Sunday, March 28, 2021

रंगों का त्योहार आया



रंगों का त्योहार आया, 
रंगों का त्योहार।
दिखता है रंग-बिरंगा 
देखो सारा संसार।
रंगों का त्योहार आया...............

रंग लाल में मिलकर पीला, 
नारंगी रंग बनाया।
पीले में मिलकर नीला,
 हरियाली है फैलाया।
हम भी आपस में मिलकर
 करें प्यारा रंग तैयार।
रंगों का त्योहार आया...........

हम सब हाथों में रंग ले,
जन को रंगीन बनाएं।
सबसे अच्छा है हम सबको 
प्यार का रंग लगाएं।
सद्व्यवहारों से रंग दें,
हम सारा संसार।
रंगों का त्यौहार आया............. 
   
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, March 27, 2021

नारी नहीं बेचारी



नारी है नहीं बेचारी,ना समझो हमें लाचारी ‌
 सुख की हैं अधिकारी,ना समझो हमको भारी।

जन्म लेते मत फेंको हमको,हमें भी हक जीने का।
हमको भी तुम दूध पिलाओ,जहर नहीं पीने का।
समानता की अधिकारी,ना समझो हमें लाचारी।

नारी ने नर को जन्म दिया है, नारी ने है पाला।
नारी का सम्मान न करते,ना बनते हो रखवाला।
क्यों लगती तुझको भारी,ना समझो हमें लाचारी।

नारी है ममता की मूरत और नारी ही है माया‌‌
नारी ने निर्माण किया है,वीर पुरुष की काया।
नारी ही है मां प्यारी,ना समझो हमें लाचारी।

नारी घरनी, नारी भरनी, नारी है दुःख हरनी।
नारी जग की अनमोल रतन, नारी है सुख करनी।
तुम पर हैं बलिहारी ,  ना समझो हमें लाचारी।

नारी की महिमा का कोई,पार नहीं पा सकता।
बिन नारी के कोई नर,आधार नहीं पा सकता।
ईश्वर की हैं रचना प्यारी,ना समझो हमें लाचारी।

हर जगह पुरुषों से नारी,कदम बढ़ाकर चलती।
दुख-परेशानी-बाधाओं को,पीछे छोड़ निकलती।
ना हारी थी,ना है हारी,ना समझो हमें लाचारी।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Friday, March 26, 2021

पुरुषार्थी बनता है पुरुषोत्तम



जिसमें है पुरुषार्थ अनुपम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

जिसके बाहु में रक्षा का बल हो।
सुरक्षा करने की इच्छा प्रबल हो‌।
जिसके विचार सदा हो उत्तम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

दया निर्बल पर जिसके मन में।
मेहनत की ताकत हो तन में।
अच्छा-भला का हो संगम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

कभी न मन में कोई छल हो।
नयनों में माया का जल हो।
विवेक-बुद्धि कभी न हो कम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

ईर्ष्या-द्वेष और क्रोध नहीं हो।
शान-घमंड का बोध नहीं हो।
आगे बढ़ता हो जो  हरदम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

जो संकट में हार न मानें।
कर्म को अपने हाथ न माने।
कर्मवीर बन करता है उद्धम।
वह बन जाता है पुरुषोत्तम।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित, मौलिक

Thursday, March 25, 2021

होली के रंग (लघुकथा )



होली में अब चार दिन शेष हैं। लेकिन इस बार मुहल्ले में वह उल्लास नहीं जो विगत वर्षों में हुआ करता था। जिसका खास वजह कोरोना काल था।
उससे भी खास वजह
पिछली होली में स्मृति भाभी को रंग लगाने के कारण हुई प्रतिक्रिया थी।
नई नवेली स्मृति भाभी के गालों पर मुहल्ले के लड़के-लड़कियों ने इतना रंग लगाया था कि उनके चेहरे की चमड़ी पर जलन होने लगा और बड़े-बड़े फसलें पड़ गये‌। महीने भर चिकित्सा कराने के बाद घाव ठीक हुआ। कमला चाची ने गुस्से में कहा दिया। कितना घटिया रंग लगाया मेरी बहू को ? अब तुम लोग इसे रंग लगाने मत आना।उस दिन से सभी चाची से नजरें चुराने लगी थी।
आज चाची अचानक मिल गई और बोली तुम लोगों को स्मृति ने बुलाया है।
सभी सहेलियां सशंकित हो उठी। पता नहीं क्या बबाल खड़ा हो जाए। लेकिन चाची ने कहा था इसलिए भाभी से मिलने गयीं।
उनमें से एक ने भाभी को नमस्ते करते हुए कहा-पिछली होली में हमने भाभी को बहुत परेशान किया था। इसलिए भाभी नाराज हैं।
स्मृति भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा-अरे ऐसी बात नहीं, मैं नाराज क्यों रहुंगी।आपलोग ने जान-बूझकर ऐसा थोड़े ना किया था।वह तो बाजार के रंग ही घटिया किस्म के थे। इस बार हम प्राकृतिक रंगों से होली खेलेंगी।आप सभी जरूर आइएगा।एक दिन तो मिलने-खेलने का इतना सुनहरा अवसर मिलता है।
फिर क्या था , भाभी के बताए नियमों से सभी ने होली के लिए प्राकृतिक रंग तैयार किये।
पलाश के फूलों को पीसकर उसका रस निचोड़कर लाल रंग बने।पालक अथवा सेम की पत्तियों को पीसकर हरा, चुकंदर के रस से गुलाबी,गेंदे के फूलों तथा हल्दी से पीला, और इन मुख्य रंगों के मिश्रण से नीला, नारंगी और बैंगनी।
स्म‌ति भाभी के संग सभी सखियों ने एक दूसरे के गालों में खूब रंग लगाया।
न किसी को कोई नुक़सान।
इन्हें छुड़ाना भी है आसान।
सभी ने खूब मस्ती किए।
बुरा न मानो होली है।
जोगिरा सा रा रा रा रा रा रा रा रा
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Wednesday, March 24, 2021

शहीदों को नमन


हे शहीद वीर भारत के जन।
मुझको शत शत बार नमन।

तुझसे ही देश महान बना।
 है तेजस गौरववान बना।

तुमने ही इसे संवारा है।
इसका रूप निखारा है।

बेड़ियां इसकी तोड़ी तुमने।
कांटी है बंधन डोरी तुमने ‌।

तुम इसका रखवाला है।
इसपर तू मरने वाला है।

लोहु से धरती कर लाल।
किया उन्नत जंग में भाल।

प्राणों को कर न्योछावर।
जीवन दाता तूं हुए अमर।

अपने सिर पर बांध कफ़न।
कलि का रावण किया हनन।

खुशबू से है भर दिया चमन।
वीरों तुझको शत बार नमन।
 
    सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित, मौलिक

आज का फैशन



जो कल गरीबी का पर्याय था,
                  आज वही है फैशन।
जिसे पहनने में हीन भाव था,
            वे आज कहते नो मेंशन।

फटे-चिटे परिधान है बिकते,
                दुकानों में खुले आम।
रंग-उड़े धब्बेदार कपड़ों के,
                      होते हैं ऊंचे दाम।

चिथड़े तन पर डाल सेठ भी,
                  चलते हैं सीना तान।
आज चिथड़ा बन गया है देखो,
                  अमीरी की पहचान।

इसे पहन आज हैं लोग, 
                  फैशनेबल कहलाते।
भिखारियों-सा वेश पहन हैं,
                 मन-ही- मन इतराते।

आर्थिक गरीबी की इलाज है, 
                  गरीबों को देना दान।
मानसिक गरीबी लाइलाज है,
                      बात मेरी तू मान।

व्यर्थ ही अपना खून सुखाते,
                   देख वसन बदहाल।
जो जन ऐसे वसन पहनते,
               उनको न कोई मलाल।
             
              सुजाता प्रिय 'सम‌द्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Saturday, March 20, 2021

नमन वीरांगना पन्ना धाय



राजभक्तिन तुझसा नहीं कोई,
             हे मां वीरांगना पन्ना धाय।
अपने पुत को बलि चढ़ाकर,
          राजकुंवर को लिया बचाय।
तुम पद्मिनियों से भी बढ़कर,
        जला मरी जो जौहर-ज्वाला।
मीरा से भी तू बढ़कर हो,
    भक्ति में पी गई विष का प्याला।
षड्यंत्रों से घिरा हुआ था,
           राजकिला चितौड़ गढ़ का‌।
अभी बालक था भावी राजा,
            उदय सिंह चितौड़गढ़ का।
पिता का हत्यारा चचेरा चाचा,
           उसे मार गिराने को उद्धत।
राज माता ने पन्ना धाय से,
              बोल उठी हों नतमस्तक।
इसे बचाना तुम हे पन्ना,
               धाय नहीं तुम माता हो।
इसको अपना दूध पिलाया,
                इसके जीवन दाता हो।
विक्रमादित्य का वंश मिटाने,
            आया वनवीर उसे मारने।
पन्ना उदय की हत्या को,
                   सोंच रही थी टालने।
झूठे पत्तलों की टोकरी में,
     रख भगा दिया सेवक के साथ।
पुत्र चंदन को सुला पलंग पर,
              मुंह दिया चादर से ढाप।
धोखे में वनवीर ने उसके,
         टुकड़े -टुकड़े कर मार दिया।
राज पता न चले वनवीर को,
              पन्ना ने आंसू टाल दिया।
मृत बेटे का मस्तक चुमकर,
           कुंवर को बचाने दौड़ पड़ी।
कर्तव्य परायण देवी तूने,
         लाश भी बेटे की छोड़ चली।
किस तरह पत्थर किया कलेजा,
               बलि दे अपने लाल को।
पुत्र शोणित से सींच बचाया,
                  राजवंश के भाल को।
हे वीरांगना मां भारत की,
                 तुमको बारम्बार नमन।
स्वामी भक्ति पर बलि चढ़ाई,
              तुझे हृदय से अभिनंदन।

                    स्वरचित, मौलिक
                  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                     रांची, झारखण्ड