पिपासा
ईर्ष्या और तृष्णा दो बहनें थी।दोनों बहनों को किसी की अच्छाई-बड़ाई सहन नहीं होता था।किसी की प्रगति देख वे जल-भुन जातीं। हाँ दोनों के जलने- भूनने में थोड़ा अन्तर था।जहां ईर्ष्या किसी की प्रसंशा सुन जल-भूनकर खाक हो जाती, किसी की बुराई करती, किसी के बुरा होने की कामना करती,उनका अपमान करती,वहीं तृष्णा किसी की प्रसंशा सुन प्रसंशा-पिपासित हो जाती। उसे इस बात की चिन्ता हो जाती कि उसकी प्रसन्शा क्यो हो रही है।वह उसके कारकों की तह तक पहुँचने की जी तोड़ कोशिश करती, उसके हर क्रिया-कलापों का बारीकी से अध्ययन क
रती और कारण जानने के बाद उसे आत्मसात करने अथबा स्वयं को उस विधा मे निपुण करने में लग जाती। इस प्रकार उन सभी की अच्छाइयों को ग्रहण कर वह स्वयं प्रसंशा प्राप्त कर लेती।इस प्रकार सफलता व सम्मान प्राप्ति के सभी मार्ग प्रशस्त करती हुई अपनी मंजिल तक पहुँच कर अपना जीवन सार्थक कर ली।
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