Sunday, January 15, 2023

मकर संक्रांति (दोहे)

 मकर संक्रांति (दोहे)

मकर संक्रांति में होता ,ऊष्मा का संचार।
शरद ऋतु को दूर हुआ, उल्लसित है संसार।

तिल का लड्डू खाइए,सुबह में कर स्नान।
तिलकुट-चूड़ा का करें-मंदिर जाकर दान।।

गुणकारी गुड़ खाइए,मन में रख विश्वास।
राम-वाण यह औषधी,कफ का करता नाश।।

खिचड़ी आकर खाइए, जिसमें चावल-दाल।
घी-जीरे से छौंक कर,मटर-टमाटर डाल।।

आसमान में उड़ रही,सर-सर करे पतंग।
नीली-पीली औ हरी,इसके सुंदर रंग।।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           स्वरचित, मौलिक

मकरसंक्रांति (मनहरण घनाक्षरी)



मकर संक्रांति ( घनाक्षरी)

मकर संक्रांति आया,
    सबका मन हर्षाया,
        नई उमंगे है लाया,
            तिल गुड़ लाइए।

गुड़ को पिघलाकर,
   चाशनी को बनाकर,
      तिल भुन मिलाकर,
            लड्डूएँ बनाइए।

गुड़ सूर्य को पसंद,
  तिल शनि को पसंद,
    पिता-पुत्र हो आनंद,
         मान  तो बढ़ाइए।

प्रातः सभी नहाकर,
    सूर्य शनि मनाकर,
       लड्डू भोग लगाकर,
            प्रसाद  ले  खाइए।

                  सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, January 11, 2023

ठंड का प्रकोप



ठंड का प्रकोप

ठंड का प्रकोप देखो बढ़ता जाए रे।
जालिम यह क्यों हमको है सताए रे।
शरीर पर गर्म कपड़े बोझ बढ़ाए रे।
जीवों का तन-मन कितना कपकपाए रे।

ठंडी है ऐसा छायी,काया है थरथराई।
बर्फीली शीत लहरी,हवा में है लहरायी।
बैठे हैं यहांँ हम अलाव जलाए रे।
जालिम यह क्यों हमको है सताए रे।

कैसी कड़कती सर्दी,जाएगी कब बेदर्दी।
सबका है हाल खस्ता,नाक में दम कर दी।
दिल का यह हाल किसको हम सुनाए रे
जालिम यह क्यों हमको है सताए रे।

ठंडी लगे रजाई,मौसम ने रंग दिखाई।
ठिठुरते हमारे तन-मन,चक्कर है यह चलायी।
चल रही है तेज कितनी ठंडी हवाएँ रे।
जालिम यह क्यों हमको है सताए रे।

कोहरा बड़ा है छाया,सूरज को भी छुपाया।
इंधन में भी नमी है,मोहरा हमें बनाया।
जाने ठंड क्यों इतना सितम है बारे रे।
जालिम यह क्यों हमको है सताए रे ।

सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, January 3, 2023

ठिठुरता बचपन



ठिठुरता बचपन

  बचपन
 की    वह 
मीठी यादें मैं
  भूल  नहीं 
     पाती ।

     पूस
 की ठिठुरन
 से  जब  मैं
  रहती थी 
 कंपकंपाती।

       दादी 
  अपनी गरम  
दुशाले  हाथ  में 
    लेकर थी 
      आती।

     टोपी 
   स्वेटर के 
ऊपर से  बाँध
   देती थी 
    गाती।

    इतने 
  सारे  गरम
 कपड़ों से  मैं 
    थी बड़ी 
    घबराती।

         तब
     धीरे-धीरे
 चुपके छुपके मैं 
     स्नान घर
      जाती।

     पानी 
  से लबालब 
भरी बाल्टी में 
  अपने हाथ 
    डुबाती।

       भींग
      जाते थे
स्वेटर टोपी भींग 
    जाती वह 
       गाती।

    अम्मा 
  और बाबा 
से प्रमोद भरा 
   मार थी 
   खाती।

      सदा
  ही ठिठुरता 
बचपन मेरा मैं
   ठंडक  से 
  अकुलाती।

 सुजाता प्रिय समद्धि

Wednesday, December 28, 2022

मच्छर की आत्मकथा

मच्छर की आत्मकथा

 उपवन में सुक्ष्म जीव विचरण कर रहे थे। उड़ने वाले जीव भी पंख फैलाकर इधर-उधर उड़ रहे तितलियों और मधुमक्खियों के साथ-साथ मक्खी-मच्छर भी भिन- भिन, भुन-भुन कर रहे थे। तितलियांँ अपने से छोटे जीवों से उनका परिचय पूछ रहीं थीं।जब मक्खी, मधुमक्खी ने अपना परिचय दे दिया तो मच्छर ने भी आत्मकथा सुनाना प्रारंभ किया।
  मैं मच्छर हूँ । निम्न कोटि की श्रेणी का एक नन्हा कीट। प्रकृति ने हमें दो पंख प्रदान किये ।जिससे उड़कर कहीं भी जा सकता हूंँ। गीत-संगीत हेतु ध्वनि भी प्रदान किया । जिससे भुन-भुन की आवाज कर गीत-संगीत से वातावरण गुंजायमान कर लोगों नींद उड़ाता हूंँ। भोजन मैं कभी नहीं करता।बस पेय पदार्थ ही मझको पसंद है। कभी-कभी पत्तियों का रस भी चूस कर काम चलाता हूंँ।लेकिन मुझे सबसे ज्यादा पसंद है जीवों के रक्त। अगर मानव- रक्त की प्राप्ति हो तो सोना में सुगंध ।रक्त -शोसन हेतु ईश्वर ने मुझे डंक भी दिया।चुपके से जीवों के शरीर में  उसे चुभोकर खून चूस  लेता हूँ ।पसंद का आहर पाकर जी लेता हूँ।लेकिन भगवान का भी अत्याचार कहो। सभी जीवो में श्रेष्ठ मानवों को बना दिया। बुद्धि-विवेक का सारा खजाना उन्हीं में भर दिया।नित नए -नए आविष्कार कर मुझसे अपनी  रक्षा करते हैं । कहीं उनके जागृत अवस्था में रक्त चूसने जाओ तो वे अपनी बड़ी- बड़ी हथेलियों के चाँटे से मेरी चटनी बनाकर देखेंगे कि मैंने उनका कितना खून चूसा ? कभी- कभी तो कुछ ऐसे चिपचिपे पदार्थ का लेपन कर लेंगे शरीर में, कि खून चूसने जाओ तो मुँह का जायका ही बिगड़ जाता है।या फिर अपने इर्द-गिर्द ऐसी अगरबत्तियाँ  जलाकर रकते हैं, जिसके धुएँं इतने जहरीले लगते है कि क्या कहूँ। बड़ी तेजी से वहाँ से भागना पड़ता है ।एक डिबिया में पता नहीं किस समंदर का पानी भरकर बिजली की स्वीच में लगा देते हैं जिससे न तो धुआं उठता है ना महक । लेकिन  उसके निकट जाने से दम घुटने लगता है ।वहांँ जाना मतलब जान गवाना।इससे तो अच्छा मच्छरदानी नामक ओहार था। जिसमें जब जी चाहे  उनके अंदर जाते समय चुपके से चले जाते थे। कहीं मच्छरदानी थोड़ा सा बिस्तर के दवाब से ऊपर हो जाता था तो  पौ बारह। अंदर जाकर जी भर खून चूसो। कहीं नींद में किसी के हाथ-पाँंव मच्छरदानी की जाली में सट गया तो बाहर से ही रक्त- पान का मजा ले लो ।कहीं उसमें छोटा -सा भी छिद्र हो गया तो समझो मदिरालय का प्रवेश द्वार खूल गया। लेकिन अब तो लगता है कि हमारा नामों- निशान मिटाकर ही रहेंगे मानव ।आज तो बड़ी-बड़ी गाड़ियों से गहरी और जानलेवा धुएंँ का गुब्बारा उड़ा कर नदी- नाला,कूड़ा -कचरा सभी जगह से हमारा नाश कर रहे हैं।
           सुजाता प्रिय समृद्धि
               

Sunday, December 18, 2022

कल हाथ पकड़ना मेरा (कविता)

कल हाथ पकड़ना मेरा

चलो सड़क मैं  पार करा दूंँ।
साथ चल विद्यालय पहुंचा दूँ।।
लाठी टेक मैं अब चलता हूंँ।
इसके बिन चलने से डरता हूंँ।।
तुझे अकेला छोड़ ना सकता।
पोता तुझसे मुख मोड़ सकता।।
आज तुम्हारा मैं हाथ पकड़ता।
कसकर मैं मुट्ठी में हूंँ जकड़ता।। 
विद्यालय का यह लम्बा रास्ता।
ऊपर से पीठ पर भारी बस्ता।।
कल ज्यादा मैं बूढ़ा हो जाऊँ।
लम्बी सड़क पर चल ना पाऊँ।।
इस तरह हाथ पकड़ना तू मेरा।
घुमा-फिरा ,वापस लाना डेरा।।
इस जीवन का भी चक्र यही है।
बच्चा-बूढ़ा बनाना क्रम सही है।। 
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, December 16, 2022

भगवान ( हाइकु )



भगवान 

    हे भगवान 
दया निधान आप
   कृपा करिए।

    हम उदास 
लेकर आए आस
    दुख हरिए।

 हे सर्वव्यापी 
हरते हैं संताप 
दया कीजिए।

     हम आपके
 शरण में हैं आए 
    वर दीजिए।

  शिवा आपके 
नहीं कोई सहारा 
 कहांँ मैं जाऊंँ।

   कौन हारेगा
दुखड़ा अब मेरा 
  किसे बताऊँ।

      दूर कर दें
मेरी भव बाधा को
   आप मिटाएंँ।

    बीच भँवर
मेरी अटकी नैया
   पार लगाएंँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'