Monday, May 25, 2026

अपमान (रोला छंद )

अपमान (रोला छंद)

मत कर तू अपमान,किसी का सुन ले भाई।
कर सबका सम्मान, इसी  में   है  चतुराई।।

जिनका हो अपमान, सदा मन उनका रोता।
दिल ही नहीं दिमाग, सदा है आहत होता।।

अपमान जहाँ हो जाय,दुःख है आता मन पर।
उनके दिल की हाय,अहो लगती जीवन भर।।

हरदम रखना ध्यान, न अपमान किसी का हो।
न सम्मान  का दान, कभी  भी फीका हो।।

थोड़ा  कर  लो  मान, मन प्रफुल्लित होगा।
तेरा भी तो आज , चित  प्रसन्नचित्त  होगा।

जो करता है मान, वही  होता  है  राजा।
वही  सभा  में  बैठ, बनता है महाराजा।।

मन्थन कर लो मीत,कहाँ मन आहत होता।
फिर उसका मन जीत,हिया मर्माहत होता।

हरदम रखो ध्यान, कभी यहाँ  दिल न  टूटे।
इतना भी लो जान,किसी का हक ना लूटे।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, May 24, 2026

विश्वासघात

विश्वासघात 

सुंदरवन में जामुन पेड़ पर,रहता था एक बंदर। 
उसके नीचे एक नदी थी,जिसमें रहता एक मगर।
दोनों गहरे मित्र थे,घुल-मिल बातें करते थे।
दोनों  मिलकर जामुन खाते,नदी का पानी पीते थे।
एक दिन बहला बंदर को,मगर ने पीठ पर बैठाया।
कहा मगरनी ने आज, तुमको दावत पर है बुलाया।
पहुँचे जब वे बीच नदी में,मगर ने बंदर को यू बताया।
मैं तो दोस्ती का वास्ता दे,छल से तुम्हें यहाँ  ले आया।
कोई दावत नहीं है घर में,नहीं मगरनी ने तुम्हें बुलाया।
तेरा कलेजा मीठा होगा,तुमने जामुन बहुत है खाया।
इसीलिए तुम्हें मारकर मैं, कलेजा तेरा खाऊन्गा।
बहुत दिनों की हसरत मैन,मन की आज पुराऊन्गा।।
कहा मगर से झट बंदर ने,काबू रखकर भय पर।
मैने अपना कलेजा सूखने,दिया पेड़ के ऊपर। 
जल्दी से मूझको वापस,पेड़ तक तू पहुँचा दे।
उठा पेड़ से कलेजा अपना,झट मैं तुम्हें थमा दूँ 
पुनः पेड़ तक उसको लाया,मगर ने 9बात में आकर।
पेड़ देख झट से चढ बैठा,बंदर ने छलांग लगाकर। ।
ऊँची डाल पर चढ़कर बोला,सुन ओ कपटी मित्र। 
कलेजा पेड़ पर सुख सकता है,यह बात नहीं है विचित्र। 
जो जन अपने मित्र से,विश्वासघात कrte है l
कोई उनका मित्र न होता,सभी दूर रहते हैं

Saturday, May 23, 2026

गाँधी जी के तीन बंदर

गाँधी जी के तीन बंदर 

गाँधीजी  के  तीन  बंदरों ने,
तीन  बातें  हैं  हमें  सिखाई। 

बुरा किसी  का कभी न देखो,
बुरा किसी का कभी न सीखो,
बुराई पर मत तुम नजरें फेंको, 
आँखे ढककर है हमें  सिखाई ।

बुरी बात तुम कभी न  सुनना।
बुरा किसी को कभी न कहना।
बुराई को अपने चित्त न धरना।
कान ढक - कर हमको बताई। 

जब  बोलने को मुख खोलो।
अपने शब्दों को पहले तोलो।
बुरी बात तुम कभी न बोलो।
मुँह ढक - कर  है हमें बताई। 
        सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Friday, May 22, 2026

स्वागत गान (वार्षिकोत्सव)

स्वागत गान

झारखंड की पावन धरती पर आपका स्वागत वंदन।
वार्षिकोत्सव में जो लोग पधारे,उन सबका अभिनंदन है।।

वीर भूमि यह बिरसा की है,इस पर है अभिमान हमें। 
वीर पुत्र के रूप मिला है,कलियुग का भगवान हमें। 
सिद्धू-कान्हू का पुन्य भूमि यह,इसका माटी चंदन है।
वार्षिकोत्सव में जो लोग.........

युग-युग से होता आया है,साहित्य का सम्मान यहाँ। 
बच्चा-बच्चा भी करता है,कलम वीरों का गुणगान यहाँ। 
हर कवयित्री यहाँ की सीता जैसी,हर कवि रघुनन्दन है।
वार्षिकोत्सव में..............

अहोभाग्य हमारा है जो,आप यहाँ पर आये हैं। 
स्वयं रचकर प्यारी मनमोहक,कविताओं को लाये हैं। 
छंद बद्ध कविताएँ लिखना,यहाँ न कोई बंधन है।
वार्षिकोत्सव में................

धन्य हुई यह धरा हमारी,कलाकारों के आने से।
दिशा- दिशा अब गूँज रही है,कविताओं के गाने से।
कवि- मणियो से समृद्घ भारत,रत्न-जड़ित यहाँ कुन्दन है।
वार्षिकोत्सव..............
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

समझदारी

समझदारी

एक टोपी वाला टोपी लेकर। 
बेचता टोपियाँ घूम घूम कर। 
हरी लाल और पीली टोपी।
काली सफेद औ नीली टोपी।
एक दिन वह जब थक गया।
पेड के नीचे जाकर सो गया।
उस पेड़ के ऊपर डाली पर। 
बैठे हुए थे बहुत सारे बंदर।
टोपी वाले को टोपी पहने देख।
पहन ली बंदरों ने भी एक-एक।
टोपीवाला जागा तो टोपी वाली।
टोकरी बिलकुल थी खाली।
उसने जब नजर उठाई ऊपर।
टोपियाँ पहन बैठे थे बंदर।
माँगी टोपियाँ बहुत मगर।
एक न वापस की बंदर। 
तब बुद्धि से उसने काम लिया।
सिर की टोपी खोल फेक दिया।
टोपी वाले को ऐसा करते देख। 
बंदरों ने भी खोल टोपी दी फेंक। 
टोपी वाला तब खुश होकर।
चल पड़ा सभी टोपियाँ लेकर।
समझदारी से जो करते काम। 
मुश्किलें उनकी होती आसान। 
      सुजाता प्रिय समृद्घि

Thursday, May 21, 2026

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी

मीठे-मीठे गीत सुनाती, 
           नन्हीं चिडिया जब घर आती।
सुबह-सबेरे रोज आकार, 
                  मेरी मुनिया को बहलाती।
आती जब वह फुदक-फुदक,
                 मुनिया ताली खूब बजाती। 
जब  भी वह रोने लगती तब,
               गाना गाकर चुप कर जाती। 
नन्ही,प्यारी चोंच खोलकर, 
                   छोटे दाने को चुग जाती।
जब मुन्ने का मन भर जाता,
                 उड़ जाती है पंख फैलाती।
सोती सूरज के सोने पर, 
                पर उससे पहले जग जाती।
स्नेह-प्यार से चीं-चीं गाकर,
                 हर प्राणि को रोज जगाती।

                          सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

तमन्ना ( विधाता छंद)

तमन्ना

तमन्ना है यही मेरी, कि तुम अब पास आ जाओ।
बड़ी तड़पा रहे मुझको,अभी मत और तड़पाओ।।

मुझे जो  छोड़कर भागे, बताया भी नहीं मुझको।
तुझे भी रास कब आया,जताया तो नहीं मुझको।।

जिगर   बेचैन   है  मेरा, परेशानी   तुझे    घेरी।
अगर  मुझको  न तड़पाते, सुधी लेते  जरा मेरी।।

अभी इतनी गुजारिश है,चले आओ निकट मेरे।
तमन्ना आज  पूरी  हो, मिटे  संताप  सब  तेरे।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Sunday, May 17, 2026

संस्कार (लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🙏 

संस्कार (लघुकथा)

"मन बहुत घबराता है सिम्मी की......!"
 "काहे खातिर.........?"
 "तुम तो कुछ समझती ही नहीं। देखो हमारी बेटियांँ जवान हो गई। आजकल के छोरों के रंग-ढंग तो देख ही रही हो । छोकरियों को देखते ही किस कदर.........।अब इन्हें बाहर जाने से....."
    "उनकी नादानियों की सजा हम अपनी बेटियों को क्यों.........."
    "अरे ! हम उन मनचलों को रोक नहीं सकते । पर,अपनी बेटियों को तो घर में सुरक्षित.........।"
       "हांँ-हांँ बेटियाँ ही ना बलि का बकरा हो सकती.......।बेटों को तो छुट्टा साढ़.........."
 "ओह! हम यह नहीं कहते कि बेटों को.....।पर बिटिया को समझाकर घर में...........।"
 "हमें बिटिया को समझा कर घर में नहीं.........,बेटों को समझाकर बाहर भेजना है कि लड़कियों के साथ किसी भी तरह की.............. पाप है। जैसे तुम्हारी मांँ-बहन की आबरू है ।वैसे ही पराई लड़कियों और........।अपनी मांँ- बहन की तरह अन्य लड़कियों की सुरक्षा भी तुम्हारी........।तब देखना हमारी बिटिया भी सुरक्षित और बेटे भी व्यवहारिक और समझदार..........।"

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
कोयल का गली पन्खोन् बाली।
मधुवन की कोयल मतवाली।
कंहुकुहू करती डाली-बा,ई
फुदक-फौट कर 

मैं

मैं                   मैं 
                  स्त्री हूँ 
             तो क्या हुआ 
        मेरा कोई वजूद नहीं 
    मेरे मन में कोई इच्छा नहीं 
  चुप रहती हूँ ! पर गूंगी  नहीं हूँ 
    यह तो मेरा  एक तरीका है 
      माहौल शान्त रखने का 
       नहीं चाहती हूँ विषाद 
        इसीलिए उदासी पर 
    परदा डाल मुस्करा देती हूँ 
दिल के अन्दर कितनी भावनाएँ 
 हिलोरे लेती हैं तूफ़ान की तरह 
   पर उसे बेरहमी से दवाकर
        शान्त कराती देती हूँ
  
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Saturday, May 16, 2026

कैसे बीज हैं पेड उगात े?

कैसे बीज हैं पेड उगाते

सहज कौतुहल उठा था मन में। नन्हें बीज मिट्टी के कण में। 
कैसे विस्तृत पेड उगाते।कैसे प्यारे फूल खिलाते।
कैसे मीठे फल उपजाते।सबको हैं वे भाते लुभाते।
एक बीज लेकर हाथ मे।छोटी खुरपी भी थी साथ में। 
खुरच-खुरच धरती का दामन।कर डाला बीज को अर्पण।
दो-चार अन्जलि पानी डाल। चल पड़ी मैन खुरपी संहाल।
रोज उठाकर देख करती।कई दिनों का लेखा करती।
एक-दो तीन गीन -गीन।ऐसे बीत गये कितने दिन। 
बीज न उगला कोई पेड। सोची इसको देखून छेड़।
तुरन्त दौड़कर खुरपी लाई।धरती का दामन खुजलाई।
वहाँ, जहाँ बोई थी बीज। खोज रही थी पेड-सी चीज। 
बीज मिल गया थोड़ी देर में। छुपा हुआ मिट्टी के ढेर में। 
नहीं अब वह छोटा था।पहले से ज्यादा मोटा था।
हाँ  एक बात  थी अलग।पड़ उसपर नजर सहज।
उस बीज के एक ओर। निकली थी मानो कोई  डोर। 
ठीक उजले धागे-सी।पीछे या उसके आगे थी।
मैंने सोचा ये क्या हुआ। मतलब कितना नया हुआ। 
दौड़ पड़ी मैन् मान के पास।सत्य जानने की ले आस। 
मा मिल गई जल्दी खैर, पूछा क्या ये हैं बीज के पैर।।
हाथ पैर  हैं या हैं  पूँछ। या फिर दूसरा और है कुछ। ।
मान थी कामों  मेन व्यस्त। सूर्य हुआ जाता था अस्त।।
खीझकर बोली ओ लंगूर।इसका नाम है अंकुर। 
बढ़कर फेंकती पत्तियाँ  दो।उससे निकलती टहनियां दो।
फिर  पत्तों से हैं  भर जाते।और फूलों से हो तर जाते।
और फलों से हैं लद जाते।जो सबको हैं लुभाते।
ऐसे बीज हैं पेड उगाते।ऐसे ही हैं फल-फूल उपजाते।
                                  सुजाता प्रिय 'समृद्घि'




Tuesday, May 12, 2026

हिन्सक पर विश्वास नहीं

एक बार जंगल की राह में,एक बाघ था बंद पिंजरे में। 
राहगीरों को रोककर कहता,खोल दो कोई पिंजरा मेरा।।
बहुत दिनों से हूँ मैं  भूखा,बिन खाये ही मर जाऊँगा।
एक पंडित जी को आई दया,बोले तेरा भरोसा क्या ?
पिंजरे से बाहर आओगे,झट मारकर मुझको खाओगे।
कहा बाघ विश्वास करो, बेकार तुम मुझसे मत डरो।
नहीं खाऊन्गा तुझको मार,मानूँगा मैन् तेरा उपकार। 
तुम मरते को अगर बचाओगे,पुण्य बहुत तुम  पाओगे।
पंडित जी तब करके विश्वास, पहुँच गए पिंजरे के पास। 
खोले पिंजरा हाथ बढ़ाकर,निकला बाघ पिंजरे से बाहर। 
कहा अब तुम्हें मैं खाऊन्गा,अपनी भूख मिटाऊन्गा।
खतरे में उनकी पड़ गई जान,क्यों लिया कहना मान?
नजर घुमाई तब ईधर-उधर,दिखा उनको एक गीदड।
पंडित जी ने पास बुलाया,सारी बातों को समझाया।
बोला गीदड विश्वास न होता,पिंजरे में बाघ है होता।
शैतान बाघ ताव मे आकर, दिखया पिंजरे मे घुसकर। 
कहा गीदड तब पंडित जी से,अब पिंजरा बंद होगा कैसे।
पंडित जी ने पिजरा लगाया,गीदड को विश्वास दिलाया।
कहा गीदड मुझे था विश्वास, पिंजरे में भी होता बाघ। 
जैसे आपको धोखा देकर,निकला यह पिंजरे से बाहर। ।
वैसे ही इसको भी बहलाया,वापस पिंजरे में पहुँचाया।
विश्वास नहीं  हिन्सक पशुओं पर, कब खाएगा धोखा देकर। 



Monday, May 11, 2026

आम

आम बड़ा है मीठा,आम बड़ा है ताजा।
राष्ट्रीय फल है यह ,सभी फलों का राजा।।

टिकोले भी हम खाते,चटनी भी बनाते।
अमावट अचार गुड़म्मा,आमाबट बनाते।।

अमझोरा पीकर हम सब,हैं गर्मी भगाते।
पकाकर  हम लगाते, हम लू को भगाते।।

पकने के बाद हम चूस-चूसकर हैं खाते। 
शर्बत ,आइसक्रीम व फ्रूटी भी हम बनाते।।

मालदा,बीजू,बम्बईया,लंगड़ा, व दशहरी।
गुलाबखश,सिन्दूरी पैबन्दी,और तोतापरी।

आओ सखियाँ आओ,मिलजुल कर खाओ।
कैसा लगा आम तुझे? जरा खाकर बताओ।

                   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'



Sunday, May 10, 2026

पिपासा (लघुकथा)

पिपासा

ईर्ष्या और तृष्णा दो बहनें थी।दोनों बहनों को किसी की अच्छाई-बड़ाई सहन नहीं होता था।किसी की प्रगति देख  वे जल-भुन जातीं। हाँ दोनों के जलने- भूनने में थोड़ा अन्तर था।जहां ईर्ष्या किसी की प्रसंशा सुन जल-भूनकर खाक हो जाती, किसी की बुराई करती, किसी के बुरा होने की कामना करती,उनका अपमान करती,वहीं तृष्णा किसी की प्रसंशा सुन प्रसंशा-पिपासित हो जाती। उसे इस बात की चिन्ता हो जाती कि उसकी प्रसन्शा क्यो हो रही है।वह उसके कारकों की तह तक पहुँचने की जी तोड़ कोशिश करती, उसके हर क्रिया-कलापों का बारीकी से अध्ययन करती और कारण जानने के बाद उसे आत्मसात करने अथबा स्वयं को उस विधा मे निपुण करने में लग जाती। इस प्रकार उन सभी की अच्छाइयों को ग्रहण कर वह स्वयं प्रसंशा प्राप्त कर लेती।इस प्रकार सफलता व सम्मान प्राप्ति के सभी मार्ग प्रशस्त करती हुई अपनी मंजिल तक पहुँच कर अपना जीवन सार्थक कर ली।
                                        सुजाता प्रिय  'समृद्धि'

सैनिक

Saturday, May 9, 2026

तेरी नजर ने मुझको चाहा

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽
गजल

तेरी नजर ने मुझको चाहा,
   इसे मुहब्बत का नाम  दे दो।
      मेरी नजर ने  तुम्हीं को देखा,
          सभी को  ऐसा पैगाम दे दो।

खड़ी मै  पथ पर तुम्हें निहारूं।
    मन- ही -मन में तुम्हें पुकारू।
       कभी मिले हम नदी किनारे,
          बस एक ऐसी तू शाम दे दो।

बसी हृदय में तुम्हारी सूरत।
   नहीं किसी की मुझे जरूरत।
        मेरे  हृदय  में सदा विराजो,
           हृदय में अपना ही नाम दे दो।

नहीं घड़ी भर है चैन मुझको।
    अगर न देखे ये नैन तुझको।
      जरा न होना नजर से ओझल,
          मुझे दरस तुम तमाम  दे दो।

तुम्हें जो लगता कि मैं हूँ पागल।
    किया है मुझको तुम्हीं ने घायल। 
        मन को कुछ  तो सुकूं मिलेगा,
          मुझे यह तू छोटा इनाम दे दो।

तू अपने मन में  जरा टटोलो।
    हृदय का अपना तू राज खोलो।
       फिजा में महकती है मेरी खुशबू ,
            सुरा का  ऐसा तू जाम  दे  दो।

  
हैं जहाँ में तेरे जो लोग प्यारे,
    सभी  ही   न्यारे  रहें  हमारे।
         मुझे तो आशीष उन्हीं से लेना,
               सभी  को  मेरा प्रणाम दे दो।

                        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, May 7, 2026

नव किसलय से भरा धरातल

नव किसलय से भरा धरातल 

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरणें फैली हैं,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटे हैं।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती की तपन मिटी है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरीतिमा है मन  में छाई।
     सुजाता प्रिय समृद्घि

Wednesday, May 6, 2026

काश मैने कह दिया होता

काश मैंने कह दिया होता

सामने कुर्सी पर दो महिलाएंँ साथ-साथ बैठी थीं। रमेश बाबू दोनों को बारी-बारी से देख रहे थे। दोनों में कितना अंतर है । एक सुंदर, शांत, समझदार, सहनशील,शालीन, मृदुभाषी ।ना कोई नाज नखरे ना कोई शान- घमंड ।दूसरी दिखने में साधारण अशांत,उदंड,बाचाल,नासमझ, नखरेबाज और घमंडी। पहली महिला उसके दोस्त की पत्नी और दूसरी उनकी स्वयं की पत्नी। वे यादों के भंँवर में गोते लगाने लगे। जब उनकी नौकरी लगी थी, पहली महिला के परिजन उनके घर उनसे विवाह का प्रस्ताव लेकर आए थे। उनके घर वालों को लड़की तो भाई लेकिन दान-दहेज ? ना -ना -ना !हम कोई फ़क़ीर घर में बेटे की शादी नहीं करेंगे ।इतने कम में हम क्यों बेटे का विवाह करें ?कोई मेरा बेटा भागा तो नहीं जा रहा ।साइत अच्छा कहें या किस्मत खराब। अगले महीने ही दूसरा परिवार आया और मुँह- मांगी दहेज देने को तैयार हो गया। अब ढेर किस बात की ? सभी ने तुरंत हामी भर् दी।खुशखबरी रमेश बाबू के कानों तक भी पहुंची। संयोग से वे दोनों लड़कियों को जानते थे ।दोनों उनके ही कॉलेज में पढ़ती थी दोनों ही अपने-अपने गुण-दोषों के कारण चर्चित थीं। वे दोनों की तुलना करने लगे ।जमीन- आसमान का अंतर । पहली दुःख-पीड़ा में भी मुस्कुराने वाली। दूसरी घमंड से बरसने-गरजने वाली ।जी में आया -अपने परिवार को कह दें कम दहेज भी लाती है तो पहली लड़की से ही हमारा विवाह करें ।लेकिन कहे तो कैसे ? कहीं इसका कुछ दूसरा अर्थ ना निकल जाए कि साथ में पढ़ती थी .................... फिर  पैसे कम देंगे तो शादी का सारा खर्च कैसे चलेगा ? लोग सरस्वती और शक्ति से ज्यादा महत्व तो लक्ष्मी को ही देते हैं । सो रमेश बाबू के साथ भी ऐसा ही हुआ। आखिर वे उन धनाढ्य की बेटी के साथ बंध गए ।कुछ ही दिनों में पता चला पहली लड़की की शादी दहेज कम देने के कारण प्राइवेट में काम करने वाला रमेश बाबू के मित्र अजीत से हो गई।
आज उनकी शादी के 25वीं वर्षगांठ है ।मोहल्ले में रहने के कारण अजीत और उसकी पत्नी  भावना भी निमंत्रण पर पधारे। उनकी पत्नी रजनी भावन को जानती थी । इसलिए दोनों साथ -साथ बैठकर बातें करने लगीं। रमेश जी भावना को देख सोच रहे थे । काश मैंने कह दिया होता ,उस दिन अपने परिवार से कि मुझे भावना ही पसंद है ।लोग बातें बनाते, पैसे कम मिलते,लेकिन जीवन तो सुखमय होता। भावना मुहल्ले की सबसे अच्छी और समझदार बहू कहलाती है।और रजनी उफ़ sssss मेरे साथ -साथ मेरे घर वालों और बच्चों के नाक में भी.......................
              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, May 5, 2026

भला कैसे

भला कैसे
बनते हो सभी के लिए,
                        सदा तुम फरिश्ता।
पर क्या जोड़ा है कभी,
                        स्वयं से भी रिस्ता।
  अनगिनत लोगों से है,
                      तुम्हें जान-पहचान।
स्वयं को पहचानने में क्या 
                       कभी लगाए ध्यान। 
   अनेकों से होती है तुम्हारी,
                     बात और मुलाकात। 
   स्वयं से मिलते हो,और 
                    करते हो कभी बात ?
    किसी के चेहरे से पढ़ लेते
                       उसकी अन्तर्व्यथा।
    पर क्या समझ पाते हो कभी
                   अन्तर्मन की अवस्था।
   बताओ तो कोई कि जिसे-
                        नहीं है आत्मज्ञान। 
     तो भला दूसरे को कैसे वह ,
                       सकता है पहचान? 

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Thursday, April 30, 2026

जेठ की दुपहरी

जेठ की दुपहरी

लू की लहरी
तपती दुपहरी
ना मन भाए।

सूर्य तपता
लहक-दहकता
यूँ झुलसाए।

अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।

हो गया जीना
बह रहा पसीना
जी घबराए।

बंद चलना
घूमना औ फिरना
किसे बताएँ।

गर्मी सहना
पढ़ना व लिखना
रास न आए।

सूर्य तपता
तन-मन जलता
किसे बताएँ।

कंठ हैं सूखे
रहकर यू भूखे
प्यास बुझाएं।

सूखे हैं भैया,
कूप ताल-तलैया,
जल धाराएंँ।

जीव आकुल 
तन-मन व्याकुल
घेरी चिंताएँ।

तपन सारा
औ संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, April 27, 2026

दोहे

दोहे (शब्द आधारित)

काक चेष्टा सभी करे,रखते मन में लोभ।
धोखा दे सब घट भरें,रखकर मन में क्षोभ।।

धर्मों का झण्डा दिखा,फैलाते हैं द्वेष। 
हिन्सा,धर्म व झूठ से,देते सदा क्लेश।।

सत्ता की लालच दिखा,जुमले कसे हजार।
कपट भाव से आप वे,बना रहें सरकार ।।

छल से मन घृणा बढ़ा,करवाते हैं वैर। 
रखता इसमें पाँव जो,छल की करता सैर।।

कहता बात बढा-चढ़ा,भरता मन उन्माद। 
वादा जो करते यहाँ,जीत न रखते याद।।

अन्याय का छत्र बढा,दे न्याय की छाँव। 
अपना काम निकाल वे,पीछे खींचे पाँव।।
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'
             राँची, झारखण्ड

Wednesday, April 22, 2026

तुम चुप मत रहना

तुम चुप मत रहना

हे स्त्री !  तुम चुप मत रहना।
सीखो अब इतिहास बदलना।
हे स्त्री! तुम ..............
अगर सदा तुम रहोगी मौन। 
दर्द हिया -का सुनेगा कौन। 
पीड़ा अपनी सबको कहना।
हे स्त्री! तुम,.............
निज हृदय में लाओ  शक्ति। 
मत करना  दुष्टों की भक्ति।
अन्याय कभी मत तुम सहना।
हे स्त्री ! तुम...................
ख़ामोशी तुमको जब सताए। 
तेरे मन  के टुकड़े कर जाए। 
यूँ टूटकर तुम नहीं बिखरना।
हे स्त्री! तुम,.............
सच्चाई को तुम नहीं छुपाओ।
मक्कारी से भी मत घबराओ।
सीखो तुम भी सदा निखरना।
हे स्त्री ! तुम...............
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, April 20, 2026

अक्षय तृतीया आयी

अक्षय तृतीया आयी

वैशाख माह के शुक्ल-पक्ष की,अक्षय तृतीया आयी।
शुभ तिथि है आज अपने संग,शुभ-सौभाग्य है लायी।

शुभ मुहूर्त है आज,सभी मिल पूजन-अर्चन कर लो।
शुभाशीष पाओ ईश्वर से, और अच्छे-अच्छे वर लो।
देखो भगवन विष्णु के संग में खड़ी है लक्ष्मी -माई।
शुभ तिथि है आज............

बड़ी ही पावन तिथि है, पुण्य-कार्य भी सब कर लो।
अच्छे-सच्चे कर्मों से अपने,  जीवन का घट भर लो।
अच्छे फल देंगे तब ईश्वर,जीवन की है यही कमाई ।
शुभ तिथि है आज...............

आज हम दीन-दुखियों को, चलकर दान करें कुछ। 
दुखित-पीड़ित जो जन हैं,उनका कल्याण करें कुछ।
जरूरतमंद लोगों की भी, हम चलकर करें भलाई।
शुभ तिथि है आज...................

सुख-सौभाग्य का देखो जी,य़ह अक्षय पर्व  है आया।
रोग - शोक,संताप को भी,अब देखो यह दूर भगाया।
रिद्धि-सिद्धि खुश होकर देखो, सुख 'समृद्धि' हैं लाई।
शुभ तिथि है आज .....................

                                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, April 19, 2026

बढता जा

बढता जा
बढ़ता जा तू पग-पग प्रतिपल,जीवन भर बढता जा।
मंजिल की जब राह न सूझे,राह नयी गढता जा।।
            जीवन को तुम कर ले रोशन। 
            खुशियों से तू भर ले तन-मन।
             इस  दुनिया  में  रंग बहुत  है,
             सब  रंगो  से  रंग ले  जीवन। 
रंग लगाकर, प्यार जमाकर, कंचन से मढ़ता जा।
            मारुत  से  बढना  सीखो,
            जलधारा से बहना सीखो।
            इस जीवन की राह बड़ी है,
            चंदा  से  तू  चलना सीखो।
अग्निधूम से शिक्षा लेकर,पर्वत पर चढ़ता जा।
          रुको नहीं तुम जीवन पथ पर,
          बढ़े चलो तुम बस जीवन भर,
          बढ़ना   ही   है  धर्म   तुम्हारा-
         बढ़े चलो तुम यह निश्चय कर। 
सुखी जीवन का मंत्र यही है,मन-ही-मन पढता जा।
            बढ़ने वाले ही मंजिल पाते।
            जीवन पथ में जो न घबराते।
           उतार-चढ़ाव को समतल कर,
            सुंदर - सुगम  हैं राह  बनाते।
अपनी मेहनत से जीवन में,मानिक-मोती जङता जा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Saturday, April 18, 2026

शिक्षक

नए-नए नित ग्यान सिखाने आते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।

अक्षर लिखना ,शब्द बनाना और वाक्य रचवाते।
निबंध लिखना ,कविता रचना, सब हमको सिखलाते।
अक्षर-अक्षर ग्यान दे साक्षर ,बनाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।

अनुशासन  की शिक्षा देते, कहते पालन करना।
गुरूजनों का आदर करना ,मानना हरदम कहना।
जीवन जीने की कला,सिखलाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।

टेढ़े-मेढ़े ,जीवन पथ पर ,चलना हमें सिखाते।
भला-बुरा का ग्यान देकर ,जीना हमें सिखाते।
अच्छे-अच्छे कर्म करना, बतलाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।
                                       सुजाता प्रिय

Friday, April 17, 2026

धूर्त की पहचान

धूर्त की पहचान 

मीठी-बोली बोलना,धूर्तों की पहचान।
मीठा-मीठा बोलकर,बात सभी ले जान।।

हर मानव से दोस्ती,करते आठो याम।
भले-मानुस बने सदा,जपे राम का नाम।।

मिल्लत की बातें बता,दिखलाते हैं प्यार। 
आग पीठ पीछे लगा,लड़वाते ललकार।।

मुँह पर करते हैं सदा,प्यारी-प्यारी बात।
पीठ पीछे वही करे,जा करके आघात।।

दिल की बाते पूछते,मीठी बोली बोल। 
वक्त-मिले तो आपके,राज सभी दे खोल।।

करो सभी से दोस्ती,पर रखो यह ध्यान। 
जितना ही दरकार हो,उतना ही दो मान।।

देते धोखा चाल चल,सुनो खोलकर कान।
बार हैं करते पीठ पर,रहो तुम सावधान।।

Thursday, April 16, 2026

जीवन की कड़ी

S.             जीवन की कड़ी
  
                  भीड़  के पीछे 
                   चलना छोड़ो 
                  उसके बीच में 
             अपना रास्ता बनाओ
        लोग क्या कहेंगे,क्या सोचेंगे 
    इसे छोड़ अपनी राह चलते जाओ 
  मुश्किल से भाग मत,उससे टकरा जा 
असफलता से भी मत घबरा,कोशिश कर 
 धैर्य रखो!क्योंकि सफ़लता समय लेती है 
  परीक्षा भी लेती है, कुछ सिखाती भी है 
   सभी को छोड़ो, स्वयं पर भरोसा रखो,
    क्योंकि तुम स्वयं ही  अपना मित्र हो 
      प्रारंभ  किया है तो पूरा भी करो 
        पूर्णता ही  जीवन की कड़ी है 

               सुजाता प्रिय समृद्धि

जीवन की कडी

Monday, April 13, 2026

पत्थर के गुरु

पत्थर के गुरु 
लेकर दृढ़ विश्वास हृदय में,पहुंँचा एकलव्य द्रोण के पास।
नतमस्तक हो बोला-गुरुवर !धनुर्विद्या की ले आया आस।।कृपया चलाना धनुष सिखा दें,मुझको आप प्रसाद स्वरूप।छोटे-छोटे कुछ नियम बता दें, मुझ छोटे -बालक अनुरूप।।
पूछा - गुरुवर ने-हे अनुगामी! तुम किस कुल के बालक हो।कौन तुम्हारे मात - पिता हैं ,बोलो- तुम किसके पालक हो।।
बोला- एकलव्य,हाथ जोड़कर,जंगल की कुटिया में रहता हूँ।
छोटे कुल का बालक हूंँ मैं, रूखी - सूखी खाकर पलता हूंँ।
बोले गुरुवर- मैं तो केवल,राजकुमारों को ही देता हूंँ शिक्षा। 
छोटे कुल के बालक हो तो,  मत माँगो तुम मुझसे भिक्षा।।विदीर्ण हृदय में दृढ़ संकल्प लें,चला एकलव्य अपने घर।
प्रतिमा, गुरु की एक बनाया,काट-तरास कर एक पत्थर।।
नित्य चरण-रज शीष लगता, शीश नवाकर मूर्ति के पास। स्वनिर्मित धनुष-वाण ले नित्य,दृढ़ मन से करता अभ्यास।।
एक सुबह जब कर रहा था, अभ्यास वह तीर चलाने का।
एक स्वान आ लगा भौंकने,किया प्रयास बड़ा मनाने का।।
बहुत उसे पुचकार मनाया,लेकिन बात न माना वह कुत्ता। जितना उसको शांत कराता,उतनी-ही जोर से था भूंकता।। भटक रहा था ध्यान एकलव्य का,केंद्रित न कर पाता मन।
जब धनुष पर वह बान चढ़ाता,स्वान भौंकता था उस क्षण।।
सहन न कर पाया अवरोध, तिरंदाजी के अभ्यास विरुद्ध ।कुशलता से तीर चला,कर दिया- स्वान का कंठ अवरुद्ध।।*****************************************नगर नगर- गाँव से दूर-अरण्य में,प्रातः-काल गुरुवर द्रोणाचार्य। 
राजकुमारों को धनुष सीखने का,कर रहे थे पुनीत कार्य।। भांँति-भाँति के गुर्र गहराई से, वे शिष्यों को सिखा रहे थे। बारीकी से तीरंदाजी के कुछ,करतब उनको बता रहे थे।। रोमांचित हो सब सीख रहे थे,तिरंदाजी का यह रूप नया।
नई रीति को और नई नीति को, नए नियम व स्वरूप नया।।

इसी समय कहीं से भगता,उनका कुत्ता आ गया सिर टेक।सभी शिष्य और गुरु ने देखा,उसके कंठ में थे तीर अनेक।।गुरु-शिष्य सब हुए अचंभित,तीरंदाज की इस कुशलता पर।
रक्त का एक बूंद न बहा था,स्तब्ध थे उसकी सफलता पर।।
बस उसका कंठ अवरुद्ध था,ताकि वह अब भौंक नहीं पाए। अभ्यास करने वाले को आगे, वह ध्यान नहीं भटका पाए।।
चल पड़े -गुरुवर शिष्यों को ले, ढूंढने उस नव धनुर्धारी को।
 जिसने उनको दिखलाया था,तीरंदाजी की कलाकारी को।। *******************************************
तन्मयता से अभ्यास वहाँ वह,कर रहा था तीर चलाने का ।
अलग-अलग,नये अंदाज में ,निशाना वह वहांँ लगाने का।।
ध्यान भंग कर गुरुवर ने पूछा,कौन तुम्हारे गुरु जी हैं तात।
कौन तुमको तीर चलाने की,यह सुविद्या देते  हैं  सौगात।।
कहा-एकलव्य ने-विनीत भाव से,मैंने गुरु आपको माना। प्रत्यक्ष नहीं तो,मूर्त रूप दे, प्रसाद-स्वरूप हर गुण जाना।।
वृक्ष के नीचे रखी उनकी प्रतिमा, उन्हें इशारे से दिखाया।नतमस्तक हो- प्रणाम कर, उठा चरण-रज शीश लगाया।।आपकी ही मूर्ति में शीश नवा, नित्य अभ्यास मैं करता हूंँ।
आत्मसात कर सारी विद्या को,अपना ज्ञान कोष भरता हूँ।।
बोले गुरुवर-हे शिष्य ! मूर्त रूप में, गुरु मुझको तूने माना।
गुरु मानकर मुझको अपना,मेरी हर विधा को तुमने जाना।।
मेरे स्वान का कंठ अवरुद्ध कर, हे शिष्य तूने जो दी परीक्षा। 
हर अंदाज ka अवलोकन कर,आज मैंने भी  की समीक्षा।।
धनुर्विद्या में सफल हुए तुम, अब गुरु दक्षिणा की बारी है।  माँगता हूँ जो दान तूक्ष मैं, तेरे लिए नहीं देना वह भारी है।।
खुश होकर बोला-एकलव्य, गुरुवर य़ह अहोभाग्य हमारा है।गुरुदक्षिणा देने का अवसर आया,यह सौभाग्य  हमारा है।।
मुझ निर्धन बालक से हे गुरुवर! आज आप जो भी मांगेंगे। 
यदि वह मेरे पास हुआ तो,आप वह पल भर में ही पाएंगे।।  बोले गुरुवर- हे वत्स ! वह चीज,अभी तुम्हारे ही पास  है।
उस छोटी-सी चीज दक्षिणा में, मुझको लेने की आस है।। 
अपने दाहिने हाथ का अँगूठा,आज मुझको दे दो दान में।
मैं नहीं चाहता -तेरा अँगूठा,कभी घायल हो धनुष-बाण में।।
नवा मस्तक एकलव्य गुरु-चरणों में,उसने जो प्रण ठाना था।दिया था वचन जो गुरुवर को वह,उसको आज निभाना था।।
झट खडग ले काट अंगुष्ठा वह,गुरु के चरणों में चढ़ा दिया।
एक शिष्य होने के नाते वह,निज गुरू का मान बढ़ा दिया।। 
हाहाकार कर उठा तब अम्बर,चीत्कार उठी अब वसुंधरा। 
अश्रु बहा निर्झर बोला-कलंकित गुरू-शिष्य की परम्परा।।

दिल भी तो पत्थर का ही होगा, पत्थर के गुरू के सीने में।। 
                                  सुजाता प्रिय समृद्धि 

Friday, April 10, 2026

लेवनी (गेंदरी बनाम गद्दे)

गेंदरी बनाम गद्दे 

होली-दशहरे में आई साड़ियाँ नई।
पुरानी साड़ियाँ जमा हो गयी कई। 
कोई रंग उड़ी,  कोई फटी-चिथड़ी।
कोई - थी मुड़ी, कोई थी  सिकुड़ी। 
उन्हें देखने को नहीं करता था दिल। 
रखना  भी  है उन्हें उनको मुश्किल।
य़ह  सभी अब  तो बेकार की ढेर है। 
इसे  हटाने में करना क्यों  यूं देर  है। 
अम्मा - चाची और  बुआ को  दादी। 
बोली - मत करो तुम इनकी बर्बादी।
इनको  मिला कर  बना लेना गेंदरी।
मतलब  बिछौना अथवा  कहो दरी। 
डर  से अम्मा  और चाची रही मौन। 
बुआ  ने पूछा - इसे बनाएगा  कौन?
दादी बोलीं- तुम ननद-भौजाई मिल।
तह लगा-लगाकर उसको देना सिल।
बुआ के चेहरे पर उड़ पड़ी हवाइयाँ।
माँ और  चाची लेने  लगी जम्हाईयाँ।
बाहर बोला कोई माइक में  हल्ले में। 
आ गया आपके हर गली मुहल्ले में।
कपड़े से  रूई  बनाने वाली मशीन। 
नरम-गरम तोसक बनबाईये हसीन।
सुन- बुआ,चाची व माँ बड़ी इतराई।
झट जा- रुई बनाने वाले को बुलाई। 
सभी पुरानी साड़ियों के बन गए गद्दे।
छूटे कपडों  से  गेंदरी  बनाने के मुद्दे। 

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, April 7, 2026

अर्जी

अर्जी.                अर्जी 
        
                           हे                   
                         मित्रों 
                     मन विश्वास 
                  सदा ही तुम रखो 
         आगे बढ़ना है हमको जीवन में 
      महकाना है अपनी इस फुलवारी को 
  मेहनत की सुगंध बिखरा-कर चहुँ दिशा में 
 रिश्तों की डोर पकड़ ,साथियों के हाथ थाम 
चलते चले जाना है,कदम-से-कदम मिलाकर 
                             यही 
                             मेरी
                            मर्जी, 
                            अर्जी 
                             परम 
                             पिता 
                           परमेश्वर
                           से भी है
   
                     सुजाता प्रिय समृद्धि 

Sunday, April 5, 2026

गाँव की नारी

गाँव की नारी 

पुरुषों से कदम मिलाकर चलती,
                           वह गाँव नारी है।
हर पल पुरुषों का साथ निभाती,
                     वह  गाँव की नारी है।

घर का काम निपटाकर बाहर,
             पुरुषों का साथ निभाती है।
पीठ पर बच्चे को बांँध कर,
                संग खेती करने जाती है।

कुदाल चलाती,खेत कोड़ती,
              हल चलाकर खेत जोतती।
मेड़ बनाकर बीज बोती,
              एक-एक कर पौध रोपती।

भला कैसे गुजारा होगा अब, 
                     हाल बड़ा बदहाल है।
करे क्यूँ न मजबूरी में, 
             यह पापी पेट का सवाल है।

फिर भी जन हाथ उठाकर कहते        
                   शक्तिहीना यह नारी है।
है केवल ममता की मूरत, 
           कोमल अबला यह बेचारी है।
         सुजाता प्रिय समृद्धि

Saturday, April 4, 2026

एकता में बल

एकता में बल 

एक दिन एक शिकारी आया। 
जंगल में वह जाल बिछाया। 
उसके ऊपर वह दाना डाला। 
छिपकर बैठा बन रखवाला। 
कबूतरों का झुण्ड तब आया। 
दाने को देख कर ललचाया। 
कबूतरों का राजा तब बोला। 
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला। 
जंगल में अन्न कहाँ से आया। 
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे। 
लज्जा से उनके सिर झुके थे। 
कपोतराज ने फिर मुँह खोला। 
बड़े प्यार से उन सबको बोला। 
एक साथ चलो उड़ चलें हम। 
जाल को लेकर भाग चलें हम। 
मानकर कबूतर दादा की बात। 
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से। 
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।

Friday, April 3, 2026

संगठन में शक्ति

संगठन में शक्ति 
एक किसान के थे चार बेटे ।
चारो मिलकर खूब झगड़ते ।
किसान ने उनको समझाया। 
पर  बेटों को समझ न आया। 
किसान ने एक योजना बनाई। 
उनसे आठ  लड़कियाँ मंगाई।
चार को  साथ रस्सी से बंधा। 
चार को अलग - अलग रखा। 
प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया। 
बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।
पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी। 
मिलकर  पाई  थी  मजबूती। 
एक - एक लकड़ी पकड़ाया।
उनको उन चारो से तुड़वाया।
टूटी  वह  बिना  लगाए जोर। 
अकेली लकड़ी थी कमजोर। 
तब लड़कों को समझ आया। 
सब आपस में हाथ मिलाया। 
बोले अब हम सब नहीं लड़ेंगे।
हम-सब मिल- जुलकर रहेंगे। 
संगठन में शक्ति बहुत है भाई। 
है  बँधी लकड़ियों-सी सच्चाई।

Wednesday, April 1, 2026

चोट (लघुकथा)

चोट (लघुकथा) 

पत्नी की तीखी बोली से संजीव का मन बड़ा आहत था। इतनी बेरूखी से सबके सामने डांँटेगी । यह तो कभी उसने सोचा.......... ।क्या हो गया उसे ?
 इतना भी नहीं सोंचा ऐसे अपमान भरे लहजे से मेरे दिल पर क्या..... ।
यदि मैं सबके सामने उसे ऐसे ही अपमानित...............? 
"करते तो हो........ !  हमेशा... .....।
हर जगह.........।हर समय ,......।
बडो़ं के सामने...... ।
छोटों के............।सहेलियों .......।
पडोसियों........।परिवारों,
सहकर्मियों,नौकरों..... ।"
उसने एक बार तुमसे........ ।
अपमान से दिल लहू-लुहान हो जाता है....... ।लेकिन वह हमेशा आसुओं के घूट पीकर  ........है।तो तुम क्यों विचलित.... ?"
तेरे जैसा उसका दिल..........? नहीं- नहीं! अपनी अंतरात्मा की फटकार सुन वह ............।
होंठों से बुदबुदाते हुए...
..मुझे भी. उसके सम्मान का...............। 

  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 31, 2026

कब तक (वर्ण पिरामिड)

5,               कब तक 
              (वर्ण-पिरामिड)

                       मैं 
                      जब 
                    राहों में 
                   चलती  हूँ।
                 मन-ही-मन 
               सोचा करती हूँ।
              कब तक मुझको 
             इन  दुर्गम  राहों  में 
           चलते चले जाना होगा? 
          और कब - तलक मुझको 
         इनकी असीमित दूरियों को 
        अपने कदमों से नापना होगा?
       कब तलक मुझको इसके सभी 
      घुमावदार मोड़ों में  मुड़ - मुड़कर 
    दिशा बदल कर, दाएं और बाएँ चल 
  कंक्रीटों से भरे उबड़ - खाबड़,टेढ़े - मेढ़े 
पथ के ठोकरों को सह करके चलना होगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आँखों-ही-आँखों में (लघुकथा)

आँखों-ही-आँखों में 

सुशांत का मन बड़ा अशांत था।आखिर कौन सा ऐसा अपराध  .......? जो सुनीता मैम ने इतनी जोर से........
वह तो कोई भी काम उनसे पूछे बिना............।
उन्होंने जिन सामानों को लाने कहा वह तो लाकर...........!
उन्हें लाने में मेरी जेब भी खाली..... ।
उपर से सबके सामने........।
अपमान का घुट पीकर कॉलेज के आयोजित कार्यक्रम में शामिल.........।लेकिन सुनीता मैडम  से नजरें चुराता.........।
कार्यक्रम की समाप्ति होते ही आयोजक छात्रों ने खर्च के पैसे का  हिसाब और बचे हुए पैसे उन्हें देने लगे ।
वह सोचने लगा-मैं दूँ भी तो क्या  ?
मेरे तो जेब के पैसे भी......
कोई बात नहीं मैं मैम को न हिसाब दूंगा न ही यह बताऊँगा कि ...........
सुशां s s त.....! अचानक मैम ने पीछे से पुकारा  ।
"लो य़ह तुम्हारे रुपये !" उसके पीछे पलटते ही मैम ने रुपये बढ़ाते हुए कहा-
"यह कौन - से रुपये मै  s s म  ?" उसकी आवाज में हकलाहट  ......
"तूने सारे सामन ..........।"  "मैंने पैसे भी......!"
"इसकी कोई जरूरत नहीं .........."
"क्यों नहीं ?" मैम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ......
वह नजरें उठाकर मैडम की ओर......।
उनके नजरों में वात्सल्य, प्रेम और ममत्व की लहरें हिलोरे ....। 
सारे गिले-शिकवे भूल वह हौले से मुस्कुरा दिया......
मैम का मन भी.....

                    सुजाता  प्रिय "समृद्धि"

Thursday, March 26, 2026

तीखे बोल-(लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽

        तीखे बोल 

अर्चना के पति विलास जी अचानक बीमार पड़े ।डॉक्टरों ने किडनी की बीमारी बताकर वेल्लोर ले जाने को कहा।वह पड़ोसन सोनाक्षी को बच्चों एवं घर की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप कर चल पड़ी।
मोह बस सोनाक्षी सारी जिम्मेदारी बखूबी........।
छह महीने इलाज के बावजूद विलास जी.............।
अंतिम संस्कार गाँव से होने के बाद दुःखी मन से जब अर्चना जी शहर वापस आई तो देखी- बच्चे सोनाक्षी अंटी के दिवाने हो गए हैं। 
हर बात पर सोनाक्षी जी की तारीफों के पुल............।
"आंटी जी ने ऐसा खाना खिलाया, वैसा लंच दिया ! ऐसे घर, कपड़े, फूलों इत्यादि............।तबियत खराब होने पर खूब..........।किसी से लड़ाई झगड़े होने पर बीच-बचाव.............।"
हाँ अब बच्चे उनके अहसान के काईल हो या ममता के वशीभूत हो अंटी के भी ,बाजार के  छोटे-मोटे काम कर देते। 
माँ के मना करने पर कहते- अंटी ने हमें पैसे और मेहनत से जितना सहयोग व सहारा दिया उस अनुपात में तो हम तो कुछ भी नहीं करते मम्मी!" 
उफ्फs s s s s s s s s s
हर समय सोनाक्षी की तारीफ.......
खीज कर वह बच्चों को डाट .....।
इस तरह भी जब बच्चे नहीं मानते तो सोनाक्षी को ही कठोर शब्दों में सुनाती -"मेरे बच्चों जैसा मुर्ख कोई हो ही नहीं सकता। कोई कुछ चिकना-चटपटा खिला देगी तो उसकी जी हजूरी में लगे रहेगें।इनके सीधेपन का फायदा चालबाज  औरतें खूब उठाती हैं। एक तो दुसरे के बच्चों से काम कराने में कोई शर्म नहीं करतीं, ऊपर से खूब वाहवाही भी लूटती हैं।"
सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 24, 2026

sur

सुर छेड़o न अभी तुम सांवरिया। 
तेरी सुर सुन होती मैं  बाबरिया।।
सुर छेड़ न.........
मैं तो paniया  भरण को जाती रहीं, 
छलक-छलक छलक जाए मोरी gagriyan

Sunday, March 22, 2026

यमुना किनारे

हरी बोलो!कृष्ण जी बंसी बजावे यमुना किनारे हरि बोलो।
हरि बोलो! वंशी के धुन में सबको रिझाबे हरी बोलो।
हरी बोलो .....
यमुना किनारे कदम की गछिया,
हरि बोलो गाछ पर चढ़कर डाली नवाबे हरि बोलो ।
हरि बोलो ......
सब सखियन मिली वसन उतारे,
हरि बोलो  यमुना के जल में संग नहाबे हरि बोलो
हरि बोलो .......
देख गोपन की स्नान की रीति, 
हरि बोलो धीरे से जाकर कान्हा वसन चुराबें हरि बोलो ।
हरि बोलो ...
सब सखियां मिली अरज करत हैं,
हरि बोलो कान्हां से विनय कर वसना मांगे हरि बोलो।
हरि बोलो....
 कृष्ण जी बोले वसन मत खोलो,
हरि बोलो जल में वरुण के वास बताए हरि बोलो।
हरि बोलो......
                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, March 18, 2026

तुम से मिलकर

S               तुम से मिल कर 

                तुम  से  मिल कर
                ऐसा लगता है कि 
                कुछ  खोया हुआ 
                पा लिया है हम ने 
            उस रास्ते की याद आई 
        जहाँ कभी हम साथ चलते थे 
     गलबहियाँ डाल,पीठ पर बस्ते लिए 
  नन्हें कदमों से मंजिल की दूरियाँ नापते 
   संजीदगी -से रास्ते की धूल उड़ाते हुए 
    चलते चले  जाते थे, बढ़ते जाते थे, 
       तब  हमारे  मक़सद एक होते थे, 
        और हमारे उद्देश्य एक होते थे,
          सभी सपने भी एक होते थे,
             पर आज हमारा मिलना
              एक सपने से कम नहीं
                
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, February 16, 2026

सौन्दर्य

देखकर आईने में सूरत निहारती।
बड़े ही जतन से सजाती-संवारती।

साँवली सूरत को गोरी बनाने को।
दागदार चमड़ी को कोरी बनाने को।
सौंदर्य-प्रसाधनों से उसको निखारती।
बड़े ही जतन से..............
केशों को संवारती विभिन्न तरीके से।
गूँथती और बांधती बड़े सलीके से।
देखकर आईना कंघी से हो झाड़ती।
बड़े जतन से... ‌......................
पहनकर वसन बार-बार हो देखती।
आईने में हर बार नज़रे हो फेंकती।
वसन को ठीक करने को हाथ मारती।
बड़े ही जतन से.................
तू काश आईने में अपने मन को देखती।
बस एक बार अंतर में नजर को फेंकती ।
अपनी बुराइयों को थोड़ा सुधारती।
बड़े ही जतन से...................
मन के सौंदर्य को तू निखारती सखी। 
कभी भी किसी जन से करती न बेरूखी।
हृदय- सुन्दरी कह सखी तुम्हें पुकारती 
बड़े ही जतन से ..............     
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, February 8, 2026

सपने

सपने 
                
                कभी 
             लड़कपन में 
        हमने जो देखे सपने 
   काश!अभी वे हो जाते अपने 
ऊँची उड़ान भरते हम भी नभ में 
  खेल तारों संग आँख-मिचौनी 
     फिर चढ़ कर चाँद के ऊपर 
         सारे जग की सैर कर
           आ लौट अपने घर 
              दादी- दादा को 
                हाल सुनाते
                    चंदा 
                  तारे की 
                बात बताते 
          नभ में कैसे वे रहते हैं 
      रात को कैसे चमका करते हैं 

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आईना

1.    आईना 
                        हम 
                   आईने को 
              लाख साफ कर लें 
              चेहरे पर नकाब है 
         तो खुद को पहचान पाना 
                भी मुश्किल है 
                    इसलिए 
               आईने को साफ 
               करने  से  अच्छा  
               चेहरे  साफ रखो 
                     क्योंकि 
            हमारा  प्यारा आईना 
            जितना  साफ   होगा 
            चेहरे  के   धब्बों  को  
            उतनी ही बारीकी  से                                         
             सभी  को  दिखाएगा 
             हमारे होठों की वाणी
             हमारे  चेहरे  के भाव
             आँखों  की  दृष्टि   ही 
              हमारे  प्यारे चेहरे की 
              अनमोल   सुंदरता  है

               सुजाता प्रिय समृद्धि

आया सुंदर भोर

,       आया सुन्दर भोर 

          उठ  भाई अब 
          आलस्य त्याग 
          मिटा   मन  के
          सारे   अवसाद 
     आया प्यारा सुंदर भोर
   सूर्य-किरण फैली चहुँ ओर 
  सभी जीव का मन विहसता
 खुशियों से तन - मन हुलसता
  उड़ी चिरैया भर मन उल्लास
    चहक कर करती परिहास
         खुश कर मन उदास

Friday, January 30, 2026

खुशबू चमन से (ग़ज़ल)

खुशबू चमन से 

चुराया किसी ने है खूशबू चमन से। 
मगर है न जाता महक  मेरे मन से। 

बहारों का मौसम, फिजा में समाया, 
मग़र वह महक न आता वदन से।
 
गुल तो खिलें हैं, बहुत गुलशन में, 
मगर उनमें रौनक नहीं है अगन से। 

कोई मुझसे कह दे जरा पास आकर, 
मिला क्या किसी को,इसके हनन से ।

अगर तोड़ लेता, कोई फूल आकर, 
Aस्क न गिरता फूलों के नयन से ।

फूलों में रहता महक उनकी प्यारी, 
अलग वह न होता, अपने रतन से। 

लगन से

Thursday, January 29, 2026

,माँ शारदे भवानी

माँ शारदे भवानी 

माँ शारदे भवानी इतनी कृपा तू करना। 
मुझ मूढ के हृदय से अज्ञानता को हरना। ।
तेरे चरण में माता हम शीश हैं  नवाते। 
कर जोड़कर विनीत हो  विनती सदा ही गाते। ।
विद्या ददाति  माता !हमको सुघड़ बना दो। 
सन्मार्ग पर भी चलना, हमको तू  माँ सिखा दो। 
छोटा बड़ा सभी माँ हर काम को करें हम ।
विद्या  के ashma में उड़ान भी भरें हम।।
आशीष तुम दो माता, जो कामना करें हम। 
जो दीन और दुखी हो, उन सबका दुःख हरे हम ।।
आकाश से भी ऊंचा, मन भाव  हो  हमारा। 
गंगा बहे हृदय में, हों प्रेम की ही धारा। ।
मस्तक सदा हो ऊंचा, वरदान  मुझको देना ।
किसी का न दिल दिखाऊ, सच्चा विचार देना। ।

H


मुहब्बत का पैगाम

          मुहब्बत का पैग़ाम 

          माना कि तुमसे मेरा 
          खून का रिश्ता नहीं 
           पर अहसास से तो
            जुड़े  हुये  हैं  हम 
             तेरी झिड़की पर 
           मेरा शांत  हो जाना 
            मेरी नाराजगी पर 
         तेरा खामोश हो जाना 
    असली मुहब्बत को दर्शाता है 
  क्योंकि रिश्ते को निभाने के लिए 
     शब्द नहीं,नीयत होनी चाहिए 
          एक-दूसरे के दर्द को 
         जज्बा को जज्बातों को 
                 समझना ही 
           मुहब्बत का पैगाम है 
       उन दोनों की शादी हो गई 
            इस समाचार से ही 
          विवाह संपन्न नहीं होता 
       जरूरत होती है,एक-दूसरे के 
       अंतर्मन को जानने-समझने  
            और सहयोग देने की 
                 भावनाओं की 

              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, January 27, 2026

सपने

सपने 
                
                कभी 
             लड़कपन में 
        हमने जो देखे सपने 
   काश!अभी वे हो जाते अपने 
ऊँची उड़ान भरते हम भी नभ में 
  खेल तारों संग आँख-मिचौनी 
     फिर चढ़ कर चाँद के ऊपर 
         सारे जग की सैर कर
           आ लौट अपने घर 
              दादी- दादा को 
                 हाल सुनाते 
                    चाँद 
                  तारे की 
                बात बताते 
          नभ में कैसे वे रहते हैं 
      रात को कैसे चमका करते हैं 

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, January 26, 2026

१ दहेज ।9

जय मांँ शारदे 🙏🙏 💐💐
जय श्री गणेश 🙏🙏💐💐

दहेज (१)

वहाँ से खिसक गये। लड़कियों को बुलाकर वे अपनी बस में चढ़ाने लगे।मयंक ने देखा तो पागलों की भांति एक बार फिर अपनी सारी शक्ति संचित कर स्वयं को मुक्त कर लिया और उनकी तरफ लपका। लेकिन फिर उसे लोगों ने जकड़ लिया।वह उनकी बाहों से छुटने का जी तोड़ प्रयास कर रहा था।
इसी उपक्रम में उसकी नजरें छत पर चली गई जहांँ मुंडेर से झांकता उसे निरमा का सिर दिखा। क्या निरमा छत पर अकेली है ? उसकी छठी इंद्री उसे कुछ संकेत दे रही थी।एक बार फिर वह जोर लगाकर छुट गया और दौड़ कर सीढियांँ चढ़ने लगा।जब वह छत पर पहुंचा तो देखा निरमा छत की मुंडेर के निकट खड़ी है।वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।पर निरमा को उसके आगमन का एहसास तक नहीं हुआ था। उसने अपनी दोनों हथेलियांँ रेलिंग पर टिकाए और पैर उचकाकर रेलिंग पर चढ़ गई और फिर नीचे कूदने हेतु छलांग लगा दिए।
पर ,यह क्या ? वह कूद नहीं पाई सिर्फ लड़खड़ा कर रेलिंग पर ही अटक गई। रेलिंग की रगड़ से उसके वदन में कहीं-कहीं खरोंच भी लग गये।पर उसका उसे कोई परवाह नहीं।उसे लगा उसकी चुनरी किसी चीज में फँस गयी है। उसने हाथ बढ़ाकर उसे छुड़ाना चाहा पर उसका हाथ भी किसी ने थाम लिया।वह हड़बड़ा कर पीछे पलटी।देखा मयंक उसे हाथ पकड़कर खींच रहा था।
छोड़ दो मुझे मयंक उसने रोते हुए कहा।
मयंक बिना कुछ कहे उसे रेलिंग से नीचे उतार लिया था।
उसके चेहरे से कठोरता लुप्त हो गई और वहाँ बेचारगी का साम्राज्य स्थापित हो गया।
उसी समय बारात की बस और कारें स्टार्ट हुईं और सड़क पर चल दी। मयंक को ऐसा लगा वह गाड़ियांँ उसके सीने पर चल रही हैं।
छोड़ो मुझे मयंक !अब मैं जीकर क्या करूंगी ? निरमा बेचैनी भरे स्वर में बोल उठी।उसकी आँखों में आंँसुओं की मोटी परत थरथरा रही थी।सीसे -पारदर्शी उन आँसू- परत के पीछे निरमा की आँखों की सफेदी सुर्खी  में बदली नजर आ रही थी।
ठहरो निरमा!इन आँसुओं को गिराकर बर्बाद मत करना। मयंक तड़प कर बोल उठा।
अब किस दिन के लिए जमा करके रखने क हते हो आशु को ?
 मैं मयंक के लहू-लुहान दिल पर जोरदार गुस्सा पड़ा। निरमा की बोली से उसका समूचा वजूद थर्रा उठा। उसे याद आया शादी ठीक होने के बाद निरमा किसी बात पर रो पड़ी थी तो वह उसे चिढ़ाते हुए बोला था रो-रो कर आंसुओं को बर्बाद मत करो निरमा ? कहीं यह आसु बिल्कुल खत्म हो गया सो बिदाई के समय रोओगी भी नहीं ।
और निरमा भी अपने लजीले स्वभाव के विपरित बोल उठी थी- हंसने लगूंगी और क्या।
 मयंक पहले तो मुँह बनाया था फिर बोला यह भी ठीक ही रहेगा। अन्य लड़कियों से निराली रहेगी तुम्हारी विदाई ।
और निरमा खिलखिला कर हंस पड़ी थी ।
लेकिन मयंक की पैनी निगाहों ने उसकी आंखों की कोरों में छलकाए आंसुओं को भी देख लिया था ।लेकिन आज समय आने पर निरमा वह सुख के आंसू नहीं गिरा सकी। उसका दिल सिसक उठा । निरमा के ये आंसू कार की सीट पर गिरने चाहिए थे और गिर रहा है छत पर ।हिम्मत से काम लो निरमा! वह अपने आप इस प्रकार बुदबुदा उठा जैसे खुद को तसल्ली दे रहा हो।
 अब कहांँ से हिम्मत लाऊँ ? जबकि सारा हिम्मत जवाब दे गया निरमा सिसकती हुई बोली।अब तो मुझे मर जाने में ही भलाई है ।अच्छा हुआ जो चाचा नहीं रहे ।नहीं तो वह सहन नहीं कर पाते यह सब ।मुझे भी उन्हीं के पास जाना है। नहीं निरमा! तुम्हारे मर जाने से उन कुत्तों के सेहत में कोई गिरावट नहीं आने वाली ।तुम्हारे जैसे हजारों निरमा होने इस धरती पर अपने प्राण त्यागे हैं। पर इन दहेज लोभियों के जबड़े फैलते ही चले गए। उन निरमाओं की मृत्यु के साथ ही इन दानवों की काली करतूतें भी दफन होकर रह गई ।और तुम मर कर इनकी कृत्य को दफना दोगी। अब तुम एक नया अवतार लेकर इन असमाजिक तत्वों का नाश करोगी । इन्हें सबक सिखाओ कि इस दहेज- सागर में गोते लगाने का अंजाम कितना भयानक हो सकता है।इस दहेज- सागर में कितने बड़े-बड़े जीव अपना विशाल जबड़ा फैला कर घात लगाए हुए हैं। जो किसी भी क्षण अपने जबड़े मैं दबोचकर उसका नामोनिशान तक मिटा सकते हैं । निरमा पर उसकी बातों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उसकी मुठियां भींच गई थी और चेहरे पर ऐसी दृढता उत्पन्न हो गई थी जैसे वह दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी शक्ति से टकराने का इरादा बना ली हो। उसने स्वीकारात्मक ढंग से धीरे से सिर हिलाया।ही मयंक उसका हाथ थाम कर सीढियों की तरफ बढ़ गया । अगले ही कुछ मिनटों में दोनों नीचे बारात लौटने से शोकाकुल लोगों को समझा कर ढांढस बंधा रहे थे।

दो ही छन्द

दो ही  छन्द 
15,11 पर यति 
मेरे मन की य़ह कामना,पूर्ण करो  भगवान। 
जो लगती अच्छी भावना,उनका रख दो मान।।
हम सब बालक नादान हैं, समझ न पाते बात। 
भाई-बंधु और मeet से, लड़ते हैं दिन-रात।।
छल व कपट जो सदा करे,उसपर कर विश्वास। 
अपने लोगों को दूर कर, बनते उनके दास। ।
मेरे दिल में शुभ प्रेम का,भर दो नव प्रकाश। ।
निश्छल प्रेम दो मुझे, लेकर आई आस।।
हम दिनों के तुम नाथ हो, हरो हमारी पीर। 
आए जो संकट की घड़ी, मन में रखूँ धीर। ।
आपके चरण में हम प्रभो,झुका रहे हैं माथ।
अब जीवन आप smvariye ,दुःख हर दीनानाथ। ।

Friday, January 16, 2026

ज़माना खराब है

11
                    कहते  हैं लोग  कि 
                     जमाना खराब है
                     सुनकर हमने भी 
                     ये माना खराब है
                     दोष  जमाने  को
                 सदा तुम मत दो दोस्तों 
            क्योंकि इस जमाने को खराब             
         हमारे द्वारा बनाया जाना खराब है
        जमाने से नहीं हम,सुन लो भाई मेरे !
       इस जमाने को तो, हमने-ही बनाया है 
       जन -जनता और जमाने का  यहाँ पर
        रिश्ता- नाता व दोस्ती  बड़ा पुराना है 
         अब सोंच लो! विचार लो जन सभी  
          किस तरह से सुंदर हमें बनाना है।      
            न कहना कि जमाना खराब है
               चल रे साथी संग मेरे चल

Thursday, January 15, 2026

राम (दोहे)

जय श्रीराम (दोहे)

दशरथ जी  के लालना, राम  बड़े थे वीर।
जीवों  पर  करते  दया, लड़ने  में  रणधीर।
मंझली  मांँ  ने द्वेष  से, दिलवाया वनवास।
पितृ आज्ञा पाये प्रभो,धर मन चले हुलास।।
मातु-पिता और गुरु के,चरणों में रख शीश
गुरु जनों को प्रणाम कर, लेकर वे आशीष।
छोटे भाई लखन जी,जोड़े दोनों हाथ।
बोले भैया आपके, मैं भी चलता साथ।
त्याग राजसी वसन को, पहने वल्कल अंग।
माता सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।
वन-वन भटके साथ वे, खाते मूल व कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते ले आनन्द।
कपटी रावण ले गया, सीता को हर साथ।
एक न माना बात वो, रो कर जोड़ी हाथ।।
विकल हो तब राम-लखन,ढूंढे चारो ओर।
लेकिन सीता का वहाँ,मिला न कोई ठौर।।
जटायु घायल तब मिला, बतलाया यह बात।
सीता के गहने दिखा,झुका लिया वह माथ।।
वानर सेना ले बढ़े, प्रभु लंका की ओर।
रावण से जाकर किया, युद्ध बड़े घनघोर।
आये सीता मात ले, साथ अयोध्या धाम।
अवध वासी हँस-विहस,जपे राम का नाम।।
            '

Thursday, January 8, 2026

स्त्री मन

1,      स्त्री मन 

          उपेक्षा 
        अवहेलना, 
   तिरस्कार फटकार
       सहकर भी
          मन के 
   क्षोभ-भय-तृष्णा 
     को दमन कर 
रखती मन में कामना 
      परिवार की 
     सुख-समृद्धि 
   शांति-सुरक्षा की 
       पूरी करती
          मन्नतें 
   रख व्रत-उपवास 
    माँगती आशीष 
   आँचल फैलाकर 
       हे परमेश्वर!
 दीनानाथ! दया करो, 
     सब पाप हरो 
   भूल-चुक,गलती  
     सब माफ करो
   सबकी भला करो 

सुजाता प्रिय समृद्धि