Sunday, June 26, 2022

अधजल गगरी छलकत जाय



अधजली गगरी छलकत जाय

अधजल गगरी छल-छल छलके।
इधर-उधर वह खूब मचलके।

गगरी का वह आधा पानी।
उमड़ता है जैसे गंगा-रानी।

मन-ही-मन में यह इतराता।
छलक-छलक नाच दिखाता।

कुआँ इसको लगे भिखारी।
ताल-तलैया नदियाँ सारी।

नहीं जिसे होती समझदारी।
लगती अपनी सूरत प्यारी।

बोले सबसे सदा बड़बोली।
सारी दुनियांँ इससे भोली।

अवगुण अपना न पहचाने।
बढ़-चढ़कर लघुगुण बखाने।

     सुजाता प्रिय समृद्धि

No comments:

Post a Comment