राहगीरों को रोककर कहता,खोल दो कोई पिंजरा मेरा।।
बहुत दिनों से हूँ मैं भूखा,बिन खाये ही मर जाऊँगा।
एक पंडित जी को आई दया,बोले तेरा भरोसा क्या ?
पिंजरे से बाहर आओगे,झट मारकर मुझको खाओगे।
कहा बाघ विश्वास करो, बेकार तुम मुझसे मत डरो।
नहीं खाऊन्गा तुझको मार,मानूँगा मैन् तेरा उपकार।
तुम मरते को अगर बचाओगे,पुण्य बहुत तुम पाओगे।
पंडित जी तब करके विश्वास, पहुँच गए पिंजरे के पास।
खोले पिंजरा हाथ बढ़ाकर,निकला बाघ पिंजरे से बाहर।
कहा अब तुम्हें मैं खाऊन्गा,अपनी भूख मिटाऊन्गा।
खतरे में उनकी पड़ गई जान,क्यों लिया कहना मान?
नजर घुमाई तब ईधर-उधर,दिखा उनको एक गीदड।
पंडित जी ने पास बुलाया,सारी बातों को समझाया।
बोला गीदड विश्वास न होता,पिंजरे में बाघ है होता।
शैतान बाघ ताव मे आकर, दिखया पिंजरे मे घुसकर।
कहा गीदड तब पंडित जी से,अब पिंजरा बंद होगा कैसे।
पंडित जी ने पिजरा लगाया,गीदड को विश्वास दिलाया।
कहा गीदड मुझे था विश्वास, पिंजरे में भी होता बाघ।
जैसे आपको धोखा देकर,निकला यह पिंजरे से बाहर। ।
वैसे ही इसको भी बहलाया,वापस पिंजरे में पहुँचाया।
विश्वास नहीं हिन्सक पशुओं पर, कब खाएगा धोखा देकर।
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