Thursday, April 30, 2026

जेठ की दुपहरी

जेठ की दुपहरी

लू की लहरी
तपती दुपहरी
ना मन भाए।

सूर्य तपता
लहक-दहकता
यूँ झुलसाए।

अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।

हो गया जीना
बह रहा पसीना
जी घबराए।

बंद चलना
घूमना औ फिरना
किसे बताएँ।

गर्मी सहना
पढ़ना व लिखना
रास न आए।

सूर्य तपता
तन-मन जलता
किसे बताएँ।

कंठ हैं सूखे
रहकर यू भूखे
प्यास बुझाएं।

सूखे हैं भैया,
कूप ताल-तलैया,
जल धाराएंँ।

जीव आकुल 
तन-मन व्याकुल
घेरी चिंताएँ।

तपन सारा
औ संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

No comments:

Post a Comment