Sunday, May 24, 2026

विश्वासघात

विश्वासघात 

सुंदरवन में जामुन पेड़ पर,रहता था एक बंदर। 
उसके नीचे एक नदी थी,जिसमें रहता एक मगर।
दोनों गहरे मित्र थे,घुल-मिल बातें करते थे।
दोनों  मिलकर जामुन खाते,नदी का पानी पीते थे।
एक दिन बहला बंदर को,मगर ने पीठ पर बैठाया।
कहा मगरनी ने आज, तुमको दावत पर है बुलाया।
पहुँचे जब वे बीच नदी में,मगर ने बंदर को यू बताया।
मैं तो दोस्ती का वास्ता दे,छल से तुम्हें यहाँ  ले आया।
कोई दावत नहीं है घर में,नहीं मगरनी ने तुम्हें बुलाया।
तेरा कलेजा मीठा होगा,तुमने जामुन बहुत है खाया।
इसीलिए तुम्हें मारकर मैं, कलेजा तेरा खाऊन्गा।
बहुत दिनों की हसरत मैन,मन की आज पुराऊन्गा।।
कहा मगर से झट बंदर ने,काबू रखकर भय पर।
मैने अपना कलेजा सूखने,दिया पेड़ के ऊपर। 
जल्दी से मूझको वापस,पेड़ तक तू पहुँचा दे।
उठा पेड़ से कलेजा अपना,झट मैं तुम्हें थमा दूँ 
पुनः पेड़ तक उसको लाया,मगर ने 9बात में आकर।
पेड़ देख झट से चढ बैठा,बंदर ने छलांग लगाकर। ।
ऊँची डाल पर चढ़कर बोला,सुन ओ कपटी मित्र। 
कलेजा पेड़ पर सुख सकता है,यह बात नहीं है विचित्र। 
जो जन अपने मित्र से,विश्वासघात कrte है l
कोई उनका मित्र न होता,सभी दूर रहते हैं

Saturday, May 23, 2026

गाँधी जी के तीन बंदर

गाँधी जी के तीन बंदर 

गाँधीजी  के  तीन  बंदरों ने,
तीन  बातें  हैं  हमें  सिखाई। 

बुरा किसी  का कभी न देखो,
बुरा किसी का कभी न सीखो,
बुराई पर मत तुम नजरें फेंको, 
आँखे ढककर है हमें  सिखाई ।

बुरी बात तुम कभी न  सुनना।
बुरा किसी को कभी न कहना।
बुराई को अपने चित्त न धरना।
कान ढक - कर हमको बताई। 

जब  बोलने को मुख खोलो।
अपने शब्दों को पहले तोलो।
बुरी बात तुम कभी न बोलो।
मुँह ढक - कर  है हमें बताई। 
        सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Friday, May 22, 2026

स्वागत गान (वार्षिकोत्सव)

स्वागत गान

झारखंड की पावन धरती पर आपका स्वागत वंदन।
वार्षिकोत्सव में जो लोग पधारे,उन सबका अभिनंदन है।।

वीर भूमि यह बिरसा की है,इस पर है अभिमान हमें। 
वीर पुत्र के रूप मिला है,कलियुग का भगवान हमें। 
सिद्धू-कान्हू का पुन्य भूमि यह,इसका माटी चंदन है।
वार्षिकोत्सव में जो लोग.........

युग-युग से होता आया है,साहित्य का सम्मान यहाँ। 
बच्चा-बच्चा भी करता है,कलम वीरों का गुणगान यहाँ। 
हर कवयित्री यहाँ की सीता जैसी,हर कवि रघुनन्दन है।
वार्षिकोत्सव में..............

अहोभाग्य हमारा है जो,आप यहाँ पर आये हैं। 
स्वयं रचकर प्यारी मनमोहक,कविताओं को लाये हैं। 
छंद बद्ध कविताएँ लिखना,यहाँ न कोई बंधन है।
वार्षिकोत्सव में................

धन्य हुई यह धरा हमारी,कलाकारों के आने से।
दिशा- दिशा अब गूँज रही है,कविताओं के गाने से।
कवि- मणियो से समृद्घ भारत,रत्न-जड़ित यहाँ कुन्दन है।
वार्षिकोत्सव..............
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

समझदारी

समझदारी

एक टोपी वाला टोपी लेकर। 
बेचता टोपियाँ घूम घूम कर। 
हरी लाल और पीली टोपी।
काली सफेद औ नीली टोपी।
एक दिन वह जब थक गया।
पेड के नीचे जाकर सो गया।
उस पेड़ के ऊपर डाली पर। 
बैठे हुए थे बहुत सारे बंदर।
टोपी वाले को टोपी पहने देख।
पहन ली बंदरों ने भी एक-एक।
टोपीवाला जागा तो टोपी वाली।
टोकरी बिलकुल थी खाली।
उसने जब नजर उठाई ऊपर।
टोपियाँ पहन बैठे थे बंदर।
माँगी टोपियाँ बहुत मगर।
एक न वापस की बंदर। 
तब बुद्धि से उसने काम लिया।
सिर की टोपी खोल फेक दिया।
टोपी वाले को ऐसा करते देख। 
बंदरों ने भी खोल टोपी दी फेंक। 
टोपी वाला तब खुश होकर।
चल पड़ा सभी टोपियाँ लेकर।
समझदारी से जो करते काम। 
मुश्किलें उनकी होती आसान। 
      सुजाता प्रिय समृद्घि

Thursday, May 21, 2026

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी

मीठे-मीठे गीत सुनाती, 
           नन्हीं चिडिया जब घर आती।
सुबह-सबेरे रोज आकार, 
                  मेरी मुनिया को बहलाती।
आती जब वह फुदक-फुदक,
                 मुनिया ताली खूब बजाती। 
जब  भी वह रोने लगती तब,
               गाना गाकर चुप कर जाती। 
नन्ही,प्यारी चोंच खोलकर, 
                   छोटे दाने को चुग जाती।
जब मुन्ने का मन भर जाता,
                 उड़ जाती है पंख फैलाती।
सोती सूरज के सोने पर, 
                पर उससे पहले जग जाती।
स्नेह-प्यार से चीं-चीं गाकर,
                 हर प्राणि को रोज जगाती।

                          सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

तमन्ना ( विधाता छंद)

तमन्ना

तमन्ना है यही मेरी, कि तुम अब पास आ जाओ।
बड़ी तड़पा रहे मुझको,अभी मत और तड़पाओ।।

मुझे जो  छोड़कर भागे, बताया भी नहीं मुझको।
तुझे भी रास कब आया,जताया तो नहीं मुझको।।

जिगर   बेचैन   है  मेरा, परेशानी   तुझे    घेरी।
अगर  मुझको  न तड़पाते, सुधी लेते  जरा मेरी।।

अभी इतनी गुजारिश है,चले आओ निकट मेरे।
तमन्ना आज  पूरी  हो, मिटे  संताप  सब  तेरे।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Sunday, May 17, 2026

संस्कार (लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🙏 

संस्कार (लघुकथा)

"मन बहुत घबराता है सिम्मी की......!"
 "काहे खातिर.........?"
 "तुम तो कुछ समझती ही नहीं। देखो हमारी बेटियांँ जवान हो गई। आजकल के छोरों के रंग-ढंग तो देख ही रही हो । छोकरियों को देखते ही किस कदर.........।अब इन्हें बाहर जाने से....."
    "उनकी नादानियों की सजा हम अपनी बेटियों को क्यों.........."
    "अरे ! हम उन मनचलों को रोक नहीं सकते । पर,अपनी बेटियों को तो घर में सुरक्षित.........।"
       "हांँ-हांँ बेटियाँ ही ना बलि का बकरा हो सकती.......।बेटों को तो छुट्टा साढ़.........."
 "ओह! हम यह नहीं कहते कि बेटों को.....।पर बिटिया को समझाकर घर में...........।"
 "हमें बिटिया को समझा कर घर में नहीं.........,बेटों को समझाकर बाहर भेजना है कि लड़कियों के साथ किसी भी तरह की.............. पाप है। जैसे तुम्हारी मांँ-बहन की आबरू है ।वैसे ही पराई लड़कियों और........।अपनी मांँ- बहन की तरह अन्य लड़कियों की सुरक्षा भी तुम्हारी........।तब देखना हमारी बिटिया भी सुरक्षित और बेटे भी व्यवहारिक और समझदार..........।"

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'