Friday, May 31, 2019

मौलिक कर्त्तब्य निभाएँ हम

प्रदूषण   दूर  भगाएँ   हम।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ हम।

स्वचछ बनाएँ अपनी धरती।
गोद बैठा जो पालन करती।
कूड़े-कचरे ना फैलाएँ हम।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ हम।

जल है जीवन समझो भाई।
नदी- ताल की करो सफाई।
गंदगी ना इस में बहाएँ हम।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ हम।

स्वच्छ रखेंगे जब हम वायु।
तब हम होंगे निरोग ,दीर्घायु।
धुआँ न कहीं  फैलाएँ  हम ।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ हम।

ध्वनि- विस्तारक नहीं लगाएँ।
शांति से सदा उत्सव  मनाएँ।
बहरापन  दूर   भगाएँ    हम।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ  हम।

वैचारिक प्रदूषण  दूर भगाएँ।
उँच - नीच  का  भेद  मिटाएँ।
सबको   गले  नलगाएँ   हम।
मौलिक कर्तव्य निभाएँ हम।
                     सुजाता प्रिय

शब्द


शब्दों के माया-जाल में हम फँसते चले जाते हैं।
बुरे शब्द पर रोते और अच्छे पर हँसते चले जाते हैं।
अक्षरों के संयोजन से बनाते हैं हम शब्द,
शब्दों के संयोजन से वाक्य- लेख रचते चले जाते हैं।
शब्दों से उजागर होते हैं अन्तर्मन के सुविचार- कुविचार,
शब्द बोल विचारों को समक्ष रखते चले जाते हैं।
मन- दर्पण होते हैं हमारे बोले हुए शब्द,
शब्दों में भावों को हम परसते चले जाते हैं।
तीर- से चुभते हैं और गोलियों- से बेधते हैं शब्द,
कभी शब्दों के मिठास को हम तरसते चले जाते हैं।
मीठी फुहार- सी लगती कभी शब्दों की लरियाँ,
कभी अमृत- बूँद बन मन में बरसते चले जाते हैं।
कभी लयबध मधुर तान बन गूँजते हैं शब्द,
कभी सुर- ताल बन गीतों में लरजते चले जाते हैं।
       सुजाता प्रिय

Wednesday, May 29, 2019

विनती मेरी

हम मौन खड़े वृक्ष कहते हैं,
मत काट मुझे हे मानवजन।
बस  तेरे लिए  विनती मेरी,
मत छाट मुझे हे मानवजन।

शुद्ध वायु निशदिन पहुँचाता,
और  मेघों. को  हूँ  बुलाता।
मैं  पास  तेरे  हे  मानवजन।
मत काट मुझे हे मानवजन।

महामारी  से   रक्षा  करता।
संकट में जीना सीखलाता।
मैं अटल खड़ा हे मानवजन।
मत काट मुझे हे मानवजन।

खग - कुल का मुझ पर डेरा।
मैं   पेट   भरता   हूँ     तेरा।
कर आत्म-तुष्ट हे मानवजन।
मत काट मुझे हे मानवजन।

हर कष्ट सहन कर जी रहा।
हर विष जगत का पी रहा।
बस तेरे लिए हे मानवजन।
मत काट मुझे हे मानवजन।

क्यूँ बना रहा मुझको इंधन।
पर्यावरण ही तेरा है जीवन।
तू समझ जरा हे मानवजन।
मत काट मुझे हे मानवजन
                  सुजाता प्रिय

Thursday, May 23, 2019

एक बात खटकती है

जीत का जश्न
मनया जा रहा
देश में तमाम।
प्रतीत हो रहा ऐसा
हम जीत गए
कोई संग्राम।
जीत नहीं चयन है,
जनता द्वारा जनता की
सरकार का।
खुशी नहीं है जीत की,
न मातम कोई हार  का।
हाँ एक बात मन में,
बहुत ही खटकती है।
दिल में नहीं उतरती है,
गले में अटकती है।
पैदा न हुआ भारत में,
ऐसा दूसरा कोई लाल।
जो और बेहतरीन तरीके से,
देश की बागडोर लेता सम्हाल।
होनहारों की कद्र,
नहीं है अपने देश में ।
प्रतिभावानों को,
स्थान बनाना पड़ता है विदेश में।
यह सच है कि बहुत,
महान है हमारा देश।
किन्तु कुछ त्रुटियों का भी,
है यहाँ समावेश।
न राजनीतिक नेताओं के लिए,
कोई डिग्री निर्धारित है।
न मंत्री पद  शिक्षण- प्रशिक्षण
आधारित है ।
कहीं जिसकी लाठी,उसकी भैंस,
वाली सरकार बलवती है।
कहीं अंधों में काना राजा को,
जनता मजबूर हो चुनती है।
            सुजाता प्रिय

Wednesday, May 22, 2019

छवि

छवि

अरे तुम खुशबू हो न?
हाँ-हाँ s s s लेकिन आप कौन? मैंने आपको पहचाना नहीं? खुशबू आँखें सिकोड़कर उसे पहचानने की कोशिश करने लगी।
  ओह तुमने मुझे पहचाना नहीं? मैं सुमंत हूँ। उसने अपनी आँखों काला चस्मा उतारते हुए कहा।
हम- तुम जिला स्कूल में ' साथ - साथ पढ़ते थे।' अंतिम वाक्य ' साथ- साथ पढ़ते थे' सुमंत के साथ खुशबू ने भी कहा।
  अरे वाह मैं तुम्हें याद आ गया।बता कैसी हो?
ठीक हूँ।
यहीं पूणे में रहती हो?
हाँ।
मुझे पता ही नहीं  था। मैं भी दो सालों से  यहीं रह रहा हूँ।
यहीं नौकरी करते हो?
हाँ
वाह बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर।
कभी समय निकालकर  आ न।
हाँ-हाँ जरूर आऊँगी।इनसे मिलो । ये हैं मि० चंदन! वह साथ में खड़े अपने पति की ओर इशारा करती हुई बोली।और चंदन यह है मेरा
स्कूल का सहपाठी सुमंत'
खुशबू के अधूरे वाक्य को पूरा करते हुए चंदन हँस पड़े।और बड़े गर्मजोशी से बढ़कर सुमंत से हाथ मिलाते हुए कहा- आप भी घर आया करें ! अच्छा लगेगा।
जरूर जरूर उसके बच्चे को पुचकारते हुए सुमंत ने कहा।
पास की दुकान में खड़ा नितिन  अपने सहपाठियों का मिलन एवम्   वार्तालाप देख - सुन रहा था ।उसने झट अपनी आँखों पर चस्मा  चढ़ाते हुए हैट आगे की ओर सरका ली।उसमें कहाँ इतनी हिम्मत थी की उनका सामना कर सके।वह तो कितने सालों से यहीं रहता है।यह भी जाता है कि खुशबू यहीं रहती है।खुशबू के पड़ोसी से उसका कॉन्टैक्ट नम्बर लेकर उसे कॉल भी किया था।लेकिन खुशबू  ने उसे पहचानने से साफ इंकार कर दिया था। उसने सख्त लहजे में उससे फोन करने के लिए मना किया था।कभी - कभी उसे लगता था की वह अपने परिवार के डर से उससे बात नहीं करना चाहती।लेकिन सुमंत से मिलने औरउससे  बात- चीत करने के अंदाज से तो ऐसा लगता है कि उसके पति बड़े ही सुलझे हुए और समझदार विचार के स्वामि हैं।तभी तो सुमंत को अपने घर बुला रहे हैं।पर मुझे तो खुशबू ने ही पहचानने से मना कर दिया ।इसका एकमात्र कारण उसके द्वारा लड़कियों को छेड़- छाड़ करना ही हो सकता है।यह बात सच है कि जबतक वे स्कूल में अध्ययनरत रहे,सभी लड़के- लड़कियों में आपसी संबंध काफी मधुर रहे।उनके विद्यालय में लड़के-लड़कियों में आपस में बात- चीत करने पर कोई पाबंदी  नहीं थी। छोटी कक्षा से ही विद्यालय में उन्हें ऐसे संस्कार दिए गए थे कि तुम लोग आपस में भाई- बहन की तरह हो ।इसलिए एक- दूसरे का मान- सम्मान और सुरक्षा का दायित्व भी तुम सबों पर ही है।और सचमुच वे अपने दायित्व का निर्वहन भी भली- प्रकार करते थे।लेकिन जब वे कॉलेज में अध्ययन करने पहुँचे तो वहाँ का माहौल देख,कुछ मनचले किस्म के लड़के बहक गए।उस बहकने का ही दुष्परिणाम था कि एक बार खुशबू अपनी सहेलियों के साथ कहीं जा रही थी तो नितिन अपने दोस्तों के साथ वहाँ मिल गया।खुशबू ने उससे उसका हाल- समाचार पूछा , लेकिन उसके आवारा दोस्त खुशबू पर अश्लील फब्तियाँ कसने लगे ।खुशबू ने बचाव के लिए नितिन की ओर देखा।लेकिन नितिन तो ऐसी हरक्कतों का आदि हो चुका था। वह अपने दोस्तों की हरकतों पर मुस्कुराता रहा।उस घटना के बाद नितिन जब भी खुशबू से मिलता उसे देख कर व्यंग्य से हँसता और खुशबू तिलमिलाकर उससे किनारा कर लेती।
अभी-अभी खुशबू को सुमंत से खुलकर बात- चीत करते देख उसे आभास हो रहा था कि खुशबू को किसी लड़के से बात-चीत करने और मिलने में न तो कोई झिझक है न कोई पाबंदी।
  उसे खुशबू के साथ किए गए अपने व्यवहार पर बड़ी ग्लानि हो रही थी ।वह पाश्चाताप की अग्नि में जलने लगा।काश वह  अपने विद्यालय और परिवार में दी गई शिक्षा के अनुसार स्त्रियों का सम्मान करना सीखा होता तो आज खुशबू या अन्य लड़कियों की नजरों में  उसकी छवि इतनी बदनुमा नहीं होती।ना जाने कितनी जान- पहचान की लड़कियाँ मिलेगी जीवन में जो खुशबू की ही तरह उसका तिरस्कार करेगी।यदि वह लड़कियों के साथ अच्छा व्यवहार  किया होता तो इतने बड़े और  घर- परिवार से दूर शहर में अपना कहनेे वाला एक खुशबू का परिवार होता ।
अब तो उसे सुमंत से भी मिलने में संकोच लग रहा था कहीं खुशबू उसे सारी बातें बता न दे क्या सोचेगा सुमंत मेरे बारे में ?  कैसी होगी उसकी नजरों में मेरी छवि?
                            सुजाता प्रिय

Monday, May 20, 2019

बतरस

अगर तू रस की रखते हसरत।
यदा- कदा कुछ करले बतरस।

ध्यान   रहे   तेरे  बतरस   से,
लगे न किसी के दिल पर ठेस।
दुखती रग को मत सहलाओ,
किसी के मन में ना हो क्लेश ।
ऐसी  बोली  कभी  न   बोलो,
जिससे मन  में आए  नफरत।
यदा-कदा कुछ करले बतरस।

बस  चिढ़ाना,दिल बहलाना,
देकर    ताना     मनभावन।
थोड़ी मनमानी,  खींचातानी,
सुनकर   खुश हो  जाए मन।
रूठे  को  भी  जरा  मना लो,
किसी के मन में ना हो गफलत
यदा-कदा कुछ करले बतरस।

किन बातों का क्या है मतलव,
हर  भावों  का  समझो  अर्थ।
हँसी- खुशी  के   महफिल में,
मुँह  फुला  चुप  होना   ब्यर्थ।
हँसना  और  हँसना    सीखो,
जीत लो मन सबका हँस-हँस।
यदा-कदा कुछ करले बतरस।

बतरस  है  लोगों  को देता,
जीवन  में  उल्लास   नया।
नोक- झोंक कुछ रोक टोक
तू करता चल परिहास नया।
बतरस से मन प्रफुल्लित होता,
स्वस्थय  बनाता जैसे कसरत।
यदा-कदा कुछ करले बतरस।
                सुजाता प्रिय

Thursday, May 16, 2019

छाया

छाया

कहाँ  पाएँ  हम  थूप में  छाया।
कैसे  ठंढी   हो  अपनी  काया।
पहले सड़कों पर हम चलते थे।
दस  कदमों  पर पेड़ मिलते थे।
चलने  से  थक  जाते  थे   हम।
छाया  में बैठ  सुस्ताते  थे  हम।
पेड़  बने अब  मील के  पत्थर ।
छाया मिलेगी अब हमें  किधर।
हम   पेड़ों   को   काट   रहे  हैं।
दीमक   बनकर   चाट  रहे   हैं।
घर  में  भरे   हुए  हैं   फर्नीचर।
घट   रहे   हैं   पेड़   भूमि   पर।
हमें  नहीं पेड़- पौधों  पर माया।
कौन  देगा  फिर  हमको छाया।
एक-एक यदि हम  पेड़ लगाते ।
शायद  छाया  का  सुख  पाते।
               सुजाता प्रिय

Wednesday, May 15, 2019

अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर विशेष:

परिवार की परिभाषा
परिवार की परिभाषा आज,
बदलती  नजर  आ  रही है।
दो,चार लोगों की गिनतियों में,
सिमटती  नजर  आ  रही है।

हम  दो- हमारे दो को ही,
परिवार  माना  जाता  है।
अन्य सभी रिस्तों को अब,
बेकार  माना   जाता   है।

दादा- दादी,नाना- माना को,
पहचानते  तक  नहीं  बच्चे।
चाचा- बुआ,मामा-मौसी को,
जानते   तक   नहीं    बच्चे।

वैसे   तो  सभी   रिस्तेदार ,
अब सबको होते  नहीं  हैं।
जिनको  ईश्वर ने  है  दिया ,
वे रिस्ते अब ढोते  नहीं  हैं।

आधुनिकता व नगरीकरण ने,
सृजित किया  एकल परिवार।
कयोंकि  संयुक्त रूप से रहना,
आज लोगों को नहीं स्वीकार।
                  सुजाता प्रिय

Tuesday, May 14, 2019

मस्ती भरी छुट्टी

गर्मी  का मौसम, छुट्टी  का दिन ।
आओ नाचे तक धिना धिन धिन।
स्कूल  न जाना, मस्ती  है करना।
होमवर्क बनाना,घर में  है पढ़ना।
ठंढी  हवा   में  जाकर   टहलते।
नदी   किनारे  में खूब   उछलते।
तरबूज खीरा और ककड़ी खाते।
दही -छाछ -लस्सी, शरबत पीते।
शाम  को   करते  हैं   बागबानी।
सुबह  हम सींचते फूलों में पानी।
बगीचे में फैलाकर हम हरियाली ।
झूला  झूलते हैं  लगाकर  डाली।
मस्ती  और छुट्टी  का है  संयोग।
छुट्टी का करना है हमें सदुपयोग।
पर्यावरण  स्वचछ  बनाएँगे  हम।
मस्ती  से  छुट्टी  बिताएगें   हम।
नाचे  ताक  धिना- धिन  - धिन।
आहा - हा गिन -गिन कर -दिन ।
                     सुजाता प्रिय

Saturday, May 11, 2019

मातृ दिवस पर प्यारी माँ को समर्पित(कविता)

प्यारी माँ....

धन्य  हो  मेरी  प्यारी  माँ,
तूने  मुझको  जन्म  दिया।
हृदय लगाकर दूध पिलाया,
पाल- पोषकर बड़ा किया।
स्थान तुम्हारा सबसे ऊँचा,
जिसकी तू अधिकारी  माँ।

आँसू पोछी जब मैं रोई,
लोरी  गा  सुलाती   थी।
नींद मेरी  टूट  जाती तो,
रात- रात जग जाती थी।
मेरे संग तू  बनी  सहेली,
तेरी  सूरत   प्यारी   माँ।

हाथ  पकड़ नन्हें कदमों से,
चलना  तूने  हमें  सिखाया।
माया- ममता का पाठ पढ़ाया,
हँसना-गाना हमें  सिखाया।
तुझसे प्रेरित हो मंजिल पायी,
मैं  तुझपर  बलिहारी  माँ।

शिष्टाचार  सिखाया  तूने,
भला  बुरा का ग्यान दिया।
अक्षर-अक्षर पहचान कराया,
शिक्षा  का  वरदान   दिया।
बुनना- सिलना हमें सिखाया,
प्रथम  शिक्षिका प्यारी  माँ।

तेरे  चरणों में  सब तीरथ,
काशी,मथुरा और कैलाश।
मन  मंदिर  में  तेरी मूरत,
रहती है  तू दिल के पास।
प्रथम देवी तुम ही हो माते,
परम  पुज्या  न्यारी   माँ।
                      सुजाता प्रिय

Friday, May 10, 2019

फर्ज का कर्ज (कहानी)

परमेश्वर को लगभग तीन घंटे बाद होश आई।अपनी बूढ़ी आँखों को चारो ओर घूमाते हुए अंदाज लगाया,अवश्य ही वह किसी अच्छे अस्पताल में पड़ा है। अपनी यादास्त पर जोर डाली।उसे यादआई,वह अपनी पत्नी के साथ फल बेचकर वापस घर जा रहा था,तभी किसी वाहन की चपेट में आ गया था।
उसे होश में आया देख उसकी घरवाली ने डॉक्टर को इतला किया।
डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी।
वह चुपचाप वहीं पड़ा रहा । लेकिन ,उसकी आँखों में कुछ प्रश्नचिह्न उभर रहे थे जिसे  पढ़ते हुए उसकी घरवाली ने बताया_ जब तुम घायलावस्था में सड़क पर पड़े थे तो तुम्हें देखने के लिए वहाँ खाशी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।उस भीड़ में शामिल एक महान महिला ने मुझ बेसहारा को सहारा दिया।उसने तुम्हें अपनी कार से यहाँ लाकर  इलाज किया ।वह इसी अस्पताल में डॉक्टर है।
बहुत महान महिला है वह ।वरना आजकल उपकार करने वाले लोग कहाँ मिलते हैं।हम गरीबों के लिए तो मशीहा बनकर ही आई।नहीं तो हमारी औकात कहाँ थी,इतने बड़े अस्पताल में.........
पत्नी की बात अधूरी ही रह गई।एक महिला ने वार्ड में प्रवेश किया और सीधी उसी की ओर बढ़ने लगी। उसकी घरवाली ने धीरे- से कहा_ यही है वह महान महिला।शायद तुम्हें होश में आया जानकर ही आ रही है।
कैसी है अब तुम्हारी तबियत बाबा ? उसने परमेश्वर के पास आकर हौले से पूछा।
म- म- मैं तो ठीक हूँ बेटी।लेकिन तुम्हें मेरे लिए कितना कष्ट उठाना पड़ा ?
कष्ट कैसी बाबा।आप बूढ़े होकर मेरे काम कर सकते हैं,तो क्या आपकी सेवा करना मेरा फर्ज नहीं ?
परमेश्वर को उसकी आवाज कुछ जानी- पहचानी सी लगी ।उसने नजरें घुमाकर उसे देखा। उसके मानस पटल पर एक वर्ष पूर्व की कुछ मीठी यादें चलचित्र की भाँति  आने लगी_ _ _ _ _ _ _ _ _ _  वह आम बेच रहा है।एक महिला ने आम के दाम पूछा और पाँच किलो आम तौलबाया।
  ले लो मालकिन इसे भी।परमेश्वर ने अपने थोड़े- से बचे आमों की ओर इशारा करते हुए कहा।
कितने होंगे ये ?
यही कोई तीन ,चार किलो होगें। अब धूप में बैठने का मन नहीं कर रहा।
महिला ने दया भाव से उसे देखा और कहा_
लेकिन मैं इतना वजन उठाकर चल नहीं पाऊँगी।वैसे ही गाड़ी खराब है और रिक्शा नहीं मिला तो पैदल जा रही हूँ ।
कहाँ पर है आपका घर ?
यहाँ से सीधे जाकर जहाँ बाईं ओर सड़क मुड़ती है न वहीं पर।
तो आप ले लिजिए ।इसे मैं आपके घर पहुँचा दूँगा।
यह तो बहुत अच्छी बात है ।
चलिए मैं आपको चाय पिलाऊँगी।
चाय पिलाएँगी आप मुझे ? तब तो मैं नहीं पहुँचाता आपके आम।परमेश्वर ने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा।
क़्यों महिला ने हैरानी से पूछा ।
कयोंकि यह लालच हो जाएगी।
इसमें लालच की क्या बात है बाबा।आप बूढ़े होकर मेरी मदद कर सकते हैं , तो क्या मैं बेटी बनकर आप की  सेवा नहीं कर सकती ।
महिला के भावनात्मक स्वर सुन आस- पास के लोग उसे प्रसंशात्मक दृष्टि से देखने लगे।
लेकिन परमेश्वर ने कहा- नहीं बेटी तब यह सेवा न होकर सौदा हो जाएगा।फिर परमेश्वर ने बाकी  बचे आमों को बिना तौले ही महिला के थैले में रख दिए।
महिला ने अंदाज लगाया बचे आम भी पाँच किलो से कम नहीं थे।पर जब उसने पैसे दिए तो परमेश्वर ने नौ किलो आम के ही दाम काटे।फिर महिला के साथ आम पहुँचाने उसके घर चल दिया।
घर पहुँचकर महिला ने फिर एक बार उससे चाय पीने के लिए आग्रह किया।किन्तु परमेश्वर उपकार को ब्यापार में नहीं बदलना चाहता था। उसने चाय पीने से सख्त मना कर दिया।
लेकिन उसे उस दिन क्या पता था_ उपकार करना यदि वह अपना फर्ज समझता था तो उस महिला ने भी उसके उस फर्ज को वर्ष भर अपने पास कर्ज के रूप में रखकर डॉक्टर के रूप में उसकी सेवा कर अपना कर्ज उतार देगी।
बाबा अब आप आराम करें।उसे विचारोतल्लिन देख फिर महिला ने उसे टोका।
परमेश्वर ने एक बार फिर उस महान महिला डॉक्टर के चेहरे पर एक मीठी- सी निगाह डाली और धीरे-से अपनी पलकें मूंद ली।
             सुजाता प्रिय

Wednesday, May 8, 2019

तरबूज


फुटबॉल जैसा गोल- गोल,
रंग इसका हरा- हरा।
गुदा इसका लाल-लाल,
मीठा- मीठा रस भरा।,
शीतलता से भरपूर,
ठंढक यह पहुँचाता है।
जहाँ कभी दिख जाता है,
सबका जी ललचाता है।
काले- काले- बीज इस के,
फोड़े फुंसी दूर भगाए।
विटामिनों से यह भरपूर,
आँख- दाँत निरोग बनाए।
बालू व बंजर  में फलता,
फिर भी पानी से भर जाए।
औषधियों की खान  है ,
बड़े- बड़े यह रोग भगाए।
                  सुजाता प्रिय

Sunday, May 5, 2019

मोदीजी कहिन

आज मई का प्रथम रविवार यानि विश्व हास्य दिवस है ।
इस हास्य दिवस पर मेरी एक छोटी- सी रचना।सिर्फ हँसने- हँसाने के लिए।

    मोदीजी कहिन
चुनाव का महौल कुछ गरम है।
जीत और  हार  का भरम है।
राँची दौरे में  मोदीजी पधारे
पुष्प वर्षा हुई लगी मोदी के नारे।
भगवान बिरसा को कर नमन।
जनता को भी किया संबोधन।
आप कमलदबा मतदान करें।
कल देश गढ़ा था आज भी गढ़े।
हे जनता जनार्दन है यह इरादा।
अबकी जीत पर है मेरा वादा।
अगर इस बार मैं जीत जाउँगा।
तो हे भाइयों ,बहनों,देशभक्तों।
आशक्त, सशक्त और निःशक्तों।
मुँह मीठा करने के लिए।
चाय जरूर पिलाउँगा।
            सुजाता प्रिय

Wednesday, May 1, 2019

मजदूरों को करें नमस्ते

जो मेहनत कर अन्न  उपजाते,
कूप - ताल खोद प्यास बुझाते,
रहने    को    आवास   बनाते,
शीत-धूप    से   हमें    बचाते,
उन मजदूरों के हम गुण गाते।

तन ढकने को   वस्त्र बनाया,
आत्मरक्षा  को अस्त्र बनाया,
जेवर-गहनो  से हमें सजाया,
गर्मी  में हमें दी  शीतल छाया,
उन मजदूरों पर हमको माया।

जिनकी मेहनत से जूते- चप्पल,
हाथ  छड़ी और  टोपी सिर पर,
कल- कारखाने  घर सड़क पर,
वस्तुएँ. ढोते    रख  माथे   पर,
मजदूर  नहीं  ईश्वर  हैं भू  पर।

जिनकी मेहनत से है फुलवारी,
रंग-  बिरंगी   कलियाँ   प्यारी,
पेड़- पौधे और फलियाँ न्यारी,
जिनकी मेहनत से खेती- बारी,
उन  मजदूरों  के  हम आभारी।

जिसने  पर्वत  में  राह बनाई,
जिसने नदियों में नाव चलाई,
आसमां   में  विमान   उड़ाई,
गाड़ियाँ  सड़क  बना दौड़ाई,
उन मजदूरों की बहुत बड़ाई।

जिनकी मेहनत से कागज बनते,
कलम बनाया जिनसेे हम लिखते,
कथा- काव्य  और  नाटक  रचते,
पत्र- पत्रिका  अखबारों  में छपते,
उन   मजदूरों   को  करें   नमस्ते।
      सुजाता प्रिय🙏