Wednesday, June 17, 2020

वैज्ञानिकों से विनती

हे! कम्प्युटर रोबोट बनाने वाले।
मशीनों से सब काम चलाने वाले।

एक  मशीनी नारी भी बना दे ।
करने उसको सब काम सिखा दे।

रिक्तियाँ नारियों की जो भर सके।
पुरुषों के सब दुखड़े वह हर सके।

जिसे लगे न कभी भूख-प्यास।
उसके दिल में ना हो कोई आस।

जिसे नहीं हो कभी कोई चाह।
ना हो उसकी अपनी कोई राह।

पाँव रहे उसके दो बड़े - बड़े।
आज्ञा पालन करने दौड़ पड़े।

हो उसके दो बड़े- बड़े हाथ ।
मेरे कामों  में  दे हरदम साथ।

दिन रात करती जाए सब काम।
कभी न चाहिए उसको आराम।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, June 15, 2020

,खून के बदले खून'(लघुकथा)

बचपन से ही महेश और रोहन के बीच प्रगाढ़ मित्रता थी।रहते तो दोनों एक ही कस्वे में थे।लेकिन दोनों के घरों के बीच काफी दूरी थी।फिर भी उन्हें एक-दूसरे से मिले बिना चैन नहीं।
लेकिन,'कभी-कभी खुबियाँ भी अभिशाप बन जाती हैं।'
ऐसी ही कुछ बातें उनकी मित्रता में भी ग्रहण लगा गई।क्योंकि महेश एक कुशल कलाकार था।उसे लेखन,गायन ,वादन ,चित्रकारी,नृत्य इत्यादि में महारत हासिल थी।रोहन उससे उन कलाओं को सीखता और उसकी सराहना भी खूब करता।किन्तु जब महेश को उसकी कलाओं के लिए प्रसिद्धि मिलने लगी तो रोहन के मन में ईर्ष्या अपना फन फैलाने लगा।वह महेश से चिढ़ने लगा और बात-बात में उसे बेवकूफ बनाकर उसका मजाक उड़ाने लगा।सराहना की जगह उसका अपमान और दुष्प्रचार करने लगा।
इस बात से दोनों मित्रों में हमेशा कहा-सुनी होने लगी। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों के मन में प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली।रोहन हमेशा ताक मे रहता कि किस तरह उसे नीचा दिखा कर अपमानित करें। एक बार काव्य गोष्ठी में जब उसे सम्मानित किया गया , तब रोहन चिढ़कर महेश को भला बुरा कहने लगा।दोनों में तू-तू ,मैं-मैं होते-होते हाथा-पाई होने लगी।मौका देखकर रोहन महेश को उठाकर पत्थर पर पटक दिया।महेश का सिर जख्मी हो गया और काफी खून बहने लगा।उसे कई दिनों तक अस्पताल में इलाजरत रहना पड़ा।
इस घटना से महेश के मन में रोहन के प्रति नफरत और बदले  की आग धधक उठी।उसके अन्तर्मन में हमेशा यह विचार कौंधता - खून का बदला खून से लेना है ।लेकिन स्वभावतः वह अपने मन के कुविचारों का दमन कर देता।
कुछ दिन बाद वह किसी खास रोगी से मिलने अस्पताल गया तो देखा रोहन को स्ट्रेचर पर लेटाकर इमरजेंसी बार्ड में ले जाया जा रहा है ।पीछे से डॉक्टरों की टीम दौड़ी जा रही है।उसने पूछ-ताछ की तो पता चला कार दुर्घना में वह बुरी तरह धायल हो चुका है।उसी समय नर्स ने आकर उसके परिजनों से कहा।तुरंत खून का इंतजाम करिए नहीं तो उनको बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।खून ज्यादा बह गया है।और ब्लड बैंक में उनके ग्रुप का खून नहीं है।
यह सुनकर महेश का मन विचलि हो उठा।उसे विद्यालय का वह दिन याद आया जब दोनों का ब्लड ग्रुप एक रहने के कारण उनके दोस्त उन्हें 'खून का दोस्त' बुलाते थे।
उसके मन में 'खून के बदले खून' का विचार फिर कौंध गया।वह रोहन 'द्वारा दिए गए जख्म को सहलाते हुए बुदबुदाया - हाँ मै खून का बदला खून से ही लूँगा। वह तेजी से रोहन के परिजनों एवं नर्सों के निकट जाकर बोला मेरा और रोहन का खून एक ही ग्रुप का है ।कृपया आप मेरा खून उसे चढ़ाकर मेरे दोस्त की जान बचा दें। नर्स उसे लेकर आगे बढ़ गई।रोहन के परिजन महेश की महानता देख हतप्रभ रह गए ।
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
   स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, June 12, 2020

सोशल मीडिया (लघु कथा)

फुलमनिया काकी की खुशी का ठिकाना नहीं।टोले के जिन छोकरों से वह चिढ़ा करती थी  वे आज उसे ईश्वर का रूप लग रहे थे।उन छोकरों के कारण ही आज उसका खोया बेटा घर वापस आ रहा था।दो साल वह अपने बेटे की याद में किस तरह गुजारी यह तो उसी का दिल जानता है।जब वे उससे उसके बेटे धरमा का कोई फोटो मांगने आये तो उसे लगा वे हमेशा की तरह आज भी वे उसका मजाक बनाना चाहते हैं ।हाँ मजाक ही तो करते आए थे वे उसकी। कभी उसके टूटे हुए पैर का फोटो खींचकर, कभी झाड़ू- चटाई बनाने का फोटो लेकर ,कभी टूटी-फूटी झोपड़ी का फोटो खींचकर कहते इसे व्हाट्स-एप,फेसबुक में डाल देंगे तो सरकार और मीडिया वाले तुम्हें कुछ आर्थिक मदद करेंगे।कुछ मनचले किस्म के छोकरे उसे देखते ही पूछते - कितना पैसा सरकार दिया तुम्हारी विकलांगता और गरीबी पर काकी? उसमें से थोड़े पैसे  हमलोग को मिठाईयाँ खिलाने पर भी खर्च करना।और वह चिढ़कर जाने कितनी गालियाँ उनलोग को दे डालती।
कल उन बदमाश छोकरों ने ही मोबाइल में उसके बेटे का फोटो दिखा कर कहा देखो काकी धरमा भाई का पता चल गया।हमलोग उसका फोटो व्हाट्स-एप फेसबुक में डालकर सभी जनों से अपील किए थे कि यह व्यक्ति अगर किसी को दिखे  तो हमें खबर करें।किसी का मैसेज आया है कि इस चेहरे का एक व्यक्ति कलकत्ता के एक अस्पताल में इलाजरत है ।सड़क दुर्घना में इसके सिर में काफी चोटें आयी थी जिससे इसकी यादास्त कमज़ोर हो गई थी। अब स्वस्थ्य लाभ हो रहा है ।
टोले वाले लोग उसे लाने गये हैं।
पास-पड़ोस के लोग बोल रहे थे,बच्चे हमेशा मोबाइल में ही व्यस्त रहकर गाना ,सिनेमा गेम आदि में लगे रहते थे इसलिए इस सोशल मीडिया को हमलोग अभिशाप समझकर उससे चिढते थे। आज वही सोशल मीडिया हमारे लिए वरदान बन गया।

  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

स्वतंत्र रूप को नमन

स्वतंत्र है धरा- गगन,
पाताल , अग्नि और पवन।
सृष्टि के  रचनाकार के ,
स्वतंत्र रूप को नमन ।

स्वतंत्र अपना भाव हो ,
स्वतंत्र मन की चेतना।
स्वतंत्र ही विचार हो ,
स्वतंत्र हो् सेवा-साधना।
स्वतंत्र परोपकार हो,
स्वतंत्र भाव लिए हो मन।
सृष्टि के रचनाकार के ,
स्वतंत्र रूप को नमन।

स्वतंत्र हृदय में धारणा,
समस्त जीवों के लिए।
स्वतंत्र नगर-गाँव में सभी,
स्वतंत्र रूप में जीएँ।
स्वतंत्र अपना लक्ष्य हो,
स्वतंत्र के लिए जनम।
सृष्टि के. रचनाकार के ,
स्वतंत्र रूप को नमन।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, June 10, 2020

बाल मजदूर की विनती (बाल मजदूर दिवस १२ जून)


अभी तो हम हैं छोटे बच्चे,
काम अभी मत करने दे।
इस जीवन की राह कठिन है,
राह तो थोड़ा गढ़ने दे।

कलम छोड़, कुदाल धरूँगा,
होगी मुझपर मनमानी।
पढ़-लिखकर जो काम करूँगा,
उसमें है अपनी शानी।
पढ़ने-लिखने की उम्र हमारी,
हमें भी थोड़ा पढ़ने दे।
साक्षरता का अभियान चला है,
हमें भी साक्षर बनने दे।

मंटू ढोता ईट और बालू,
संटू अखबार है पहुँचाता।
भैया गली-गली फेरे दे,
सब्जियाँ है बेचने जाता ।
बस्ते की जगह मोट ढुलबाकर,
जुल्म-सितम मत सहने दे।
आगे भार उठाना है जीवन का,
अभी तो थोड़ा बढ़ने दे।

दीदी की किताब-कॉपियाँ,
तख्ती पर ही रह जाती है।
विद्यालय के बदले घर-घर जा,
खाना वह पकाती है।
मुनियाँ धोती घर-घर बर्तन,
औ झाड़ू-पोछा न करने दे।
बेटी बचाओ,बेटी पढा़ओ का,
मान भी थोड़ा रहने दे।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

गजल

अभी तो खुद पड़ी बीमार दुनियाँ।
लगाए क्या कोई बाजार दुनियाँ।

कभी थी दुनियाँ में जीनेे की चाहत,
अभी तो लग रही बेकार दुनियाँ।

अभी तो दाने के मुहताज हैं सब,
करे क्या अब कोई व्यापार दुनियाँ।

कभी अकड़ दिखा रहती खड़ी थी,
अभी तो है बड़ी लाचार दुनियाँ।

विपदा कब टलेगी भगवान जाने,
अभी तो है पड़ी मजधार दुनियाँ।

ईश्वर अब तुम्हीं इससे उबारो,
विनय में कर रही चित्कार दुनियाँ।
             सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित,सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, June 5, 2020

जीवन में दो वृक्ष लगाना है।

हमने यह प्रण ठाना है।
जीवन में दो वृक्ष लगाना है।

शुरु करें हम हरित क्रांति।
सबके मन में हो तभी शांति।
हरियाली फैलाना है।
जीवन में दो वृक्ष लगाना है।

कोई पेड़ न काटें हम।
मरुभूमि में न पाटे हम।
बंजर न इसे बनाना है।
जीवन में दो वृक्ष लगाना है।

स्वच्छ रखें जल-जमीन -जंगल।
सब जीवों का हो शुभ- मंगल।
पर्यावरण बचाना है।
जीवन में दो वृक्ष लगाना है।

स्वच्छ बनाएँ अपनी धरती।
माँ-जैसी जो पालन करती।
इसको सुखी बनाना है।
जीवन में दो वृक्ष लगाना है।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित