Friday, April 24, 2020

बेचारा चूल्हा

चूल्हे में आग जलता है और चुल्हे को जलाता है।
पर, बेचारा चूल्हा कुछ भी तो नहीं कह पाता है।

क्योंकि उसे जलना है बस भोजन पकाने के लिए।
और उसे तपना है सभी चीजों को तपाने के लिए।

जब चाहो रात-बिरात सुबह-शाम और दोपहर।
रहता है तैयार सदा बन- ठन और सज - सँवर।

अच्छी-अच्छी और चटपटी चीजें बनाने के लिए।
स्वादिष्ट भोजन बनबाकर हमें खिलाने के लिए।

बेचारा खाता है क्या?गोबर से बनी हुई रोटियाँ।
और साथ में सुखी हुई लकड़ियों की सब्जियाँ।

कोयले की बर्फियाँ और लड्डू उसे बहुत भाता है।
भूसे की भुजिया,पत्तों के पराठे भी पसंद आता है।

किसी जमाने में वह पीता था किरोसिन का शर्बत।
और खाना बनाने के लिए जलता था भक - भक।

धीरे-धीरे उसका रंग-रूप और स्वरूप बदलने लगा।
मिट्टी और लोहे के बाद स्टील का बन चमकने लगा।

अब तो बेचारा चूल्हा जिंदा है तो बस गैस के सहारे।
उसकेे भोजन के खत्म होते जा रहे  हैं साधन सारे।

अब गोबर की रोटियाँ कहाँ मिलेगी गोपालन होता नहीं।
पत्तों के पराठे लकड़ियों की सब्जीवृक्षारोपन होता नहीं।

अब तो खादान में देखिए जाकर कोयले भी घट रहे हैं।
हरे-भरे जंगल अब गायब होकर मरुभूमि में पट रहे हैं।
                    सुजाता प्रिय 'समृद्धि' , स्वरचित
                             २५/०४/२०

Thursday, April 23, 2020

बड़ों का फर्ज

एक गाय जब गौशाले से निकलकर घास चरने जाती तो किसी-किसी घर के दरवाजे पर उसे एक-एक रोटी मिल जाती।उसे वह बहुत खुश होकर खाती।एक दिन जब उसे पहली रोटी मिली और वह उसे खाने के लिए बढ़ी,तभी एक कुत्ता रोटी लेने के लिए झपटा।गाय रोटी छोड़ कर आगे बढ़ गई।
दूसरे दरवाजे पर भी उसे रोटी मिली । उस समय भी एक बिल्ली सहमती हुई आई और रोटी लेने के लिए बढ़ी। गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
अगले दरवाजे पर भी उसे रोटी मिली ।एक मुर्गा दौड़ता हुआ लपका।गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
कुछ दूर चलने के पश्चात फिर किसी ने उसे रोटी दी।एक कौआ भूख से व्याकुल हो उसे उठाना चाहा।गाय ने उस रोटी को भी छोड़ दिया।
उसकी इस क्रिया को उसके निकट घास चरता हुआ एक साँढ़ बड़ी तन्मयता से देख रहा था।उसने गाय से पूछा-तुमको इतनी रोटियाँ खाने के लिए मिलती हैं जिसे खाकर तम्हारा पेट भर जाता।पर, तुम उन प्राणियों के आगे बढ़ते ही उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी।क्या तुम्हें रोटियाँ अच्छी नहीं लगती।
गाय बोली- मुझे रोटियाँ अच्छी तो बहुत लगती हैं।लेकिन उतनी रोटियों से मेरा पेट नहीं भरता।अगर मैं उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी तो उनकी भूख तो मिटी।मैं तो अपना पेट घास खाकर भी भर लूँगी।लेकिन कुछ जीव एेसे हैं जो घास नहीं खा सकते।उनके लिए रोटियाँ उपयोगी थीं।फिर मै उन सभी से बड़ी हूँ।इसलिए, मेरा फर्ज है कि मैं अपने से छोटों का ख्याल रखूँ।
साँढ़ ने उसे सम्मान से देखते हुए कहा-तुम्हारी इन्हीं ममतापूर्ण गुणों के कारण तो सभी लोग तुम्हें माँ कहते हैं।सचमुच तू बड़ी महान है।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित मौलिक
          २४/०४/२०

Tuesday, April 21, 2020

विश्व धरती दिवस पर माँ धरती को समर्पित

धन्य माँ धरती

धन्य-हो तू हे माँ धरित्री,
    हमको तूने जन्म दिया।
        गोद बैठाकर पाला-पोसा,
            और खाने को अन्न दिया।

नदी-तालाब,झील-झरनों से,
    तूने पीने को जल दिया।
        तन मे शक्ति भर जाने को,
            साग-सब्जी और फल दिया।

गिरी-कंदराओं,पेड़-गुफा में,
    जीवों को आवास दिया।
        वायु से शुद्ध संजीवनी दे,
             फूलों से सुवास दिया।

दिन में प्रकाश फैलाने को,
    सूर्य से ले रोशनी दिया।
        काली रात का तम हरने,
            चँदा से ले चाँदनी दिया।

धूरी पर अपनी घूमकर,
    तूने हमको दिन-रात दिया।
        सूरज की परिक्रमा कर,
            त्रृतुओं की सौगात दिया

दुनियाँ के सब जीवों को,
    माँ तू ही पालन करती है।
        हम सबको तू धारण करती,
            नाम तेरा  तभी तो धरती है।

तुम्हें बचाने को माँ धरती।
    हमसब मिल संकल्प करें।
        संरक्षण तुझको देने को,
            तुमको हमसब स्वच्छ करें।

      .         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       .           स्वरचित मौलिक
       .              २२/०४/२०२०

Monday, April 20, 2020

गजल


मेरे लिए मन में प्यार पालकर देखो,
एक नजर मुझपर डालकर दैखो।

माना मैं कोई हूर की परी ना हूँ,
तुम अपने रूप को खंगालकर देखो।

किसी बहकावे में कतराओ ना मुझसे,
अपने दिल में मुझे संभालकर देखो।

मैं बुरी लगती हूँ महफिल में अगर,
दिल में मेरा अक्श डालकर देखो।

क्यूँ इतराते हो खुद पे मीत मेरे तुम,
अपने मन में थोड़ा सवाल कर देखो।

आज तुझसे मेरी यह गुजारिस है कि,
मेरे साथ खुद को भी ढालकर देखो।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'
         स्वरचित मौलिक

Thursday, April 16, 2020

बचा लो भगवन

बड़ा भयंकर रोग है छाया।
सबके मन में भय समाया।

यह कैसी आयी महामारी।
जिससे डरती दुनियाँ सारी।

नागिन से भी यह भयंकर।
बिन देखे सब भागे डरकर।

सब जन थर-थर काँप रहे हैं।
कहाँ तक पहुँची भाँप रहे हैं।

अपने घर में हैं छुपकर बैठे।
मित्र जनों से हम रहते ऐठे।

महीने भर से हैं कैद पड़े हम।
घर में भी भयभीत खड़े हम।

मानव से अब मानव हैं डरते।
नाक-मुँह को ढककर रखते ।

मिलने-जुलने से हैं कतराते।
पास जाने से भी हैं घबराते।

आकर हमें बचा लो भगवन।
भय से मुक्त करा दो भगवन।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             १४/०४ /२०२०

Tuesday, April 14, 2020

उम्मीद न छोड़ो ( गजल )


अकेले खड़े हो मुझे तुम बुला लो।
मायुस क्यों हो ,जरा मुस्कुरा लो।

रात है काली और अँधेरा घना है,
तम दूर होगा तू दीपक जला लो।

उम्मीद न छोड़ो, मंजिल  मिलेगी,
जो मन में बुने हो सपने सजा लो।

देखो तो कितनी है रंगीन दुनियाँ,
इन रंगों को लेकर उर में समा लो।

रूठा न करना कभी भी किसी से,
रूठे हुए को जरा तुम मना लो।

पराये को अपना बनाना  कला है,
अपनों को अपने दिल में बसालो।

बुराई किसी की तू मन में न लाओ,
अच्छाईयों को भी अपना बना लो।

प्यार सिखाता जो वह गीत गाओ,
झंकार करता  गजल गुनगुना लो ।
           सुजाता प्रिय
           राँची झारखंड

Monday, April 13, 2020

सत्तु के गुण

सुन-सुन, सुन भाई सुन।
    सत्तु के हैं बड़े-बड़े गुण।
        बता रही सबको चुन-चुन।
           बनता है अनाजों को भुन।

  बहुत सरल आहार है यह।
       बना-बनाया तैयार है यह।
          खाने में बड़ा मजेदार है यह।
               भोजन का उपहार है यह।

शरीर में है ठंढक पहुँचाता।
    लू-गर्मी यह से हमें बचाता।
        बीमारियों को दूर भगाता।
 .          स्वस्थ्य-निरोग हमें बनाता।

गुथकर खाते ,घोलकर पीते।
    नमक, चीनी मिलाकर पीते।
        खूब सुहाती सत्तु-भरी रोटी।
   .        अच्छी लगती इसकी लिट्टी।

चने का सत्तु ,जौ का सत्तु।
   बहुत प्रकार के हो तो सत्तु।
       खा लो सत्तु औ पी लो सत्तु।
          आ बहना तुम भी लो सत्तु।
     
                सुजाता प्रिय (स्वरचित)
                      १४/०४/२०२०