Wednesday, May 6, 2026

काश मैने कह दिया होता

काश मैंने कह दिया होता

सामने कुर्सी पर दो महिलाएंँ साथ-साथ बैठी थीं। रमेश बाबू दोनों को बारी-बारी से देख रहे थे। दोनों में कितना अंतर है । एक सुंदर, शांत, समझदार, सहनशील,शालीन, मृदुभाषी ।ना कोई नाज नखरे ना कोई शान- घमंड ।दूसरी दिखने में साधारण अशांत,उदंड,बाचाल,नासमझ, नखरेबाज और घमंडी। पहली महिला उसके दोस्त की पत्नी और दूसरी उनकी स्वयं की पत्नी। वे यादों के भंँवर में गोते लगाने लगे। जब उनकी नौकरी लगी थी, पहली महिला के परिजन उनके घर उनसे विवाह का प्रस्ताव लेकर आए थे। उनके घर वालों को लड़की तो भाई लेकिन दान-दहेज ? ना -ना -ना !हम कोई फ़क़ीर घर में बेटे की शादी नहीं करेंगे ।इतने कम में हम क्यों बेटे का विवाह करें ?कोई मेरा बेटा भागा तो नहीं जा रहा ।साइत अच्छा कहें या किस्मत खराब। अगले महीने ही दूसरा परिवार आया और मुँह- मांगी दहेज देने को तैयार हो गया। अब ढेर किस बात की ? सभी ने तुरंत हामी भर् दी।खुशखबरी रमेश बाबू के कानों तक भी पहुंची। संयोग से वे दोनों लड़कियों को जानते थे ।दोनों उनके ही कॉलेज में पढ़ती थी दोनों ही अपने-अपने गुण-दोषों के कारण चर्चित थीं। वे दोनों की तुलना करने लगे ।जमीन- आसमान का अंतर । पहली दुःख-पीड़ा में भी मुस्कुराने वाली। दूसरी घमंड से बरसने-गरजने वाली ।जी में आया -अपने परिवार को कह दें कम दहेज भी लाती है तो पहली लड़की से ही हमारा विवाह करें ।लेकिन कहे तो कैसे ? कहीं इसका कुछ दूसरा अर्थ ना निकल जाए कि साथ में पढ़ती थी .................... फिर  पैसे कम देंगे तो शादी का सारा खर्च कैसे चलेगा ? लोग सरस्वती और शक्ति से ज्यादा महत्व तो लक्ष्मी को ही देते हैं । सो रमेश बाबू के साथ भी ऐसा ही हुआ। आखिर वे उन धनाढ्य की बेटी के साथ बंध गए ।कुछ ही दिनों में पता चला पहली लड़की की शादी दहेज कम देने के कारण प्राइवेट में काम करने वाला रमेश बाबू के मित्र अजीत से हो गई।
आज उनकी शादी के 25वीं वर्षगांठ है ।मोहल्ले में रहने के कारण अजीत और उसकी पत्नी  भावना भी निमंत्रण पर पधारे। उनकी पत्नी रजनी भावन को जानती थी । इसलिए दोनों साथ -साथ बैठकर बातें करने लगीं। रमेश जी भावना को देख सोच रहे थे । काश मैंने कह दिया होता ,उस दिन अपने परिवार से कि मुझे भावना ही पसंद है ।लोग बातें बनाते, पैसे कम मिलते,लेकिन जीवन तो सुखमय होता। भावना मुहल्ले की सबसे अच्छी और समझदार बहू कहलाती है।और रजनी उफ़ sssss मेरे साथ -साथ मेरे घर वालों और बच्चों के नाक में भी.......................
              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, May 5, 2026

भला कैसे

भला कैसे
बनते हो सभी के लिए,
                        सदा तुम फरिश्ता।
पर क्या जोड़ा है कभी,
                        स्वयं से भी रिस्ता।
  अनगिनत लोगों से है,
                      तुम्हें जान-पहचान।
स्वयं को पहचानने में क्या 
                       कभी लगाए ध्यान। 
   अनेकों से होती है तुम्हारी,
                     बात और मुलाकात। 
   स्वयं से मिलते हो,और 
                    करते हो कभी बात ?
    किसी के चेहरे से पढ़ लेते
                       उसकी अन्तर्व्यथा।
    पर क्या समझ पाते हो कभी
                   अन्तर्मन की अवस्था।
   बताओ तो कोई कि जिसे-
                        नहीं है आत्मज्ञान। 
     तो भला दूसरे को कैसे वह ,
                       सकता है पहचान? 

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Thursday, April 30, 2026

जेठ की दुपहरी

जेठ की दुपहरी

लू की लहरी
तपती दुपहरी
ना मन भाए।

सूर्य तपता
लहक-दहकता
यूँ झुलसाए।

अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।

हो गया जीना
बह रहा पसीना
जी घबराए।

बंद चलना
घूमना औ फिरना
किसे बताएँ।

गर्मी सहना
पढ़ना व लिखना
रास न आए।

सूर्य तपता
तन-मन जलता
किसे बताएँ।

कंठ हैं सूखे
रहकर यू भूखे
प्यास बुझाएं।

सूखे हैं भैया,
कूप ताल-तलैया,
जल धाराएंँ।

जीव आकुल 
तन-मन व्याकुल
घेरी चिंताएँ।

तपन सारा
औ संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, April 27, 2026

दोहे

दोहे (शब्द आधारित)

काक चेष्टा सभी करे,रखते मन में लोभ।
धोखा दे सब घट भरें,रखकर मन में क्षोभ।।

धर्मों का झण्डा दिखा,फैलाते हैं द्वेष। 
हिन्सा,धर्म व झूठ से,देते सदा क्लेश।।

सत्ता की लालच दिखा,जुमले कसे हजार।
कपट भाव से आप वे,बना रहें सरकार ।।

छल से मन घृणा बढ़ा,करवाते हैं वैर। 
रखता इसमें पाँव जो,छल की करता सैर।।

कहता बात बढा-चढ़ा,भरता मन उन्माद। 
वादा जो करते यहाँ,जीत न रखते याद।।

अन्याय का छत्र बढा,दे न्याय की छाँव। 
अपना काम निकाल वे,पीछे खींचे पाँव।।
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'
             राँची, झारखण्ड

Wednesday, April 22, 2026

तुम चुप मत रहना

तुम चुप मत रहना

हे स्त्री !  तुम चुप मत रहना।
सीखो अब इतिहास बदलना।
हे स्त्री! तुम ..............
अगर सदा तुम रहोगी मौन। 
दर्द हिया -का सुनेगा कौन। 
पीड़ा अपनी सबको कहना।
हे स्त्री! तुम,.............
निज हृदय में लाओ  शक्ति। 
मत करना  दुष्टों की भक्ति।
अन्याय कभी मत तुम सहना।
हे स्त्री ! तुम...................
ख़ामोशी तुमको जब सताए। 
तेरे मन  के टुकड़े कर जाए। 
यूँ टूटकर तुम नहीं बिखरना।
हे स्त्री! तुम,.............
सच्चाई को तुम नहीं छुपाओ।
मक्कारी से भी मत घबराओ।
सीखो तुम भी सदा निखरना।
हे स्त्री ! तुम...............
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, April 20, 2026

अक्षय तृतीया आयी

अक्षय तृतीया आयी

वैशाख माह के शुक्ल-पक्ष की,अक्षय तृतीया आयी।
शुभ तिथि है आज अपने संग,शुभ-सौभाग्य है लायी।

शुभ मुहूर्त है आज,सभी मिल पूजन-अर्चन कर लो।
शुभाशीष पाओ ईश्वर से, और अच्छे-अच्छे वर लो।
देखो भगवन विष्णु के संग में खड़ी है लक्ष्मी -माई।
शुभ तिथि है आज............

बड़ी ही पावन तिथि है, पुण्य-कार्य भी सब कर लो।
अच्छे-सच्चे कर्मों से अपने,  जीवन का घट भर लो।
अच्छे फल देंगे तब ईश्वर,जीवन की है यही कमाई ।
शुभ तिथि है आज...............

आज हम दीन-दुखियों को, चलकर दान करें कुछ। 
दुखित-पीड़ित जो जन हैं,उनका कल्याण करें कुछ।
जरूरतमंद लोगों की भी, हम चलकर करें भलाई।
शुभ तिथि है आज...................

सुख-सौभाग्य का देखो जी,य़ह अक्षय पर्व  है आया।
रोग - शोक,संताप को भी,अब देखो यह दूर भगाया।
रिद्धि-सिद्धि खुश होकर देखो, सुख 'समृद्धि' हैं लाई।
शुभ तिथि है आज .....................

                                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, April 19, 2026

बढता जा

बढता जा
बढ़ता जा तू पग-पग प्रतिपल,जीवन भर बढता जा।
मंजिल की जब राह न सूझे,राह नयी गढता जा।।
            जीवन को तुम कर ले रोशन। 
            खुशियों से तू भर ले तन-मन।
             इस  दुनिया  में  रंग बहुत  है,
             सब  रंगो  से  रंग ले  जीवन। 
रंग लगाकर, प्यार जमाकर, कंचन से मढ़ता जा।
            मारुत  से  बढना  सीखो,
            जलधारा से बहना सीखो।
            इस जीवन की राह बड़ी है,
            चंदा  से  तू  चलना सीखो।
अग्निधूम से शिक्षा लेकर,पर्वत पर चढ़ता जा।
          रुको नहीं तुम जीवन पथ पर,
          बढ़े चलो तुम बस जीवन भर,
          बढ़ना   ही   है  धर्म   तुम्हारा-
         बढ़े चलो तुम यह निश्चय कर। 
सुखी जीवन का मंत्र यही है,मन-ही-मन पढता जा।
            बढ़ने वाले ही मंजिल पाते।
            जीवन पथ में जो न घबराते।
           उतार-चढ़ाव को समतल कर,
            सुंदर - सुगम  हैं राह  बनाते।
अपनी मेहनत से जीवन में,मानिक-मोती जङता जा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्घि'