Saturday, November 23, 2019

बिटिया जनने का जिम्मेदार कौन(कहानी)

व्यग्रता से चहलकदमी करती हुई लक्ष्मी कभी माँ के चेहरे को गौर से निहारती , कभी कुछ बोलने को आतुर हो उठती, कभी असमंजस का भाव लिए ठिठकती। फिर इधर-उधर देखने लगती। रह-रहकर उसकी आँखों में आँसू छलक आते। उसके मन में उठ रहे सवाल बार-बार उसे कुछ बोलने को उकसा रहे थे।लेकिन माँ के ममत्व भरे चेहरे को देख वह जुबान खोलने का साहस नहीं कर पा रही थी।उसे लगता माँ ने किन कठिन परिस्थितियों में कितनी कड़ी मेहनत कर तीनों बहनों को पाल-पोसकर बड़ी किया ।पढ़ाया लिखाया ।माँ का प्यार-दुलार दिया तो पिता का फर्ज भी निभाया।कभी किसी तरह की कमी नहीं महसूस होने दिया।
उसकी माँ कौशल्या भी मशीन पर कपड़े सिलतीे हुई उसकी व्याकुलता देख रही थी।वह समझ नहीं पा रही थी कि लक्ष्मी आज इतनी परेशान क्यों है। इस तरह तो वह उस दिन भी वेचैन नहीं हुई थी जब लड़के वालों ने उसे छाँट दिया था । वह भी सिर्फ यह कहते हुए कि उसके कोई भाई नहीं। क्या पता उसकी माँ की तरह उसे भी पुत्र न हो ।
क्या बात है बिटिया! तुम इतनी परेशान क्यों लग रही? माँ ने प्यार से पुचकारते हुए पूछा तो उसकी आँखों के छलकते आँसू आँखों के बाँध तोड़ बाहर बह निकले।रुंधे गले से माँ से पूछा - माँ हम तीनों बहनें आप के लिए बोझ बन गईं।
नहीं मेरी प्यारी लाडली! यह कैसी बहकी- बहकी बातें कर रही है री तू आज।
हाँ माँ शर्मा दादी कह रही थी कि आपने हम तीनों बहनों को पाकर संतोष तो कर लिया ,पर हमारे कारण ही आपका जीवन खराब हो गया।हमारा बोझ आपको ढोना पड़ रहा है। हमारे कारण ही समाज के लोग आपको हेय दृष्टि से देखते हैं।हमारे कारण ही आपको लोगों द्वारा आपमान और अवहेलना झेलना पड़ता है।
मैं यह भी देखती आई हूँ कि पास-पड़ोस और परिवार में कोई मांगलिक कार्य होता है तो स्त्रियाँ आपका तिरस्कार करती हुई काना-फुसी करती हैं कि इसे बेटा नहीं इसलिए इससे विध - विधान न करबाना चाहिए।
जाने दे बेटी! माँ ने  उसे अपने गले लगाते हुए कहा - हम जमाने की सोंच तो नहीं बदल सकते।कौशिल्या के मन में लक्ष्मी के  जनम के समय की सारी बातें चलचित्र की भाँति घुमने लगी। जब उसका जन्म हुआ तो उसके सभी परिवारवाले खुश थे लेकिन पास-पडोस के लोग सहानुभूति पूर्वक समझाते क्या करोगी भगवान ने जो करम में लिखा वही होगा । कोई अपने मन से सांत्वना देती हुई कहती।बेटी भी क्या बुरी है ।आजकल तो बेटियाँ हवाई जहाज उड़ा रही हैं। कोई मुँह बनाती हुई कहती - क्या बात है लक्ष्मी आई है ।तो कोई तुरंत उसकी बातों का खण्डन करती हुई कहती बेटी जनम लेते ही माँ -बाप को कंगाल बना देती है ।किसे ने उसेे टोक कर कहा कमर कस लो बहू रानी ! बिटिया के विवाह में सारे गहने छिन जाएँगे। लेकिन घर के सभी लोग सचमुच उसे लक्ष्मी समझते और लक्ष्मी पुकारते।

इधर लक्ष्मी के जेहन में भी कुछ दिन पूर्व की घटना याद आ रही थी।उस दिन जब वह कॉलेज से घर आई तो माँ किसी पुरुष को तिरस्कार भरे लहजे में बोल रही थी।
कौशल्या,कैकेयी तो ले आये।अब सुमित्रा भी ले आ।शायद उससे बेटा हो जाए।तुम पुरुष यही तो नहीं समझ पाते कि बेटे या बेटी पैदा करना स्त्रियों के वश की बात नहीं ।इसके लिए तो बस पुरुष ही जिम्मेवार है । स्त्री को तो प्राकृति ने एक ही क्रोमोजोन दिया ।पर तुम्हें तो दोनों क्रोमोजोन्स मिले । फिर क्यों बेटे नहीं पैदा कर लिए?तुम तीन बेटियों से घबरा गए और उन्हें बेसहारा छोड़कर भाग गए।तो लो अब चार बेटियाँ गले पड़ गयी ।अब किस- किस से पिण्ड छुड़ाओगे ? बेटी को जनमाना तुम अभिशाप समझते हो ।अगर बेटियाँ नहीं रहेंगी तो पुरुष किस से विवाह करेगा ? अगर बेटियाँ नहीं रहेंगी तो पुरुषों का जनम कैसे होगा? सृष्टि कैसे होगी?
माँ एक बात पूछूँ? लक्ष्मी ने उन बातें को याद करते हुए   संकुचित भाव से पूछा।
हाँ बेटी ! पूछ ना ।जो पूछना है ।अब तुमलोग बड़ी हो गयी  ।दुनियादारी समझती है ।इसलिए सारी बातें जाननी चाहिए तुम्हें।
माँ वह व्यक्ति कौन था जिससे उस दिन तुम्हारी बहस हो रही थी।
वह तुम्हारे पिता थे बेटी! माँ ने जैसे किसी राज पर से पर्दा हटाते हुए कहा।
पिताजी! लक्ष्मी ने आश्चर्य जनक लहजे में पूछा।सरस्वती और पार्वती भी उनकी बातें सुनकर वहाँ आ गईं । वे आवाक हो माँ को देख रहीं थी।
लेकिन तुमने तो कहा था कि-
तेरे पिताजी गुम हो गए।कौशल्या ने उसके वाक्य को पूरा किया।फिर उन्हें बताने लगी_ पहली बेटी होने से परिवार के लोग बहुत खुश थे। लेकिन दूसरी बेटी हो जाने पर तुम्हारे पिताजी और परिवार के सभी लोग औरों की तरह मुझे ही कोसने लगे कि मैं सिर्फ बेटियाँ ही जनमती हूँ।
जब पार्वती पेट में थी तो तुम्हारे पिताजी अपने परिवार वालों से मिलकर अल्ट्रासाउण्ड द्वारा भ्रुण की जाँच करवाना चाहते कि मेरा गर्भस्थ शिशु लड़का है या लड़की। मैं इसके लिए तैयार नहीं हुई।क्योंकि मैं जानती थी कि भ्रुण बिटिया का हुआ तो वे मुझे गर्भपात करने को मजबूर कर देंगे ।उसके बाद से शुरु हुआ मुझपर जुल्म- सितम का सिलसिला।आये दिन बात -बात पर मेरे साथ मार -पिट होने लगा। हर लोग मेरा तिरस्कार  करने लगे।उसी तरह प्रताड़ित होते हुए मैने पार्वती को जन्म दिया। परिवार और समाज के लोगों ने मुझे बहुत बुरा-भला कहा तथा तुम्हारे पिताजी को भी हतोत्साहित किया।शायद इसी कारण वे किसी काम से बाजार गये तो वापस नहीं लौटे।हमलोगों ने उन्हें बहुत ढुंढा-ढुंढबाया पर वे नहीं मिले।
इधर घर के लोग भी मुझपर कहर बरपाने लगे। उनकी प्रताड़ना से उबकर मैं मायके चली गई। लेकिन मायके वाले भी ज्यादा दिन हम चारो का बोझ नहीं उठा पाये।हारकर मैने अपने लिए अलग ऱास्ता चुन लिया।सिलाई-बुनाई कर मैने अपना और तुम तीनों का पेट पालने लगी।
उस दिन अचानक तुम्हारे पिताजी इस रास्ते से गुजर रहे थे तो मुझे देख रुक गये और अत्यंत दुखी हो बताने लगे कि हमारी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़कर वे दूसरे शहर जाकर कारोबार करने लगे।फिर कैकेयी नाम की युवती से विवाह कर लिया । अब उससे भी उनकी चार बेटियाँ हैं। अब वे उसे कोस रहे थे कि उसने भी सिर्फ बेटियाँ ही.........
लक्ष्मी  सरस्वती और पार्वती बड़े गर्व और आत्मीयता से अपनी माँ को देख रही थी।और सोंच रही थीं - सचमुच बेटी जनने के लिए जिम्मेवार कौन?
                          सुजाता प्रिय

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