Sunday, October 25, 2026

जय भोलेनाथ

मंदिर पिरामिड 
                       
                           हे 
                         शम्भु 
                     भोले    नाथ 
                पुकार   सुन   लीजिए 
            स्वीकार  करें  मेरी   प्रार्थना 
    आप  आकर   मेरा  दुख   हर  लीजिए 
आपके शरण में हम, यही आस लेकर आए हैं
नाथ!अपने मन में यही विश्वास लेकर आए  हैं 
  मुझ दीन- दुखियों के आप ही दीनानाथ  हैं 
  मेरे संग कोई            नहीं,आप मेरे साथ हैं
  हे   देवों  के     देव     मुझे शरण में लीजिए 
  हे    महादेव    शिव    आप  कृपा  कीजिए 
  हे  त्रिपुरारी    शंकर    संताप  हर   लीजिए 
  दुःख  सब  हर  महादेव  सुख सभी  दीजिए
  दूर कर मेरी दूर्दशा को, जीवन मेरा संवारिए 
  तारे  हैं आप अधमो को,  हमको  भी तारिए
मंदिर पिरामिड 
                       
                           हे 
                         शम्भु 
                     भोले    नाथ 
                पुकार   सुन   लीजिए 
            स्वीकार  करें  मेरी   प्रार्थना 
    आप  आकर   मेरा  दुख   हर  लीजिए 
आपके शरण में हम, यही आस लेकर आए हैं
नाथ!अपने मन में यही विश्वास लेकर आए  हैं 
  मुझ दीन- दुखियों के आप ही दीनानाथ  हैं 
  मेरे संग कोई            नहीं,आप मेरे साथ हैं
  हे   देवों  के     देव     मुझे शरण में लीजिए 
  हे    महादेव    शिव    आप  कृपा  कीजिए 
  हे  त्रिपुरारी    शंकर    संताप  हर   लीजिए 
  दुःख  सब  हर  महादेव  सुख सभी  दीजिए
  दूर कर मेरी दूर्दशा को, जीवन मेरा संवारिए 
  तारे  हैं आप अधमो को,  हमको  भी तारिए

Saturday, October 10, 2026

जय माता शैलपुत्री

जय माँ शैलपुत्री
           हे 
        माता
        प्रथम
      शैलपुत्री
    तेरी महिमा
   है अपरम्पार
देखो जरा निहार 
भक्त खड़े हैं द्वार 
 झुका कर शीश
  हाथों को जोड़
      नमस्कार
         करने
         आये
           हैं 
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
 🙏🙏🙏🙏🙏

Thursday, October 8, 2026

स्त्री

1,       स्त्री  

         उपेक्षा 
      अवहेलना, 
 तिरस्कार,फटकार
     सहकर भी
        मन के 
क्षोभ-भय-तृष्णा को
      दमन कर 
    रखती मन में 
        कामना 
     परिवार की 
    सुख-समृद्धि 
  शांति-सुरक्षा की 
      पूरी करती
         मन्नतें 
 रख व्रत-उपवास 
  माँगती आशीष 
 आँचल फैलाकर 
     हे परमेश्वर!
दीनानाथ! दया करो, 
    सब पाप हरो 
  भूल-चुक,गलती  
    सब माफ करो
  सबकी भला करो 

सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, October 7, 2026

क्यों जाऊँ उस ठांव

क्यों जाऊन उस ठांव ?

                  मैं भला
                  उस ठांव 
                क्यों  जाऊँ 
             जहाँ  झिड़की है
        अपमान है,अवहेलना है
      रिस्तों का कोई  महत्व नहीं
    भावनाओं  की  कोई कद्र नहीं
   पैसा व परिपूर्णता ही पहचान है
    पूजनीय है लोग,जो धनवान हैं
       उन्हीं का है आदर-इज्जत 
           मान-महत्व-मोहब्बत

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Tuesday, October 6, 2026

क्यों ?

?                मैं भला
                 उस ठांव 
               क्यों  जाऊँ 
            जहाँ  झिड़की है
        अपमान है,अवहेलना है
      रिस्तों का कोई महत्व नहीं
     भावनाओं का कोई कद्र नहीं
   पैसा व परिपूर्णता ही पहचान है
    पूजनीय है लोग,जो धनवान हैं
       उन्हीं का है आदर-इज्जत 
           मान-महत्व-मोहब्बत

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Monday, October 5, 2026

प्रदर्शन

     प्रदर्शन                                                  20/04/2001

एक बार एक महात्मा जी को एक अमीर व्यक्ति ने अपने घर आमंत्रित किया।नियत समय पर वे पधारे।
सेठ जी ने उन्हें गद्देदार सोफे पर बैठाया।
महात्मा जी अस्वस्थ। कास रोग से पीड़ित ।बार-बार खाश रहे थे।खासी से परेशान उन्होंने पानी की मांग की।
लेकिन सिर्फ पानी देना सेठ जी की अमीरी का अपमान था।उन्होने अपने नौकर को बुलाकर धीमें  स्वर में  कुछ आदेश दिया।
        महात्मा जी खासते रहे।
थोडी देर बाद नौकर एक चाँदी के ट्रे में बहुत सुंदर चाँदी के गिलास में बहुत सुंदर रंग का खुशबूदार शर्बत लेकर आया और महात्माजी की ओर बढाया। 
खासी से महात्माजी का कंठ सुख रहा था।उन्होने जल्दी से शर्बत का गिलास उठाया और  दो घूंट पीकर गिलास वापस ट्रे में रख दिया।
उनका यह नकारात्मक ढंग देख सेठ जी तिलमिला उठे।गुस्से में  भरकर उन्होंने कहा- महात्मन! आपने यह शर्बत क्यों छोड दिया ? यह बहुत ही महंगे स्क्वाइस से बनाया गया है।
महात्मा जी ने बड़े ही शांत और सरल शब्दों में कहा-बेशक आपने मुझे महंगे पात्र में महंगे शर्बत पेश किया।लेकिन मेरे लिए इसका कोई मोल नहीं। 
सेठ जी ने आश्चर्य मिश्रित रोष में प्रश्न किया-क्यों, आखिर क्यों महात्मन ? मैने तो आपके आदर ...
महात्मा जी उनकी बात  बीच में  ही काटते हुए बड़े ही संयत स्वर में कहा-आप देख रहे हैं, मैं कास रोग से पीड़ित हूँ। इसलिए यह शर्बत कितना भी मूल्यवान क्यों न हो,मेरे लिए कितना हानिकारक है।
इस वक्त मुझे सादे पानी की आवश्यकता थी।न कि इस महंगे शर्बत की।सेठ जी को अपनी भूल के एहसास हुआ। सचमुच धन के घने कोहरे में मदान्थ हो किसी के कष्टों और आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना ही..............
उन्होंने महात्मा जी से अपनी इस भूल के लिए हाथ जोडकर क्षमा माँगी। 
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'