के साथ भी ऐसा ही हुआ। आखिर वे उन धनाढ्य की बेटी के साथ बंध गए ।कुछ ही दिनों में पता चला पहली लड़की की शादी दहेज कम देने के कारण प्राइवेट में काम करने वाला रमेश बाबू के मित्र अजीत से हो गई।
आज उनकी शादी के 25वीं वर्षगांठ है ।मोहल्ले में रहने के कारण अजीत और उसकी पत्नी  भावना भी निमंत्रण पर पधारे। उनकी पत्नी रजनी भावन को जानती थी । इसलिए दोनों साथ -साथ बैठकर बातें करने लगीं। रमेश जी भावना को देख सोच रहे थे । काश मैंने कह दिया होता ,उस दिन अपने परिवार से कि मुझे भावना ही पसंद है ।लोग बातें बनाते, पैसे कम मिलते,लेकिन जीवन तो सुखमय होता। भावना मुहल्ले की सबसे अच्छी और समझदार बहू कहलाती है।और रजनी उफ़ sssss मेरे साथ -साथ मेरे घर वालों और बच्चों के नाक में भी.......................
              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, May 5, 2026

भला कैसे

भला कैसे
बनते हो सभी के लिए,
                        सदा तुम फरिश्ता।
पर क्या जोड़ा है कभी,
                        स्वयं से भी रिस्ता।
  अनगिनत लोगों से है,
                      तुम्हें जान-पहचान।
स्वयं को पहचानने में क्या 
                       कभी लगाए ध्यान। 
   अनेकों से होती है तुम्हारी,
                     बात और मुलाकात। 
   स्वयं से मिलते हो,और 
                    करते हो कभी बात ?
    किसी के चेहरे से पढ़ लेते
                       उसकी अन्तर्व्यथा।
    पर क्या समझ पाते हो कभी
                   अन्तर्मन की अवस्था।
   बताओ तो कोई कि जिसे-
                        नहीं है आत्मज्ञान। 
     तो भला दूसरे को कैसे वह ,
                       सकता है पहचान? 

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Thursday, April 30, 2026

जेठ की दुपहरी

जेठ की दुपहरी

लू की लहरी
तपती दुपहरी
ना मन भाए।

सूर्य तपता
लहक-दहकता
यूँ झुलसाए।

अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।

हो गया जीना
बह रहा पसीना
जी घबराए।

बंद चलना
घूमना औ फिरना
किसे बताएँ।

गर्मी सहना
पढ़ना व लिखना
रास न आए।

सूर्य तपता
तन-मन जलता
किसे बताएँ।

कंठ हैं सूखे
रहकर यू भूखे
प्यास बुझाएं।

सूखे हैं भैया,
कूप ताल-तलैया,
जल धाराएंँ।

जीव आकुल 
तन-मन व्याकुल
घेरी चिंताएँ।

तपन सारा
औ संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'