Monday, July 12, 2021

मां का आंचल

मां का आंचल

जिससे हम पाते शीतल छाया।
जिसमें बसती है  ममता माया।
जो ढककर रखती  मेरी काया।
जिसका सुगंध है मन को भाया।
वह मेरी मां का आंचल है।

जिसमें हर फूलों की महक है।
जिसमें चांद तारे-सी चमक है।
पायल की घुंघरू-सी छनक है।
हाथों की कंगने  की खनक है।
वह मेरी मां का आंचल है।

जो हमको प्यार से  सहलाता।
हवा में उड़ कर मन बहलाता
अंक में भरकर है हमें झुलाता।
हर पल है जो हमको लुभाता।
वह मेरी मां का आंचल है।

जो पंखा बन देता वायु झोंके।
धूल-गंदगी सब पड़ने से रोके।
मेरी आंसुओं को हरदम पोंछे।
मुत्र -पसीने को खुद में सोखे।
वह मेरी मां का आंचल है।

निंदिया आयी,आंखें झपकी।
जो देता जो प्यार की थपकी।
छोर- छोर उड़ आती लपकी।
हर कोने से है ममता टपकी।
वह मेरी मां का आंचल है।

     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित, मौलिक

Sunday, July 11, 2021

नेग की परम्पराएं

-हंसी-मजाक एवं नेग लेने का रिवाज
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हंसी-मजाक का रिवाज हमारी संस्कृति में माहौल को खुशनुमा बनाने में काफी सहायक रही है।
शादी में एक बहुत ही प्यारा रिवाज है द्वार-छेकाई का। जिसमें दालधोई मटकोड़ आदि की रस्में निभाकर वापस आने पर घर पुत्रियां द्वार घेरकर खड़ी होती हैं और सुंदर-सलोने गीत गाकर  नेग मांगती है। मां-चाची मौसी-मामी  थोड़े नोंक-झोंक, थोड़ी तकरार थोड़ी मनुहार और हंसी मजाक के बाद खुशी-खुशी उपहार एवं पैसे इत्यादि देती हैं।इसी प्रकार भांवर के लाबे बेचने का भी रस्म चलता है। शालियां दुल्हे के जूते छिपा कर भी कुछ उपहार प्राप्त कर लेती हैं।इस प्रकार हर विधि- विधान में नेग लेने और हंसी-मजाक कर शादी की खुशियों को बढ़ाने में इन छोटी छोटी रीति रिवाजों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, July 8, 2021

बिहार में बाढ़ (मगही गीत )



सुना-सुना भाई, सुना-सुना राही।
मचा देलकै बाढ़ बिहार में तबाही।

सुखाड़ हलै तो हमें पानी मांगलिऐ।
झम-झम बरसाबा भगवान के कहलिऐ।
बड़ी बरसैला अब अउरो न चाही।
मचा देलकै बाढ़ बिहार में तबाही।

नदी-नाला में उठल उफान है।
ताल-तलैया में मचल तुफान है।
सड़किया पर पनिया के धार बताही।
मचा देलकै बाढ़ बिहार में तबाही।

बढ़िया में बहलै मकान अउर झोपड़ी।
साग-सब्जी बहलै,सूप-दउरी-टोकरी।
कर न सकलिऐ कोय कौनो मनाही।
मचा देलकै बाढ़ बिहार में तबाही।

इनर भगवान के हमें पुजलिऐ।
मिश्री-बतासा  तुलसी चढैलिऐ।
अब बरसे में थोड़ा करहो कोताही।
मचा देलकै बाढ़ बिहार में तबाही।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Tuesday, July 6, 2021

काव्यात्मक परिचय

जय मां वागीश्वरी 🙏
#साहित्य_संगम_संस्थान_झारखण्ड_इकाई
#दो

बिहार राज्य जन्मस्थान,नाम है सुजाता।
मुरली मनोहर पिताजी हैं, शकुंतला है माता‌।

ससुराल बिहार शरीफ नालंदा, रांची है निवास।
शंकर प्रिय पति परमेश्वर,जिनपर है विश्वास।

भाई-बहनों में बड़ी हूं,दो बेटियों की माता।
छोटा-सा परिवार यही, दिया है मुझे विधाता।

सिलाई-बुनाई, कढ़ाई-पेंटिग में रखती अभिरुचि।
संगीत-चित्रकारी, मूर्ति निर्माण में भी मेरी रुचि।

भावों के मनके गुथकर कविताएं मैं रचती हूं।
शिक्षाप्रद कहानियां-नाटक भी थोड़ा लिखती हूं ‌।

हर विधा की हूं मैं, छोटी-सी साहित्यकार ‌।
सभी साहित्यकार मित्रो को,मेरा नमस्कार ।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, July 2, 2021

ग़ज़ल (बड़ी सुंदर नजारे हैं )



धरा पर आज है देखो, बड़ी सुंदर नजारे हैं।
यहीं पर चांद-सूरज हैं,यही टिमटिम सितारे हैं।

कहीं है बूंद शबनम का,कहीं श्रमकण टपकता है ‌।
कहीं बरखा की रिमझिम-सी बरसती अब फुहारें हैं।

कहीं हठखेलियां करते, गिलहरी- नेवले-दादूर,
कहीं कलरव से गुंजित कर,खग- कुल पर पसारे हैं।

चमन के फूल सब सुंदर, झूमते हैं महक देकर,
वहीं भौंरें - तितलियां भी,गाते गीत प्यारे हैं।

सजा हरियाली से देखो,यही का कोना-कोना है,
लताऐं डाल से लिपटी, झुमते वृक्ष कतारें हैं।

जल निर्झर से झर-झर कर,सुर संगीत की छेड़ा,
छलकते बर्षा के जल से,सरोवर के किनारे हैं।
                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

पति-पत्नी

पति-पत्नी

आपस में विश्वास बनाकर।
एक-दूजे का साथ निभाकर।।
जीवन पथ पर बढ़ते जाते।
अंत-काल तक साथ निभाते।।

कभी-कभी तकरार भी होता।
पर आपस में प्यार भी होता।।
जो आती सुख-दुख की बारी।
दोनों ही बन जाते अधिकारी।।

प्यार के रंग में रंगती है जोड़ी।
लड़ाई-खिचाई भी होती थोड़ी।। 
पत्नी सयानी और पति सयाना।
दोनों मिल कर एक समाना।।

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, July 1, 2021

धरती के भगवान (लघुकथा)



विद्या का मन बहुत घबरा रहा था। बेटा को कोरोना मरीजों के वार्ड में ड्यूटी पड़ी।मन की झुंझलाहट लंच बॉक्स पर निकाल रही थी । हरीश के लिए लंच बॉक्स में भूना हुआ बादाम भरती हुई वह सोच रही थी  इससे तो अच्छा था वह घर बैठ कर कोई बैंक बगैरह की नौकरी की तैयारी करता। बस इसके पिता जी को ही ज़िद थी कि एक ही बेटा है डाक्टर बनाऊंगा।अब देख लिया ना इतनी बड़ी आपदा पड़ी है।सभी लोग घर में सुरक्षित बैठे हैं और मेरे जिगर के टुकड़े को कोरोना बैरियर बना दिया। स्टुडेंट-लाइफ में ही इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी। क्या और चिकित्सक नहीं है। मेरे फूल से बच्चे को बीमारों की इलाज में झोंकना था।
         मां जल्दी दो ना मेरा लंच- बॉक्स हरीश ने तैयार होकर आते हुए बोला। हां ठीक है ।यह स्कूल वाला लंच-बाक्स । तुम्हारे हाथ का बना हुआ मजेदार गाना खाएं बगैर मुझे चैन नहीं।ऊपर से यह बचपन बाला लंचबॉक्स।मां के हाथ से लंचबॉक्स लेकर मां पिताजी के चरण-स्पर्श किए और हास्पीटल के लिए निकल पड़ा। मां जानती थी यह सब बातें वह उसे बहलाने के लिए बोल रहा है। मां का जी चाहा उसे पकड़ कर रोक ले। लेकिन तब तक वह बढ़ चला था।
             उसके मनोभावों को पढ़ते हुए शिखर जी ने कहा-क्यों मन छोटा करती हो विद्या !उसे कुछ नहीं होगा।उसे अस्पताल जाने से हम रोक भी नहीं सकते।
       चिकित्सक धरती के भगवान होते हैं। उन्हें बीमारों की इलाज कर उनकी जान बचाना होता है। चिकित्सक का यह पहला कर्तव्य है। उन्हें अपनी जान की परवाह नहीं होनी चाहिए। औरों की जान बचाना ही उसका पहला कर्म है हमारा आशीर्वाद है कि वह अपने कर्म-पथ पर हजारों बरस बना रहे। हां वना रहे मां ने भी अपने चिंतायुक्त हृदय को तसल्ली देते हुए कहा -
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'