जेठ की दुपहरी
लू की लहरी
तपती दुपहरी
ना मन भाए।
सूर्य तपता
लहक-दहकता
यूँ झुलसाए।
अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।
हो गया जीना
बह रहा पसीना
जी घबराए।
बंद चलना
घूमना औ फिरना
किसे बताएँ।
गर्मी सहना
पढ़ना व लिखना
रास न आए।
सूर्य तपता
तन-मन जलता
किसे बताएँ।
कंठ हैं सूखे
रहकर यू भूखे
प्यास बुझाएं।
सूखे हैं भैया,
कूप ताल-तलैया,
जल धाराएंँ।
जीव आकुल
तन-मन व्याकुल
घेरी चिंताएँ।
तपन सारा
औ संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 2 मई 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
सादर धन्यवाद भाई !
ReplyDeleteवाह!! ग्रीष्म ऋतु की पूरी बानगी पेश कर दी आपने अपनी पंक्तियों में
ReplyDeleteबहुत बढ़िया वर्णन।
ReplyDeleteआभार भाई
Deleteसुंदर
ReplyDeleteनमन
Deleteबहुत बढ़िया
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद भाई
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