Friday, March 27, 2020

काजल

अखियों में काजल भर,
मुझको जादू न कर ,बृजबाला !
तेरा काजल है मतवाला।
यह गोकुल नगर,
जिसमें है मेरा घर,गुणवाला।
मैं हूँ मोहन बाँसुरीवाला।

काले-मेघों से काजल चुराकर।
तूने अखियों में रख ली बसाकर।
अब मुझे न चुरा,
मुझको दिल में बसा,सुरबाला!
मै हूँ मोहन बाँसुरीवाला।

तेरे काजल में जादू भरी है।
इसलिए मेरी अखियाँ ड़ी है।
मुझको घायल न कर,
अपने कायल न कर,हे बाला।
मैं हूँ मोहन बाँसुरीवाला।

तेरी अखियों का काजल निराला।
तेरे नैना है मदिरा का प्याला।
मुझको करे बेखबर,
कुछ न आता नजर,मधुवाला!
मैं हूँ मोहन बाँसुरीवाला।

अपने नैनों में काजल न डालो।
मृगनयनी तू मुझको बसा लो।
तुझको लगता है डर,
मुझसे ऐ हमफर,मैं हूँ काला।
मैं हूँ मोहन बाँसुरीवाला।
            सुजाता प्रिय

Thursday, March 26, 2020

भाग रे कोरोना

लॉक डाउन लगा हुआ है,
               हम बंद पड़े हैं घर में।
बोर हो रहे कमरे के अंदर,
                पड़े - पड़े बिस्तर में।
इस  रोग  की यही दवा है ,
                दूर  रहें  हम जन से।
मिलना-जुलना कुछ दिन छोड़ें,
               मित्रों औ परिजन से।
जनता कर्फ्यु लगा था उस दिन,
                ऐसे ही उकताए थे ।
कैरम - लूडो खेल घर में,
          दिनभर समय बिताए थे।
शाम के पाँच बजते ही हम,
                  खूब बजाए ताली।
दीदी- मुन्ना दोनों मिलकर ,
       .          बजा रहे थे थाली।
सब लोगों के हाथ में टुन-टुन ,
                  बज रही थी घंटी।
शंख नाद कर उठे जोर से,
              छत पर अंकल-अंटी।
दादाजी ने बालकनी में,
                 ढोलक खूब बजाई।
एकता का संदेश सभी ने,
                     एकजूट हो गाई।
सभी घरों से ऐसी-ही ,
               झंकार सुनाई दी थी।
भाग-भाग तू ऐ कोरोना!
              दुत्कार सुनाई दी थी।
संगठन में शक्ति बहुत है ,
           हमसब संगठित होकर।
सारे नियमों का पालन कर,
            लड़ें आपदा से डटकर।
एक मत हो सारे मानव,
            कोरोना का नाश करेंगे।
इसे हराकर फिर से हमसब,
                  सुख से बास करेंगे।
कोरोना से युद्ध हमारा,
                तब-तक रहेगा जारी।
जब-तक इसके प्रकोप से ना,
                मुक्त हो दुनियाँ सारी।
कोरोना को दूर भगाने को,
                    सब हो जा तैयार।
सब हो जा तैयार साथियों!
                    सब हो जा तैयार।
                                सुजाता प्रिय

Monday, March 23, 2020

मानव उतरे मानवता ना उतरी

घंटों से रही थी मैं बाट जोह।
हर जगह थी जिसकी टोह।

नजरें फेंक चहुँ ओर तलाशी।
दिखी न मन में भरी उदासी।

एक गाड़ी आकर हुई खड़ी।
थी मानवों से खचाखच भरी।

कुछ मानव बैठे थे कुछ खड़े।
कुछ थे दरवाजे के साथ अड़े।

कुछ थे हत्थे-पृष्ठों पर अटके।
कुछ थे पायदानों पर लटके।

कुछ बैठे चढ़ छत के ऊपर।
जान को हथेली पर लेकर।

उतरने लगे सब रेलम-पेल।
लोगों और सामानों को ठेल।

सबको घिसते-पिसते उतरे।
चीख-पुकार सब करते उतरे।

बुड्ढों की लाठी को धर रोका।
बच्चों को हाथ पकड़ रोका।

महिला , महिला से झगड़ी।
गाली दी और झोंटे पकड़ी।

उतरने की देख आपा-धापी।
मन-ही-मन में मै थी काँपी।

घूम-घूम कर रही थी तलाश।
मानवों से मानवता कीआस।

ले मानवों से भरी इस गाड़ी से।
मानवता की आस नर-नारी से।

मैं आवाक देखती रह गई खड़ी।
मानव उतरे मानवता ना उतरी।
                      सुजाता प्रिय
                     २४.०३.२०२०

Saturday, March 21, 2020

साँसों का मोल

साँसों का मोल समझ ले प्राणि,
क्यों समझ न इसको पाए रे।
हर साँस अनमोल हमारा,
जो पल-पल घटता जाए रे।

साँसों से ही वायु पीकर,
यह जीवन जीते जाते हम।
साँस-संवारण वायु को फिर,
क्यों ना हैं शुद्ध बनाते हम।
साँस हवा के झोंके में है,
अब कौन इसे समझाए रे।

सबको साँस दिया विधाता,
साँस सभी को लेने दे।
जन्मसिद्ध अधिकार सभी का,
हक न किसी को खोने दे।
साँसों के सरगम पर प्राणि,
जीवन के गाने गाए रे।

जब-तक साँस है शरीर में,
तब-तक आस लगाना है।
प्रत्येक साँस में लक्ष्य हमारा,
पग-पग बढ़ते जाना है।
साँस एक अनदेखा पंछी,
पंख लगा उड़ जाए रे।
सुजाता प्रिय
21.03.2020

चहुँ ओर मिलावट दिखती है

हम जन मानस के जीवन में,
चहु अोर मिलावट दिखती है।
वसन-वस्तुओं, रिस्ते-नातो में,
घनघोर मिलावट दिखती है।

मिलना- मिलाना है बात भली।
है मेल-जोल की सौगात भली।
मेल-जोल मिलाप रखने में भी,
अब घोर मिलावट दिखती है।

घी-तेल में मिलावट है शानी।
दूध-छाँछ में है मिलता पानी।
क्या कहूँ अब तो पानी में भी,
पुरजोर मिलावट दिखती है।

मिलावट आटे,चावल,दालों में।
और नमक मिर्च मसालों में।
अब सारे खाद्य सामानों में।
बेजोड़ मिलावट दिखती है ।

सब्जियाँ को हरे रंग से रंगते।
फलों में पानी-शर्बत भरते।
दवा-दारु और दुकानों में,
बलजोर मिलावट दिखती है।

राजनीति की बात भी क्या।
है सत्ता की विसात भी क्या।
दलबदलुओं की दूसरे दल से,
गठजोड़ मिलावट दिखती है।

मिलावट का यह दौर चला।
इस पर करते क्यों गौर भला।
यहाँ रक्षक और रक्षापालों में।
रण छोड़ मिलावट दिखती है।
                 सुजाता प्रिय

Friday, March 20, 2020

विश्व गौरैया दिवस पर चिंतन विशेष

कहाँ गई तुम ओ गौरैया

एक जमाना बीता जब
मेरे कमरे के रोशनदान पर,
खर-पतवार के तिनके
दवा चोंच में लाती थी तू गौरैया।
एक-दूजे में उलझा-उलझाकर
थोड़ा उसमें फँसा-फँसाकर,
घोंसला अपना बनाती थी तू गौरैया।
रह-रहकर तुम्हारे नव-जनमें बच्चे,
मधुर कलरव जिसमें करते थे।
मेरे हृदय में मधुरस घोल
नव जीवन वे भरते थे।
चीं-चीं की कोमल संगीत,
सुनाई पड़ता था कानों में।
मन के तार झंकृत हो उठते थे,
उनके मधुर-मीठे गानों में।
उनके कोमल,लाल चोंच में,
तुम दानों के कण भरती थी।
निज शिशुओं की भूख मिटाकर,
अंतर की पीड़ा हरती थी।
चलचित्र-सा देखा करती थी,
पुलकित मन से मैं वह दृश्य।
माता की ममता की महिमा,
कैसी सुंदर उपहार सदृश्य।
आज न दिखती हो तुम गौरैया,
न श्रवण ही होता तुम सबका गाना।
रोशनदान घोंसले बिन सूना है ,
कौन छेड़ेगा वह प्रेम-तराना।
हाय कहाँ तू गई गौरैया,
बना बसेरा आसमान में।
नीले-नभ की सीमा पाने,
या पर फैलाने नील -वितान में।
                    सुजाता प्रिय

Friday, March 13, 2020

दिलवर

नजरें बिछाए बैठ़ी हूँ तेरा दीदार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिल में तुम्हारे प्यार का दरिया है बह रहा।
दिलब के दिल में डूबना दस्तूर है यहाँ।
दिलवर तू खेवनहार हो पतवार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए ।

मेरे दिल के दायरे में दिलवर तुम्हीं रहो।
दखल हो किसी और का ये बात ना कहो।
दुआ हो जिसके लब पे वो दिलदार चाहिए ।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिलवर हमारे दरमियाँ दीवार ना रहे ।
दस्तक पे दिल का बंद दरवार ना रहे।
दिल की दरख्त पर बस दुलार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिलवर कभी भी दिल को दुत्कारना नहीं।
दिल में कभी भी लाना तू दुर्भावना नहीं।
दिल को दुरुस्त रखने की दरकार चाहिए ।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।
                            सुजाता प्रिय