Friday, August 27, 2021

हे सखिया ( मगही भाषा )




हे सखिया

अब बीतल सावन हे सखिया।
आइलै भादो पावन हे सखिया।

जल्दी से केसिया चोटी बना ला।
मथबा में सेनुर-टिकुली लगा ला।
करूँ मेंहदी लगावन हे सखिया।
अब बीतल सावन, हे सखिया।

अब खेतबा में भर गेलै पानी हे।
 केयरिया  के रंग होलै धानी हे।
होलै धान रोपावन हे सखिया।
अब बीतल सावन हे सखिया।

बचल-खुचल मोरिया रोपु से सखी।
संग मिलके गीतिया गइवै हे सखी।
करूं झूला झूलावन हे सखिया।
अब बीतल सावन हे सखिया।

भादों महीना में भैया जी अइलन।
खोमचा में भर के पेड़ा भी लइलन।
दिन लगे हुस्न से सखियां।
अब बीतल सावन से सखिया।
अइलै भदवा पावन से सखिया।
         सुजाता प्रिय'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 22, 2021

ग़ज़ल

लाकडाउन का अफसोस क्यों जताते हो।
यूं भी वर्षों से मेरे पास कहां तुम आते हो।

पता है हर महीने तुम आते हो शहर में मेरे,
और मुझसे बिना मिले ही तो चले जाते हो।

पल भर मिलने का, कभी फुर्सत नहीं तुझको,
जीवन भर साथ निभाने की कसम खाते हो।

एक एक खत लिखकर, हाल ना पूछते मेरा,
दुरियों का ह‌मको अहसास क्यों दिलाते हो।

लाकडाउन में फोन करने की मनाही तो नहीं,
ना कभी फोन करते हो,ना ही  फोन उठाते हो।

आज अपने नैनो में तुम छलकाकर ये आंसू,
वक्त बूरा है बहुत,अब ये बात क्यों बताते हो।

याद दिला कर तुम बीते हुए प्यार के लम्हे,
दिल में उठने वाले मेरे  दर्द को बढ़ाते हो।
                   सुजाता प्रिय समृद्धि
,
र

Friday, August 20, 2021

रक्षा बंधन गीत ( मगही भाषा )



राखियां बंधा ला भैया सावन पूर्णिमा,
जीया तू लाख बरीस जी।
तोहरा के लागे भैया हमरी उमरिया,
बहनी के इहे अशीष जी।

जुग-जुग बढ़े भैया तोहरी उमरिया,
भौजी के बढ़े अहिबात जी।
दिन दुगुना बढ़े,पहर तिगुना,
चारी गुणा बढ़े तोहर रात जी।
बारह महीना के साल सबके है,
तोहर महीना होबे तीस जी।
राखिया बंधा ला भैया..........
दिन-दिन बढ़े भैया तोहरी दौलतिया,
देखि कर मन हुलसाय जी।
बडढ़े तोर घरबा में कोठा-अटरिया,
देखी कर हृदा जुड़ाय जी।
परसन मन रहे सदा तोर भैया,
दिखै तोर दतिया बत्तीस जी।
राखिया बंधा ला भैया...........
सदा खुश रहें मोर भतिजा- भतिजिया,
तिल-तिल बढ़े तोर कूल जी।
दूर-सुदूर तोर नाम बजे अउर,
बगिया में खिले सुख फूल जी।
दुअरा पर शोभे कार-मोटरबा,
सुंदर गाड़िया पच्चीस जी।
रखिया बंधा ला भैया.............
तोहरा के लागे भैया..............
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, August 19, 2021

मेरी हंसी



जब -जब मेरे होंठों पर,
देती दिखाई मेरी हंसी।
जब-जब मेरी मुखड़े पर,
है छाई मेरी हंसी।

कितने लोगों ने होश को खोए, कितने हो गये घायल।
कितने के दिल में तीर समान,
समाई मेरी हंसी।

कुछ लोग भी हैं ऐसे, 
जिन्हें हंसना नहीं गवारा।
उन लोगों के मन में भी,
 कुछ-न-कुछ भाई मेरी हंसी।

जब महफ़िल में छाई थी, 
तमाम उदासियां,
तो खुशी का जलवा बन, 
लहरायी मेरी हंसी।

भरी सभा में आलम था,
मायुसियों की क्या जाने।
तब बादल की झोकेे -सी ,
लहराई मेरी हंसी।

सोई थी रात तिमिर का,
चादर फैलाकर ओढ़।
प्रभात किरण बनकर नभ में 
तब छाई मेरी हंसी।

मेरी हंसी का जलवा क्या, 
देखें  कभी हैं आप,
हंसने वालों को भी है
मिर्ची लगाई मेरी हंसी।

मार ठहाके मेरी हंसी पर,
हंसते जाते हैं आप।
चलो खुशी की बात है,
 कुछ तो रंग लाई मेरी हंसी।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, August 17, 2021

रूप बदलते चंदामामा



रूप बदलते चन्दा मामा

             आंगन में 
        एक खाट पड़ी थी।
उसके ऊपर इक टाट पड़ी थी।
               रात को 
      उसपर मैं सो रही थी।
मीठे -स्वप्नों में मैं खो रही थी।
            चंदामामा 
      आये हैं आंगन मेरे।
मेरी ओर अपना मुखड़ा फेरे।
            कर रहे 
    हैं हंस वे मुझसे बातें।
शिकायत मेरी क्यों ना आते।
          उसी समय
       टूट गई मेरी नींद।
सुस्वप्न टूट जाने की मानिंद।
             ढूंढ़ी चंदा
        को मैंआंखें खोल।
इत-उत हथेलियों से  टटोल।
             अनायास
        ऊपर उठीं निगाहें।
रुक गई  मेरी टटोलती बाहें।
           आसमां में 
        तारे विचर रहे थे।
चम-चम करते निखर रहे थे।

चंदामामा 
        ्भी्थे्भी््भी्थे्के्््भ
हंस-हंस मुझसे कर रहे बा
      थे लुक छिप खेल।
इक- दूजे से वेे रखकर मेल।
             चंदामामा
        का देख आकार।
मेरे  मन में यह उठा विचार।
          कहां छुपाये
        हैं वे आधा अंग। 
किसी के प्रहार से हुए हैं भंग।
             एक रात 
      देखी मैं हंसियाकार।
   एक रात दिखते थे जैसे तार।
               एक रात 
       रूप था गोल-मटोल।
आज मैं इनकी खोलूंगी पोल।
               मां  से 
       पूछा मैंने  इसका राज।
 चंदामामा आधा क्यों है आज।
              मां बोली
       चंदा बड़ा है नटखट।
रूप बदलता रहता है झटपट।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित, मौलिक

Sunday, August 15, 2021

बंदिशें (लघुकथा )



आज खूशबू गौरव से नजरें मिलाने से कतरा रही थी।यह पहला मौका था जब उनलोगों के द्वारा बनाए गए प्लान में वह शामिल नहीं हो पाई।न जाने कैसे उसे एक ओर खड़ी देख गौरव उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सब ठीक है न खूशबू ! तुम इतनी उदास क्यों नजर आ रही हो ? कल पिकनिक पर भी नहीं आई ? उसने लगातार प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
खुशबू ने रुआंसी आवाज में कहा-मैने मां-पिताजी को कितना समझाया कि तुम कालेज में टाप आने की ख़ुशी में सभी दोस्तों को पिकनिक पार्टी दे रहे हो। लेकिन वे नहीं माने।कहा- लड़के-लड़कियों को घर से इतनी दूर अकेले घूमना सही नहीं।
तो इसमें तुम्हें लज्जित होने की क्या बात है।गौरव ने बेवाकी से कहा। उनके विचार महान हैं।वे अपनी जगह सही हैं। लड़के-लड़कियों के मेल-जोल में थोड़ी बंदिशें होनी ही चाहिए। नहीं तो दुनियादारी से अनभिज्ञ किशोर मन को फिसलते देर नहीं लगता।अब देखो न सारे दोस्तों ने मुझे पार्टी के लिए उकसाया। इसलिए मैंने सारा खर्च किया। लेकिन वहां का नजारा कुछ और था।सारी लड़कियों ने अपने-अपने ब्याय फ्रेंड को बुला रखें थे। हमारी पार्टी जल्दी से खत्म कर उनके साथ सैर सपाटा करने लगीं। उनके माता-पिता सोंच रहे होंगे वे कालेज के दोस्तों के साथ हैं। लेकिन उन्हें क्या पता थोड़ी-सी छूट देते ही उनके बच्चे कहां फिसल रहे हैं।
उफ़ इतना बड़ा धोखा? खुशबू व्यग्र हो बोल उठी।
धोखे वे मां-पिताजी को नहीं दे रहे। स्वयं धोखे के दलदल में फंसे जा रहें हैं। इसलिए हमारे माता-पिता का हमारे ऊपर बंदिशें लगाना जायज है।
गौरव की बातें सुन खुशबू के मन पर पड़ा बहुत बड़ा बोझ हल्का हो गया।
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

जंगल की चिरैया (लघुकथा )



चिरैयो की गोष्ठी लगी थी।एक साथ ढेर सारी चिरैयों को बैठे देख आकाश में उड़ती चिरैया भी वहां एकत्रित होने लगी।पता चला वहां गीत प्रतियोगिता होने वाली है। प्रतियोगिता शुरू होते ही सभी चिरैया अपनी -अपनी बारी आने पर अपने प्यारे प्यारे गीत गाकर सुनाई। सर्वश्रेष्ठ गीत गाने वाली पांच चिरैयों को सम्मानित किया जाना था।एक चिरैया की मधुर आवाज़ और प्यारे गीत सुन सभी आत्मविभोर हो ग्ए।सभी ने उसकी गायकी की खूब प्रशंसा की और उसकी श्रेष्ठ गीतों के कारण उसकी खुब सराहा। फिर श्रेष्ठ गीत गाने वाली चिरैयों से उनका नाम पता पूछा जाने लगा।
उस चिरैया ने चहकते हुए कहा-मेरा नाम गीतिका है, मैं पास के जंगल के एक विशाल वृक्ष पर अपना घोंसला बनाकर रहती हूं।
उसका पता सुन प्रतियोगिता आयोजित करने वाली चिरैयों ने उसे हेय दृष्टि से देखते हुए अन्य चिरैयों से नाम पता पूछा।अन्य सुंदर गीत गाने वाली चिरैयों ने अपने घोंसले का पता छोटे-छोटे बगीचे के पेड़ पर या शहर के ऊंचे घरों के रोशनदानों में बताये। अब भला इस जंगल की चिरैया को कौन पूछे। सबसे प्यारा गाना गाती है तो गाए, सबसे मधुर आवाज है तो है।उसका निवास तो अच्छी जगह नहीं है न।भला जंगल में रहने वाली चिरैया को इतनी प्रसिद्धि क्यों ? जब बड़े-बडे़ शहरों में रहने वाली चिरैया यहां मौजूद हैं।उसे छोड़ अन्य चिरैयों को चयनित कर पुरस्कृत किया गया।बेचारी जंगल की चिरैया के सारे आस टूट गये। प्रसंशा से प्रसन्न मन उदास हो गया। उसे क्या पता था, "सम्मान गुण और कार्य-कुशलता से नहीं मिलता। उसके निवास और कुल श्रेष्ठता के कारण मिलता है।"
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित, मौलिक