एक टोपी वाला टोपी लेकर।
बेचता टोपियाँ घूम घूम कर।
हरी लाल और पीली टोपी।
काली सफेद औ नीली टोपी।
एक दिन वह जब थक गया।
पेड के नीचे जाकर सो गया।
उस पेड़ के ऊपर डाली पर।
बैठे हुए थे बहुत सारे बंदर।
टोपी वाले को टोपी पहने देख।
पहन ली बंदरों ने भी एक-एक।
टोपीवाला जागा तो टोपी वाली।
टोकरी बिलकुल थी खाली।
उसने जब नजर उठाई ऊपर।
टोपियाँ पहन बैठे थे बंदर।
माँगी टोपियाँ बहुत मगर।
एक न वापस की बंदर।
तब बुद्धि से उसने काम लिया।
सिर की टोपी खोल फेक दिया।
टोपी वाले को ऐसा करते देख।
बंदरों ने भी खोल टोपी दी फेंक।
टोपी वाला तब खुश होकर।
चल पड़ा सभी टोपियाँ लेकर।
समझदारी से जो करते काम।
मुश्किलें उनकी होती आसान।
सुजाता प्रिय समृद्घि
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