सहज कौतुहल उठा था मन में। नन्हें बीज मिट्टी के कण में।
कैसे विस्तृत पेड उगाते।कैसे प्यारे फूल खिलाते।
कैसे मीठे फल उपजाते।सबको हैं वे भाते लुभाते।
एक बीज लेकर हाथ मे।छोटी खुरपी भी थी साथ में।
खुरच-खुरच धरती का दामन।कर डाला बीज को अर्पण।
दो-चार अन्जलि पानी डाल। चल पड़ी मैन खुरपी संहाल।
रोज उठाकर देख करती।कई दिनों का लेखा करती।
एक-दो तीन गीन -गीन।ऐसे बीत गये कितने दिन।
बीज न उगला कोई पेड। सोची इसको देखून छेड़।
तुरन्त दौड़कर खुरपी लाई।धरती का दामन खुजलाई।
वहाँ, जहाँ बोई थी बीज। खोज रही थी पेड-सी चीज।
बीज मिल गया थोड़ी देर में। छुपा हुआ मिट्टी के ढेर में।
नहीं अब वह छोटा था।पहले से ज्यादा मोटा था।
हाँ एक बात थी अलग।पड़ उसपर नजर सहज।
उस बीज के एक ओर। निकली थी मानो कोई डोर।
ठीक उजले धागे-सी।पीछे या उसके आगे थी।
मैंने सोचा ये क्या हुआ। मतलब कितना नया हुआ।
दौड़ पड़ी मैन् मान के पास।सत्य जानने की ले आस।
मा मिल गई जल्दी खैर, पूछा क्या ये हैं बीज के पैर।।
हाथ पैर हैं या हैं पूँछ। या फिर दूसरा और है कुछ। ।
मान थी कामों मेन व्यस्त। सूर्य हुआ जाता था अस्त।।
खीझकर बोली ओ लंगूर।इसका नाम है अंकुर।
बढ़कर फेंकती पत्तियाँ दो।उससे निकलती टहनियां दो।
फिर पत्तों से हैं भर जाते।और फूलों से हो तर जाते।
और फलों से हैं लद जाते।जो सबको हैं लुभाते।
ऐसे बीज हैं पेड उगाते।ऐसे ही हैं फल-फूल उपजाते।
सुजाता प्रिय 'समृद्घि'
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