Wednesday, June 24, 2020

रथ-यात्रा पर रोक

रथ-यात्रा पर भी रोक है।
हा यह कैसा संयोग है।
मानव जन की मनमानी का,
लगता जैसे यह भोग है।

चपेट में जिसकी दुनियाँ सारी।
कर दिया सबका जीना भारी।
हे भगवान,कर कल्याण,
छाया यह कैसा रोग है।

मिटा दो जन के सारे पाप।
दूर करो सबके संताप।
कृपा करो हे कृपा निधान।
भयभीत यहाँ सब लोग हैं।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, June 22, 2020

हम शरण में आपके कब से खड़े

हम शरण में आपके कब से खड़े।
आपके चरणों में आकर हैं पड़े।।

परमेश्वर हम आपकी संतान हैं।
मेरे सिर पर आपका वरदान है।।

गुण-सुबुद्धि आप हमको दीजिए।
हे प्रभो कल्याण हमारा कीजिए।।

सबके उर में आपका ही प्यार है।
सारे जग के आप पालनहार हैं।।

आप हममें ऐसी कुछ शक्ति भरें।
दुखियों के दुखड़े सारे हम हरें।।

तेरे चरणों में हम झुकाए माथ हैं।
हम अधम के आप ही तो नाथहैं।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, June 21, 2020

धरती की चिट्ठी वर्षा के नाम

आषाढ़ शुक्ल,दिनांक द्वितीया
    बादलों से बने घर के पते पर।
       सूर्य किरण की तप्त कलम से,
           कड़ी धूप की तपते पन्नें पर।

अपने गरम कर-कमलों से,
    धरती ने लिखी एक चिट्ठी।
        रूठी वर्षा को मनाने को,
         लिखकर बातें मीठी-मीठी।

हे प्रिय सहेली बरखा रानी,
   तुम्हें मेरा पहुँचे शुभ-प्यार।
       बहुत दिन हुए तुमसे मिले,
          मिला न तेरा कोई समाचार।

समय निकाल मिलने आओ,
    मैं राह तुम्हारी हूँ देख रही।
        नयन बिछा राहों में मैं तेरी,
           चहुँ ओर नजरें हूँ फेक रही।

सावन की सौगात देने को,
     सखी तुम्हें आना ही होगा।
        बादल-बिजली घोर-घटा को,
            अपने संग लाना  ही होगा।

झम-झम पानी की बुँदी भी,
    लेकर आना अपने साथ में।
        फुहारों की रसभरी मिठाई,
            संदेशा लाना तुम  हाथ में।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
  स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

पिताजी आप पर अभिमान है

पिताजी आप पर अभिमान है।
आपकी हर कीर्ति पर शान है।

बस आप ही तो वह व्यक्ति हैं।
जो हमको देते हरदम शक्ति हैं।

पाल - पोषकर हमें बड़ी किया।
सद्गुणऔर शिक्षा है हमें दिया।

हर अच्छी राह हमें दिखाया है।
अनुशासन में रहना सिखाया है।

आज मैं आपसे बहुत ही दूर हूँ।
मिलने-जुलने से भी मजबूर हूँ।

आपका अनूठा-अनुपम प्यार।
याद आ रहा मुझको बारम्बार।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, June 20, 2020

तेरी प्रतिक्षा में

सुरमयी गोधुली बेला तक,
यह आस लिए मैं खड़ी रही।
तुम आओगे, तुम आओगे,
विश्वास लिए मैं अड़ी रही।

आँखों के पल्ले फिहकाकर
,तकती रही मैं राह तेरी।
जाने कहाँ तुम भटक गए,
मन में उठती परवाह तेरी।

वह शाम ढली,अब रात भई,
लेकिन अब तक तुम ना आए।
चंदा की चमक, तारे की टिमक,
कुछ भी मुझको अब ना भाए।

तेरी प्रतिक्षा में खड़े-खड़े ,
जी उकताया सा-लगता है।
आशंकित दिल बेचैन ये मन,
कुछ धबराया-सा लगता है।

बस एक झलक की चाहत है,
हो रहा है अब चंचल चितवन।
व्याकुल हृदय कमज़ोर हुआ,
रुक ना जाए अब यह धड़कन।

अब भी समय है,तुम आ जाओ,
कुछ देर हुई कोई बात नहीं।
कुछ ना लाना, बस तुम आना,
हो मेरे लिए  सौगात तुम्हीं।
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, June 18, 2020

चल छोटू

,
राय बहादूर सिंह जी पत्नी के साथ बस डिपो में उतरे।पत्नी को सामान देखने के लिए कहकर रिक्शे की तलाश करने चले।रिक्शे तो उन्हें कई मिले लेकिन भाड़ा ही अत्यधिक बोल रहा था।कई रिक्शे वाले को मनुहार किया- बाबु इतनी दूर से आया हूँ।बस वाले ने भी बोरियों के अलग से भाड़ा ले लिया।उन्हें तो तुमलोग जानते ही हो कितने बेरुखे और दवंग होते हैं।पर ,तुम तो समझदार हो।बस बजरंगी चौक तक ही तो जाना है।भारी सामान हैं इसलिए ।नहीं तो हम दोनों पैदल ही टहलते हुए चल देते।
किन्तु कोई भी रिक्शावाला तीस रुपये से कम में चलने को तैयार नहीं हुआ।
सिंह जी बीस से बढ़कर पचीस पर आ गए।फिर भी वे नहीं माने ।
उन्होंने इधर-उधर नजरें दौड़ाई।एक भोला- सा तेरह चौदह वर्षीय बालक पुराना जर्जर-सा रिक्शा थामें बेचारगी का भाव लिए खड़ा था ।
चल छोटू! सिंह जी ने बड़े प्यार से उसे पुचकारते हुए बुलायाा।
बेचारा बालक,रिक्शा चालक! तो जैसे उनकी आज्ञा रूपी पुकार का इंतजार कर रहा था।झट रिक्शा लिए बढ़ चला।सोंचा पचीस तक तो उन्होंने स्वयं देने की बात कही है।नहीं तो बीस तो अवश्य देंगे।इयलिए भाड़े पर कोई चर्चा नहीं की।दूसरे रिक्शा-चालक ने थोड़ा ऐतराज जताते हुए कहा- भाड़ा पहले ही तय कर लो ।लेकिन उनके  साथी रिक्शा-चालक ने इशारे से उसे रोक लिया ।शायद उसे उस बालक की दीनता पर तरस आ रहा था।उसने फुसफुसाते हुए कहा-जाने दो बीस रुपये ही सही कुछ तो कमाएगा।
उस छोटे-से रिक्शा-चालक ने सिंह जी की अनाज से भरी बोरियों को उठाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी पर बोरियाँ उससे ना हिली।दूसरे रिक्शा-चालक ने दया भाव से बोरियाँ चढा़ने में उसकी मदद की।दोनों पति-पत्नी तो पहले ही बैठ चुके थे।बोरियों के ऊपर उनके दोनों बैग रखकर वह रिक्शा चलाने लगा।
रास्ते में उसके टूटे-फूटे रिक्शे के लिए उन्होंने उसे खूब जली-कटी  सुनायी । नया रिक्शा खरीद लेने की सलाह भी दी।रिक्सशा चलाने के ढंग को अल्हड़पन बताया।और जाने क्या-क्या दोषारोपण किया।
बात-बात में उन्होंने यह भी जान लिया कि उसका बाप महीने भर से बीमार है।जिस कारण मजबूर हो वह विद्यालय जाना छोड़ कर रिक्शा चला रहा है ताकि घर में भोजन का प्रबंध , पिता का उपचार और रिक्शा-मालिक का किराया भुगतान हो ।
उसकी बातों को सुन उन्होंने अपनी अमीरी दर्शाते हुए कहा- हम तो घर से चना-मसूर ले आये घर की चीज है।खरीदने पर कितने पैसे लगते हैं।
यही बजरंगी चौक है दादाजी! बालक ने रिक्शा रोकते हुए कहा।
थोड़ा गली में घुसा दे बाबु ! थोड़ा-ही दूर है उनहोंने दुलारते हुए कहा।ठीक है आपलोग उतर जाइए।उधर बहुत चढ़ाव है।
अरे हमलोग कहाँ उतरेंगे बे्टा! अभी तुमने ही न दादाजी कहा।उमर का ख्याल करो ।तुम्हारे जैसा बच्चा थोड़े न हूँ कि जब चाहूँ चढ़ूँ जब चाहूँ उतारूँ।
वह जोर लगाकर रिक्शा चलाया। पर, चढान में चलाना मुश्किल लग रहा था।
सिंह जी की पत्नी ने सुझाव दिया- जरा उतर कर खींच बेटा!
वह उतर कर खींचने लगा ।कुछ देर में थक कर बोला अब मुझसे नहीं चलेगा।
सिंह जी ने कहा -जरा और जोर लगाकर खींच ना बेटा! भारी सामान है कैसे ले जाउँगा?
लड़के ने जोर लगाकर खींचते हुए कहा दादाजी आप उतरकर पीछे से ठेल दें तब चला जाएगा।
सिंह जी ने आँखें तरेरते हुए कहा- मैं ठेलूँ ? बोलने का तम्मीज नहीं है।बड़ा-छोटा का ख्याल नहीं मुझे रिक्शा ठेलने कहता है।मारूँगा दो चाँटे खीचकर गाल में तो मुँह घूम जाएगा।मैं इतने बड़े पद पर रहा हूँ ।कोई मुझे आज तक मेरा अपना काम तक करने को नहीं कहा और यह बालिस्त भर का छोकरा मुझे रिक्शा ठेलने को कहता है।तुम्हारे जैसे बच्चे का पूरा खानदान मेरी जी हुजूरी करता आया है। खुद तनिक जोर लगाकर खींचेगा तो नहीं चलेगा।
बेचारा डर से जैसे- तैसे रिक्शा खींचते रहा।
बीच-बीच में दोनों कभी ललकारते ,कभी खीजते हुए कहते क्या बच्चा है ? एक रिक्शा भी नहीं खींच सकता।
पत्नी ने कहा जमाना खराब है लोग मुफ्त में पैसा लेना जानते हैं।गली केलोग तमाशवीन बने उस बालक के जोर-आजमाइस को देखते रहे और वह बेचारा अँगुल - अँगुल भर रिक्शा खींचत हुए लगभग सौ मीटर की दूरी तय किया ।
हुएँ उचका पर चढ़ाकर रोक दे। अचानक सिंहजी ने एक ओर इशारा करते हुए कहा तो बेचारे की जान-में-जान आई।एक बार पूरी ताकत लगाकर रिक्शा खींचते हुए ऊपर चढ़ाया और हाँफता हुआ रोक दिया ।जैसे रेस का निशान पार कर गया हो ।चेहरे से टपकते पसीने को पोछते हुए सामान उतारने लगा। स्वागत में खड़े उनके नौकर  ने मिलकर बोरियाँ उतारी।जब सारा सामान उतर गया तो  सिंहजी ने झट उसके हाथ में दस रुपये का नोट थमाकर गेट में घुसने लगे ।
इतने में क्या होगा दादाजी कम-से-कम बीस रुपये तो दिजिए।
क़्यों नहीं होगा बच्चा है ज्यादा पैसा लेकर क्या करेगा।उनकी पत्नी ने डाँटते हुए कहा।जा बिस्कुट- लेमनचूस खरीदकर खा ले।
दस रुपये और दिजिए दादाजी! पिताजी की दवा भी लाना है।
क़्यों दूँ उस समय तुमने बात क़्यों नहीं किया।मैं तो तुम्हें छोटा समझकर ही लाया।चल भाग यहाँ से नहीं तो पिटाओगे।
बेचारा छोटा रिक्शा- चालक अपनी छोटी कमाई हाथ में लिए सोंच रहा था कैसे इतने में सारे काम होंगे? वह सिंह जी के विशाल भवन को निहार रहा था। आँखों के अस्क गालों के स्वेद से मिलकर धारा- प्रवाहित हो रहा था।जिसे पोछकर विराम देने का हौसला उसमें नहीं था।
                सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, June 17, 2020

चेत -चेत तू ऐ चीनियों

खबरदार ऐ चीनी सैनिक,
        आँखें हमें दिखाओ ना।
धोखे से हमला करने वाले,
         इतना तुम इतराओ ना।
हम भारत के वीर सिपाही,
        तुम्हें भगाकर दम लेंगे।
मेरी सीमा पर अगर रेंगे तो,
         हम तेरा फन कुचल देंगे।
इतिहास अगर दुहराओगे,
       उन्नीस सौ बासठ,सड़सठ का।
आठ अगर हम खड़े हुए तो,
     खून बहाएँगे तुम अड़सठ का।
गलवन से तुम कदम हटा लो,
         लेह और लद्दाख हमारा है।
भारत माँ के कंधे पर केवल,
   जन्मसिद्ध अधिकार हमारा है ।
चेत -चेत तू अब ऐ चीनियों,
            तेरा न यहाँ ठिकाना है।
नेस्तनाबुद तुझको करने को,
            हमने भी प्रण ठाना है।

      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित