Thursday, April 30, 2020

धरती के दो तारे टूटे

धरती वाले भयभीत खड़े थे,
उल्का पिण्ड टकराने वाला है।
धरती से वह टकराकर अब,
उथल-पुथल मचाने वाला है।

उल्का तो गुजर गया दूर से,
पर धरती के दो तारे टूटे।
ध्रुवतारा- से जगमग करते,
फिल्मी दुनियाँ के सितारें टूटे

दुनियाँ के रंग मंच पर वे,
अंतिम अभिनय दिखा गए ।
कभी साथ अभिनय करते वे,
अंतिम साँस तक निभा गए।

सारी दुनियाँ को यह दुःख है,
शोक-संतप्त हैं भारत के लोग।
दोनों ने साथ अभिनय किया था,
था कैसा यह  अंतिम संयोग।
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, April 25, 2020

झील किनारे

आज रात इक सपना आया।
पुलकित मेरा मन मुस्काया।

मैं जा बैठी हूँ झील किनारे।
जल में अपना पाँव पसारे।

मुस्कुरा रही है सुनहरी उषा।
लेकर खुशियों की मंजूषा।

झील में है हरियाली छाई।
लग रही थी बड़ी सुखदाई।

पत्ते बिखर-बिखर फैले हैं।
कोमल कमल फूल खिले हैं।

मंद-मंद बह रहा था बयार।
तुझसे मिलने का अभिसार।

हाथ बढ़ाकर फूल को छू ली।
उनींदी आँखों में मैं सब भूली।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि,स्वरचित
         

Friday, April 24, 2020

बेचारा चूल्हा

चूल्हे में आग जलता है और चुल्हे को जलाता है।
पर, बेचारा चूल्हा कुछ भी तो नहीं कह पाता है।

क्योंकि उसे जलना है बस भोजन पकाने के लिए।
और उसे तपना है सभी चीजों को तपाने के लिए।

जब चाहो रात-बिरात सुबह-शाम और दोपहर।
रहता है तैयार सदा बन- ठन और सज - सँवर।

अच्छी-अच्छी और चटपटी चीजें बनाने के लिए।
स्वादिष्ट भोजन बनबाकर हमें खिलाने के लिए।

बेचारा खाता है क्या?गोबर से बनी हुई रोटियाँ।
और साथ में सुखी हुई लकड़ियों की सब्जियाँ।

कोयले की बर्फियाँ और लड्डू उसे बहुत भाता है।
भूसे की भुजिया,पत्तों के पराठे भी पसंद आता है।

किसी जमाने में वह पीता था किरोसिन का शर्बत।
और खाना बनाने के लिए जलता था भक - भक।

धीरे-धीरे उसका रंग-रूप और स्वरूप बदलने लगा।
मिट्टी और लोहे के बाद स्टील का बन चमकने लगा।

अब तो बेचारा चूल्हा जिंदा है तो बस गैस के सहारे।
उसकेे भोजन के खत्म होते जा रहे  हैं साधन सारे।

अब गोबर की रोटियाँ कहाँ मिलेगी गोपालन होता नहीं।
पत्तों के पराठे लकड़ियों की सब्जीवृक्षारोपन होता नहीं।

अब तो खादान में देखिए जाकर कोयले भी घट रहे हैं।
हरे-भरे जंगल अब गायब होकर मरुभूमि में पट रहे हैं।
                    सुजाता प्रिय 'समृद्धि' , स्वरचित
                             २५/०४/२०

Thursday, April 23, 2020

बड़ों का फर्ज

एक गाय जब गौशाले से निकलकर घास चरने जाती तो किसी-किसी घर के दरवाजे पर उसे एक-एक रोटी मिल जाती।उसे वह बहुत खुश होकर खाती।एक दिन जब उसे पहली रोटी मिली और वह उसे खाने के लिए बढ़ी,तभी एक कुत्ता रोटी लेने के लिए झपटा।गाय रोटी छोड़ कर आगे बढ़ गई।
दूसरे दरवाजे पर भी उसे रोटी मिली । उस समय भी एक बिल्ली सहमती हुई आई और रोटी लेने के लिए बढ़ी। गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
अगले दरवाजे पर भी उसे रोटी मिली ।एक मुर्गा दौड़ता हुआ लपका।गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
कुछ दूर चलने के पश्चात फिर किसी ने उसे रोटी दी।एक कौआ भूख से व्याकुल हो उसे उठाना चाहा।गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
उसकी इस क्रिया को उसके निकट घास चरता हुआ एक साँढ़ बड़ी तन्मयता से देख रहा था।उसने गाय से पूछा-तुमको इतनी रोटियाँ खाने के लिए मिलती हैं जिसे खाकर तम्हारा पेट भर जाता।पर, तुम उन प्राणियों के आगे बढ़ते ही उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी।क्या तुम्हें रोटियाँ अच्छी नहीं लगती।
गाय बोली- मुझे रोटियाँ अच्छी तो बहुत लगती हैं।लेकिन उतनी रोटियों से मेरा पेट नहीं भरता।अगर मैं उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी तो उनकी भूख तो मिटी।मैं तो अपना पेट घास खाकर भी भर लूँगी।लेकिन कुछ जीव एेसे हैं जो घास नहीं खा सकते।उनके लिए रोटियाँ उपयोगी थीं।फिर मै उन सभी से बड़ी हूँ।इसलिए, मेरा फर्ज है कि मैं अपने से छोटों का ख्याल रखूँ।
साँढ़ ने उसे सम्मान से देखते हुए कहा-तुम्हारी इन्हीं ममतापूर्ण गुणों के कारण तो सभी लोग तुम्हें माँ कहते हैं।सचमुच तू बड़ी महान है।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित मौलिक
          २४/०४/२०

Tuesday, April 21, 2020

विश्व धरती दिवस पर माँ धरती को समर्पित

धन्य माँ धरती

धन्य-हो तू हे माँ धरित्री,
    हमको तूने जन्म दिया।
        गोद बैठाकर पाला-पोसा,
            और खाने को अन्न दिया।

नदी-तालाब,झील-झरनों से,
    तूने पीने को जल दिया।
        तन मे शक्ति भर जाने को,
            साग-सब्जी और फल दिया।

गिरी-कंदराओं,पेड़-गुफा में,
    जीवों को आवास दिया।
        वायु से शुद्ध संजीवनी दे,
             फूलों से सुवास दिया।

दिन में प्रकाश फैलाने को,
    सूर्य से ले रोशनी दिया।
        काली रात का तम हरने,
            चँदा से ले चाँदनी दिया।

धूरी पर अपनी घूमकर,
    तूने हमको दिन-रात दिया।
        सूरज की परिक्रमा कर,
            त्रृतुओं की सौगात दिया

दुनियाँ के सब जीवों को,
    माँ तू ही पालन करती है।
        हम सबको तू धारण करती,
            नाम तेरा  तभी तो धरती है।

तुम्हें बचाने को माँ धरती।
    हमसब मिल संकल्प करें।
        संरक्षण तुझको देने को,
            तुमको हमसब स्वच्छ करें।

      .         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       .           स्वरचित मौलिक
       .              २२/०४/२०२०

Monday, April 20, 2020

गजल


मेरे लिए मन में प्यार पालकर देखो,
एक नजर मुझपर डालकर दैखो।

माना मैं कोई हूर की परी ना हूँ,
तुम अपने रूप को खंगालकर देखो।

किसी बहकावे में कतराओ ना मुझसे,
अपने दिल में मुझे संभालकर देखो।

मैं बुरी लगती हूँ महफिल में अगर,
दिल में मेरा अक्श डालकर देखो।

क्यूँ इतराते हो खुद पे मीत मेरे तुम,
अपने मन में थोड़ा सवाल कर देखो।

आज तुझसे मेरी यह गुजारिस है कि,
मेरे साथ खुद को भी ढालकर देखो।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
         स्वरचित मौलिक

Thursday, April 16, 2020

बचा लो भगवन

बड़ा भयंकर रोग है छाया।
सबके मन में भय समाया।

यह कैसी आयी महामारी।
जिससे डरती दुनियाँ सारी।

नागिन से भी यह भयंकर।
बिन देखे सब भागे डरकर।

सब जन थर-थर काँप रहे हैं।
कहाँ तक पहुँची भाँप रहे हैं।

अपने घर में हैं छुपकर बैठे।
मित्र जनों से हम रहते ऐठे।

महीने भर से हैं कैद पड़े हम।
घर में भी भयभीत खड़े हम।

मानव से अब मानव हैं डरते।
नाक-मुँह को ढककर रखते ।

मिलने-जुलने से हैं कतराते।
पास जाने से भी हैं घबराते।

आकर हमें बचा लो भगवन।
भय से मुक्त करा दो भगवन।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             १४/०४ /२०२०