Tuesday, November 19, 2019

परत हटाकर देखो

तेरे भीतर गुण की खान,
परत हटाकर देखो।
असीम शक्ति अथाह ग्यान,
पलक उठाकर देखो।

ऐ मानव तुम तो ईश्वर की,
रचना है सबसे सुंदर।
अकूत संपदा के तुम मालिक,
भंडार छिपा तेरे अंदर।
अपनी कीर्ति को पहचान,
परत हटाकर देखो।
पलक उठाकर देखो।

धरा पर ऐसा मनुष्य नहीं,
जिसमें कोई गुण न होता है।
गुणवानों में भी कुछ-ना
-कुछ तो अवगुण होता है।
रह मत इससे तू अनजान,
परत हटाकर देखो।
पलक उठाकर देखो।

अब सबसे जलना छोड़ो ,
मन से द्वेष हटा कर तू।
उपयोग करो अपने गुण का,
मन का क्लेश मिटाकर तू।
बन जाओगे बहुत महान,
परत हटाकर देखो।
पलक उठाकर देखो।

सुजाता प्रिय

Friday, November 15, 2019

तेरे आने की आहट (गजल)

हवा के झोंके में होती जो सरसराहट है।
यूं लगता है तेरे आने की यह आहट है।

चाँद को देख चाहत का मन लुभाता है,
ऐसा लगता है तेरे प्यार की मुस्कुराहट है ।

गुल खिलते हैं जब कभी भी गुलिस्ता में,
लगता है तेरी खुशी की खिलखिलाहट है।

भौंरे छेड़ते हैं  तान कभी बागों में मधुर,
कानों में गूंजे तेरी गीतों की गुनगुनाहट है।

जाड़े की नर्म धूप में तपन मिलती थोड़ी,
एहसासों में लगता तेरे साँसों की गरमाहट है।

जब पेड़ों पर विहग चहककर कलरव करते,
क्यूँ लगता है तेरी बातों की फुसफुसाहट है।

नजरें ढूंढती ब्याकुल हो हर तरफ तुझको,
तू कहीं पास हो या मेरे मन की आकुलाहट है।
                                सुजाता प्रिय

Tuesday, November 12, 2019

नेहरू चाचा (नेहरू चाचा के जन्म दिवस पर विशेष )

नये -नये गुब्बारे लेकर
आए नेहरू चाचा।
मैं नाची और गुड्डी नाची,
चुन्नु भैया नाचा।
नाच रहे गुब्बारे सारे,
रंगों की रंगोली।
कुछ गुब्बारे लुक-छिप
नभ में खेले आँख-मिचौनी।
गुब्बारे की शान निराली,
झूमे और इठलाये।
एक साथ सब थिरक रहे हैं
अपनी तोंद फुलाये।
वश में उनके कर रखी है
नाजुक पतली डोरी ।
भाग न जाए नीलगगन में
उड़कर चुपके-चोरी।
हरे-लाल और नीले-पीले,
है कोई चम्पइया।
जो मन भाए, जी बहलाये
सो तुम ले लो भैया ।
    सुजाता प्रिय

Monday, November 11, 2019

भगवान की विजय हुई

न राम की जय हुई,
न अयोध्या धाम की विजय हुई।
हम लड़ें नहीं फिर किस संग्राम की विजय हुई।
लाख
है विविधता,
फिर भी हममें है एकता।
हम एक थे,हम एक हैं,
हम एक ही
रहें सदा।
सौहार्द्र भाईचारे के ,
आयाम की विजय हुई।
हम जानते
हैं फूट से हैं ,
देश के टुकड़े हुए।
देश अलग लेकर भी हम,
हैं आज तक
लड़े हुए।
इतिहास ना दुहरायें, इस
पैगाम की विजय हुई।
राम ही
रहीम है,
कृष्ण ही करीम है।
एक ही माटी हमारी,
एक ही
जमीन है।
जो सबको है गढ़ता सदा,
उस भगवान की विजय हुई।
               सुजाता प्रिय
          

Friday, November 8, 2019

मौन भाषा

               भाषा तो
          बहुत है दुनियाँ में,
मौन भाषा की महिमा ही अलग।
               न अक्षर
           इसके ना मात्राएँ,
फिर भी इसकी गरिमा ही अलग।
                इसकी
         कोई आवाज नहीं,
बिन बोले सबकुछ कह जाती।
             इस भाषा
         के विशाल हृदय,
सबके फिकरे को सह जाती।
       .    बोली जाती
           न सुनी जाती,
न लिखी जाती न पढ़ी जाती।
              पर जाने
           इसके पन्नें पर,
कितनी बोलियाँ हैं गढ़ी जातीं।
              इस भाषा
         को हथियारों बना,
पराजित करते हम दुश्मन को।
            हम जीतते
           हैं संग्राम बड़े,
मिलतीे हैं खुशियाँ जीवन को।
             अम्मा के
          मौन इशारे से,
समझ जाते थे हम बात बहुत ।
            पिताजी के
         मौन नजरिये से,
हम पाते थे  सौगात  बहुत।
            पर मौन
       हमें उकसाती है,
कि सदा नहीं तुम मौन रहो।
            दुनियाँ
      बोले कड़बी बोली,
कुछ मीठी वाणी तुम भी कहो।
            जब मौन
      रहोगी हरदम तुम,
समझेगी दुनियाँ कमजोर तुझे।
            कुछ उल्टी
       -सीधी बात बना,
वह देगी सदा झकझोर तुझे।
          सुजाता प्रिय

Monday, November 4, 2019

जीवन के स्वप्न

स्वप्न
सुनहरे
जीवन के,
हो जाएँ साकार।
मानव को मानव
जन से,रहे सदा ही प्यार ।
ऊँच-
नीच का
भेद हमारा,
जड़ से ही मिट जाये।
छल-कपट -सा दुर्गुण ,
जग में,कभी न आने पाये।
सच्चाई
का स्वर्ण पताका ,
जग -भर में लहराए ।
झूठ , फरेब, मक्कारी,
जल के बुलबुले -सा ढह जाए।
शान-घमंड
विद्वेष-भावना,
कभी न आए पास।
सब पर सबको मोह
रहे, सबपर सबको विश्वास।
पर
हितकारी
कार्य में, तनिक
न हमको संशय हो।
सुख पहुँचाऊँ, सदा,
सभी को ,मन में दृढ़ निश्चय हो ।
              सुजाता प्रिय

Friday, November 1, 2019

सूर्यदेव से विनती

सात घोडें के स्वर्ण रथ पर।
आए सूर्यदेव सवार होकर।
कार्तिक  मास की  षष्ठी है।
कतार में खड़े वर्ती-कष्टी हैं
सूप में भरकर फल-पकवान।
दे रहे अर्ध्य लगाकर ध्यान।
सिर नवाकर कर रहे विनय।
हृदय तल से थोड़ा अनुनय।
हे सूर्यदेव है नमन आपको।
दूर करें जग के संताप को।
अंधा देखे और बहरा सूने।
लंगड़ा दौड़े अरध्य चढ़ाने।
गूंगा  में गाए तेरा कीर्तन।
लूला ताली दे मन भावन।
कोढ़ी को दो कंचन काया।
धरा के हर जीवों पर मा़या।
धन अपार दे हर निर्धन को।
सुनी गोद भर हर बांझन को।
हर नारी को दो अमर सुहाग।
हर पुरुष के मन में अनुराग।
हर बालक को विद्या का वर दे।
हर बाला को सम्मान से भर दे।ञ
                सुजाता प्रिय व