Thursday, February 11, 2021

उड़िया ना छंद

शरद ऋतु बीता, वसंत ऋतु आया।
बागों की क्यारी में,फूल मुस्काया।।
मंजरियों से सज गयी,पेड़ों की डाली।
कूक रही कोकिल ,हुई  मतवाली।।

उड़ने लगी रंग-बिरंगी , तितलियां।
आज सुवासित है,गांव की गलियां।।
आओ सभी मिल,खुशियां मनाएं।
प्रेम ऋतु आया है, प्रेम धुन गाएं।।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           स्वरचित, मौलिक

Tuesday, February 9, 2021

किसान आंदोलन ( गीत )



बैठे धरना पर देखो किसान देश के।
चाहे  मानो ना ये हैं  , गुमान देश के।

किसान हमारे अन्नदाता हैं,
इनपर नाज है हमको।
इनके दम पर हम राजा हैं,
दिलवाते ताज में हमको।
इनके दम पर हम बनते,महान देश के।
बैठे धरना पर देखो किसान देश के।

राजनीति क्यों करते तुम,
इनकी मेहनत पर भाई।
कठिन परिश्रम ये करते हैं,
इनकी है कृषि कमाई।
लोग करते क्यों इनको परेशान देश के।
बैठे धरना पर देखो किसान देश के।

आकर कोई नियम बता दे,
कोई तो समझा दे।
अधिनियम बना है उनके हक में,
आकर तो बतला दे।
उन लोगों का होगा ,एहसान देश के।
बैठे धरना पर देखो, किसान देश के
                  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                       रांची, झारखंड
                    स्वरचित, मौलिक

Saturday, February 6, 2021

किसी का दिल नहीं तोड़ो ( गज़ल )



निज टूटे हुए दिल ले, सभी मेरे पास आते हैं।
हम जोड़ेगे इसे ठीक से, लिए विश्वास आते हैं।

भरी है टोकरी दिल के, टुकड़े से यहां देखो,
इन्हीं टुकड़ों को ले मायुस, बड़ी उदास आते हैं।

जुटाकर दिल के टुकड़े को,सजाये हैं करीने से,
न कोई उल्टा-सीधा हो, यही एहसास आते हैं।

इसे रख सामने अपने, मरम्मत करने बैठे हैं,
मगर ये तो बड़े घायल,गुमे-हवास आते हैं।

लगाते हम हैं जब टांके,लहू इनसे टपकते हैं,
जोे इनसे गिरते हैं लोहू, नहीं हमें रास आते हैं।

जोड़े ये नहीं जुटते ,भला कैसे इन्हें छोड़े,
खुदा भी हैं, तो क्या हैं हम,हो निराश जाते हैं।

अगर जुटते ये हमसेे,तो हम भी जोर कुछ करते ,
सभी जाते खुशी मन से,जो हो उदास आते हैं।

मनुज तुझसे है मिन्नत अब, किसी का दिल नहीं तोड़ो,
तुम अपने दिल में यह सोचो,ये मुद्दे खास आते हैं।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित,मौलिक

नन्ही परी



खुशी का ठिकाना नहीं,
मेरे घर आई है नन्ही परी।
इसको मिटाना नहीं,
मेरे.................
मेरा ही अंश है,मेरा स्वरूप है।
मैं मां बनी वह बेटी का रूप है।
आज मेरी गोद भरी,
मेरे घर आई है नन्ही परी।
खुशी का ठिकाना नहीं,
मेरे......................
जब मैं थी मां की गोदी में आई।
मां ने भी कितनी थी खुशियां मनाई।
चाहे माने जमाना नहीं,।
मेरे घर आई है नन्ही परी
खुशी का ठिकाना नहीं,
मेरे घर..............
आज है बेटी, कल होगी माता।
बेटाऔर बेटी सबकी जन्मदाता।
की मेरी गोदी हरी,
मेरे घर आई है नन्ही परी।
खुशी का ठिकाना नहीं,
मेरे घर..................
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            
          स्वरचित ,मौलिक

Friday, February 5, 2021

आम जनमानस में साहित्य का महत्व (आलेख)



यह सत्य है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।एक सच्चा साहित्यकार सामाजिक विषमताओं, रीति-रिवाजों,छल-प्रपंचो, उच्च-नीच, भेद-भाव, उत्थान-पतन, सेवा-सद्भाव , शिक्षा-संस्कारों सभी विषयों पर अपनी लेखनी चलाकर साहित्य रचकर सच्चाई से चित्रण कर उसके परिणामों -दुष्परिणामों को आईने की भांति दर्शाता है। साहित्यकार साहित्य के द्वारा जनमानस को जागरूक कर सुधार लाता है तथा समाज का पुनरुत्थान एवं नवनिर्माण करने का प्रयास करता है।
आम जनमानस पर भी साहित्य का प्रभाव अवश्य पड़ता है ।आम जन साहित्यिक रचनाओं को पढ़कर बहुत कुछ सीखते समझते और जानते हैं ‌तथा साहित्यिक कथा -कहानियों में आनेवाले सुपरिणामों-दुषृपरिणामों से प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाने की कोशिश कर सामाजिक और मानसिक विसंगतियों को दूर करते हैं।आम जनमानस के लिए साहित्य  प्रेरणादायक, शिक्षक और सुधारक है।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               रांची, झारखंड
             स्वरचित, मौलिक

Wednesday, February 3, 2021

जावांज सिपाही भारत के



दस्तक सुनकर गुड़िया रानी, दरवाजे को खोली।
देखो मां! पिताजी आए, बड़ी चहक कर बोली।

मेरे लिए टॉफी - चॉकलेट , लाए हैं पिताजी।
हाथ में छिपाकर गुड़िया ,दिखा रहे नाराजी।

आवाज़ सुनकर आई पत्नी, जा लिपटी सीने से ‌
बोली-इंतजार कर रही हूं, मैं ग्यारह  महीने से।

पीछे का हाथ आगे ना आया ,हुआ कुछ अंदेशा।
मन की बेचैनी छिपा कर पूछी, क्या लाए संदेशा।

जब पीछे वह मुड़कर देखी, हाथ बंधी थी पट्टी।
उसे घुमा जब उसने देखा, हथेली थी पूरी कटी।

सीने पर हाथ रखकर पूछी, किसने इसको काटा।
नाम जरा उसका बतलाओ,  जाकर मारूं चांटा।

हंसकर जंग-बहादुर बोला, सीमा पर थे सोए हम।
वहां पर छुपाकर दुश्मन ,रखा था टाइम- बम।

मैंने उसे उठाकर फेंका,झटसे पहाड़ी के नीचे।
टाइम पूरी थी फटा वह,  गिरा मैं आंखें  मीचे।

इस तरह से हमने अपने, साथियों की जान बचाई।
अपना कर्तव्य निभाने में , हमने यह हाथ गवांई।

नतमस्तक हो गई सुनयना चरणों में उसके जाकर।
बोली-आज धन्य हुई मैं, जांबाज़ पति को पाकर।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  स्वरचित, मौलिक

Tuesday, February 2, 2021

जीवन एक संघर्ष



जीवन एक संघर्ष है,हंसकर गले लगाना है।
बाधाओं को ठेल कदम से, आगे बढ़ते जाना है।

करना है उत्थान अगर तो,करता चल संघर्ष।
आनेवाली चुनौतियों को स्वीकार करो सहर्ष।
मुश्किल से ना डरना है,मन में ना घबराना है।
जीवन एक संघर्ष है,  हंसकर गले लगाना है।

हमको आगे बढ़ना है, और करना है उत्कर्ष।
मंजिल तक पहुंचना है,अब लेकर मन में हर्ष।
टेढ़ी-अनगढ राहों को,सरल-सुगम बनाना है।
जीवन एक संघर्ष है हंसकर गले लगाना है।

ऊपर चोटी पर चढ़ने की, स्वयं बनाएंगे सीढ़ी।
उच्चाई पर चढ़ना सीखें, देख हमें अगली पीढ़ी।
बुलंदियों पर चढ़कर,जीवन सफल बनाना है।
जीवन एक संघर्ष है,हंसकर गले लगाना है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              रांची, झारखंड
            स्वरचित, मौलिक