Thursday, May 7, 2026

नव किसलय से भरा धरातल

नव किसलय से भरा धरातल 

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरणें फैली हैं,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटे हैं।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती की तपन मिटी है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरीतिमा है मन  में छाई।
     सुजाता प्रिय समृद्घि

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