Sunday, April 19, 2026

बढता जा

बढता जा
बढ़ता जा तू पग-पग प्रतिपल,जीवन भर बढता जा।
मंजिल की जब राह न सूझे,राह नयी गढता जा।।
            जीवन को तुम कर ले रोशन। 
            खुशियों से तू भर ले तन-मन।
             इस  दुनिया  में  रंग बहुत  है,
             सब  रंगो  से  रंग ले  जीवन। 
रंग लगाकर, प्यार जमाकर, कंचन से मढ़ता जा।
            मारुत  से  बढना  सीखो,
            जलधारा से बहना सीखो।
            इस जीवन की राह बड़ी है,
            चंदा  से  तू  चलना सीखो।
अग्निधूम से शिक्षा लेकर,पर्वत पर चढ़ता जा।
          रुको नहीं तुम जीवन पथ पर,
          बढ़े चलो तुम बस जीवन भर,
          बढ़ना   ही   है  धर्म   तुम्हारा-
         बढ़े चलो तुम यह निश्चय कर। 
सुखी जीवन का मंत्र यही है,मन-ही-मन पढता जा।
            बढ़ने वाले ही मंजिल पाते।
            जीवन पथ में जो न घबराते।
           उतार-चढ़ाव को समतल कर,
            सुंदर - सुगम  हैं राह  बनाते।
अपनी मेहनत से जीवन में,मानिक-मोती जङता जा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

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