Saturday, April 4, 2026

एकता में बल

एकता में बल 

एक दिन एक शिकारी आया। 
जंगल में वह जाल बिछाया। 
उसके ऊपर वह दाना डाला। 
छिपकर बैठा बन रखवाला। 
कबूतरों का झुण्ड तब आया। 
दाने को देख कर ललचाया। 
कबूतरों का राजा तब बोला। 
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला। 
जंगल में अन्न कहाँ से आया। 
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे। 
लज्जा से उनके सिर झुके थे। 
कपोतराज ने फिर मुँह खोला। 
बड़े प्यार से उन सबको बोला। 
एक साथ चलो उड़ चलें हम। 
जाल को लेकर भाग चलें हम। 
मानकर कबूतर दादा की बात। 
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से। 
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।

2 comments:

  1. कहानी का शानदार काव्य रूपांतरण

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  2. कहानी का सधा हुआ काव्य रुपांतरण किया है आपने

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