Saturday, February 20, 2021

वसंत के दोहे



मौसम बड़ा सुहावना, आया है वसंत।
लेकर आया साथ में, खुशियां है अनंत।

मुस्काई कलियां प्यारी, महक उठी सब डाल।
इस प्यारे मौसम ने, ऐसा है किया कमाल।

आम पेड़ की डाल पर,रही है कोयल कूक।
जिसे सुनकर विरहन के,दिल में मारे हूक।

उड़ रही तितलियां, भौंरे ने छेड़ी तान।
होठों पर सब लोग के, थिरक रही मुस्कान।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Friday, February 19, 2021

कालू चाचा की दुकान



आजा तेरे दरवाजे पर,कालू चाचा आया हूं।
अपनी फटी कमीज़ में दुकान सजाकर लाया हूं।

दैनिक जरूरत की देखो सभी सामान लगे हैं।
कंघी जेब में,कलम बटन में, चाकू पैवंद में टंगे हैं।

टाफी-बिस्कुट,मुढ़ी-मिक्सचर हाथों में लटकाया।
पुदिना-पाचक, जलजीरे को बाहों में अटकाया।

पेस्ट-ब्रश है दातुन-मंजन,सर्फ-साबुन,शैम्पू।
छोटे-छोटे नट-बोल्ट, पेचकस, स्वीच,कलेम्पू।

चीनी-चायपत्ती भी संग में हल्दी, मिर्च-मसाला।
छोटे पैकेट के नमक-तेल हैं, छोटे चाबी-ताला।

कांटे,चम्मच,कलछूल,छननी,सड़सी-चिमटे।
सूई-धागे,हूक-बटन भी, हैं डब्बे में सिमटे।

तुमको भी आसान काम से,मेरी भी कुछ कमाई।
तेरा भी कुछ समय बचेगा, मेरी भी करो भलाई।

भीख मांगने से है अच्छा,थोड़ा काम करें हम।
प्रभात फेरी में समान बेच, फिर आराम करें हम।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             रांची, झारखण्ड
              स्वरचित, मौलिक

वायु बिन ना जीवन रे



ना रूप है,ना रंग है।
आकार है ना अंग है।
वायु हमारे जीवन में,
रहता सदा ही संग है।

पंच महाभूतों में एक है।
उपयोग इसके अनेक हैं।
हर जगह हैं काम आता,
सब काम इसके नेक हैं।

पल-पल वायु पीते हम।
इसके दम पर जीते हम।
अगर हमें ना मिलता वायु,
तो रह जाते बस रीते हम।

वायु बिन ना है जीवन रे।
ना जीवों का तन-मन रे।
इसके बिना तो चुल्हे में भी,
ना जल पाता  है इंधन रे।

आओ अब इसे बचाएं हम।
धरती पर बृक्ष लगाएं हम।
सांस-संवारण इस वायु को,
मिलकर स्वच्छ बनाएं हम।

     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       रांची, झारखण्ड
      स्वरचित, मौलिक

Wednesday, February 17, 2021

हम फूल एक फुलवारी के

हम फूल एक फुलवारी के

हम  फूल एक फुलवारी के,
   हिल-मिल आपस में रहते हैं।
      सर्दी-गर्मी और वर्षा-पतझड़,
         सब कुछ मिलकर सहते हैं।

रंग-विरंगा है रूप हमारा,
    हम एक-दूजे को भाते हैं।
     अलगआकार-प्रकार हमारा,
          हम सबका साथ निभाते  हैं।

ऊंच-नीच का भेद न हममें,
    बड़ा -छोटा का भान नहीं है।
       सुंदरता की खान सभी हैं,
            पर मन में गुमान नहीं है।

आपस में हम कभी न लड़ते,
   सब पर रखते कोमल भाव।
      कभी किसी को कष्ट न देते,
          नहीं किसी पर आता ताव।

फूलों का परिवार हमारा,
     जग भर में खुशहाल है।
       किसी से  कोई द्वेष नहीं है,
            किसी से  नहीं मलाल है ‌।

               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                      स्वरचित, मौलिक

Monday, February 15, 2021

सरस्वती वंदना



क्षमा प्रार्थना 🙏🙏

हे ज्ञान दायिनी सरस्वती माता !क्षमा करो अपराध ,🙏🙏
मेरा, क्षमा करो अपराध 🙏🙏
कला-ज्ञान, विज्ञान विधाता,
क्षमा करो अपराध,🙏🙏
मेरा क्षमा करो अपराध।🙏🙏

क्षमा करो मैं जग- प्राणि के,
            अवगुण चित में लाती हूं।
गुण का आदर कर नहीं पाती,
                ईर्ष्या से भर जाती हूं।
जल-भुन कर मैं मन में अपने,
                   भर लेती हूं विषाद।
     मेरा क्षमा करो अपराध।🙏🙏
 
कंठ दिया, तूने शब्द दिया,
          पर मधुर वचन ना बोलूं मैं।
वाणी दे ऐसी मां मुझको,
           जब भी मुख को खोलूं मैं।
स्वर में पहले मधुरस घोलूं,
                      तब मैं बोलूं बात।
     मेरा क्षमा करो अपराध।🙏🙏

मुझ दुष्टा को हे जगद्रष्टा,
          ज्ञान की राह दिखाना मां।
जब मैं भटकूं,हाथ पकड़ कर,
           सतपथ पर ले आना मां।
ज्ञान-गुरु बन सर पर मेरे,
                 रखना हरदम हाथ।
     मेरा क्षमा करो अपराध।🙏🙏

क्षमा-दया, तप-त्याग की माता,
                      दे करके वरदान।
मन में ऐसी लगन लगा दे,
              करूं मैं जन-कल्याण।
सारा जग रौशन कर जाऊं,
                सत्य का देकर साथ।
     मेरा क्षमा करो अपराध।🙏🙏

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               रांची, झारखंड
              स्वरचित, मौलिक

सरस्वती वंदना🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🌹🌹सरस्वती वंदना🌹🌹
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

  तेरी वीणा की झंकार, 
माता गूंज 
  रही।

 कर झंकृत मन के तार,
माता गूंज 
   रही।

शुभ्र वसना मां वागीश्वरी,

  गले में स्फाटिक हार,
  माता गूंज
     रही।

छेड़ रही तू राग मनोहर,

 पुलकित है संसार,
 माता गूंज
   रही।

हाथ में तेरे पुस्तक शोभे,

 ज्ञान का है भंडार,
 माता गूंज
   रही।

तेरी ममता बड़ी निराली,

 महिमा अपरम्पार,
 माता गूंज
    रही।

तेरी शरण में आई हूं मां,

 दे दो अपना प्यार,
 माता गूंज
   रही।

भक्ति भाव सेभजन करूं मैं,

 हृदय से करूं पुकार,
 माता गूंज
   रही।

मंदिर-मंदिर गूंज रही मां,

 भक्तों की जयकार,
 माता गूंज
   रही।

दिशा-दिशा वासंती छाई,

  भौरों की गुंजार,
 माता गूंज
   रही।

विद्या का वरदान दो मां अम्बे,

 गुण का कर संचार,
 माता गूंज
   रही।

नमन हमारा हंसवाहिनी,

 कर लो तू स्वीकार,
 माता गूंज
   रही।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
  स्वरचित, मौलिक
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Saturday, February 13, 2021

प्रीत न जाने रीत



मन तुमसे लगाया है प्रीत रे।
क्यों समझे न इसको मीत रे।

मुझे तेरी सूरत नजरों को भाई।
मैंने उसको है  दिल में बसाई।
दिल ने प्रीत का गीत है गाया,
मन में बजने लगा संगीत रे‌।
क्यों समझे न इसको मीत रे।

तेरा-मेरा  है  ये रिश्ता पुराना।
फिर क्यों हमको रोके जमाना।
चाहे हमसे जीतना लड़े  वो,
होगी हमारी ही जीत रे।
क्यों समझे न इसको मीत रे।

ऊंच-नीच का भेद मिटा दो।
सारी दुनिया को समझा दो।
चाहे कोई भी नियम बना ले,
पर यह प्रीत न जाने रीत रे।
क्यों समझे न इसको मीत रे।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              रांची , झारखंड
             स्वरचित , मौलिक