भला कैसे
बनते हो सभी के लिए,
सदा तुम फरिश्ता।
पर क्या जोड़ा है कभी,
स्वयं से भी रिस्ता।
अनगिनत लोगों से है,
तुम्हें जान-पहचान।
स्वयं को पहचानने में क्या
कभी लगाए ध्यान।
अनेकों से होती है तुम्हारी,
बात और मुलाकात।
स्वयं से मिलते हो,और
करते हो कभी बात ?
किसी के चेहरे से पढ़ लेते
उसकी अन्तर्व्यथा।
पर क्या समझ पाते हो कभी
अन्तर्मन की अवस्था।
बताओ तो कोई कि जिसे-
नहीं है आत्मज्ञान।
तो भला दूसरे को कैसे वह ,
सकता है पहचान?
सुजाता प्रिय 'समृद्घि'
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