Wednesday, July 10, 2024

लक्ष्य (मुक्तक)

लक्ष्य (मुक्तक )

लक्ष्य पाने के लिए तुम,सत्य पथ पर बढ़ चलो।
राह में पर्वत भी आये, हौसला ले चढ़ चलो।
दृढ़ हृदय ले बढ़ते जाओ,राह तुम भटको नहीं-
राह कोई न दिखे तो,नव रास्ते गढ़ते चलो।

चाह रखो तुम हृदय में,राह भी मिल जाएगी।
दृढ़ हो निश्चय तुम्हारा, चट्टान भी हिल जाएगी।
ठोक कदमों से उसे तुम, दूर कर दो राह से -
पाषाण की छाती को चिर, सुंदर कली खिल जाएगी।

हृदय में हिम्मत बढ़ा चल, तुम कभी मत हारना।
जीतकर ही आयेंगे हम,मन में रखो धारना।
रास्ते के ठोकरों को, ठेलकर बढ़ते चलो-
पग कभी उसपर पड़े तो, तुम भी ठोकर मारना।

अधिकार तेरा लक्ष्य पाना, लक्ष्य पाना धर्म है।
लक्ष्य हेतु संग्राम करना, भी हमारा कर्म है।
जीत कर संग्राम को तुम, लौट कर घर आओगे-
तब तुम्हें यह ज्ञात होगा, लक्ष्य ही तो मर्म है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

देखने को बहार

देखने को बहार, देखने को बहार ।
कान्हा चले मधुबन में,देखने को बहार,
बसंत के बहार , कान्हा चले 
आगे आगे कान्हापीछे से गोपियांँ,
हाँ जी राधा चली उनके साथ।
देखने को बहार ।
कोकिल कूके,पपीहा गाबें,
हाँ जी मोर दिखाते नाच,बीच मधुबन में 
कान्हा चले मधुबन में........
कदम पर कन्हैया, मुरली बजाबे,
हाँ जी प्यार की छेड़े तान।बीच मधुबन में,
देखने को.....
पलास तरू पर दस-दह दहके,
हाँ जी लता में खिले कचनार।
कान्हा चले मधुबन में,देखने को बहार 
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि' 

Tuesday, July 9, 2024

चपला बोली (चौपाई छंद)

चपला बोली (चौपाई छंद )

नभ  में चपला चमक रही है।
कड़-कड़,कड़-कड़ कड़क रही है।।

बादल को ललकार रही है।
बारम्बार पुकार रही है।।

कहती बादल अब तुम बरसो।
नहीं करो तुम कल औ परसों।।

अब न करो तुम आना-कानी।
चला नहीं अपनी मनमानी।।

घनघोर घटा को  बरसाओ।
तपती वसुधा को हर्षाओ।।

आ तुझको मैं राह दिखा दूँ।
कहाँ बरसना यह समझा दूँ।।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, June 29, 2024

गणेश वंदना (हरि गीतिका छंद)

गणेश वंदना (हरि गीतिका छंद)

हे गजानन, चढ़ मूषक वाहन, गृह आप मेरे पधारिए।
प्रारंभ किया जो काज मैंने,आप उसको संवारिए आशीष देकर संवारिए।।
आये यदि कोई विघ्न तो,प्रभु आप उसको टालिए।
बिगड़े जब कोई बात तो,प्रभु आप उसको संभालिए।।

आपके चरणों में प्राणि,जब झुकाता माथ है।
आशीष हेतु आपका उठता सदा ही हाथ है।
आप ही शुभ काज करते,आप दीनानाथ हैं।
जिनका न कोई साथ देता,आप उनके साथ है।

आपके पग को पकड़ हम,विनती करते आज हैं।
मुख से जो हम बोलते हैं,यह हृदय की आवाज है।।
आपके ही हाथ में अब, भगवन् हमारी लाज है।
आपसे न है हमारा,छुपा हुआ कोई राज है।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, June 28, 2024

अनुराग (सवैया)

अनुराग (सवैया)

जो मन में अनुराग धरो तुम, 
                 चाहत जो तुमको वह पाओ।
जो मन चाह रहा उसको अब, 
                 पाकर संग खुशी अपनाओ।।
रे मन मौज करो न अभी तुम, 
                 जाकर आज यही समझाओ।
जाग अभी तुम ऐ मन मूरख,
                 सोबत हो अब नींद भगाओ।।

जीवन का सब आस यहाँ पर,
                   पूरण हो तुम जोर लगा लो।
काम करो अपने मन माफिक,
               लेकिन आज नहीं यह टालो।।
के विधि से यह काज बना नहिं,
              आज जिया तुम आन बसा लो।
जो बिगड़े अब काज यहाँ पर,
               धैर्य धरो उसको सुलझा लो।।

जो मन ने तुमको समझा यह, 
                     बात वही सच है यह जानो।
उद्यम जो करते जुगती कर,
                   सिद्ध करें सब कारज जानो।।
सोच मनोरथ पूर्ण करे वह, 
                       साधन तो उसने यह मानो।
ध्यान रहे जिसके मन में यह, 
                       ले अनुराग लगा यह मानो।।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, June 15, 2024

रहने दो न पापा ( लघुकथा)

रहने दो ना पापा (लघुकथा)

सुनिए जी मिनी की शादी मैंने उतरा दीदी के जेठ के बेटे से पक्की कर ली है । कामिनी ने उल्लसित स्वर में खुश होते हुए रघुवीर से कहा । उनलोग बहुत खुश हैं ।उन्होंने कहा है मुझे परिवार के रूप में आप सभी बहुत पसंद हैं । विषेश रूप से मिनी बिटिया.......
तुमने बगैर मुझसे पूछे यह रिश्ता क्यों तय कर लिया ? इतना आवश्यक तो नहीं था कि उस शराबी से मेरी बेटी का रिश्ता पक्का कर लिया। वह तो मेरी मासुम मिनी बिटिया से बिल्कुल अलग विचार का है ।क्या पता कैसा बुरा व्यवहार करेगा मेरी लाडली के साथ। रघुवीर ने सहमते हुए कहा।
कोई बात नहीं पापा! अपने कमरे से निकलते हुए मिनी ने कहा -शराबी है तो क्या हुआ मांँ की तरह मैं भी झेल लूंगी उसका गुस्सा-अत्याचार,अपमान-अवहेलना, दुत्कार-फटकार ।आपकी तरह नशे में द्यूत होकर गालियाँ देगा ,मारेगा, पिटेगा।पैसे-गहने छीन लेगा बस यही न।मेरा जीवन नर्क हो जाएगा तो तुम मुझे देखकर दुखी रहना।जैसे नाना -नानी माँ को देखकर.......
रघुवीर सकते की हालत में खड़ा रह गया। अपनी पत्नी की जगह बिटिया के दुखी जीवन की कल्पना मात्र से.......
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, June 5, 2024

धरती कहे पुकार



धरती कहे पुकार 

  देख लो तुम
यह रेगिस्तान में,
   भरा है रेत।

     बन रहे हैं
देखो ऐसे ही अब
    हमारे खेत।

    दूर-सुदूर
दिख रहा है यहाँ
  एक ही पेड़।

    तुम मानव ,
ने बर्वाद है किया
   है हमें छेड़।

    अगर तुम 
एक-एक पेड़ भी
   यहाँ लागते।

   बसुंधरा के
आंचल में कुछेक 
  पेड़ सजाते।

  स्वच्छ रहता
पर्यावरण यहाँ
  हम हँसते।

   सूखता नहीं 
नल कूप,न पानी
   को तरसते 

सुजाता प्रिय समृद्धि