सपने
कभी
लड़कपन में
हमने जो देखे सपने
काश!अभी वे हो जाते अपने
ऊँची उड़ान भरते हम भी नभ में
खेल तारों संग आँख-मिचौनी
फिर चढ़ कर चाँद के ऊपर
सारे जग की सैर कर
आ लौट अपने घर
दादी- दादा को
हाल सुनाऊँ
चंदा
तारे की
बात बताऊँ
नभ में कैसे वे रहते हैं
रात को कैसे चमका करते हैं
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
No comments:
Post a Comment