Sunday, September 5, 2021

शिक्षक (दोहा छंद)



शिक्षक हमको देते हैं, विद्या- बुद्धि और ज्ञान।
शिक्षक से हम सीखते,साहित्य,संस्कृति-विज्ञान।।

लक्ष्य-प्राप्ति के लिए, बतलाते हैं हमको  राह।
बिन शिक्षक के जीवन में, मिलता नहीं है थाह।।

हम माटी की अनगढ़ लोई,शिक्षक हैं कुम्भकार।
गढ़ते- घुमाकर चाक पर,देते  हैं सुगढ़ आकार।।

शिक्षा की प्रसाद खिला,बनाते हैं शिष्य गुणवान।
शिक्षक के गुण को अपना,बनता गुण की खान।।

निर्मल मन की दीप जला, देते हैं सदा वे ज्ञान।
ज्ञान प्रकाश फैलाना ही, शिक्षक की पहचान।।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

6 comments:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (06-09-2021 ) को 'सरकार के कान पर जूँ नहीं रेंगी अब तक' (चर्चा अंक- 4179) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    1. बहुत-बहुत आभार भाई !

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  2. शिक्षक की महिमा बयां करते सुंदर दोहे । बहुत बधाई सुजाता जी। मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है ।

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    1. जी अवश्य।सादर धन्यवाद

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  3. हार्दिक बधाई सखी।
    बहुत ही सुंदर दोहे।
    सादर

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  4. सादर धन्यवाद सखी

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