Friday, January 17, 2020

ज्ञान पिपासा

जिसके मन में ज्ञान पिपासा।
ज्ञान की जिसे है अभिलाषा।

ज्ञानामृत उसके घर बरसेगा।
ज्ञान पान कर मन हरषेगा।

घट ज्ञान का कभी न भरता।
ज्ञान को ना कोई भी हरता।

जग सूना है बिना ज्ञान के।
घटता है यह बिना दान के।

उतना बाँटो जितना पाओ।
देने में कभी ना सकुचाओ।

अगर ज्ञान की प्यास तुझे है।
ज्ञानी बनने की आस तुझे है।

अज्ञानी को तुम बाँटो ज्ञान।
पाओगे तुम जग में सम्मान।
               सुजाता प्रिय

Tuesday, January 14, 2020

मेरा नाम पतंग है

ना पंछी हूँ ना तितली हूँ,
मैं आसमान में उड़ती हूँ।
दूर - दूर तक  घूमती हूँ,
जब चाहूँ वापस मुड़ती हूँ।

ना विमान हूँ ना तुफान हूँ,
फिर भी भागी फिरती हूँ।
ना पंख हैं ना पाँव है,
जब चाहूँ उठती-गिरती हूँ।

ना हड्डी ना पसली मेरी,
ना मांस-खून ना चमड़ी है।
ना हाथ-मुँह है,ना पेट है,
मोल मेरा बस दमड़ी है।

अन्न-जल कुछ ना चाहिए,
ना खाती ना पीती हूँ।
ना सांस लेती,उछ्वास लेती,
हैरत है कैसे जीती हूँ।

ना कोयला , ना पेट्रोल चाहिए,
ना बिजली से चलती हूँ ।
ना भाप, ना गैस चाहिए,
निराधार मैं पलती हूँ।

उड़ूँ मचलकर, जैसे नभचर,
नन्हीं नटखट, करती छटपट।
रंग-विरंगी, मन- मतंगी,
हटपट-झटपट भागूँ सरपट।

देश-विदेश में पहचान मेरा,
जन-जन मेरे संग हैं।
मन में सबके भरूँ उमंग,
मेरा नाम पतंग है।
    सुजाता प्रिय

Saturday, January 11, 2020

बोली की चोट

बोली ऐसी बोलिए लगे न दिल पर चोट।
घाव घनेरी ना करे,रहे न दिल में खोट।

बोली से न मारिए,कभी किसी को शूल।
जब मुख को खोलिए झड़ता जाए फूल।

बोली तो पत्थर बनकर,चोट करे भरपूर।
बोली से ही दिल टूटता, होकर चकनाचूर।

चोट सदा तूम बेचते, बोली में क्यों ढाल।
बोली सुनकर जन के, मन में रहे मलाल।

टूटे दिल के टुकड़े को, सके न कोई जोड़।
जोड़ सके तो जोड़ ले, उसमें रहेगा जोड़।

बोली की एक चाशनी,सबके मन को भाय।
दिल के छाले को भरे ,बोली मरहम लगाय।

विनती है कर जोड़कर,मीठी बोली बोल।
सुनकर कड़वी ना लगे ,मन में ले तू तोल।
                          सुजाता प्रिय

Tuesday, January 7, 2020

नानी का भजन

मेरी नानी को गुजरे सैंतीस साल गुजर गए।तब मैं छोटी थी ।मेरी नानी बहुत अच्छा भजन गाती थीं ।बहुत सारे भजनों का अर्थ तब समझ नहीं पाती थी लेकिन बड़े होने पर उन भजनों का अर्थ समझ में आया।सचमुच कितना यथार्थपूर्ण और स्वार्थ से भरे असमाजिक ढोंग तथा दिखावे को आईना दिखाता नानी का यह भजन।

जगदीश गुण गाये नहीं,
गायक हुए तो क्या हुआ।

गंगा नहाए हर्ष से,
पर मन तो मैला ही रहा,
धोया न उस मन मैल को,
गंगा नहाए क्या हुआ।

खाया नमक निज सेठ के ,
चाकरी जो न कर सके,
चाकर नहीं वह चोर है,
खाया नमक तो क्या हुआ।

नारी पराई संग ले,
मोटर पे चढ़ बाबू बने।
घर की त्रिया रोती रही
बाबू बने तो क्या हुआ।

जीते जी माँ-बाप की
सेवा से जो मुख मोड़ते,
मरने के बाद श्राद्ध और
तर्पण किए तो क्या हुआ।
        सुजाता प्रिय(नानी से सुना हुआ भजन)

Monday, January 6, 2020

पूस की बरसात

सावन में बर्षा ले आती,
रिमझिम-सी सौगात।
हा़य वेदर्दी बड़ी सताती,
पूस की बरसात।

फैली धुंध कोहरे की,
आसमान में बदली छाई।
समा जाने को रूह में तत्पर,
ठंढी हवा बहती हरजाई ।
झम-झम-झम मेघ बरसते
दिखा रहे हैं औकात।
हाय वेदर्दी बड़ी सताती
पूस की बरसात।

बादलों की ओढ़ रजाई,
सो गया ठिठुर मार्तंड।
आगोश में सभी को ले,
यह भीषण ठंढ प्रचंड ।
काँप रहे सब थर-थर,
ओढ़ कमली बाँध गात।
हाय वेदर्दी बड़ी सताती,
पूस की बरसात।

भींग गई लकड़ियाँ सारी,
अलाव जलाना नामुमकिन।
रात्री में बरसते ओस,
सीतलहरी का प्रकोप दिन।
काटे नहीं कटती है,
ठंढ की यह लम्बी रात।
हाय वेदर्दी बड़ी सताती,
पूस की बरसात।
       सुजाता प्रिय

Friday, January 3, 2020

ऐसी दुआ दे


जगप्राणि को प्रीत सीखा दे।
हे जगदीश्वर एेसी दुआ दे।।

जन के दुःखों का अँधेरा मिटा दे।
जग में सुखों का सवेरा जगा दे।
इस धरती का जन-जन सुखी हो।
हे जगदीश्वर  ऐसी दुआ दे।।

जन के दिलों में समता जगा दे।
भेद भुलाकर विषमता भगा दे।
कटुताओं को जड़ से मिटा दे।
हे जगदीश्वर एेसी दुआ दे।।

हमें ऐसी बुद्धी दो हे परमेश्वर।
आपस में हम रहें मिलजुलकर ।
नफरत दिलों से सदा ही दुरा दे।
हे जगदीश्वर ऐसी दुआ दे।।

कोई किसी की न करे अब बुराई।
बुराई के बदले भी करें हम भलाई।
यह रीत सबके मन में समा दे।
हे जगदीश्वर ऐसी दुआ दे ।।
              सुजाता प्रिय

Wednesday, January 1, 2020

रमिया के सपने

रमिया आज फूले न समाई।
महीने भर की मिली कमाई।

चार घर चुल्हे-चौका करती।
झाड़ू-पोछा कर पानी भरती।

कपड़े धोती औ बर्तन धोती।
तड़के जगती देर से सोती।

हाथ में अपने लेकर पगार।
पहुँची जब वह अपने द्वार।

बच्चे पेट पकड़कर बैठे थे।
भूखे मुँह फुलाकर रूठे थे।

गई रसोई के अंदर वह जब।
याद आया यह उसको तब।

आटे-चावल औ दाल नहीं है।
नमक-तेल का  हाल यही है।

दौड़ी-दौड़ी वह गई बाजार।
उसमें खतम हो गए हजार।

सोची कल बाजार जाऊँगी।
अपने कुछ शौक पुराऊँगी।

सितारें वाली मैं साड़ी लूँगी।
सिंदूर , बिंदी औ चूड़ी लूँगी।

मुन्नी की किताब-कॉपी लूँगी ।
मुन्ने की चप्पल- टोपी  लूँगी।

हरिया  दारू पीकर आया ।
आँखें तरेर कर वह गुर्राया ।

झोंटे खींच-खींचकर पीटा।
पटक भूमि पर उसे घसीटा।

पूछा वह गंदी गाली देकर।
कहाँ गई थी तू पैसे लेकर।

मेरे घर में है बस मेरी तूती।
तू है बस मेरे पैरों की जूती।

सारी कमाई रख मेरे हाथ।
तब रखूगाँ तुझको मैं साथ।

रमिया के हो गए सपने चूर।
शौक-मौज सब हुए काफूर।
                    सुजाता प्रिय