Wednesday, October 20, 2021

परीक्षा



एक गुरुकुल में यह परम्परा थी कि नित्य कक्षा में आगमन और प्रस्थान करते समय शिष्य गण गुरुजी के चरण-स्पर्श करते थे।एक दिन गुरुजी ने शिष्यों से कहा-कल तुम सबकी परीक्षा है। दूसरे दिन नियत समय पर गुरुजी एक ऊंची तख्ती पर बैठ गये। उन्होंने अपना बायां पांव जमीन पर रखे और दाएं पांव को मोड़कर बांए पांव के घुटने पर चढ़ा लिया।सभी शिष्य परीक्षा देने उपस्थित हुए ।वे कतार बांध कर आ रहे थे और बारी-बारी से  गुरुजी के चरण-स्पर्श करते। गुरु जी के बैठने के अंदाज से सभी शिष्यों को चरण -स्पर्श  करने में कठिनाई हो रही थी। कोई शिष्य सिर्फ उनके नीचे रखे चरण को स्पर्श करता, कोई ऊपर वाले को , कोई बारी-बारी से दोनों को,तो कोई तिरछे हाथों से एक साथ दोनों चरणों को, कोई दोनों हाथों को दाएं बाएं घुमाते हुए दोनों चरणों को। गुरुजी प्रसन्न चित्त से सभी को आशीष देते।
अंतिम शिष्य जिसका नाम विशाल था आया। उसने असमंजस से  गुरुजी के चरणों को देखा, और क्षमा-याचना के भाव से अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। गुरुजी शिष्य को गौर से देखकर सोचने लगे, क्या यह चरण -स्पर्श नहीं करेगा ?
   लेकिन उसनेे ध्यान से गुरुजी के चरणों को देखा फिर आदर- पूर्वक दोनों हाथों से गुरुजी के ऊपर वाले पांव पकड़ कर नीचे वाले पांव के बराबर रखा। उसके बाद दोनों हाथों से दोनों चरणों को स्पर्श किया। गुरु जी ने उसे भी आशीष दिया।
 फिर उठकर परीक्षा कक्ष में प्रवेश किए और होंठों पर मधुर मुस्कान लिए हुए कहा आज की परीक्षा में विशाल उत्तीर्ण हुआ।
सभी शिष्य गुरु जी को अचंभित हो देखने लगे।वे मन-ही-मन सोच रहे थे अभी तो हमारी परीक्षा ली ही नहीं गयी फिर परीक्षा फल कैसे घोषित कर दिया गया ?
     गुरु जी उनके नेत्रों की भाषा से उसके मन के भाव समझ रहे थे। उन्होंने कहा-आज तुम्हारे द्वारा मेरे चरणों का स्पर्श ही तुम सबकी परीक्षा थी। मैंने अपने चरणों को प्रतिकूल रखा।तुम सभी उस प्रतिकूलता को ही अपनाते रहे। परीक्षा अर्थात चरण-स्पर्श गलत तरीके से करते रहे। लेकिन विशाल ने मेरे चरणों को सही तरीके से रखा अर्थात पहले परिस्थिति को अनुकूल बनाया फिर चरण-स्पर्श किया। इसलिए प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने वाला ही जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकता है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक

पत्र पेटी (लघुकथा )

हाथ में दो दर्जन पोस्ट-कार्ड लिए करुणा बड़ी तेजी से डाक घर की ओर बढ़ी जा रही थी। बाजार आते वक्त मां जी ने उन्हें उसके हाथों में थमाते हुए कहा-डाक घर जाकर इन पत्रों को पत्र पेटी में डाल देना।अब बस दस दिन ही शेष हैं।पत्र मिलने में देर होगी तो सभी लोग शिकायत करेंगे। उसने उन चिट्ठियों पर सरसरी नजरें डाली। सभी चिट्ठियों में अशीष, प्रणाम और हाल समाचार के बाद लिखा था-दस दिनों बाद मेरी दूसरी आंख का आपरेशन होने वाला है। जल्द-से-जल्द आने की कोशिश करो।
पते पर नजरें दौड़ाई। सभी चिट्ठियों पर मां जी के भाई- बहन, भतीजे-भतीजियों, बेटियों आदि के पते लिखें थे।वह सोचने लगी ,उनके रहने एवं खाने-पीने की व्यवस्था भी तो करनी है।उसे याद है मां जी की पहली आंख का आपरेशन के समय मां जी के मायके के लोग आए थे तो अलग से रसोइया रखना पड़ा था।ऊपर से वह स्वयं सभी लोगों की सेवा- सुश्रुषा एवं आवभगत में लगी रहती थी। फिर भी सभी लोग उसकी निंदा करते रहते,ताने देते रहते।अलसी,निकम्मी,अलहेली, बेवकूफ,मुंह जोर आदि कितनी उपाधियां उसे प्रदान किया गया था।उन पुरानी बातों को याद कर उसके तन-मन में आग लग गयी।रोगी से ज्यादा देख-रेख और सेवा तो रोगी को देखने आने वालों की करनी पड़ती है। कोई सेवा या मदद के लिए थोड़े ना आते हैं।मेहमानी भी होती है और काना-फूसी भी करते हैं। इलाज और आपरेशन से ज्यादा पैसा तो रिस्तेदारों ंंके आवभगत में खर्च हुए थे।
  इन विचारों में डूबी वह डाक घर के पास पहुंच गयी।उसी समय कचरे ले जाने वाली गाड़ी पत्र पेटी के पास आकर रुकी।वह उस गाड़ी के हटने का इंतजार करने लगी। अचानक उसकी नज़र कचरे वाली गाड़ी के डब्बों पर पड़ी ।वह हरे डब्बों में सारी चिट्ठियों को डालने लगी। कचरे ले जाने वाले ने उसे नासमझ समझते हुए कहा- उधर है पत्र-पेटी।इन चिट्ठियों को उसमें डालिए। लेकिन करुणा ने तेजी से उन चिट्ठियों को कचरे के डिब्बे में डालते हुए कहा- इन चिट्ठियों की पेटी यही है। चिट्ठियां ना मिलने की शिकायत अवश्य रहेंगी। किन्तु हमारे और उन सभी लोगों के पैसे और समय की बचत होंगी।साथ में परेशानियों से भी मुक्ति मिलेगी।
बेचारा कचरे वाला आवाक उसका मुंह देखता रह गया।गीले कचरे में भींग सारी चिट्ठियां गीली हो गईं थी, और करुणा राहत की सांस लेते हुऐ बाजार की ओर बढ़ गयी।
                                    सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                                       स्वरचित, मौलिक

Tuesday, October 19, 2021

कहां खोया ये बचपन


,कहाँ खोया रे बचपन ?

हाय कहाँ खोया रे बचपन,
खेल-खिलौने सब छोड़कर।
तुतली  बोली  से रूठकर,
भोलापन से मुख मोड़कर।

कहाँ  गए वे लट्टू - घिरनी,
और कहाँ वे गिल्ली - डंडे।
साँप-सीढ़ी,लूडो - शतरंज,
और  वे ब्यापारी  के फंडे।

इक्खट - दुक्खट  का मजा,
वह कित-कित-कित करना।
रूमाल - चोर, ओ सम्पाजी,
वो आँख-मिचौनी का छुपना।

कहाँ गया वह गेंद और पिट्टो,
कूदना और फांदना  रस्सी से।
रेल बनाकर बम्बई को घुमना,
और झूला झूलना  मस्ती  से।

लउवा - लाठी, चंदन - काठी,
आईस-पाईस, चोर - सिपाही।
अटकन-मटकन दही-चटाकन,
और वो दोस्तों  की  गलबाहीं।

आहा,क्या थे दिन बचपन के,
मन में  कोई  क्लेश  नहीं था।
ना किसी से शिकायत शिकवा,
किसी से भी वैर- द्वेष नहीं था।

बड़े  हुए  तो खेलने  पड़ते हैं,
जिम्मेदारियों के बड़े-बड़े खेल।
छूट  गए  सब   संगी - साथी,
नहीं किसी से हो पाता है मेल।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

राम (दोहा )


दशरथ जी के लालना,राम बड़े थे वीर।
अरिदल की सेना संग, लड़ने में रणधीर।

मंझली मां के कोप से, मिला उन्हें वनवास।
पिता की आज्ञा पा चले,मन में ले हुलास।

मातु-पिता और गुरु के,चरणों में नवाकर शीश।
सभी जन को प्रणाम कर,चले पाकर आशीष।

लघु-भ्राता लक्ष्मण बोले,जोड़ कर दोनों हाथ।
भैया अकेले  ना जाइए, मैं भी चलूंगा साथ।

त्याग राजसी वस्त्र को,पहन वलकल अंग।
भार्या सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।

वन वन भटके साथ वे, खाते मूल और कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते लिए आनन्द।
                 सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Monday, October 18, 2021

कलश यात्रा

जय मां शारदे
 कलश यात्रा
शारदा की खुशी का ठिकाना नहीं ।बेटा दुल्हा बनेगा।घर में बहू आएगी।उसके पायल की रुनझुन से घर का माहौल संगीतमय हो जाएगा।उसकी शृंगार की सुगंध से पूरा घर सुवासित हो जाएगा।उसकी सुंदरता से पूरा महल सुशोभित हो जाएगा।आज उसके बेटे को तिलकोत्सव है।शुभ-घड़ी पर उपस्थित टोले-मुहल्ले के सभी लोगो तिलक-भोज से निपटकर चले गये। सम्बंधी-कुटुमब के लोग तिलक में आए सामानों को देखने लगे। किन्हीं सामानों की बड़ाई और किसी की बुराई का शिलशिला चलने लगा। लेकिन शारदा को सामानों की परवाह नहीं बहू तो सुंदर और संस्कारी मिली। किसी ने मुंह बनाते हुए कहा-इतने बर्तनो में आपकी दोनों बेटियों की शादी कैसे हो जायेगी।किसी ने कहा-होने वाले समधी की सात बेटियां हैं और यह आखिरी बेटी है कहां से दे पाते अधिक सामान। लेकिन शारदा मन-ही-मन प्रतिज्ञा कर रही थी कि बहू के मायके से आये एक भी सामान वह बेटियों को नहीं देगी।सारे सामानों को देखते-देखते अचानक उसकी नज़र तिलक में आयी कलशी पर पड़ी।उसे देख उसकी आंखों में अजीब सी चमक उत्पन्न हुई।जैसे वह अपनी कोई खोयी हुई वस्तु पा गयी।वह झट से उठी और कलशी को उठाकर देखी ।फिर उसमें की गयी कशीदाकारी में जैसे कुछ ढूंढने लगी। कशीदाकारी के बेल-बूटे पर उसकी नजरें थम-सी गयी।बूटे के बीच में उभरे अपनी दादी के दादा-दादी के नाम देख उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।वह अपने बेटे को देखते हुए बड़ी प्यार से बोली-मेरा बेटा मेरी प्यारी कलशी को बहुरा कर ला दिया।
      मतलब ? लोगों ने अचंभित हो पूछा।
शारदा ने कहा-आज से पच्चीस साल पहले यह कलशी मेरे मायके से आया था। इसमें मेरी दादी के दादा -दादी का नाम लिखा हुआ है।फिर कितनी जगह यात्रा करते हुए यह वापस मेरी बहु के मायके से आया।वह मेरे बेटे के कारण ही न। मतलब इसे मेरा बेटा वापस लाया।
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शारदा अठारह वर्ष की होने वाली है। ठीक अठारह वर्ष पूरे होने पर उसका विवाह होने वाला है। तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं।दुल्हे का जोड़ा ,सिकड़ी-अंगूठी घड़ी-मोटरसाइकल और दहेज में मांगे जाने वाले सारे सामानों की खरीदारी के साथ शारदा के लहंगे-गहने संदूक-पिटारी टेबुल पलंग और जाने क्या-क्या सामान कुछ जरूरत के कुछ दिखाबे के खरीदकर लाया गया। किन्तु,
 शारदा को उन सामानों से कोई खुशी नाराजी नहीं।वह तो खुश है, बस इस बात से कि दादी ने अपनी दादी का दिया हुआ कलश उसे दे दी। उसे याद है बचपन में उस कलशी में वह तरह-तरह के सुंदर फूलों को सजाकर रखती थी।उसे वह कलशी बहुत अच्छी लगती थी।जिसका कारण था उसमें की गयी नक्काशी। कलशी के गर्दन में इतने सुन्दर  बेल ! ऐसा प्रतीत होता था कि कोई दुल्हन अपने गले में सुंदर हार पहनी हो।बीच के चौड़े भाग की नक्काशी के क्या कहने।जो देखता दंग रह जाता। सचमुच इतने सुंदर बेल बूटे कहीं किसी गगरी में नहीं दिखे।ना किसी दुकान में ना हीं किसी के घर में। दादी कहती थी कि उसकी दादी ने ठठेरे को कहकर उसे विशेष रूप से बनवाया था। नक्काशी के बड़े-बड़े बूटों में दादी के दादा-दादी का नाम इतनी बारिकी से खुदा हुआ था कि बिना बताए किसी को नजर नहीं आता था।
जब से दादी ने घोषणा की थी कि वह  कलशी अपनी पोती शारदा को दे देगी,शारदा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। तरह-तरह के सपने देखने शुरू किए।गगरी को फूलदान बनाएगी, उसमें रोज सुंदर और ताजे फूलों के गुच्छे को सजाएगी। कभी सोचती इसमें पीने का पानी रखेगी, कभी सोचती इसमें बचत के पैसे रखेगी। कभी सोचती इसे संभालकर रखूंगी और मैं भी अपनी पोती को शादी में उपहार दे डालूंगी। धत् तेरे की s s ! उसने शर्माते हुए तकिए में मुंह छिपा लिया।यह क्या सोच रही है। अभी शादी भी नहीं हुई और पोती...... कितनी कल्पनाएं कर डाली उस कलशी को लेकर।
            खैर ! उसकी शादी बड़े धूम-धाम से हो गई। ससुराल में अपनी कलशी को देख मन इस प्रकार प्रफुल्लित हो उठा -जैसे उसकी कोई अंतरंग सहेली से मिलाप हुआ हो।टोले-मुहल्ले तथा घर-परिवार के लोग मुंह दिखाई के लिए आते तो उसकी छवि के साथ-साथ उसकी प्यारी कलशी की भी प्रशंसा दिल खोलकर करते जिसे सुनकर उसके हृदय में आनन्द के जो हिलोरें उठती उसका वर्णन कर पाना अत्यंत कठिन कार्य है।
       लेकिन उसकी शादी के ठीक आठवें दिन उसकी एकलौती ननद की शादी थी।खुशी से उसका मन-मयूर थिरक उठा ।अपनी कितनी साड़ियां, कितने लहंगे, कितने गहने खुश मन से उसने ननद को पसंद करबा कर दे दिए। एक बार भी नहीं सोचा वह उसका किसी का दिया हुआ उपहार है,उसका सुहाग-शृंगार है। लेकिन उन मनोदशाओं पर काबू पाना कितना कठिन हो गया जब उसकी आंखों के सामने से उसकी प्यारी गगरी को यह कहते हुए उठाकर ले जाया गया कि उसकी ननद को यह गगरी बहुत पसंद है, इसलिए उसे उसके तिलक में  दे देते हैं। ऐसा लगा उसके सीने से किसी ने उसका कलेजा काढ़ लिया हो। परन्तु स्वाभाविक संकोच से मना नहीं कर पायी। मायके वालों की शिक्षा कानों में अलग डंके बजा रही थी-यहां से भेजे समानों को कोई रखते हों, उपयोग में लाते हों, किसी को देते हों,तुम कुछ मत बोलना।
पति ने आकर नजरों की भाषा में कुछ नहीं बोलने की चेतावनी दी।
 उसके पास अपने कलेजे पर पत्थर रख लेने के अलावा कोई चारा नहीं था।मन को तसल्ली दी कभी ननद के घर जाउंगी तो देखूंगी। लेकिन,ननद ने ससुराल से आते ही कहा आपकी कलशी की वहां बहुत तारीफ हुई। सुनकर मन गदगद हो गया। लेकिन ....
लेकिन ? सशंकित हो वह घबराकर कर पूछ बैठी।
उसे मेरी ननद ने नेग में ले लिया।ननद ने रुआंसे स्वर में कहा।
जब वह शादी के बाद पहली बार मायका गई तो लोगों ने पूछा कलशी कहां सजायी ?
 बेचारी ! जवाब में होंठों पर स्निग्ध मुस्कान बिखेरने के सिवा कुछ नहीं कर सकती थी। कुछ वर्षों बाद उसकी ननद ने यह समाचार सुनाया कि आपकी वह कलशी , जो मेरी ननद को नेग में दिया गया था वह उसकी ननद को दहेज में दे दिया गया। ठीक हुआ जैसे को तैसा। उसने कभी सोचा नहीं कि वह मुझे मिला था। मुझे कितना पसंद था। आखिर उसका भी नहीं रहा।
 शारदा सोच रही थी जैसे को तैसे का सिद्धांत तो सबके साथ लागू होता है। उसने भी तो नहीं सोचा यह सब कि मुझे वह कलशी कितनी पसंद थी। मुझे भी तो वह कलशी दादी ने उपहार में दिया था ।वह निराश मन से सोच रही थी कि अब अपनी प्यारी कलशी को कभी नहीं देख पाऊंगी।भला ननद की ननद की ननद के घर वह क्यों जाएगी ?
मायके में बार-बार पूछे जाने पर कलशी का यात्रा-वृत्तांत जाने कैसे फिसलकर उसके मुख से बाहर आ गया । फिर क्या था ।काना-फुसी होते-होते दादी के कान तक पहुंच गयी। उसके बाद के माहौल का माहौल उसके लिए भी भारी पड़ा ।तरह-तरह के ताने-बाने सुनने को मिला। कलशी की बात उठते ही उसकी मां और दादी ने उसकी ननद को लालची,सास को नासमझ और पूरे परिवार को जाने किन-किन अलंकरणों से विभूषित करती।उनके लिए बोली गयी जली-कटी  सुन उसे बहुत बुरा भी लगता। लेकिन वह करती भी क्या ?उसे वापस मांग तो नहीं सकती थी।
दिन बीतते गए।वह कलशी को मिलने-खोने और दूर होने की बात को दु:स्वप्न समझकर भूलने की कोशिश करती। कभी भी कलशी की याद आती तो अपने मन में यह निश्चय जरूर करती कि बहू के मायके से आने वाले सामानों को कभी ना उपयोग में लाएगी,ना बेटियों को देगी। किसी के दहेज अथवा उपहार में मिले सामानों को बिना उससे पूछे लेना या किसी को देना एक ग़लत प्रथा है।इस प्रथा के रोक-थाम करने पर दूसरों पर तो वश नहीं है पर स्वयं पर नियंत्रण किया जा सकता है।यह तो महज एक संयोग है कि जहां उसकी कलशी गयी थी उसी घर में उसके बेटे की शादी हुयी, और यह तो पूर्ण रुपेण  महासंयोग है कि मेरी बहू को दिए जाने के लिए अब तक यह कलशी वहां सुरक्षित रही । नहीं तो उसकी भी ननद अथवा सात बेटियों में किसी और को दे दिया जाता। शारदा प्रसन्न मन से उस कलशी को देखती हुयी उसे उठाकर अपने सीने से लगा ली। तभी कहीं लाउडस्पीकर में फिल्मी गाना गूंज उठा।कल के बिछड़े हुए हम आज कहां आ के मिले.........
और शारदा की आंखें बिछड़ने के बाद मिलन के हर्षा-तिरेक में छलछला आईं।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Sunday, October 17, 2021

ठगी का शिकार

खेल रहे ठग खेल ठगी का,हम सब हुए शिकार।
कदम- कदम पर ठग हैं देखो, ठगने को तैयार।
तरह- तरह के रोज बहाने, वे लेकर आते हैं पास।
फटे-चिथड़े परिधान पहनकर, चेहरा लिए उदास।
कोई कहते मां मरी है, कोई कहते हैं बाप बीमार।
कोई मदद में दस-बीस मांगते, मांगता कोई हजार।
कोई-अंधा-कोढ़ी बन आता, कोई बन गूंगा-बहरा।
कोई कमर झुकाकर आता, कोई बन लूला-लंगड़ा।
कोई मंदिर के नाम पर ठगता, कोई कहता है पूजा।
ठगता है लंगर-भण्डारे कह, हथकंडे और भी दूजा।
खेल रहे हैं बहुरूपिए भी, ठगी का खेल निराला।
बचकर रहना इनसे ऐ लोगों,पड़े जो इनसे पाला।
घोड़े को रंग काले रंग से,पहनाकर लोहे की नाल।
दस कदम चला दस हजार में बेचते तुरंत निकाल।
रिक्शे, टैक्सी को सजाकर, प्रतिमा उसमें रख देते।
धूप-दीप- के नाम पर भी लोगों से पैसे हैं ठग लेते।
मिलावट कर मिर्च-मसाले में, साहुकार हमें ठगते।
महंगाई का रोना रोकर, हितैषी वे हमारे हैं बनते।
ठगने के ये खेल निराले,मेहनत करने से हैं अच्छे ।
इस खेल को खेल रहे हैं, मिल युवा बूढ़े औ बच्चे।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक



Friday, October 15, 2021

रावण मरता क्यों नहीं



रावण मरता क्यों नहीं

हर साल विजयदशमी की अवसर पर बुराई के प्रतीक स्वरूप रावण को हम तीर चलाकर मारते हैं। अग्नि प्रज्वलित कर उसे धूं-धूं कर जलते हुए देखते हैं और मन में संतुष्ट होते हैं कि रावण का दहन हो गया।रावण मर गया। किन्तु आगामी साल के विजयदशमी को पुनः रावण को मारना पड़ता है।फिर हम सोचते हैं कि प्रत्येक वर्ष मारे जाने पर भी रावण मरता क्यों नहीं ? 
आखिर क्यों ? हर बार रावण को मारना पड़ता है। इस ज्वलंत प्रश्न पर हम कभी विचार नहीं करते। हम कभी यह नहीं सोचते कि कपड़े अथवा कागज के बने रावण को तो हम अग्नि में फुकते हैं किन्तु मन में पल रहे बुराई रुपी रावण को  तो हम कभी फूंक नहीं पाते।मन में उठे दुर्विचारों को, दुर्व्यवहारों को, दुराचारों को हम कभी मार नहीं पाते।तो भला हर साल मारने पर भी रावण क्यों मरेगा ? 
जिस प्रकार रावण मांस-मदिरा का सेवन करता था।उस प्रकार हम भी कर रहे हैं। जिस प्रकार रावण साधु-संतों को सताता था उस प्रकार भले लोगों के साथ हम भी दुर्व्यवहार करते हैं। जिस प्रकार रावण पराई स्त्रियों का हरण करता था उस प्रकार हमारे समाज में भी नारियों का अपहरण किया जाता है।जिस प्रकार रावण दूसरों के धन नष्ट करता था ,उस प्रकार हम भी दूसरों के धन लूट रहे हैं।इस प्रकार रावण तो हमारे मन के कण-कण में विद्यमान है। इसलिए रावण के मारने की हमारी लाख कोशिशों के बावजूद  रावण नहीं मरता है। अगर हम सचमुच रावण को मारना चाहते हैं तो इस नकली रावण को मारने का ढोंग करने वाले अभिनय  करने से अच्छा मन में उत्पन्न बुराई रुपी असली रावण को मारने का प्रयत्न करें।रावण ज़रूर मर जाएगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'