Tuesday, March 9, 2021

राधा संग कृष्ण मुरारी



राधा संग कृष्ण-मुरारी, 
                  बैठे हैं मधुवन में।
यह दृश्य बड़ा मन हारी,
               लगता है नयनन में।

ऋतुराज ने ली अंगड़ाई,
           प्रीत-मिलन रुत आई।
दिशा-दिशा वासंती छाई,
          चल रहा पवन पुरवाई।
झूमें फूल हैं क्यारी,
                भौंरों के गुंजन में।
राधा संग कृष्ण-मुरारी,
                 बैठे हैं मधुवन में।

वंशी की धुन भूल गए वे,
          बैठे सुध-बुद्ध  खोकर।
मोर छनन-छन नाच रहा है,
            मन मतवाला होकर।
खड़ी है गैया प्यारी, 
            मगन हो चितवन में।
राधा संग कृष्ण-मुरारी,
                बैठे हैं मधुवन में।

वो रे कन्हैया,रास रचैया,
         क्यों ना मुरली बजाते।
छेड़ तू अपनी तान मनोहर,
             क्यों ना हमें बुलाते।
मैं यहां खड़ी बनवारी,
                 अपने आंगन में।
राधा संग कृष्ण-मुरारी,
                   बैठे मधुवन में।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Sunday, March 7, 2021

नारी चेतना (महिला दिवस पर सभी नारियों को समर्पित)







आगत युग में नारियों को 
अपना रूप बदलना होगा।
अपने सुंदर मुखड़े पर ,
अलग मुखौटा रखना होगा।

जगह-जगह पर गिद्ध खड़े हैं,
नयन उठाकर देखो।
नोच -खसोट खाने को आतुर,
जिधर भी नजरें फेंको।
उनको मार भगाने हमको,
तुरंत सम्हालना होगा।

बहुत बनी हम सील-अहिल्या,
बनी द्रौपदी -सीता।
बहुत बनीं हम सुंदर-सुकोमल,
सुहृदया-सुपुनीता।
सती अनुसुइया के पथ पर,
अब हमको चलना होगा।

इस मुखड़े पर दृढ़ता के ,
छलकाने होंगे पानी।
हम वीरांगना बनकर रच दें,
वीरता की अलग कहानी।
रणचंडी बन असुरों को,
तुरंत कुचलना होगा।
 
  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      रांची, झारखण्ड
    स्वरचित, मौलिक

बचपन की होली



          रंगीन स्मरण

एक बार छुटपन में मैं होली  में नानीघर में थी। क्योंकि मेरे मामाजी की शादी कुछ ही दिन पहले हुई। नई नवेली मामी घर में थी । इसलिए नानी ने हमलोग को होली में रोक लिया था। हम बच्चों के लिए मस्ती का दिन था। मौसेरी, ममेरी बहनों तथा नयी मामी की छोटी बहन जिन्हें मामी ने रोक लिया था।वह भी हमारी ही उम्र की थी ,के साथ जमकर खेलना और घूमना-फिरना हो रहा था। होली के दो-चार दिन पहले से हमलोग होली खेल रहे थे। होली के दिन तो खुब रंग उढ़ेली एक दूसरे पर।
सामने बाले मामा के दरवाजे पर छोटा-सा हौज था जिसमें थोड़ा सा पानी  था।वो मामा ने मामी की बहन से कहा इसी पानी में नहा लिजिए। लेकिन शरारत में उन्होंने चुपके से उसमें रंग डाल दिया ‌। जब वह नहाई तो पूरी रंगीन हो गई थी।उनका रंग हमें भी माया और मैं और मेरी अन्य बहनें आव देखा ,न ताव झट-झट हौज मैं कुद-कुदकर डुबकी लगा ली।अब   हमारे फ्राक सहित हम सभी हरी-हरी दिख रही थीं।
घर से निकलते हुए मेरे मामा की नजर जब अपनी शाली पर पड़ी तो वे खूब मजे ले लेकर हंसे। और जब हमारी मां-मौसी की नजरें हम सभी पर पड़ी तो क्षणिक गुस्से से ज्यादा हंस-हंसकर लोट-पोट हो गई। फिर पूरे मुहल्ले के लिए हम हंसी के पात्र हो गये। रंग इतना चोखा था कि हमारा रंग उगरने में पूरा सप्ताह लग गया। मामा की रंगीन शाली तो पहले चली गई।  एक-दो दिन में हमारा रंग कुछ फीका पड़ा तो हम भी चल दिए हमारे घर लौटने पर सभी जगह बस हमारी ही परिचर्चा होती। सभी खूब हंसते और उस रंगीन स्मरण में भी जी भरकर हंसती हूं ‌❤️❤️😀😀🙏🙏

                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, March 5, 2021

ओस की बूंद



ओ अनोखी बूंद चमकती ओस की,
पौधे को पियुष पिलाती रात को।
फुहार बनकर हो बरसती फूल पर,
क्यों नहाती पेड़ के हर पात को।

तुम टपककर मोतियों का रूप ले,
दूव कणियों में लरिया बनाती हो।
निकलती सुबह की सुनहरी धूप जब,
कांच-टुकड़े सम झिलमिलाती हो।

चमचमाती तारकों- सी घास पर,
सप्त ऋषियों की तरह घेरा बनाती।
जगमगाती जुगनुओं-सी डाल पर,
धूप से घबरा सदा ही भाग जाती।

दीप-सी जलती सुबह मुंडेर पर,
बड़े सबेरे तुम दीवाली है मनाती।
तेल बनकर हो ढलकती दीप में,
अदृश्य बाती डाल इसमें हो जलाती।

क्या किसी के अस्क की तुम बुंद हो,
गिरती द्रवित होकर हृदय की वेदना।
या बुझाती तुम किसी की प्यास हो,
या जगाती सुषुप्त मन की चेतना।

जी चाहता,उंगलियों से तुझको बीन लूं,
पर किसी के हाथ तुम आती नहीं।
जल के धरती, क्यों तू नन्हा रूप यह,
क्यों तुम अपना राज बतलाती नहीं।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               रांची, झारखण्ड
              स्वरचित, मौलिक

Wednesday, March 3, 2021

कलम



बड़े काम की चीज कलम है,
मत इसका अपमान करो।
महाशक्ति प्रदान है करती,
जननी-सा सम्मान करो।

इसकी महिमा हर युग में थी,
कोई काल अपवाद नहीं।
इसकी गरिमा सदा रही है,
जन्म हुआ कब याद नहीं।
हर युग का इतिहास है रचती,
सदा ही इसपर शान करो।
महाशक्ति प्रदान..........

जग भर में जितने सस्त्र हैं,
सभी से यह ही है वरिष्ठ।
तलवार-कृपाण,छूरी-फरसा,
हर  धारदारों से बलिष्ठ।
बहुत बड़ा हथियार हमारा,
सदा इसपर अभिमान करो।
महाशक्ति प्रदान..............

ज्ञान का भण्डारण करती,
मषी अपना यह बहाकर।
सींचकर कागज की क्यारी,
कागज को यह सदा नहाकर।
सुंदर रचना इससे हम रचते,
हमसब इसका मान करो
महाशक्ति प्रदान.........
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Monday, March 1, 2021

होली गीत


 
 
चल आज सखी खेलें होली, मिल-जुलकर।
सब मिलकर आज खेलें होली मिल-जुलकर।

सद्भावों के पहनकर गहने।
प्रेम भाव का चुनर पहने।
मिल्लत की पहनकर चोली, मिल-जुलकर।
मिल-जुलकर आज..........

प्यार के रंग से भर पिचकारी।
सराबोर कर दुनिया सारी।
एकरूपता की बना टोली, मिल-जुलकर।
मिल-जुलकर आज..............

सुविचारों के गुलाल लगाएं।
सद्व्यवहार से गांव सजाएं।
बोल मधुर-मीठी बोली, मिल-जुलकर।
मिल-जुलकर आज...........

प्रीत से हो यह जग रंगीला।
भाव सुनहरा , नीला-पीला।
खुशियों से भर लें झोली, मिल-जुलकर।
मिल-जुलकर आज............

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित, मौलिक

पेटियां के पेड़ा ( लघुकथा मगही भाषा )



पांव लगियों चाचा!
खुश रह। तू सुदिनमा रे ?कने जा हीं भोरे- भोरे।
बघोर जा हिऐ । भौजी के लाबे लगी।
आज्हे घुरम्हीं कि?
 हां चचा!
ठिके है ।पुतुलबा के मैया के नैहरा से लेके हमहुं घुरबै संझिया तक।
सिउर से ने चचा।
हां रे! 
ठीके है चचा। एजै पेठिया भिजुन भेटैबै। फिनु सभे साथे चल अइबै।
अरे हां ठीके याद करैल्हीं ‌।पुतुलबा कहलकै ह पेठिया से पेड़ा लाबेले।
घुरे बेरी याद करैंहें ले लेबै।
सांझ के रामदीन चाचा चाची के लेके आउर सुदिनमा अपन भौजी के लेके डुमरी पेठिया पास पहुंचलथी तो दुनु जनानी के पीपर गाछ तर छोड़के पेड़ा लाबेले गेलथिन।
पेड़ा बड़ी महंगा रहै।तबो चाचा सेर भर पेड़ा लेलथिन तो सुदिनमों पांव भर लें लेलकै।
चाचा के सम्मान में सुदिनमा उनकर खोमचा लेबे लगलै। लेकिन चाचा के नागवार भुझैले।ऐसे नै सुदिनमा के हाथ में खोमचा देखके सब सोचै कि सुदिनमा पेड़ा किनलकै आउ रामदीन चाचा नै किनलथिन।
पेड़ा के खोमचा देख चाची के जी ललचाय लगलै । चाचा से कहलथिन थोड़े पेड़बा खिलाहो हमनी के।
चाचा पेड़ा निकलालथिन तो सुदिनमा मन मारके पेड़ा के ठोंगा जेबी में रख लेलकै आउर मुंह घुमा लेलकै काहे कि पाव भर में चार गो तो पेड़बे चढ़लै।
तब चाचा बड़प्पन में उहो दुनु एक गो पेड़ा लेलथिन।पेड़ा खैते देखके पहचान के चार आदमी अउर जुट गेलै।
लाजे चाचा उनको पेड़ा खिलैलथिन।
चाची रास्ता में समझैलथिन खोमचवा के झोलवा में रख लेहो ‌नै तो जे देखतै से मांगतै।
लेकिन इ बात चाचा के नै जचलै।एतना महंगा पेड़ा ले जैते सभे नै देखतै तो शान कैसे बढ़तै।
राह चलते धनपुरनी चाची भेटैलथिन तो हसके कहलथिन अकेले पेठिया के पेड़ा खा हखो।
इ नै कि एका गो बाल-बुतरु के दूं। चाचा पेड़ा निकाल के देबे लगलथिन तब तक आंगनबाड़ी के बुतरुन सब लुझ गेलै । चाचा केेकरा पेड़ा देथिन केकरा नै। चाचा पेड़ा देले जाथिन।सभे हाथ पसारे जाय।
चाची मने मन पितपिताय के अपन घर चल गेलथिन।
घर तक चाचा शान से खोमचा संभालले जाथिन। के जानै कि खोमचा में एको पेड़ा नै हकै ‌।सभे तो सोचै होतै चाचा सेर भर पेड़ा किनलथिन। घर घुसला पर पुतुलबा माय साथ पेड़ा के खोमचा देख खुश भेलै ।कि जानै खोमचा में एको पेड़ा नै है।
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  स्वरचित,मोलिक