Thursday, July 23, 2020

रिमझिम रिमझिम आई बरसात

रिमझिम रिमझिम आयी बरसात।
मीठी  फुहारों  की  लायी सौगात।
रिमझिम-रिमझिम.................

झूम-झूमकर झूमे रे बदरिया।
काली-काली बिखरी कजरिया।
लहर-लहर लहराई ।
आसमान में छाई।
हवा के झोंके को लेकर साथ।
मीठी फुहारों की लायी सौगात।
रिमझिम-रिमझिम...............

चम-चम चमके बिजुरिया ।
कड़-कड़ कड़के बदरिया।
रूई - जैसी वह लरजे।
गड़-गड़,गड़-गड़ गरजे।
सखी -घन से कुछ करती बात।
मीठी फुहारों की लायी सौगात।
रिमझिम-रिमझिम...............

टप-टप,टप-टप टपके।
लप-लप,लप-लप लपके।
इधर-उधर कभी भटके।
और मारे सौ-सौ झटके।
धूम मचाती दिन और रात।
मीठी फुहारों की लायी सौगात
रिमझिम-रिमझिम..................
     सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, July 22, 2020

वृद्धाआश्रम ( लघु कथा )

बहुत मुश्किल से राजू बाबूजी को वृद्धाआश्रम में रहने के लिए मनाया । माँ के गुजरने के बाद वे अकेलापन महसूस कर रहे थे।
उनकी देख-भाल का जिम्मा अब उसके और उसकी पत्नी पर आ गया था।उसके कार्यालय और बेिट्टु के विद्यालय के लिए नास्ता-खाना तैयार करने के साथ-साथ बाबूजी के लिए भी चाय नास्ते की व्यवस्था करनी पड़ती।सौम्या परेशान हो जाती।
वह रोज राजू को उलाहने देती हुई बोलती- बाबूजी ने तो नाक में दम कर दिया है।समय पर चाय नास्ता और भोजन चाहिए।कुछ करना-धरना तो है नहीं।अखवार- टी०वी० से चिपके रहना।रोज पार्क में टहलना जरूरी है। घुटने का दर्द का बहाना बनाकर व्हील चेयर खरीदबा लिए।एक कमरे को अलग से दखल किए रहते हैं।एक-आध घंटा विट्टु को पढाते हैं तो लगता है कितना बड़ा काम करते रहे हैं ।तुरंत चाय की फरमाईश।
पत्नी की बात सुन-सुन कर उसे भी बाबूजी का साथ रहना नागवार लगने लगा।एक दिन उसने बाबु जी को वृद्धाआश्रम में रहने की सलाह दी।
बाबूजी ने कहा- मैं तुमलोग को छोड़ कर कहीं नहीं जाउँगा।इस घर में मेरी आत्मा बसती है। इस घर में तुम्हारी माँ की यादें बसी है।तुम्हारा बचपन बसा हुआ है।बहुत मुश्किल से दो-दो पैसे जोड़कर मैने इस घर को बनाया है।इसकी एक-एक ईंट से मुझे लगाव है।

राजू ने कहा- आप वहाँ रहने लगेंगे , तो आपको वहाँ भी मन लगेगा।हमउम्रों का साथ होगा।फिर धीरे-धीरे इस घर से लगाव खत्म हो जाएगा।
आखिर कार बाबूजी मान गए।
उन्हें लेकर राजू वृद्धाआश्रम पहुँचा।बगल में अपना प्रारंभिक विद्यालय देख बाबुजी से पूछा- याद है बाबूजी !बचपन में आप रोज इसी विद्यालय में मुझे पढ़ने के लिए पहुँचाने आते थे ?
बाबुजी ने रुआंसे से स्वर में कहा।हाँ बेटा ! और यह भी याद है कि यह वृद्धाआश्रम आश्रम पहले अनाथालय हुआ करता था।और इस अनाथालय से मैं और तुम्हारी माँ तुम्हें अपने साथ ले गए थे। जब यहाँ के सारे बच्चों को निःसंतान दम्पति ले गए तो यहाँ वृद्धाआश्रम चलाया जाने लगा।उस दिन मैं नहीं सोंचा था कि जिसे मैं यहाँ से निकालकर प्यार से पाल-पोष कर, पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाऊँगा,वह एक दिन मुझे यूँ अनाथों की तरह मेरे घर से निकालकर यहीं पहुँचा  देगा।

यह सुन राजू के पैरों के तले से जमीन खिसक गई।वह जड़वत बाबूजी का व्हील चेयर पकड़े खड़ा रहा।
          सुजाता प्रिय'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, July 18, 2020

कोरोना काल में साहित्योदय

छत के मुंडेरे के पास बैठ सुमित्रा जी आसमान में छाई लालिमा को अपलक निहार रही थीं।सुर्योदय से पूर्व जागने की आदत उन्हें बचपन से थी।सुबह रसोई का काम निपटाकर तैयार हो विद्यालय के लिए प्रस्थान करती।
पेशे से शिक्षिका सुमित्रा जी को विद्यालय से आने के पश्चात गरीब और अनाथ बच्चो को सुशिक्षित और संस्कारित करने में बड़ा आनंद आता।सच पूछें तो यही उनका सांध्य-आराधन था।लॉक डाउन के कारण ना तो विद्यालय जाना था, ना ही बच्चों को पढ़ना था।परिवार के लोग सुबह देर से जागते।
किसी को कहीं जाना नहीं।रसोई की भी कोई जल्दी नहीं।सुबह उठकर थोड़ी देर छत पर टहलने लगीं।अकेले में आसमान-सूरज, पेड-पौधे़,पशु-पक्षियों ,नदी-तालाबों इत्यादि को देख मन में अनेक प्रकार के सुविचारों का उदय होता।कई दिनों तक उन विचारों को मथने के बाद उन्होंने उन्हें लिपिबद्ध करने की ठानी।और कोरोना-काल की विषमताओं और गरीबों की दयनीय दसा का सजीव चित्रण कर अनेकानेक कविता और कहानियों का रूप देने लगी।दैनिक मजदूरी या व्यापार कर कमाने वाले तथा प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थितियों एवं मजबूरियों को अपनी लेखनी 'द्वारा खूब उकेरा।अपनी रचनाओं 'द्वारा जन-जागरण करना अब उनकी दिनचर्या हो गई थी।सभी ने उन्हें उनकी इस प्रसंशनीय कार्य के लिए खूब सराहा। इस प्रकार लॉक डाउन न सिर्फ सभी लोगों को कोरोना से संक्रमित होने से बचाया,अपितु साहित्य प्रेमियों के मन में साहित्य को उदय कर सम्पूर्ण समाज में साहित्यिक सेवा करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

गज़ल

मुझे जो मुहब्बत तुम्हारी मिलेगी।
तो दौलत दुनिया की सारी मिलेगी।

मुझे आज तुमसे मुहब्बत हुई है,
सुना दूँ खबर तुमको प्यारी मिलेगी।

तेरी आस में दिल व्याकुल है कितना,
मैं सोची न थी बेकरारी मिलेगी ।

आशा का दीपक जलाया है दिल में,
लौ इसकी हरदम जारी मिलेगी

मेरी ख्वाहिशों को जो पूरा करोगे,
तो समृद्ध प्यार की क्यारी मिलेगी।
     सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Friday, July 17, 2020

पृथ्वी बनी पटरानी

पृथ्वी बनी पटरानी,
बनी सारे जगत की ऱानी।
लगती बड़ी ही सुहानी,
बनी सारे जगत की रानी।

हरी मखमल की चोली पहनी।
चुनरी का रंग हुआ धानी,
बनी सारे जगत की रानी।
पृथ्वी बनी---------------

पेड़-पौधों से अंग सजा है।
लताओं की हार बड़ी शानी,
बनी सारे जगत की रानी।
पृथ्वी बनी---------------

ताल-तलैया लबा-लब भरा है।
नदियों में भर गया पानी,
बनी सारे जगत की रानी।
पृथ्वी बनी------------------

मोर,पपीहा वन में नाचे।
चिड़ियाँ बोले मीठी वाणी,
बनी सारे जगत की रानी।
पृथ्वी बनी---------------
सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Thursday, July 16, 2020

झूला लगा कदम की डाली

झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में ।
चलती मधुर-मधुर पुरवाई,
मस्ती छाई तन-मन में।

आया सावन बड़ा सुहावन,
हरियाली छाई।
देख घटा का रूप सलोना,
मन में मैं हरषाई।
नभ की छटा बड़ी मनभावन,
खुशियाँ' लायी जीवन में।
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में।

ओ रे साजन तू भी आजा,
संग-संग हम झूलें।
दोनो मिलकर पेंग बढ़ाकर,
गगन को जा छू लें।
चल अम्बर में विचरण कर लें,
उमंग लेकर चितवन में।
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में।

         सुजाता प्रिय'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, July 12, 2020

अभिशाप ना कहो

छोटे- छोटे दुःखों को संताप ना कहो।
जिंदगी' वरदान है अभिशाप ना कहो।

समझो कभी ना ये कि भार है ये जिंदगी।
ईश्वर का दिया हुआ उपहार है ये जिंदगी।
कभी भी तुम इसको  श्राप   ना कहो।
जिंदगी वरदान है अभिशाप ना कहो।

हालात को सुधारकर जिंदगी सवार लो।
मेहनत के  कूचे से इसको  निखार लो।
भूले से भी इसको  तू पाप ना कहो।
जिंदगी वरदान है अभिशाप ना कहो।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'