Monday, September 14, 2026

मैं

मैं                   मैं 
                  स्त्री हूँ ।
            तो क्या हुआ ?
       मेरा कोई वजूद नहीं ?
   मेरे मन में कोई इच्छा नहीं ?
  चुप रहती हूँ ! पर गूंगी नहीं हूँ।
    यह तो मेरा  एक तरीका है, 
      माहौल शान्त रखने का।
        नहीं चाहती हूँ विवाद, 
        इसीलिए उदासी पर 
    परदा डाल मुस्करा देती हूँ।
दिल के अन्दर कितनी भावनाएँ 
 हिलोरे लेती हैं तूफ़ान की तरह, 
   पर उसे बेरहमी से दवाकर
        शान्त कराती देती हूँ।
  
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

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