Monday, December 21, 2020

मानवाधिकार का अर्थ



नित्य की भांति आज भी अनुपमा विद्यालय जाने के लिए पव्लिक बस में बैठी थी।आज विद्यालय में मानवाधिकार के अर्थ पर परिचर्चा थी। वह सोंच रही थी क्या बोलूंगी? तभी एक महिला अपने तीन बच्चों को साथ लिए बस में सवार हुई।कण्डकटर ने एक सीट पर उसे यह कहकर बैठने के लिए कहा कि कुछ ही देर में साथ वाली सीट खाली हो जाएगी फिर वहां बच्चों को बैठा लेना। वह एक बच्चे को गोद में लेकर और दो बच्चों को अपने आगे खड़ा कर बैठ गई। उसके साथ वाली सीट पर बैठे व्यक्ति को शायद बच्चे को खड़ा देख कर दया आ गई। उसने दोनों में से छोटे बच्चे को उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया।तभी वह व्यक्ति जो पहले महिला वाली सीट पर बैठा था आया और महिला से कहा- यह सीट छोड़ कर उठ जाओ यह मेरी सीट है।
महिला ने कहा -यह आपकी सीट कैसे हुई मैंने इस सीट का किराया दिया है और मुझे कण्डक्टर ने यहां बैठाया है।
तभी कण्डक्टर ने आकर कहा- हां यह सीट इन्हीं की है। ये पहले से यहां बैठे हुए थे।
लेकिन आपने तो कहा कि यह सीट खाली । महिला ने गुस्से से कहा।
हां कहा था पर जब ये उतरे तो इनका विचार हुआ कि ये अगले शहर तक जाएं। इसीलिए चले आए।पहले से बैठे थे तो सीट इन्हीं का न है।
महिला ने खीजते हुए उठकर कहा -ठीक है मेरे पैसे वापस करिए। मैं दूसरी बस से चली जाउंगी।
पैसे क्यो वापस करुं ? आप एक ओर खड़ी रहिए जब सीट खाली होगी बैठ जाइएगा। आपने बस का किराया दिया है तो बस में सफर करना आपका मानवाधिकार है। ये सीट पर पहले से बैठे थे तो वहां बैठना उनका मानवाधिकार है।कण्डकर ने उसे रोकते हुए कहा।
अचानक उस महिला के बगल वाली सीट पर बैठा पुरुष उठ खड़ा हुआ और बिफरते हुए कहा- क्या मानवाधिकार की बात करते हो। मानवाधिकार का अर्थ समझ में आता है तुम्हें?एक तो तुमने एक सीट खाली देकर दो सीटों के किराए ले लिए। दूसरे उतरे हुए यात्री को फिर से बैठाने के लिए इस महिला को उठा रहे हो।क्या यही मानवाधिकार है। ये भाई साहब जहां तक का किराया दिए थे बस वहीं तक बैठना उनका अधिकार था।
और मैं अपनी सीट को छोड़ रहा हूं क्योंकि तुमने इनसे इस सीट का किराया ले लिया है।अब इस सीट पर भी इन्हीं का अधिकार है।
आप क्यों परेशान हो रहे भैया!कण्डक्टर ने मनुहार करते हुए कहा।
उस व्यक्ति ने उसे सचेत करते हुए कहा- मानवाधिकार का अर्थ किसी मानव को छलना,ठगना और वेवकूफ बनाना और सिर्फ अपना अधिकार लेना ही नहीं होता।
'मानवाधिकार का अर्थ एक मानव द्वारा दूसरे मानव को उसके अधिकारों की जानकारी देना, उसके अधिकार की सुरक्षा देना, और उसके अधिकारों को सुनिश्चित कर उसके अधिकारों को उपलब्ध कराना भी है ।'
कण्डक्टर ग्लानि से सिर नीचे कर लिया ।
अौर अनुपमा को परिचर्चा के लिए मानवाधिकार का अर्थ समझ में आ गया।
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                  स्वरचित , मौलिक

Sunday, December 20, 2020

गज़ल



अपने मन में प्यार पालकर देखो।
एक नजर मुझपर डालकर दैखो।

माना, मैं कोई  हूर की परी ना हूँ,
अपने रूप को खंगालकर देखो।

बहकावे  में कतराओ ना  मुझसे,
दिल में मुझको संभालकर देखो।

मैं बुरी लगती हूँ महफिल में  तुझे,
दिल में मेरा अक्श डालकर देखो।

क्यूँ  इतराते हो खुद पर मीत मेरे,
मन में जरा यह सवाल कर देखो।

तुझसे मेरी बस यही गुजारिश है,
मेरे साथ खुद को ढाल कर देखो।

नजरिया बदल ले जरा नजरों की ,
'प्रिय' तुम  यह  कमाल कर देखो।

      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
         स्वरचित मौलिक

Tuesday, December 15, 2020

सीता-हरण की पटकथा (रौद्र रस)



एक लड़की कागज कलम ले,
                  रास्ते में जा रही थी।
लिखने कागज पर कलम से,
                भूमिका बना रही थी।
लिखने मिला था वर्ग में, 
           सीता-हरण की पटकथा।
सोंच रही थी कैसे लिखुंगी,
                 नारी की अन्तर्व्यथा‌।
अनायास उसको एक लड़का,
                बाजुओं में भर लिया।
बंदूक दिखाकर उसको बोला,
             हमने तुझको हर लिया।
बोला- कि तुम न चीखना,
            चुप मेरे संग चलती रहो।
मार दूंगा जान से ,
              इंकार में कुछ ना कहो।
सिर झुका कर चल पड़ी वह                                     
             उसकी बताई राह पर। 
छोकरा तब मुस्कुराया,
            उसकी झुकी निगाह पर।
कुछ दूर जा वह मुक लड़की,
                   घूम कर पीछे मुड़ी।
नागिन सी फुफकार कर,
          उसपर अचानक टुट पड़ी।
प्रहार वह करने लगी,
                पकड़ मुट्ठी में कलम।
चेहरे को उसके गोदने,
                  लगी वह हो बेरहम।
पलट हमले से पराजित,
           लड़के ने खोया होश तब।
गिरा धरा पर बंदूक तो,
         ठंडा  पड़ा कुछ जोश अब।
खोल सैण्डल सिर पर उसके,
                  चोट वह करने लगी।
अपने हरने वाले का अब,
                  प्राण वह हरने लगी।
नाखुनों  से नोच डाले,
                      मनचले के चेहरे।
पीटने का प्रमाण देकर,
                   मुंह में लगाईं मुहरें।
कागज पर उसके लहु के,
                छींटें भी कुछ थे पड़े।
नारी के अपमान के,
         स्वाभिमान बनकर थे खड़े।
इस तरह उसने लिखे,
            सीता-हरण की पटकथा।
मन में कुछ संतोष पाया,
             मिट गयी मन की व्यथा।

               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Sunday, December 13, 2020

गज़ल (देखकर मुस्कुराते गये)



        

देखकर  मुस्कुराते  गये।
मुझको दिल में बसाते गये।

तिरछी नजरों से देखकर,
मुझको थोड़ा लुभाते गये।

मुझको पाने की ले आरजू ,
दिल अपना लुटाते गये।

दिल की दीवानगी में मुझे,
अब तक भरमाते गये।

सुलगा प्यार की आग में,
तीर हमपर  चलाते गये।

चोट दिल पर पहले दिया,
फिर मरहम लगाते गये।

जख्म गहरा दिया है मुझे,
दे दवा फिर सुखाते गये।

संग-संग जीने की 'प्रिय',
कसमें भी हैं खाते गये।
       
 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
   स्वरचित, मौलिक

Wednesday, December 9, 2020

कलवरी(भारतीय नौसेना दिवस पर विशेष)


 
लंदन देखी, पेरिस देखी,और देखी जापान।
अमेरिका देखी, रसिया देखी,देखी पाकिस्तान।
घूम-घूम कर देखी हूं भाई,मैं सारा जहान।
सारे जग में कहीं न दिखती, कलवरी जैसी शान।

इसके जैसा कहीं न दिखती नौसेना में पनडुब्बी।
छुपकर तन्मयता से,हमले करना है इसकी खूबी।
भारत ने निर्माण किया खुद, इसका है अभिमान।
सारे जग में कहीं न .................

टाइगर शार्क सी शक्ति शाली, डीजल से चलनेवाली।
मझगांव में निर्मित, इलेक्ट्रिक अटैक करनेवाली।
भारत की रक्षा करने वाली,देश की है यह जान।
सारे जग में कहीं न..............

भारत मां की रक्षा करते हैं , इसमें बैठ सिपाही।
योगी बनकर साधना करते, दृढ़- संकल्प ये राही।
आठ दिसंबर ,नौसेना दिवस पर, रखें इसका मान।
सारे जग में कहीं न...............
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Tuesday, December 8, 2020

तुझपर है विश्वास हमें



आई है विपदा घोर,
       विवश यहां सब लोग खड़े।
दिशा-दिशा चहुं ओर,
          सब हैं अपने घर में पड़े।
बड़ा भयंकर रोग,
            छाया है दुनियां भर में।
यह कैसा संयोग,
            युक्ति नहीं कोई नर में।
सबके जीवन में आज,
            फैला है अंधकार घना।
बंद पड़े सब काज,
         आना-जाना सब है मना।
कटता नहीं है दिन,
          मास दस अब बीत गए।
पल-पल,छन-छन गिन,
    सब जन अब भयभीत भए।
होगी अपनी जीत,
            आज हैं हम हारे-हारे।
घर में रहें सब मीत,
         विमुख होंगे संकट सारे।
उबारो हमको आज,
      भगवन तुझपर आस हमें।
कहां छुपे महाराज,
          तुझपर है विश्वास हमें।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                स्वरचित, मौलिक

Sunday, December 6, 2020

संयुक्त परिवार



दादाजी खटिया बुन रहे हैं , नीम पेड़ के नीचे।
दादी माँ सहयोग में,रस्सियों को पकड़कर खींचे।

मंझली बूआ बैठ चरखे से , सूत कात रही है।
पाँव पर रख  फूफाजी की चिट्ठी बाँच रही है।

बड़ी दीदी कुएँ से खींचकर,पानी भरती जाती।
छोटी दीदी घड़े उठाकर,आँगन में है पहुँचाती।

सँबरी गैया आकर घड़े से, पी रही है पानी।
पिताजी जा रहे हैं देने , बैलों को गुड़धानी।

कुत्ते को देखो भूख लगी है,झाँक रहा है खपड़ी।
बछड़ा लिए आस खड़ा है,मिलेगी रोटी की पपड़ी।

अम्मा ने आकर खबर सुनाई,भोजन है तैयार।
चलें साथ बैठकर खालें, हिल-मिल पूरा परिवार।

गाँव में यह परिवार हमारा, सदा रहते खुशहाल।
सब मिल सब काम करते किसी को नहीं मलाल।

                सुजाता प्रिय,राँची
                  स्वरचित,मौलिक