Saturday, May 16, 2026

कैसे बीज हैं पेड उगात े?

कैसे बीज हैं पेड उगाते

सहज कौतुहल उठा था मन में। नन्हें बीज मिट्टी के कण में। 
कैसे विस्तृत पेड उगाते।कैसे प्यारे फूल खिलाते।
कैसे मीठे फल उपजाते।सबको हैं वे भाते लुभाते।
एक बीज लेकर हाथ मे।छोटी खुरपी भी थी साथ में। 
खुरच-खुरच धरती का दामन।कर डाला बीज को अर्पण।
दो-चार अन्जलि पानी डाल। चल पड़ी मैन खुरपी संहाल।
रोज उठाकर देख करती।कई दिनों का लेखा करती।
एक-दो तीन गीन -गीन।ऐसे बीत गये कितने दिन। 
बीज न उगला कोई पेड। सोची इसको देखून छेड़।
तुरन्त दौड़कर खुरपी लाई।धरती का दामन खुजलाई।
वहाँ, जहाँ बोई थी बीज। खोज रही थी पेड-सी चीज। 
बीज मिल गया थोड़ी देर में। छुपा हुआ मिट्टी के ढेर में। 
नहीं अब वह छोटा था।पहले से ज्यादा मोटा था।
हाँ  एक बात  थी अलग।पड़ उसपर नजर सहज।
उस बीज के एक ओर। निकली थी मानो कोई  डोर। 
ठीक उजले धागे-सी।पीछे या उसके आगे थी।
मैंने सोचा ये क्या हुआ। मतलब कितना नया हुआ। 
दौड़ पड़ी मैन् मान के पास।सत्य जानने की ले आस। 
मा मिल गई जल्दी खैर, पूछा क्या ये हैं बीज के पैर।।
हाथ पैर  हैं या हैं  पूँछ। या फिर दूसरा और है कुछ। ।
मान थी कामों  मेन व्यस्त। सूर्य हुआ जाता था अस्त।।
खीझकर बोली ओ लंगूर।इसका नाम है अंकुर। 
बढ़कर फेंकती पत्तियाँ  दो।उससे निकलती टहनियां दो।
फिर  पत्तों से हैं  भर जाते।और फूलों से हो तर जाते।
और फलों से हैं लद जाते।जो सबको हैं लुभाते।
ऐसे बीज हैं पेड उगाते।ऐसे ही हैं फल-फूल उपजाते।
                                  सुजाता प्रिय 'समृद्घि'




Tuesday, May 12, 2026

हिन्सक पर विश्वास नहीं

एक बार जंगल की राह में,एक बाघ था बंद पिंजरे में। 
राहगीरों को रोककर कहता,खोल दो कोई पिंजरा मेरा।।
बहुत दिनों से हूँ मैं  भूखा,बिन खाये ही मर जाऊँगा।
एक पंडित जी को आई दया,बोले तेरा भरोसा क्या ?
पिंजरे से बाहर आओगे,झट मारकर मुझको खाओगे।
कहा बाघ विश्वास करो, बेकार तुम मुझसे मत डरो।
नहीं खाऊन्गा तुझको मार,मानूँगा मैन् तेरा उपकार। 
तुम मरते को अगर बचाओगे,पुण्य बहुत तुम  पाओगे।
पंडित जी तब करके विश्वास, पहुँच गए पिंजरे के पास। 
खोले पिंजरा हाथ बढ़ाकर,निकला बाघ पिंजरे से बाहर। 
कहा अब तुम्हें मैं खाऊन्गा,अपनी भूख मिटाऊन्गा।
खतरे में उनकी पड़ गई जान,क्यों लिया कहना मान?
नजर घुमाई तब ईधर-उधर,दिखा उनको एक गीदड।
पंडित जी ने पास बुलाया,सारी बातों को समझाया।
बोला गीदड विश्वास न होता,पिंजरे में बाघ है होता।
शैतान बाघ ताव मे आकर, दिखया पिंजरे मे घुसकर। 
कहा गीदड तब पंडित जी से,अब पिंजरा बंद होगा कैसे।
पंडित जी ने पिजरा लगाया,गीदड को विश्वास दिलाया।
कहा गीदड मुझे था विश्वास, पिंजरे में भी होता बाघ। 
जैसे आपको धोखा देकर,निकला यह पिंजरे से बाहर। ।
वैसे ही इसको भी बहलाया,वापस पिंजरे में पहुँचाया।
विश्वास नहीं  हिन्सक पशुओं पर, कब खाएगा धोखा देकर। 



Monday, May 11, 2026

आम

आम बड़ा है मीठा,आम बड़ा है ताजा।
राष्ट्रीय फल है यह ,सभी फलों का राजा।।

टिकोले भी हम खाते,चटनी भी बनाते।
अमावट अचार गुड़म्मा,आमाबट बनाते।।

अमझोरा पीकर हम सब,हैं गर्मी भगाते।
पकाकर  हम लगाते, हम लू को भगाते।।

पकने के बाद हम चूस-चूसकर हैं खाते। 
शर्बत ,आइसक्रीम व फ्रूटी भी हम बनाते।।

मालदा,बीजू,बम्बईया,लंगड़ा, व दशहरी।
गुलाबखश,सिन्दूरी पैबन्दी,और तोतापरी।

आओ सखियाँ आओ,मिलजुल कर खाओ।
कैसा लगा आम तुझे? जरा खाकर बताओ।

                   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'



Sunday, May 10, 2026

पिपासा (लघुकथा)

पिपासा

ईर्ष्या और तृष्णा दो बहनें थी।दोनों बहनों को किसी की अच्छाई-बड़ाई सहन नहीं होता था।किसी की प्रगति देख  वे जल-भुन जातीं। हाँ दोनों के जलने- भूनने में थोड़ा अन्तर था।जहां ईर्ष्या किसी की प्रसंशा सुन जल-भूनकर खाक हो जाती, किसी की बुराई करती, किसी के बुरा होने की कामना करती,उनका अपमान करती,वहीं तृष्णा किसी की प्रसंशा सुन प्रसंशा-पिपासित हो जाती। उसे इस बात की चिन्ता हो जाती कि उसकी प्रसन्शा क्यो हो रही है।वह उसके कारकों की तह तक पहुँचने की जी तोड़ कोशिश करती, उसके हर क्रिया-कलापों का बारीकी से अध्ययन करती और कारण जानने के बाद उसे आत्मसात करने अथबा स्वयं को उस विधा मे निपुण करने में लग जाती। इस प्रकार उन सभी की अच्छाइयों को ग्रहण कर वह स्वयं प्रसंशा प्राप्त कर लेती।इस प्रकार सफलता व सम्मान प्राप्ति के सभी मार्ग प्रशस्त करती हुई अपनी मंजिल तक पहुँच कर अपना जीवन सार्थक कर ली।
                                        सुजाता प्रिय  'समृद्धि'

सैनिक

Saturday, May 9, 2026

तेरी नजर ने मुझको चाहा

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽
गजल

तेरी नजर ने मुझको चाहा,
   इसे मुहब्बत का नाम  दे दो।
      मेरी नजर ने  तुम्हीं को देखा,
          सभी को  ऐसा पैगाम दे दो।

खड़ी मै  पथ पर तुम्हें निहारूं।
    मन- ही -मन में तुम्हें पुकारू।
       कभी मिले हम नदी किनारे,
          बस एक ऐसी तू शाम दे दो।

बसी हृदय में तुम्हारी सूरत।
   नहीं किसी की मुझे जरूरत।
        मेरे  हृदय  में सदा विराजो,
           हृदय में अपना ही नाम दे दो।

नहीं घड़ी भर है चैन मुझको।
    अगर न देखे ये नैन तुझको।
      जरा न होना नजर से ओझल,
          मुझे दरस तुम तमाम  दे दो।

तुम्हें जो लगता कि मैं हूँ पागल।
    किया है मुझको तुम्हीं ने घायल। 
        मन को कुछ  तो सुकूं मिलेगा,
          मुझे यह तू छोटा इनाम दे दो।

तू अपने मन में  जरा टटोलो।
    हृदय का अपना तू राज खोलो।
       फिजा में महकती है मेरी खुशबू ,
            सुरा का  ऐसा तू जाम  दे  दो।

  
हैं जहाँ में तेरे जो लोग प्यारे,
    सभी  ही   न्यारे  रहें  हमारे।
         मुझे तो आशीष उन्हीं से लेना,
               सभी  को  मेरा प्रणाम दे दो।

                        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, May 7, 2026

नव किसलय से भरा धरातल

नव किसलय से भरा धरातल 

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरणें फैली हैं,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटे हैं।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती की तपन मिटी है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरीतिमा है मन  में छाई।
     सुजाता प्रिय समृद्घि