Sunday, April 5, 2026

गाँव की नारी

गाँव की नारी 

पुरुषों से कदम मिलाकर चलती,
                           वह गाँव नारी है।
हर पल पुरुषों का साथ निभाती,
                     वह  गाँव की नारी है।

घर का काम निपटाकर बाहर,
             पुरुषों का साथ निभाती है।
पीठ पर बच्चे को बांँध कर,
                संग खेती करने जाती है।

कुदाल चलाती,खेत कोड़ती,
              हल चलाकर खेत जोतती।
मेड़ बनाकर बीज बोती,
              एक-एक कर पौध रोपती।

भला कैसे गुजारा होगा अब, 
                     हाल बड़ा बदहाल है।
करे क्यूँ न मजबूरी में, 
             यह पापी पेट का सवाल है।

फिर भी जन हाथ उठाकर कहते        
                   शक्तिहीना यह नारी है।
है केवल ममता की मूरत, 
           कोमल अबला यह बेचारी है।
         सुजाता प्रिय समृद्धि

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