Wednesday, July 1, 2026

धरती के भगवान (लघुकथा )

चिकित्सक 

विद्या का मन बहुत घबरा रहा था। बेटा को कोरोना मरीजों के वार्ड में ड्यूटी .....।मन की झुंझलाहट लंच बॉक्स पर ...
.। हरीश के लिए लंच बॉक्स में भूना हुआ बादाम भरती हुई वह सोच रही थी  इससे तो अच्छा था वह घर बैठ कर बैंक बगैरह की नौकरी की तैयारी ......। बस इसके पिता जी को ही ज़िद थी कि एक ही बेटा है डॉक्टर.....।अब देख लिया ना!इतनी बड़ी आपदा पड़ी है।सभी लोग घर में सुरक्षित बैठे हैं और मेरे जिगर के टुकड़े को कोरोना बैरियर बना ...।" स्टुडेंट-लाइफ में ही इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी। क्या और चिकित्सक नहीं है?मेरे फूल से बच्चे को ही बीमारों की इलाज में .....।
         "माँ जल्दी दो ना मेरा लंच- बॉक्स ।" हरीश ने तैयार होकर 
..........। 
"हाँ ठीक है ।"
माँ! तुम्हारे हाथ का बना हुआ मजेदार खाना खाए बगैर मुझे .....।"ऊपर से यह बचपन बाला लंचबॉक्स।
मांँ के हाथ से लंचबॉक्स लेकर. मांँ- पिताजी के चरण-स्पर्श किए और हॉस्पीटल के लिए ........
 माँ जानती थी यह सब बातें वह उसे बहलाने के लिए ........
 उसका जी चाहा उसे पकड़ कर ......लेकिन तब तक वह ......
         उसके मनोभावों को पढ़ते हुए शिखर जी ने कहा-"क्यों मन छोटा करती हो विद्या !उसे कुछ नहीं होगा।उसे अस्पताल जाने से हम रोक भी नहीं सकते।
       चिकित्सक धरती के भगवान होते हैं। बीमारों की इलाज कर उनकी जान बचाना चिकित्सक का  पहला कर्तव्य है। उन्हें अपनी जान की परवाह नहीं ........."।  हमारा आशीर्वाद है कि वह अपने कर्म-पथ पर हजारों बरस बना रहे।
"हाँ! वना रहे।" मांँ ने भी अपने चिंतायुक्त हृदय को तसल्ली देते हुए.........।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

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