Friday, August 14, 2020

हम भारत की बेटियाँ

हम भारत की बेटियाँ हैं , इसका मान  बढ़ाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम,हँसकर प्राण गवाँएगें।

कोई भारत माँ पर अपनी,बुरी नजर अब डालेगा।
इसकी धरती पर कब्जे की मन में सपने पालेगा।
हम संहार के लिए खड्ग ले रणचण्डी बन जायेंगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवांएगे।

अब किसी की गुलामी, हमको है स्वीकार नहीं।
मेरी पावन धरती पर,किसी का है अधिकार नहीं।
अपनी जौहर की ज्वाला में दुश्मन को जलाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवाँएगें।

सीमा की रक्षा की खातिर,हम प्रहरी बन जाएगें।
अपने घर के वीरों को भी,अपने साथ लगाएँगे।
हम चुड़ावत की हाड़ा बन,मुण्डमाल बन जाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम हँसकर प्राण गवाँंएगे।
          सुजाता प्रिय'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, August 13, 2020

बादल की शोभा

घने बादल की शोभा अपार देखो।
सारे  नभ में है छाई  बहार  देखो।

धूमकेतु - से काले - काले बादल।
लगे तरुणी के आँखों का काजल।
कर लिया है  सोलह शृंगार देखो ।
सारे नभ  में है छाई  बहार देखो।

कभी  इधर -  उधर दौड़ लगाए।
हवा के झोंकों के संग उड़ जाए।
पवन रथ पर होकर सँबार देखो।
सारे नभ में है छाई  बहार देखो।

कभी गड़-गड़,गड़-गड़ गरजे।
कभी पानी की बुंदें बन बरसे।
छाई चारो दिशा में बहार देखो।
सारे नभ में है छाई बहार देखो।

कभी चंदा  की ओट ले  झाँके।
कभी झिलमिल तारों को ताके।
दिखता है सूरज के  पार देखो।
सारे नभ में है छाई बहार देखो।

       सुजाता प्रिय'समृद्धि'
  स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, August 12, 2020

माँ-बाप की हालत खस्ता

चाहे टूट जाए रीढ़ की हड्डी।
लाद चलूँ मैं नोटों की गड्डी।

मासिक फीस भी है भरना।
वार्षिक नामांकन करवाना।

दैनिक वेष है जरूरी लेना।
हाउस- ड्रेस मजबूरी लेना ।

जूते सफेद और काले लेने।
बेल्ट - टाई और मोजे लेने।

वाहन-शुल्क भी हमें देना है।
कार्यक्रम -शुल्क भी देना है।

किताबें भारी - भारी है लेनी।
कॉपियाँ बहुत सारी  है लेनी।

ड्राईंग की कॉपी भी लेनी है।
कलर पेंसिल कूची  लेनी है।

ढोना  है हमको भारी बस्ता।
माँ-बाप की है हालत खस्ता।

       सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Tuesday, August 11, 2020

श्रीकृष्ण जन्म लीला

लिए जनम मुरारी,जग हितकारी,
बिलख उठी महतारी।
जब पता चलेगा,इसे मारेगा,
कंस है अत्याचारी।

भए प्रकट कृपाला,दीन दयाला,
गूढ़ बात समझाये।
मुझको लेकर,पहुँचा दें नन्द घर,
उनकी कन्या ले आएँ।

खुल गए ताले,सो गए रखवाले,
टूट गई उनकी बेड़ी।
रात अँधियारी , हुई उजियारी,
छाई घटा घनेरी।

उन्हें सूप में लेकर, रख माथे पर,
वसुदेव चले वृंदावन।
उफनायी यमुना, छूने को चरणा,
बालकृष्ण के पग पावन।

बादल गरजे , झम-झम बरसे,
शेषनाग सिर छत्र धरे।
लक्ष्मण-रघुराई, मिले दोउ भाई,
पुलकित चित आनन्द भरे।

गोकुल के नन्द ,घर में आनन्द,
कान्हा जी हैं जनम लिए।
कन्या को लेकर , पहुँचे तत्पर,
रखवाले सब जाग गए

कंस जब जाना,जनमी कन्या,
लगा पटकने हाथ पकड़।
हाथ से छुटकर ,नभ में उड़कर,
महामाया का रूप धर।

बोली रे कंस, सुन देवकी का अंस
पहुँच गया वृंदावन में।
सुन रे दुराचारी,तुझ पर वह भारी,
सोंच जरा अपने मन में।

यह प्रभु की लीला,परम सुशीला,
जो जन आनंद से गाबे।
दुख न सताबे ,सब सुख आबे,
निश्चित ही सुफल पाबे।

        सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 9, 2020

जीया सब बिहार के लाला

बिहार धरती दिवस पर साईकिल यात्रा कर धरती पर पौधा रोपण करने वाले सभी भाईयों को समर्पित।

जीया सब बिहार के लाला

जीया सब बिहार के लाला।
जीया हो सब हजार साला।
सगरो घूम-घूम के,
सभे झूम-झूम के।
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

आज बिहार घरती दिवस है,
सबके तू बताबा।
स्वच्छ बनाबे धरती अपन,
सब मिलके समझाबा।
जने मिलै कौनो बंजर धरती
हरियाली तू फैलाबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

साईकिल यात्रा तोहर बड़ी निराली,
पेट्रोल जले ना डीजल।
ना दुर्गंध ना धूआँ उगले,
झटपट मारा पैंडल।
साईकिल यात्रा के फयदा ,
सबके बताबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

कटौना,दाबिल,गरसंडा में तू
अनगिनत पौध लगैला।
नगदेवा,लभैत,टुंबा पहाड़ पर भी,
हरियाली फैलैला।
धरती के सगरे मरुभूमि के हरियर, बनाबा हो भैया!
सभे घूम-घूम के,
धरती पर पेड़ लगाबा हो भैया!

अब पेड़ लगाके पर्यावरण,
बचाबा हो भैया!

        सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, August 8, 2020

अहिंसा परमों धर्मः ( लघु कथा )

भगवान बुद्ध गृह त्याग चुके थे।संसार के प्राणियों के दुःखों का कारण व उसका निदान ढुंढते हुए एक उपवन में जा बैठे।निकट गाँव के लोगों ने उन्हें देखा तो गाँव के लोगों की खुशहाली एवं सुखी जीवन की कामना के लिए अपने द्वारा किए जा रहे सामुहिक पूजा में उन्हें आमंत्रित किया ।
भगवान बुद्ध ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया।निश्चित समय पर वे पूजा स्थल पर उपस्थित हो गए।सभी ने आकर उनका स्वागत-सत्कार किया और ऊँचे स्थान पर बैठाया।
वहाँ के लोगों के सहयोग एवं शांति पूर्ण व्यवहार से वे बड़े प्रभावित हुए।उन्होंने देखा हवन-कुण्ड के चारो ओर केले तथा अन्य बृक्षों को काटकर सुंदर और आकर्षक तोरणद्वार बनाकर मनमोहक सजावट किया गया है।एक ओर बहुत सारे लोग पंक्तिबद्ध खड़े हैं।
बुद्ध ने पूछा-क्या वे प्रसाद ग्रहण करने के लिए वहाँ खड़े हैं?
वहाँ खड़े पुजारीजी ने बताया- वे बलि दिलबाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
बुद्ध ने पूछा- ये किन की बलि देंगे।
पुजारीजी ने एक ओर लकड़ियों और रस्सियों से बने बाड़े की ओर दिखाते हुए कहा- उन जानवरों तथा पक्षियों की।
भगवान बुद्ध ने देखा,बाड़े में गाय, भैंस ,भेड़ ,बकरे,कबूत्तर इत्यादि पशु-पक्षी बँथे थे।
बुद्ध ने पूछा- इन पशु-पक्षियों की बलि देने से तुमलोग को क्या मिलेगा।
पुजारी जी ने खुश होते हुए कहा-यह हमारा धर्म है।
भगवान बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले- यही तो हम मानवों की भूल है।हम एक प्रबुद्ध और श्रेष्ठ प्राणि होकर भी अन्य जीवों के प्रति हिंसा का भाव रखते हैं।हिंसा किसी भी स्थिति में मानवों का धर्म नहीं हो सकता।आपलोगों के आत्मीय भावों को देख मैं बहुत प्रसन्न हुआ।लेकिन किसी ने यह सोंचा है कि जगह-जगह पूर्ण बृक्षों को काटकर जो सजावट की गई है इससे प्राकृतिक वनस्पत्तियों की कितनी हानि होगी ?यह कौन- सा धर्म है, कैसी पूजा है ? इस प्रकार सभी जीव-जन्तु एवं पेड़ -पौधे नष्ट हो जाएँगे। जो मानव किसी अन्य बेवस लाचार और निरीह प्राणियों के प्रति हिंसा का भाव रखते हैं, वे अन्य मानवों तथा परिवार-रिस्तेदार के प्रति भी हिंसक हो सकते हैं।इसलिए आप लोगों  जिस प्रकार मानवों के साथ मित्रवत एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखते हैं,उसी प्रकार सभी जीवों के प्रति प्रेम और दया का भाव रखें।बलि देने से आपका जीवन कभी भी सुखमय नहीं हो सकता।आपका जीवन सुखमय हो सकता है अहिंसा को अपनाने से।'अहिंसा ही हम मानवों का परम धर्म है। हिंसा नहीं।'
पुजारीजी ने उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया।
भगवान बुद्ध ने देखा- सभी लोग बाड़े में बँधे पशु-पक्षियों को बंधन- मुक्त कर रहे थे।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 2, 2020

दोस्ती का रिस्ता

हर  रिस्ते से प्यारा , है दोस्ती का रिस्ता।
सच्चा है वही साथी ,जो करता है मित्रता।

ना जन्म औ जाति हो,ना धर्म का हो बंधन।
जब दोस्त बने कोई , तो देखते केवल  मन।
वही इसको निभाता है,जो जाने इसकी महता ।
सच्चा वह...................

गिरने से पहले जो , थाम ले  हाथों को।
दुःख दर्द जो हर लेता,समझे जज्वातों को।
भटकने से पहले ही ,जो राह है दिखलाता।
सच्चा वह..........

सारे सुख - दुःख को जो , बाँट ले जीवन के।
व्याकुलता प्रसन्नता जो समझता अन्तर्मन के।
अपने सब  मित्रों का जो साथ है निभाता ।
सच्चा वह..............
         सुजाता प्रिय'समृद्धि'