Wednesday, August 5, 2026

दिल एक मंदिर (लघुकथा)

दिल एक मंदिर ( लघुकथा)

मंगलवार का दिन....
साँझ को दुर्गा माता और हनुमानजी  के मंदिर में दीया भी जलाना है और प्रसाद भी.......
 दमयन्ती अपनी बेटी सुकन्या  के साथ मंदिर के पास वाले दुकान से नारियल- चुनरी, बतासे- लड्डू ,माला इत्यादि लेने बढ़ी तभी- "ले लो माई जी ! घर में काम आने वाले सामान, कम कीमत लगा दूँगी..।"
दोनों अनसुनी करती ......।
"कुछ तो ले लो माँ जी!" उसके साथ बैठी छोटी बच्ची ने दीन भाव से .....l
माँ ने दया भाव  से पूछा-"क्या-क्या रखी है आंय  ...?"
प्लेट,कटोरी,चम्मच एहि सब.......
"प्लेट दिखा तो कैसा है ?"
 वह टोकरी से सामान निकाल........
उसकी गोदी से बच्चे के रोने.........
वह उसे पुचकार कर चुप कराती हुई आँचल से.......।
"कितने दिन का है.?"
 चार दिन बाद महीना लगेगा माँ जी.."
 "इसका बाप ....?"
"दिहाड़ी मजदूर है माँ जी!....पेड़ काटते वक्त गिर पड़ा सो हाथ टूट गया.."
"बर्तन बेचकर कितना कमा......"
"बर्तन पर दो रुपया बचता है. पचास भी बिक जाए तो......"
दमयन्ती ने प्रसाद के पैसे उसकी ओर बढ़ा दिए-"जा कुछ लेकर तुम और बेटी खा ले और बचे हुए पैसे से बच्चे के  लिये दूध.....l"
फिर प्रसाद के सारे पैसे भी ........
"जा इसके बाप का इलाज.....
उसने मंदिर में प्रवेश कर दुर्गा माता और हनुमानजी को प्रणाम किया और घर की ओर........
उसे उस बच्ची के चेहरे में दुर्गा माता, और बच्चे के चेहरे में हनुमानजी की छवि दिख रही थी। और अपना दिल............।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

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