Tuesday, October 26, 2021

वह काली रात (संस्मरण)



वह काली रात (संस्मरण)

एक बार दुर्गा-पूजा के अवसर पर हम भाई -बहन अपनी पसंद के कपड़े खरीदने की जिद कर बैठे । बाजार हमारे घर से कुछ दूर थी । पिताजी को कहीं जाने के लिए रात्रि की बस पक़ड़नी थी।तय हुआ कि हमारे पसंद के कपड़े खरीद कर पिताजी हमें दे देंगे और घर तरफ आने वाली भाड़े की गाड़ी में बैठा देंगे। नियम समय पर पिताजी ने हमें गाड़ी पर बैठा दिया।हम तीनों भाई बहन हाथ में लिए नमकीन खाते चले आ रहे थे।कि अचानक गाड़ी खराब हो गयी।हम बहुत देर किसी दूसरी गाड़ी के इंतजार में खड़े रहे। तभी उस गाड़ी से उतरते यात्रियों ने कहा-अब यहां रुकना सही नहीं।रात हो जाएगी तो गाड़ी भी नहीं मिलेगी । इससे अच्छा हम पैदल चल चलें। देखते-देखते सभी लोग बढ़ चले।अब वहां हम तीन भाई-बहन रह गये। हमने कहा -यहां अकेले खड़े रहने से अच्छा है हम भी इनके साथ चल चलें।कुछ दूर चलने के बाद बीच-बीच में सभी लोग अपने-अपने घरों की ओर मुड़ते चले। अब रास्ते में हम तीन भाई-बहन ही चल रहे थे। अंधेरा घिर आया था।काली-रात के अंधेरे में और सुनसान रास्ते की नीरवता मन में यूं ही भय उत्पन्न कर रहा था। लेकिन हम हिम्मत कर बढ़े जा रहे थे।कि अचानक चेहरे पर कपड़े लपेटे तीन लोग हमारे सामने प्रकट हुए और कड़कती आवाज में बोले- जल्दी से सारे सामान हमारे हवाले करो नहीं तो बहुत मारेंगे। हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।डर के मारे सारे सामान के थैले उनके हवाले कर दिए।सामान लेकर उन्होंने पास खड़ी साइकिल में टांग लिए फिर बोले-जल्दी से हमारी साइकिल में बैठ जाओ।इस बार बोलने का लहजा और भी तीखा था।डर और घबराहट से हम कांपने लगे।अब हमें लग रहा था कि ना हम सिर्फ लूटे गए बल्कि अगवा भी कर लिए गए। मां पिताजी ठीक समझाते थे कि बच्चों को कहीं अकेले नहीं जाना चाहिए। लड़खड़ाते कदमों से हम उनकी साईकिल की ओर बढ़ चले तभी एक जानी-पहचानी सी हंसी गूंज पड़ी। मैंने हंसने वाले की ओर देखा। सभी लोगों ने अपने चेहरे के रूमाल हटा लिए। उन्हें देखकर हमारी जान-में- जान आ गयी। क्योंकि वे हमारे चाचा और उनके मित्र थे। उन्होंने कहा-हमें लग रहा था कि तुम लोग को आने में देर होगी। इसलिए तुम्हें लेने चला आया। फिर सोचा थोड़ी शरारत भी हो जाए। तुमलोग के भय दूर करने के लिए हमें अपने चेहरे पर से नकाब हटाने पड़े।
   हम सभी का भय चाचा और उनके साथियों को देख दूर अवश्य हो गया था।पर उस भयावह परिस्थिति की कल्पना कर मन सिहर उठा।ऐसी घटनाएं सच में भी घट सकती है। हमारी जिद्द से मजबूर हो पिताजी हमें बाजार अवश्य लें गये।पर उन्हें क्या पता था गाड़ी बीच में ही खराब हो जाएगी।हम मन -ही-संकल्प कर रहे थे कि अब कभी भी इस तरह की ज़िद नहीं करेंगे।आज भी वह काली रात याद आती है तो मन कांप उठता है।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

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